Monday, 27 August 2012

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Monday, 27 August 2012  
(अधिक-भाद्रपद शुक्ल एकादशी , वि.सं.-२०६९, सोमवार)

 (गत ब्लागसे आगेका)
पालन-पोषण व शिक्षा पाकर ही मानव कुछ देने के योग्य होता है । इससे स्पष्ट है कि लिया हुआ देना है । परिवार के जो सदस्य समर्थ हैं वे असमर्थ बालकों और वृद्धों की सेवा करें। यह सद्भावना समाज के लिए उपयोगी है । जिसकी सेवा की जाती है उसकी अपेक्षा सेवा करनेवाले का अधिक विकास होता है।

सम्पन्न व्यक्ति दुखियों के काम आयें - क्योंकि समस्त बल निर्बलों की धरोहर है । सबके भले में ही अपना भला है । सबल व निर्बल की एकता ही समाज का सुन्दर चित्र है ।

संसार उसी को प्यार करता है जो दूसरों के काम आता है। और संसार के काम वही प्राणी आता है जो सब प्रकार से भगवान् का हो जाता है ।

पूर्ण जीवन क्या है ?- शरीर विश्व के काम आ जाए,हृदय प्रीति से छका रहे और अहम् अभिमान शून्य हो जाय।

अपनी व्यक्तिगत कोई भी वस्तु नहीं है, और एक सत्ता के सिवाय कुछ भी नहीं है । 


॥ हे मेरे नाथ! तुम प्यारे लगो, तुम प्यारे लगो! ॥

- (शेष आगेके ब्लागमें)

Wednesday, 22 August 2012

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Wednesday, 22 August 2012  
(श्रावण अधिक-भाद्रपद शुक्ल पंचमी , वि.सं.-२०६९,बुधवार) 
(गत ब्लागसे आगेका)
  सब साधनों का सार

1. भक्ति : सब प्रकार से प्रेम के पात्र हो जाओ यही भक्ति है

2. मुक्ति : अपनी प्रसन्नता के लिए किसी अन्य की ओर मत देखो । यही मुक्ति है

3. त्याग : संसार की दासता मन से निकाल दो यही त्याग है

4. जो कुछ हो रहा है, वह मंगलमय विधान से हो रहा है - ऐसा मान लेने से निश्चिन्तता आती है

5. जो शरीर, प्राण आदि वस्तु व्यक्ति को अपना नहीं मानता - वह निर्भय हो जाता है ।

6. जो "है" (भगवान्) वही मेरा अपना है - इसमें जिसने आस्था स्वीकार कर ली, उसी में प्रियता उदित होती है

7. निश्चिन्तता से शान्ति, निर्भयता से स्वाधीनता तथा प्रियता से रस की अभिव्यक्ति होती है । यही मानव की माँग (लक्ष्य) है

8. उसे सब कुछ मिल जाता है जो किसी का बुरा नहीं चाहता है ।

9. कार्य उसी का सिद्ध होता है, जो दूसरों के काम (न्यायोचित काम) आता है ।

10. मोहयुक्त क्षमा, क्रोधयुक्त त्याग और लोभयुक्त उदारता निरर्थक है ।

11. भाव में पवित्रता हो, कार्य में कुशलता हो और लक्ष्य (परमात्मा) पर दृष्टि हो, तो प्रत्येक प्रवृति से परमात्मा की प्राप्ति हो जाती है ।

- (शेष आगेके ब्लागमें) .......

Tuesday, 21 August 2012

धर्म

                 धर्म

जिस प्रवर्ती में त्याग तथा प्रेम भरपूर  है , वही वास्तव में धर्म है ।  संत समागम २/२७९

जो प्रवर्ती धर्मानुसार की जाती है, उसमे भाव का मूल्य होता है क्रिया का नहीं । भाव को मिटा कर क्रिया को मूल्य देना पशुता है ।  संत समागम २/२७८

धर्म का मतलब है जो नहीं करना चाहिए,  उसको छोड़ दो तो जो करना चाहिये, वही होने लगेगा ।   संतवाणी ५/१७९

आप जानते है मजहब की आवस्यकता  क्यों होती है ? अपने जाने हुए असत का त्याग करने के लिए ।  जीवन पथ १३१-१३२

धर्म एक है अनेक नहीं । जिस प्रकार रेलवे स्टेशन पर मुसलमान के हाथ में होने से ;मुसलमान पानी' और हिन्दू के हाथ में होने से 'हिन्दू पानी'  कहलाता है , यदपि बेचारा पानी न तो हिन्दू होता है न मुसलमान । उसी प्रकार जब लोग धर्मात्मा को किसी कल्पना में बांध  लेते है, तब उसके नाम से उस धर्म को कहने लगते है ।   संत समागम १/५८

सभी बंधन प्राणी  में उपस्थित है, परिस्थिति में नहीं । प्रतिकूल परिस्थिती का भय नास्तिक अर्थात धर्म रहित प्राणियो को होता है । धर्मात्मा प्रतिकूल परिस्थितियो से नहीं डरता, प्रत्युत उसका सदुपयोग करता है ।    संत समागम २/२८०

मानवमात्र का धर्म भिन्न नहीं हो सकता । मानवमात्र का धर्म एक ही है ।  संत वाणी ८/१११

धर्म माने संसार के काम आ जाओ । और संसार के काम कैसे आओगे ? इस सत्य को स्वीकार करो की मन से, वाणी से, कर्मे से, कभी किसी को हानि नहीं पंहुचाउंगा  । संत वाणी ८/१०९

Monday, 20 August 2012

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Monday, 20 August 2012  
(श्रावण अधिक-भाद्रपद शुक्ल तृतीया, वि.सं.-२०६९, सोमवार)

(गत ब्लागसे आगेका)

             धन

        धन संग्रह से कोई निर्धनता मिट जाये - यह बात नहीं है । (संतवाणी 5/231)

      जब तक भौतिक मन में 'अर्थ'  का महत्व है, तब तक उसका अपव्यय मन में खटकता है और उसकी प्राप्ति सुखद प्रतीत होती है ।  (पाथेय 30)

       क्या कर्जा बाटने वाला गरीब नहीं है । कर्ज लेने वाला ही गरीब है क्या ? सोचो जरा इमानदारी से । (संतवाणी  8/14)

        कुछ लोग तो यही घमंड  करते हैं कि हमारे पास सम्पत्ति सबसे अधिक है । उन्होंने यह कभी नहीं सोचा कि हममें बेसमझी सबसे अधिक है । विचार करे, सम्पत्ति के आधार पर जो तुम्हारा महत्व है, शायद  उससे अधिक बेसमझी और कही नहीं मिल सकती ।  (संतवाणी 7/122)

        संग्रह का अधिकार उन्ही  लोगो को है, जो अपने  लिए संग्रह नहीं करते ।  (मानव दर्शन 147)

        श्रम को सिक्के में बदलने से श्रम का महत्व नहीं बढ़ता।   (दर्शन और निति 54)

       निर्धन वह है जिसे, दूसरे का धन अधिक दिखाई देता है और अपना धन कम दिखाई देता है ।    (संत समागम 2/72)

         बाहर से जितना इकट्ठा करोगे, उतने ही भीतर से  गरीब होते चले जाओगे ।   (संतवाणी 8/17)

        धन का संग्रह करने की सामर्थ्य जिसमें होती है, उसमें धन का सदुपयोग करने की योग्यता नहीं होती । ऐसा नियम ही है । यदि सदुपयोग करना आ जाये तो वह संग्रह कर ही नहीं सकता ।  (संतवाणी 7/184)

        सिक्के से वस्तुओं का , वस्तुओं से व्यक्ति का,  व्यक्तियों से विवेक का और विवेक से उस नित्य जीवन का, जो परिवर्तन से अतीत है, अधिक महत्व है ।   (संत समागम 2/91)

        जिसके पास धन न हो, उसको दान  करने का संकल्प नहीं उठने देना चाहिए । ...... दान तो संग्रह करने का टैक्स है ।   (संत सौरभ 78)

- (शेष आगेके ब्लागमें) 'क्रान्तिकारी संतवाणी' पुस्तक से ।

Sunday, 19 August 2012

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Sunday, 19 August 2012
(श्रावण अधिक-भाद्रपद शुक्ल द्वितीया, वि.सं.-२०६९, रविवार)

(गत ब्लाग से आगेका)
     त्याग

        एक शरीर को लेकर कुटिया में  बंद कर दिया और हम त्यागी हो गए । मैं तो कहूँगा की तुम्हारे बाप भी त्यागी नहीं हो सकते । यदि पूछो क्यों त्यागी नहीं हो सकते ? तो कहना होगा की अपने अपने (अहम् का) त्याग तो किया नहीं । भाई मेरे अगर त्याग करना हो तो अपना त्याग करो । और प्रेम करना हो तो सभी को प्रेम करो । और यदि अपने-आप का त्याग नहीं कर  सकते तो आप संसार का भी त्याग नही कर सकते ।    (प्रेरणा पथ 187)

        त्याग क्या है ? मैं शरीर  और संसार से अलग हूँ । इसका फल क्या है ? अचाह होना, निर्मम होना और निष्काम  होना ।    (संत उदबोधन 105)

        त्याग का अर्थ है किसी वस्तु को अपना मत मानो । स्थूल, सूक्ष्म और कारण शारीर से  सम्बन्ध मत रखो । कर्म, चिन्तन एवं स्थिति किसी भी अवस्था में जीवन-बुद्धि मत रखो । किसी का आश्रय मत लो । किसी से सुख की आशा मत करो ।   ( संत उदबोधन 161)

        ममता, कामना और तादात्मय के त्याग का नाम 'संन्यास' है।   (संत उदबोधन 190)

        मानव का अपना हित तो त्याग में है ।  (मानव दर्शन 129)

        शरीर और संसार को छोड़ने का प्रश्न नहीं है । प्रश्न है कि शरीर और संसार से हमारा सम्बन्ध  न रहे ।  (संतवाणी 8/151)

        मोहयुक्त क्षमा और क्रोधयुक्त त्याग निरर्थक है ।  (संत समागम 2/344)

- (शेष आगेके ब्लागमें) 'क्रान्तिकारी संतवाणी' पुस्तक से।

Saturday, 18 August 2012

रोग

रोग

रोग शारीर की वास्तविकता समजहाने  के लिए आता है।   संत पत्रावली  १/११९

रोग पर वही विजय प्राप्त कर सकता है, जो शरीर  से असंगता का अनुभव कर लेता है  ।   संत पत्रावली  १/१२४

जब प्राणी तप नहीं करता, तब उसको रोग के स्वरुप  में तप करना पड़ता है ।  संत पत्रावली  १/१४९

प्राप्त का अनादर और अप्राप्त का चिंतन , अप्राप्त की रूचि और प्राप्त से अरुचि - यही मानसिक रोग है ।  साधन त्रिवेणी ६१

वास्तव में जीवन की आशा ही परम रोग है और निराशा ही  अरोग्यता है । देहभाव का  त्याग  ही सच्ची औसधि  है  ।  संत पत्रावली  २/३६

रोग प्राकृतिक तप है । उससे डरो मत । रोग भोग की रूचि का नाश तथा देहाभिमान गलाने के लिए आता है । इस द्रिस्टी से रोग बड़ी अवश्यक  वस्तु है ।  संत पत्रावली  २/१७०

सभी रोगों का  मूल एकमात्र राग है ।   पाथेय ४८ 

जो भोगी होता है , वह रोगी अवश्य होता है । यह नियम है ।  संतवाणी ५/१९२

रोग से शारीर की वास्तविकता का ज्ञान हो जाता है, जिससे भोग वासनाओ के त्याग करने की शक्ति आ जाती है ।  संत समागम २/३००

Friday, 17 August 2012

योग

योग


योग कब होता है ? की जब आपका शरीर  से संबंध नहीं रहता |   संत वाणी ५/२०३

राग रहित होते ही सबको योग मिल जायेगा |   संत वाणी ४/११९

भोग की रूचि रहते हुए योग की उपलब्धि संभव नहीं है |  चित शुद्धि २४७

भोग का अत्यन्त अभाव हो जाना ही वास्तव में योग है |  संत समागम १/५४

योग की शक्ति संचय होती है, तत्व साक्षात्कार  नहीं |   संत समागम १/२४९

भोग बुधि का अन्त होते ही योग बिना ही प्रयत्न  हो जाता है |   संत समागम १/२६९

योग तो शारीर विज्ञान और मनो विज्ञान- इन दोने से परे है |   संत वाणी २/३९

योग की इस परिभाषा पर गौर  कीजिये की सृष्टी का अपने लिए उपयोग करना भोग है, सृष्टी की सेवा में अपने तो त्याग देना योग है | परमात्मा को अपना मांगना योग है, परमात्मा से कुछ मांगना भोग है |    संत वाणी ७/७७

पराश्रय और परिश्रम  से रहित तथा हरी-आश्रय  और विश्राम के द्वारा जो जीवन है, वह जीवन जिसे पसंद है, वह योगी है | योग का उपाय क्या है ? हरी-आश्रय  और विश्राम |   संत वाणी ३/१२३



Thursday, 16 August 2012

ज्ञान

                                                                            ज्ञान


ज्ञान का सर्वोत्तम साधन केवल विचार है |  संत पत्रावली  १/९३

ज्ञान असत का होता है , प्राप्ति सत की होती है |   मानव दर्शन ९५

अल्प ज्ञान का दूसरा नाम अज्ञान है | अज्ञान का  अर्थ 'ज्ञान का अभाव' नहीं है |   मानव की  मांग  ६९   

अनुभव से पूर्व मान लेना आस्था है, ज्ञान नहीं | विकल्प रहित आस्था ज्ञान के समान प्रतीत होती है |  मूक सत्संग ८२

जो साधक अपने ज्ञान का आदर नहीं करता, वह गुरु और ग्रन्थ के ज्ञान का भी आदर नहीं कर सकता | जैसे जो नेत्रों के प्रकाश का उपयोग नहीं करता, वह सूर्य के प्रकाश का भी उपयोग नहीं कर पाता |   जीवन दर्शन २५८

अपने प्रति होने वाली बुराईओ  का ज्ञान जिस ज्ञान में है, वही ज्ञान मानव का वास्तव में पथ प्रदर्शक है | दर्शन और निति १५१

यह नियम है की जब तक अपना ज्ञान अपने काम नहीं आता, तब तक अन्य के द्वारा सुना हुआ ज्ञान भी जीवन नहीं हो पाता |  साधन तत्व २४

संतो का ज्ञान,आपका ज्ञान, और वेदों का ज्ञान   इनमे एकता है |  संत वाणी ५/१७८

भूल न जानने में नहीं है , प्रत्युत  जाने हुए को न मानने में है | चित शुद्धी १९७

कर्म ज्ञान का साधन नहीं होता, बल्कि भोग का दाता होता है | संत समागम १/२१६

Wednesday, 15 August 2012

कामना

                                                                   कामना


कामना के  रहते  जिज्ञासा  पूरी  नहीं  होती | संतवाणी ४/७३

अचाह होना जीते जी मरना है |   संतवाणी ३/९४

अगर हम अचाह हो जाये और मरने से न डरे तो अमर जीवन मिलता है |  संतवाणी ३/९१

कामना अगर पूरी होती है तो विधान से, कामना से नहीं | वस्तु यदि रहती है तो विधान से ममता से नहीं |  संतवाणी ६/१९

जो कुछ नहीं चाहता, वही अभय होता है  और दुसरो को अभय बनता है |   संतवाणी ७/१३६

अपना मूल्य संसार से अधिक बढाओ, आप  अचाह हो जायेंगे  | संत उदबोधन ९ 

कामनापूर्ति में पराधीनता है, त्याग में नहीं |  साधन निधि १३

किसी अभ्यास से कामनाओ का नाश नहीं होता |   साधन निधि १२

संसार से संबंध है सेवा करने के लिए और परमात्मा से सम्बन्ध है प्रेम करने के लिए | न संसार से कुछ चाहिए, न परमात्मा से कुछ चाहिए |  संत उदबोधन १२ 

हे प्यारे, तुम अपने हो ! तुमसे और कुछ नहीं चाहिए | क्यों नहीं चाहिए ? क्योकि अपनेपन से बढ़कर भी कोई और चीज होती तो हम जरुरु मांगते  |  जीवन पथ २८

Tuesday, 14 August 2012

गुरु

गुरु 


जो किसी का भी गुरु बनेगा, वह अपना गुरु नहीं बन सकता और जो अपना गुरु नहीं बन सकता, वह जगत का गुरु नहीं बन सकता |  संत वाणी ४/२१

गुरु के मिलने का मालूम है, फल क्या है ? गुरु हो जाना |  संत वाणी ४/१७५

विवेक ही वास्तव में गुरु तत्त्व है | कोई व्यक्ति किसी का गुरु है - इसके सामान कोई भूल ही नहीं है | कोई भी व्यक्ति किसी का भी सुधारक है - इसके सामान  कोई भूल नहीं | मानव का अपना विवेक ही अपना सुधारक है, वही उसका गुरु है, वही उसका नेता है, वही उसका शासक  है |  संत वाणी ५/२५२

गुरु की सबसे बड़ी भक्ति यह है की गुरु मिलना चाहे और सिष्य कहे की जरुरत नहीं है ; क्योकि जिसने गुरु की बात को अपनाया,उसमे गुरु का अवतरण हो जाता है |  संत वाणी ७/१४९

सच्चा गुरु वही है, जिसके जीवन से साधको को प्रकाश मिलता है | सिद्धांत की  चर्चा करने मात्र से वास्तव में  गुरु पद नहीं मिल जाता |  जीवन पथ ७८

विवेक को ही ज्ञान कहते है | ज्ञानरूपी जो गुरु है उसकी बात मान लोगे तो शरीर रुपी गुरु की जरुरत नहीं पड़ेगी | साधन त्रिवेणी ७६

अपने दोषों का ज्ञान जितना अपने को होता है उतना अन्य को हो ही नहीं सकता |..... अत दोष देखने और निवारण करने के लिए साधक को अपने ही ज्ञान को अपना गुरु बना लेना चाहिए |  जीवन दर्शन ८१

जो निज  स्वरुप  का आदर  करता  है वह गुरु,  इश्वर तथा संसार आदि को अपने में ही पा लेता है |   संत समागम १/२४०

सास्त्रो    में नेता या गुरु बनने  को पतन का हेतु माना है  | इससे सिद्ध होता है की यह काम महापुरुषों के ही उपयुक्त है | साधको को इस  बखेड़े  में कभी नहीं पड़ना चाहिए | संत सौरभ ५१

गुरु, ग्रन्थ, और सत-चर्चा  साधक में विद्यमान विवेक शक्ति  को विकसित कर सकते है | कोई नयी शक्ति प्रदान नहीं कर सकते |  संत सौरभ ९२

Monday, 13 August 2012

कर्तव्य

कर्तव्य


दुखी का कर्तव्य है त्याग और सुखी का कर्तव्य है सेवा |  मानवता की मूल सिद्धांत ५

दुसरे के अधिकार की रक्षा और अपने अधिकार का त्याग वास्तव में कर्तव्य है |   मानव दर्शन १५

जो किसी को भी बुरा समझता  है  तथा किसी का भी बुरा चाहता है एवं जानी हुई  बुराई करता है, वह कभी भी कर्तव्य की वास्तविकता से परिचित नहीं  हो सकता | कर्तव्य पालन से पूर्व कर्तव्य का ज्ञान अनिवार्य है | वह तभी संभव होगा, जब मानव यह स्वीकार कर ले की में किसी को बुरा नहीं समझूंगा   |  मानव दर्शन १२६

निष्काम कर्ता से ही कर्तव्य पालन होता है |  साधन निधि ११

दुसरे का कर्तव्य वही देखता है, जो अपने कर्तव्य का पालन नहीं करता | उन्होंने कृपा नहीं की यह कैसे जाना? आपको जो करना है वह कर डालो |  उनको जो करना है वह स्वयं करेंगे |    संत पत्रावली १/८७

जब तक हम अपने मन की बात पूरी करते रहेंगे, तब तक कर्तव्यनिष्ठ  नहीं हो सकेंगे | कर्तव्यनिष्ठ होने के लिए हमे दुसरे के अधिकारों के रक्षा करते हुए अपने अधिकारो का त्याग  करना होगा |  जीवन दर्शन ८८

कर्तव्य पालन में असमर्थता की बात मन में तब आती है, जब हम प्राप्त सामर्थ्य का व्यय सुख भोग में करने लगते है |  चित सुद्धि  १९

अधिकार तो कर्तव्य का दास है | जो अपने कर्तव्य का पालन करता है, उसको बिना अभिलाषा के भी अधिकार स्वयं प्राप्त  हो जाते है |  संत पत्रावली १/८९

कर्तव्यनिष्ठ होने पर जीवन तथा मृत्यु दोनों सरस हो जाते  है  और कर्तव्यचुय्त  होने पर जीवन नीरस तथा मृत्यु दुखद एवं भयंकर  होती है |   मानव की मांग १८२

Sunday, 12 August 2012

सेवा

सेवा

यदि आपको वस्तु नहीं मिलती तो इसका अर्थ यह है की आपने बल दुसरो की सेवा में लगाया  ही नहीं |  संत वाणी ३/३९

सेवक हम कब होंगे ? जब यह अनुभव करे की मेरा कुछ नहीं है, मुझे कुछ नहीं चाहिए ?    संत वाणी ७/३७

सेवा करने से मोह का नाश होता है और प्यार पुष्ट   होता है |   संत वाणी ७/१३८

जिसे अपने लिए कुछ नहीं करना होता, वही सेवा कर पता है |   संत वाणी ७/१४८

भलाई का फल मत चाहो , और बुरे रहित हो जाओ, यही तो सेवा का स्वरुप है |  साधन त्रिवेणी २९

भोगी के द्वारा सेवा की बात सेवा का उपहास है, और कुछ नहीं |  मानव दर्शन १४७

सेवा त्याग की भूमि तथा प्रेम की जननी है |  जीवन दर्शन १८९

लोभ और मोह में आबद्ध प्राणी सेवा नहीं कर सकता |  
जीवन दर्शन १८९ 

सेवा का मूल्य प्रभु देता है, संसार नहीं दे सकता |   संत-जीवन-दर्सन ९७

सेवा भाव है कर्म नहीं | इस दृष्टी से छोटी या बड़ी सेवा समान अर्थ रखती है  | सेवा का स्वरुप है प्राप्त सुख किसी दुखी की भेट कर देना और उसके बदले में सेवक कहलाने तक की आशा न करना | चितसुधि २९७

Saturday, 11 August 2012

एकता


 एकता

आज हम स्वरुप से एकता करने की जो कल्पना  करते है, वह विवेक की दृष्टी से अपने को धोखा  देना है अथवा भोली-भाली  जनता को बहकाना है | मानव की मांग १४

प्रत्येक व्यक्ति,वर्ग,देश यदि दुसरो की उपयोगिता में प्राप्त वस्तु,सामर्थ्य एवं योग्यता का व्यय करे    तो एक दुसरे  के पूरक हो सकते है  और फिर परस्पर स्नेह की एकता बड़ी ही सुगमतापूर्वक सुरक्षित रह सकती है, जो विकास  का मूल है | मानव दर्शन १७२

शरीर  का मिलन वास्तव में मिलन नहीं है | लक्ष्य तथा स्नेह की  एकता ही सच्चा मिलन है |  संत समागम २/३३६

दो व्यक्तियो के रूचि,सामर्थ्य  तथा योग्यता एक नहीं है; किन्तु लक्ष्य सभी का एक है | यदि इस वैधानिक तथ्य का आदर    किया जाये  तो भोजन तथा साधन की भिन्नता रहने पर भी परस्पर एकता रह सकती है |   मंगलमय विधान २२

अपने गुण और पराये दोष देखने से पारस्परिक एकता सुरक्षित नहीं रहती |  दर्शन और निति ६४

बाह्य भिन्नता के आधार पर कर्म में भिन्नता अनिवार्य है, पर आन्तरिक एकता होने के कारण प्रीति की एकता भी  अत्यंत अवश्यक है |......नेत्रों से जब देखते है, तब पैर से चलते है | दोनों की  क्रियाओ में भिन्नता है, पर भिन्नता नेत्र और पैर की एकता में हेतु  है | उसी प्रकार दो व्यक्तिओ में, दो वर्गों में,दो देशो में एक दुसरे की उपयोगिता के लिए भिन्नता है |  मानव दर्शन १७२ 


Friday, 10 August 2012

उपदेश

 उपदेश



उपदेश करने की जो सेवा है वह सबसे नीचे  दर्जे की सेवा है | संतवाणी ४/२२३

आप किसी को वह उपदेश नहीं बता सकते, जो वह नहीं जनता है | जब वह अपना ही जाना हुआ नहीं मानता, तो आपका बताया हुआ मान लेगा ?  संतवाणी ४/२२३

सही बताने का फल यह नहीं था की लोग हमारे पीछे ऐसे  चिपक जाये की पीछा ही न छोड़े | सही बताने का फल यह था का इन्हें हमारी जरुरत न रहे और जो काम हमे उनके साथ किया, वह दुसरो के साथ करने लग जाये | एक स्वाधीनता का साम्राज्य बन जाये |  संतवाणी ४/२२५

यह जो उपदेश करने वाली सेवा है, वह कम से कम की जाये | इस सेवा में मैंने बहुत कठिनाई सही है | आज भी सहनी पढती है |  संतवाणी ४/२२५

जरा सोचो, जिनके निर्णय में तुमको अविचल श्रधा नहीं है, उनके उपदेश से तुम्हारा क्या कल्याण होगा |       संतवाणी ४/२३७

सबसे बड़ा उपदेशक कौन है? जो जीवन से उपदेश करता है | वह सबसे बड़ा वक्ता है ,सबसे बड़ा पंडित है | सबसे बड़ा सुधारवादी है | और सबसे घटिया  कौन है ? जो परचर्चा करके उपदेश करता है | कभी व्यक्ति की चर्चा और कभी परिस्थतियो की चर्चा |  संतवाणी ३/५८

जो मनुष्य नेता  या प्रचारक बन जाता है या उपदेष्टा बन जाता है, उसका चित सुद्ध होना कठिन है | संत सौरभ ५३

कर्तव्य निष्ठ होने से कर्तव्य परायणता फैलती है, सम्ज्हाने  से नहीं, उपदेश करने से नहीं,शासन  करने से नहीं, भय देने से नहीं,प्रलोभन देने से नहीं |  संतवाणी ५/२५१



Thursday, 9 August 2012

उन्नति

उन्नति

शरीर  उन्नति के लिए 'सदाचार' परम आवश्यक    है , मानसिक उन्नति के लिए 'सेवा' परम आवश्यक  है, आत्मिक उन्नति के लिए 'त्याग' परम आवश्यक  है |  संत समागम १/३७

आत्मिक उन्नति होने पर और किसी उन्नति की आवस्यकता नहीं रहती |   संत समागम १/१३९

अगर आप भौतिक उन्नति करते है, तोह उसमे सयम,सदाचार,सेवा,त्याग और श्रम होना चाहिए | आस्तिकवाद की उन्नति ,द्रढ़ता, सरल विश्वास और शरणागति से होती है | और अध्यात्मवाद की उन्नति विचार,त्याग और निज ज्ञान के आदर से होती है |  संत समागम २/८२-८३

प्रत्येक उल्जहन उन्नति का साधन है ,डरो मत | उल्जहन रहित जीवन बेकार है | संसार में उन्ही प्राणियों की उन्नति हुई है जिनके जीवन में पग पग पर उल्जहन आई है |  संत समागम २/२२५

अगर तुम दुसरो के लिए बोलते हो, दुसरो के लिए सुंनते हो, दुसरो के लिए सोचते हो , दुसरो के लिए काम करते हो तोह तुम्हारी भौतिक उन्नति होती चली जाएगी | की बाधा नहीं डाल सकता | अगर तुम केवल अपने लिए सोचते हो तो  दरिद्रता कभी नहीं जाएगी |  संत वाणी ८/१७

मैं तोह इस नतीजे पर पंहुचा हु की हम सबका वर्तमान हम सबके विकास के हेतु है ; चाहे दुखमय है वर्तमान, चाहे सुखमय है |  संत वाणी ४/९८

मनुष्य के विकास  में जो प्रेम का विकास है ,वह अंतिम विकास है | स्वाधीनता दुसरे नंबर का विकास है और उदारता तीसरे नंबर का  विकास है | साधन त्रिवेणी ११४

संसार हमारी आवस्यकता  अनुभव करे - यह भौतिक उन्नति है |और हमे  संसार की आवस्यकता न  रहे यह अध्यात्मिक उन्नति है | संत वाणी (प्रश्नोत्तर) ९७

Wednesday, 8 August 2012

आस्था

आस्था

संदेह रहते आस्था सजीव नहीं होती | मानव दर्शन १७

यह अवश्यक नहीं है के आस्था विवेक से समर्थित हो, पर यह अवश्यक है के आस्था में विवेक का विरोध न हो |   मानव दर्शन १८

संदेह देखे हुए में होता है, बोध जाने हुए का होता है, और आस्था सुने हुए में होती है |  मानव दर्शन ५३

जब मिला हुआ और देखा हुआ अपने को संतुस्ट नहीं कर पाता, तब स्वाभाव से ही बिना जाने हुए मे आस्था होती है |  मानव दर्शन ८८

अधूरे ज्ञान से जिज्ञासा  जागृत होती है, आस्था नहीं | आस्था एकमात्र उसी में हो सकती है, जिसे कभी भी इन्द्रय तथा बुधि द्र्स्टी    से अनुभव नहीं किया | मानव दर्शन ८८

'नहीं' की  निवर्ती में विचार है, और 'है' की प्राप्ति में आस्था ही समर्थ है |  मानव दर्शन ९५

आस्था 'स्व' के द्वारा होती है | उसके लिए कोई करण अपेक्षित नहीं है |  मानव दर्शन ९७

जिसने आस्था स्वीकार की है, वह कोई करण नहीं है, अपितु  कर्ता है |  मानव दर्शन ९७

आस्था का उपयोग कामना की पूर्ति तथा निवृति में करना आस्था का दुरूपयोग है | आस्था का सदुपयोग एकमात्र आत्मीयता पूर्वक प्रियता की जाग्रति में ही है | मानव दर्शन ९९

आस्था देखे हुए तथा मिले हुए तथा देखे हुए में हो ही  नहीं  सकती, अपितु उसी में हो सकती है, जिसे देखा नहीं है |  मानव दर्शन १०२

मिले हुए का उपयोग किया जा सकता है,उसमे आस्था नहीं की जा सकती | देखे हुए पर विचार किया जा सकता है, आस्था नहीं की जा सकती | सुने हुए में आस्था की जा सकती है , उस पर विचार नहीं किया जा सकता |  साधन निधि ३८

Tuesday, 7 August 2012

उदगार

 उदगार


शरीर  सदैव  म्रत्यु में रहता है , और मैं  सदेव अमरत्व मैं  रहता हु , यह मेरा परिचय है | प्रबोधनी १

 अरे दुनिया के दुखियो !  अब देर मत करो  ! व्याकुल ह्रदय से आनंदघन भगवान् को बुलाओ , वे अवश्य  आयेंगे, आयेंगे, आयेंगे |  संत पत्रावली १/७२

हे पतितपावन सर्वसमर्थ भगवान् ! आप अपनी और देख कर अपने इस पतित प्राणी को अपनाइए , जिससे इसका उद्धार तथा आपका नाम सार्थक हो | संत पत्रावली १/८०

तुम यह बात अपने मन से सदा के लिए निकल दो की मेरे समीप आने पर ही मेरी सेवा होगी | तुम जितना  अपने को सुन्दर  बना  लोगे ,उतनी  ही मुझे  प्रसन्नता   होगी और वही  मेरी सच्ची सेवा होगी |  संत पत्रावली २/३५

वास्तव   में तो  मानव  मात्र   के अनुभूति  ही मानव-सेवा-संघ का साहित्य है |   पाथेय १०३ 

जिसने जाने हुए असत के त्याग द्वारा असाधन का अंत कर साधन  परायणता प्राप्त की, उसने तो मेरी बड़ी सेवा की है | जो अपने लिए तथा जगत के लिए एवं प्यारे प्रभु  के लिए उपयोगी है , वही मुझे परम प्रिय है |      पाथेय १३०

तुम कभी अपने स्वरुप को मत भूलो | यही मेरी सर्वोतकर्स्ट  सेवा है |  पाथेय ३२४

गीता के रचियता से मेरा बड़ा भरी सम्बन्ध  है | वे मेरे बड़े मित्र है | मैं गीता का बड़ा आदर करता हु ; क्युकी यह मेरे दोस्त की बातचीत  है |   संतवाणी ७/१६९

मेरा बचा हुआ काम है - सोयी मानवता को जगाना |  संतवाणी ३/४०

- (शेष आगेके ब्लागमें)

Monday, 6 August 2012

सन्त हृदय की करूण पुकार

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

 सन्त हृदय की करूण पुकार

 

हे हृदयेश्वर, हे सर्वेश्वर, हे प्राणेश्वर, हे परमेश्वर।
हे हृदयेश्वर, हे सर्वेश्वर, हे प्राणेश्वर, हे परमेश्वर।
हे हृदयेश्वर, हे सर्वेश्वर, हे प्राणेश्वर, हे परमेश्वर।
हे हृदयेश्वर, हे सर्वेश्वर, हे प्राणेश्वर, हे परमेश्वर।
हे हृदयेश्वर, हे सर्वेश्वर, हे प्राणेश्वर, हे परमेश्वर।

हे समर्थ हे करूणासागर विनती यह स्वीकार करो,
हे समर्थ हे करुणासागर विनती यह स्वीकार करो,
भूल दिखाकर उसे मिटाकर अपना प्रेम प्रदान करो।
भूल दिखाकर उसे मिटाकर अपना प्रेम प्रदान करो।

पीर हरो हरि पीर हरो हरि पीर हरो प्रभु पीर हरो।
पीर हरो हरि पीर हरो हरि पीर हरो प्रभु पीर हरो।



॥ हे मेरे नाथ! तुम प्यारे लगो, तुम प्यारे लगो! ॥
॥ O' My Lord! May I find you lovable, May I find you lovable! ॥ 

Sunday, 15 July 2012

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Sunday, 15 July 2012  
(श्रावण कृष्ण द्वादशी, कामदा एकादशीव्रत, वि.सं.-२०६९, रविवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
किसी का बुरा न चाहना

        भौतिक बल कभी भी साधन-निधि से सम्पन्न पर विजयी नहीं हो सकता। उसकी दृष्टि में शरीर का रहना, न रहना समान अर्थ रखता है; कारण, कि उसने अपने ही में सब कुछ पा लिया है । उसमें पराधीनता की गन्ध भी नहीं है। यह साधननिष्ठ होने की महिमा है । इस कारण कितना ही भौतिक बल क्यों न हो, यदि मानव साधक होकर साधननिष्ठ हो जाता है, तब किसी सबल का अत्याचार उसे अपनी निष्ठा से विचलित नहीं कर सकता, उसके शरीर आदि वस्तुओं का भले ही नाश कर दे । बल के दुरूपयोग से उसे कोई अपने अधीन नहीं कर सकता। 

        साधन-निधि से सम्पन्न साधक की दृष्टि में शरीर आदि वस्तुओं का नाश कुछ अर्थ नहीं रखता; कारण, कि वह अविनाशी जीवन से अभिन्न हो जाता है । इतना ही नहीं, सर्वात्मभाव होने के कारण वह बल के दुरूपयोग करनेवाले पर भी अपने प्राणों की आहुति देता हुआ उसकी हित-कामना से उस पर विजयी होता है।

        प्राकृतिक नियमानुसार बल का दुरूपयोग निर्बलता को जन्म देता है, अर्थात् सबल बल के दुरूपयोग के कारण स्वयं निर्बल हो जाता है । हाँ, यह अवश्य है कि जो साधक साधन-निधि से सम्पन्न नहीं है, उसी पर भौतिक बल का प्रहार अपना अधिकार जमाता है । अतः किसी को बुरा न समझ कर, किसी का बुरा न चाह कर तथा किसी के साथ बुराई न करके साधन-निधि से सम्पन्न साधक बल के दुरूपयोग की भावना के नाश करने में समर्थ होता है । पराधीनता से उत्पन्न हुई सुख-लोलुपता उससे सबल के अत्याचार को सहन कराती है, जिसका नाश एकमात्र दुःख के प्रभाव से प्रभावित होकर साधन-निधि से सम्पन्न होने से ही सम्भव है ।

- (शेष आगेके ब्लागमें) 'साधन-निधि' पुस्तक से, (Page No. 37-38) ।

Thursday, 10 May 2012

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Thursday, 10 May 2012  
(ज्येष्ठ कृष्ण पंचमी, वि.सं.-२०६९, गुरुवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
किसी का बुरा न चाहना

        जब यह कहा जाता है कि किसी को बुरा न समझो, किसी का बुरा न चाहो एवं किसी की बुराई न करो, तब यह प्रश्न स्वतः उत्पन्न होता है कि जब सबल निर्बलों को सता रहे हैं, तब बेचारा निर्बल कैसे किसी को बुरा न समझे, तथा किसी का बुरा न चाहे? इस समस्या पर विचार करने पर ऐसा विदित होता है कि सबल निर्बल के प्रति बल का रूपयोग तभी करता है, जब किसी को निर्बल पाता है । यदि जीवन में निर्बलता न रहे, तो सबल अत्याचार नहीं कर सकता, यह निर्विवाद सिद्ध है ।

       सबसे बड़ी निर्बलता जीवन में कब आती है ? जब मानव प्रसन्नतापूर्वक मृत्यु को नहीं अपनाता, अपितु सबल के अत्याचार को स्वीकार कर जीना चाहता है । इस निर्बलता ने ही सबल की बल के दुरूपयोग करने की प्रवृति को पोषित किया है। मानव को अपना लक्ष्य अपने प्राणों से अधिक प्रिय होना चाहिए। लक्ष्य की सिद्धि के लिए हर्षपूर्वक प्राणों का त्याग करना आ जाय, तो कोई भी सबल निर्बल को अपने अधीन नहीं कर सकता। परन्तु प्राणों का प्रलोभन उससे अमानवतापूर्ण अत्याचार सहन कराता है ।

        भौतिक निर्बलताओं के कारण सबल के द्वारा किए गए बल के दुरूपयोग को सहन करना और उसके अधीन हो जाना, यह साधक का प्रमाद है, और कुछ नहीं ।

- (शेष आगेके ब्लागमें) 'साधन-निधि' पुस्तक से, (Page No. 36-37) ।

Wednesday, 9 May 2012

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Wednesday, 09 May 2012
(ज्येष्ठ कृष्ण चतुर्थी, वि.सं.-२०६९, बुधवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
किसी का बुरा न चाहना

        अपने पर अपना शासन करने की भावना एवं प्रवृति तभी जाग्रत होती है, जब उसे कोई दूसरा शासित न करे, अपितु आत्मीयतापूर्वक पीड़ित होकर सहयोग प्रदान करे। इस कारण किसी को बुरा समझना, किसी का बुरा चाहना और किसी के प्रति बुराई करना सर्वथा त्याज्य है । यही सर्वांश में बुराई-रहित होने का अचूक उपाय है ।

        बुराई-रहित जीवन की माँग सदैव सभी को रहती है । और बुराई-रहित जीवन में ही साधक का सर्वोतोमुखी विकास होता है। इस दृष्टि से बुराई-रहित होना वर्तमान का  प्रश्न है, जो एकमात्र साधन-निधि के सम्पादन से ही सम्भव है । साधन-निधि में ही साधक का जीवन और साध्य की प्रसन्नता निहित है। साधन-निधि प्रत्येक साधक को उपलब्ध हो सकती है । उससे निराश होना, अपने को उसका अधिकारी न मानना साधक की ही भारी भूल है, जिसका शीघ्रातिशीघ्र अन्त करना अनिवार्य है ।

        किसी को बुरा न समझने, किसी का बुरा न चाहने और किसी के प्रति बुराई बुराई न करने का निर्विकल्प निर्णय श्रम-साध्य उपाय नहीं है, अपितु अपने ही द्वारा अपने को स्वीकार करना है । जो अपने द्वारा करना है, उसमें पराधीनता तथा असमर्थता नहीं है - यह प्राकृतिक विधान है । विधान के आदर में ही मानव का अधिकार है । यह स्वाधीनता उसे उसके निर्माता ने दी है । मिली हुई स्वाधीनता का सदुपयोग ही तो मानव का परम पुरुषार्थ है । इस दृष्टि से साधन-निधि के सम्पादन में प्रत्येक साधक सर्वदा समर्थ है ।

- (शेष आगेके ब्लागमें) 'साधन-निधि' पुस्तक से, (Page No. 36) ।

Tuesday, 8 May 2012

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Tuesday, 08 May 2012
(ज्येष्ठ कृष्ण द्वितीया, वि.सं.-२०६९, मंगलवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
किसी का बुरा न चाहना

     क्षुभित तथा क्रोधित होने पर तो मानव में विनाश की भावना उत्पन्न होती है, जो किसी भी बुराई से कम नहीं है। विनाश की भावना में अपना ही विनाश निहित है; कारण कि 'पर' के प्रति जो किया जाता है, वह अपने प्रति हो जाता है, यह वैधानिक तथ्य है ।

        परहित में, पर-सेवा में साधक का अधिकार है । किसी को बुरा समझने, बुरा चाहने एवं किसी के साथ बुराई करने में साधक को कोई अधिकार नहीं है । इतना ही नहीं, परचिन्तन मात्र से ही साधक का अहित होता है । यद्यपि किसी न किसी नाते सभी अपने हैं । परन्तु जिसके नाते सभी अपने हैं, अपना तो वही है, अपने की प्रियता और उनके नाते सभी की सेवा ही तो साधक का जीवन है ।

       सेवा तभी सिद्ध होती है, जब शासक की भावना का सर्वांश में नाश हो जाय । सेवक शासक नहीं होता और शासक सेवा नहीं कर पाता । किसी को बुरा समझना, किसी का बुरा चाहना और किसी के प्रति किसी भी कारण से बुराई करना शासन की प्रवृति है, सेवा नहीं । शासक शासित का विकास नहीं कर पाता । सेवक के द्वारा सभी का विकास होता है । साधक सभी  के लिए उपयोगी हो, यही तो उसकी वास्तविक माँग है ।

        जो किसी के लिए भी अनुपयोगी होता है, वह साधक नहीं है। किसी के लिए उपयोगी और किसी के लिए अनुपयोगी हो जाना शासन करना है, सेवा नहीं । उसका परिणाम कभी भी हितकर सिद्ध नहीं होता । इतना ही नहीं, दो देशों, दलों, वर्गों, व्यक्तियों आदि में परस्पर वैर-भाव ही दृढ़ होता है, जो विनाश का मूल है। हाँ, साधक अपने ही द्वारा अपने पर शासन करता है और की हुई भूल नहीं दोहराता, अर्थात् वर्तमान निर्दोषता सुरक्षित रखता है, जो सर्वतोमुखी विकास की भूमि है ।

- (शेष आगेके ब्लागमें) 'साधन-निधि' पुस्तक से, (Page No. 35-36) ।

Monday, 7 May 2012

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Monday, 07 May 2012
(ज्येष्ठ कृष्ण प्रतिपदा, वि.सं.-२०६९, सोमवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
किसी का बुरा न चाहना

        बुराई करने की अपेक्षा किसी का बुरा चाहना बहुत बड़ी बुराई है । यद्यपि किसी का बुरा चाहने से उसका बुरा हो नहीं जाता, परन्तु बुरा चाहने से बुरा चाहनेवाले की बहुत  भारी क्षति होती है । इतना ही नहीं, बुराई करने पर तो करनेवाले में परिवर्तन भी आता है और वह बुराई करने से अपने को बचाने का प्रयास भी करने लगता है, किन्तु बुरा चाहने से तो भाव में अशुद्धि आ जाती है ।

      भाव कर्म की अपेक्षा अधिक विभु और स्थायी होता है । इस कारण बुरा चाहने से बुराई करने की अपेक्षा अधिक क्षति होती है। जो किसी का बुरा नहीं चाहता, उसमें सर्वहितकारी भावना तथा करुणा स्वतः जाग्रत होती है । इस दृष्टि से बुरा चाहने की प्रवृति सर्वथा त्याज्य है ।

        जब साधक किसी का बुरा नहीं चाहता, तब उसमें उसके प्रति भी करुणा जाग्रत होती है, जो उसे बुराई करता हुआ प्रतीत होता है और उसके प्रति भी, जिसके प्रति बुराई की जा रही है।  उसकी सद्भावना दोनों ही पक्षों के प्रति समान रहती है । इस कारण उसमें क्षोभ तथा क्रोध की उत्पत्ति ही नहीं होती, जिससे वह स्वभाव से ही कर्तव्यनिष्ठ हो जाता है और उससे सभी का हित होने लगता है । यह ध्रुव सत्य है ।

- (शेष आगेके ब्लागमें) 'साधन-निधि' पुस्तक से, (Page No. 34-35) ।

Sunday, 6 May 2012

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Sunday, 06 May 2012
(वैशाख पूर्णिमा, वि.सं.-२०६९, रविवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
किसी के साथ बुराई न करना

       यदि कोई स्वयं अपने को दोषी स्वीकार करे, तब भी साधक उसे उसकी वर्तमान निर्दोषता का स्मरण दिलाकर उसे सदा के लिए निर्दोषता सुरक्षित रखने की प्रेरणा देता है और उससे वर्तमान निर्दोषता के अनुरूप ही व्यवहार करता है । इस दृष्टि से परस्पर निर्दोषता सुरक्षित रखने का बल प्राप्त होता है ।

        जगत् के प्रति इस प्रकार का सम्बन्ध स्थापित करना जगत् के लिए मंगलकारी है । अपने द्वारा जगत् का अहित न हो, इसमें साधक की अविचल निष्ठा रहनी चाहिए । यह तभी सम्भव होगा, जब वह वर्तमान निर्दोषता के आधार पर किसी को बुरा न समझे और न किसी का बुरा चाहे एवं न किसी के साथ बुराई करे । 

       ऐसा होने पर ही सुगमतापूर्वक जीवन जगत् के लिए उपयोगी होता है, अथवा यों कहो कि जगत् के अधिकार की रक्षा हो जाती है । साधक पर जगत् और जगतपति दोनों का ही अधिकार है । अपने लिए उपयोगी हो जाने पर, अपने अधिकार का प्रश्न ही शेष नहीं रहता, किन्तु साधक के प्रति जगत् की उदारता और जगतपति की कृपालुता सदैव रहती है, यह मंगलमय विधान है ।

- (शेष आगेके ब्लागमें) 'साधन-निधि' पुस्तक से, (Page No. 29-30) ।

Saturday, 5 May 2012

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Saturday, 05 May 2012
(वैशाख शुक्ल चतुर्दशी, वि.सं.-२०६९, शनिवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
किसी के साथ बुराई न करना

       यह सभी को मान्य होगा, कि सर्वांश में कोई बुरा नहीं होता, सभी के लिए कोई बुरा नहीं हो सकता और बुराई नहीं कर सकता । बुराई की उत्पत्ति होती है, अर्थात् उसका कोई स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं है । इसी कारण बुराई न दोहराने से बुराई सदा के लिए मिट जाती है, यह मंगलमय विधान है । इस विधान का आदर करना प्रत्येक साधक के लिए अनिवार्य है । अतः बुराई करने का साधक के जीवन में कोई स्थान ही नहीं है ।

       जब साधक इस महाव्रत को अपना लेता है, तब बुरा नहीं रहता और जब बुरा नहीं रहता, तब बुराई की उत्पत्ति ही नहीं होती, जिसके न होने पर कर्तव्यपरायणता स्वतः आ जाती है, यह निर्विवाद सत्य है ।

        बुराई न करने का व्रत साधक को वर्तमान निर्दोषता से अभिन्न करता है । इस कारण उसके अहम् में से यह धारणा सदा के लिए निकल जाती है कि 'मैं बुरा हूँ' । प्राकृतिक नियमानुसार कर्ता में से ही कर्म की उत्पत्ति होती है । 

        जब साधक वर्तमान निर्दोषता के आधार पर अपने को निर्दोष स्वीकार कर लेता है, तब उसमें पुनः दोषों की उत्पत्ति नहीं होती । इस दृष्टि से बुराई-रहित होने का व्रत प्रत्येक साधक के लिए अनिवार्य है । इतना ही नहीं, दूसरों के सम्बन्ध में भी उसकी यही धारणा हो जाती है कि वर्तमान तो सभी का निर्दोष है।

- (शेष आगेके ब्लागमें) 'साधन-निधि' पुस्तक से, (Page No. 28-29) ।

Monday, 30 April 2012

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Monday, 30 April 2012
(वैशाख शुक्ल नवमी, वि.सं.-२०६९, सोमवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
किसी के साथ बुराई न करना

      निर्दोष जीवन से ही समाज में निर्दोषता व्यापक होती है ।  निर्दोष साधक दोषयुक्त मानव को देख, करुणित होता है, क्षोभित नहीं। उसे परदुःख अपना ही दुःख प्रतीत होता है और करुणित होकर उसके प्रति क्रियात्मक तथा भावात्मक सहयोग देने के लिए तत्पर हो जाता है ।

        उसका परिणाम यह होता है कि अपराधी स्वयं अपने अपराध को देख, निर्दोष होने के लिए आकुल तथा व्याकुल हो जाता है, और फिर वह बड़ी ही सुगमतापूर्वक वर्तमान निर्दोषता को सुरक्षित रखने में समर्थ होता है । इस प्रकार साधननिष्ठ जीवन से समाज में निर्दोषता व्यापक होती है ।

       बल का दुरूपयोग न करने से ही कर्तव्यपरायणता आती है और फिर उसके द्वारा सभी के अधिकार सुरक्षित हो जाते हैं, जिससे समाज में कर्तव्यपरायणता की अभिरुचि जाग्रत होती है।

      कर्तव्यनिष्ठ होने की माँग साधक को अकर्तव्य से रहित कर देती है, जिसके होते ही स्वतः कर्तव्यपरायणता आ जाती है। बुराई-रहित होने से बुराई का नाश होता है, किसी अन्य प्रकार से नहीं । इतना ही नहीं, बुराई के बदले में भी जब भलाई की जाती है तब बुराई करनेवाला बुराई-रहित होने के लिए तत्पर हो जाता है।

- (शेष आगेके ब्लागमें) 'साधन-निधि' पुस्तक से, (Page No. 28) ।

Sunday, 29 April 2012

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Sunday, 29 April 2012
(वैशाख शुक्ल अष्टमी, वि.सं.-२०६९, रविवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
किसी के साथ बुराई न करना

        परिवर्तनशील परिस्थिति मानव का जीवन नहीं हो सकती; कारण, कि जीवन अविनाशी है, विनाशी नहीं। अविनाशी जीवन की उपलब्द्धि किसी परिस्थिति विशेष से सम्बन्ध नहीं रखती । इसी कारण सभी परिस्थितियों में साधक को जीवन की उपलब्धि हो सकती है। इस दृष्टि से साधक का अपना मूल्य प्रत्येक परिस्थिति से अधिक है । पर यह रहस्य तभी स्पष्ट होता है, जब साधक को कर्तव्य-विज्ञान का बोध होता है ।

        यह सभी को मान्य है कि जबतक भूल-रहित होने की तीव्र माँग जाग्रत नहीं होती, तबतक निज-विवेक के प्रकाश में अपनी भूल देखना सम्भव नहीं होता, अर्थात अपने द्वारा अपनी भूल का ज्ञान नहीं होता । भूल के ज्ञान में ही भूल का नाश है । यह मंगलमय विधान है ।

       कर्तव्यनिष्ठ जीवन से दूसरों में अपनी-अपनी भूल देखने की माँग जाग्रत हो जाती है । कर्तव्य-निष्ठ मानव किसी को भयभीत नहीं करता, अपितु भय-रहित होने के लिए सहयोग प्रदान करता है । किसी को भयभीत करने से उसका कल्याण नहीं होता, अपितु किसी-न-किसी अंश में अहित ही होता है । भय देकर कोई भी राष्ट्र अपनी प्रजा को निर्दोष नहीं बना सका, यह अनुभव-सिद्ध सत्य है ।

- (शेष आगेके ब्लागमें) 'साधन-निधि' पुस्तक से, (Page No. 27-28) । 

Saturday, 28 April 2012

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Saturday, 28 April 2012
(वैशाख शुक्ल सप्तमी, वि.सं.-२०६९, शनिवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
किसी के साथ बुराई न करना

       अब विचार यह करना है कि कोई भी व्यक्ति बुराई क्यों करता है ? कर्म कर्ता का चित्र है और कुछ नहीं, अर्थात् कर्ता में से कर्म की उत्पत्ति होती है। जबतक मानव भूल से अपने को बुरा नहीं बना लेता, तबतक उससे बुराई नहीं होती । बुराई तभी कम हो सकती है, जब कर्ता बुरा न रहे । बुराई के बदले में बुराई करने से उत्तरोत्तर बुराई की वृद्धि होती है । उससे बुराई की निवृति नहीं होती । अतएव बुराई के बदले में भी बुराई न करना बुराई मिटाने में हेतु है ।

       इस दृष्टि से सर्वप्रथम प्रत्येक मानव को अपने को साधक स्वीकार करना अनिवार्य है । फिर अपने और जगत् के सम्बन्ध पर विचार करना चाहिए, तभी कर्तव्य-विज्ञान का भलीभाँती परिचय होगा, जिसके होने पर कर्तव्यपरायणता आएगी, जो जगत् के लिए उपयोगी सिद्ध होगी । 

        कर्तव्यपरायणता प्राप्त परिस्थिति से सम्बन्ध रखती है। इसी कारण उसको पालन करने में मानव सर्वदा स्वाधीन तथा समर्थ है । परन्तु अपने को साधक स्वीकार किए बिना परिस्थिति में जीवन-बुद्धि उत्पन्न होती है, जिसके होने से मानव परिस्थितियों का दास हो जाता है और फिर प्राप्त परिस्थिति का सदुपयोग नहीं कर पाता और अप्राप्त परिस्थितियों के चिन्तन में आबद्ध हो जाता है, जो विनाश का मूल है ।

- (शेष आगेके ब्लागमें) 'साधन-निधि' पुस्तक से, (Page No. 26-27) । 

Friday, 27 April 2012

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Friday, 27 April 2012
(वैशाख शुक्ल षष्ठी, वि.सं.-२०६९, शुक्रवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
किसी के साथ बुराई न करना

     बुराई को 'बुराई' जानकर न करना कर्तव्य-विज्ञान का आरम्भ है, किन्तु बुराई की उत्पत्ति ही न हो, यह कर्तव्य-विज्ञान की पूर्णता है ।

      किसी भय से भयभीत होकर बुराई न करना कर्तव्य की ओर अग्रसर होने का सहयोगी उपाय मात्र है, बुराई-रहित होना नहीं है। बुराई-रहित हुए बिना कर्तव्यपरायणता की अभिव्यक्ति ही नहीं होती ।

        बलपूर्वक की हुई भलाई कर्ता में अभिमान को जन्म देती है, जो भारी भूल है । जबतक मानव बलपूर्वक की हुई भलाई के आधार पर जीवित रहता है, तबतक उसमें प्रदोष-दर्शन की रूचि बनी रहती है, जो उसे कर्तव्य-विज्ञान से परिचित नहीं होने देती। इसका परिणाम यह होता है कि वह दूसरों पर शासन करने लगता है, जिसका साधक के जीवन में कोई स्थान ही नहीं है ।

      शासन के द्वारा समाज में से अकर्तव्य का अन्त नहीं हुआ, यह सभी विचारशीलों का अनुभव है । भूल-जनित वेदना से ही मानव बुराई-रहित होता है । सजगता आने पर ही भूल-जनित वेदना उदित होती है, जो कर्तव्यनिष्ठ बनाने में समर्थ है। अतएव यह निर्विवाद सिद्ध है कि व्यक्ति को समाज के प्रति बुराई नहीं करनी है, अपितु अपने प्रति होनेवाली बुराई का उत्तर भी बुराई से नहीं देना है ।

- (शेष आगेके ब्लागमें) 'साधन-निधि' पुस्तक से, (Page No. 26) । 

Wednesday, 25 April 2012

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Wednesday, 25 April 2012
(वैशाख शुक्ल चतुर्थी, वि.सं.-२०६९, बुधवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
किसी को बुरा न समझना 

        पराधीनता से ही विवश होकर मानव वह करने लगता है, जो नहीं करना चाहिए। उससे उत्तरोत्तर पराधीनता की ही वृद्धि होती है । वास्तव में तो जो नहीं करना चाहिए, उसके न करने में ही मानव की स्वाधीनता है, और इसी प्रयोग से पराधीनता नष्ट होती है । इस दृष्टि से स्वाधीनतापूर्वक ही स्वाधीनता की उपलब्धि होती है ।

      स्वाधीन होने के लिए अपनी ओर न देखना और दूसरों से आशा करना भारी भूल है । 'पर' के द्वारा हमें जो कुछ मिलता है, वह पराधीनता में ही आबद्ध करता है । साधक को जगत् के लिए उपयोगी होना है, जगत् से कुछ लेना नहीं है । भला पर-प्रकाश्य, परिवर्तनशील, उत्पत्ति-विनाश-युक्त जगत् से आशा की जाय! वह बेचारा दे ही क्या सकता है ?

        जब साधक किसी को बुरा नहीं समझता, किसी की बुराई नहीं चाहता और किसी भी भय तथा प्रलोभन से बुराई करने के लिए तत्पर नहीं होता, तब उसका जीवन जगत् के लिए अनुपयोगी नहीं रहता, अपितु उपयोगी हो जाता है । यह मंगलमय विधान है ।

- (शेष आगेके ब्लागमें) 'साधन-निधि' पुस्तक से, (Page No. 34) । 

Tuesday, 24 April 2012

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Tuesday, 24 April 2012
(वैशाख शुक्ल अक्षयतृतीया, वि.सं.-२०६९, मंगलवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
किसी को बुरा न समझना 

       अब विचार यह करना है कि व्यक्ति तथा समाज में से असमर्थता का नाश कैसे हो? सर्वहितकारी सद्भावना तथा प्राप्त सामर्थ्य के सदुपयोग से ही असमर्थता मिट सकती है। सामर्थ्य के सदुपयोग से उत्तरोत्तर सामर्थ्य की वृद्धि होती है, यह प्राकृतिक विधान है ।

        सामर्थ्य का दुरूपयोग न करें, इसके लिए यह आवश्यक है कि साधक किसी को बुरा न समझे । दूसरों को बुरा समझने मात्र से ही क्षोभ तथा क्रोध उत्पन्न होता है, जो सामर्थ्य का सदुपयोग नहीं करने देते । इस कारण बड़ी ही सजगतापूर्वक दूसरों के प्रति अपने कर्तव्य का निर्णय करना चाहिए ।

       असमर्थता का भूल मानव की अपनी भूल है और कुछ नहीं। भूल-रहित करने के लिए साधक को स्वयं भूल-रहित होना अनिवार्य है । अपनी भूल से ही मानव आप पराधीनता में जीवन-बुद्धि स्वीकार करता है और जन्मजात स्वाधीनता से विमुख हो जाता है । 

        जिसमें पराधीनता नहीं रहती, वह असमर्थ नहीं रहता, और जो असमर्थ नहीं रहता, वह मिली हुई सामर्थ्य का दुरूपयोग नहीं करता । इस दृष्टि से पराधीनता का सर्वांश में नाश करना अनिवार्य है, जो एकमात्र सत्संग से प्राप्त साधन-निधि से ही सम्भव है ।

- (शेष आगेके ब्लागमें) 'साधन-निधि' पुस्तक से, (Page No. 33) । 

Monday, 23 April 2012

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Monday, 23 April 2012
(वैशाख शुक्ल द्वितीया, वि.सं.-२०६९, सोमवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
किसी को बुरा न समझना 

         अधिकतर तो सुनकर, अथवा अनुमानमात्र से ही दूसरों को बुरा समझ लिया जाता है । इतना ही नहीं, इन्द्रिय दृष्टि से किसी की वास्तविकता का बोध ही नहीं होता । अधूरी जानकारी के आधार पर किसी को दोषी मान लेना, उसके प्रति अन्याय और अपने में बुराई को जन्म देने के अतिरिक्त और कुछ नहीं है । पर यह रहस्य वे ही साधक जान पाते हैं, जिन्होंने सभी के प्रति सद्भावना तथा आत्मीयता स्वीकार की है ।

        समस्त दोषों का मूल मानव की अपनी असमर्थता है और कुछ नहीं । असमर्थता जीवन में तब आती है, जब मानव अपने लक्ष्य को भूलता है । लक्ष्य की विस्मृति से ही मिली हुई सामर्थ्य का दुरूपयोग करता है और उसके परिणाम में स्वयं असमर्थ हो जाता है ।

        सामर्थ्य के दुरूपयोग से ही समाज में दोषों की उत्पत्ति होती है । सामर्थ्य का सदुपयोग असमर्थ की असमर्थता मिटाने में है, किसी को असमर्थ बनाने में नहीं । पर इस वास्तविकता को भूल जाने से सामर्थ्य का दुरूपयोग रोकने के लिए मिली हुई सामर्थ्य द्वारा उसे असमर्थ बनाते हैं । उसका परिणाम कभी भी हितकर नहीं होता ।

        थोड़ी देर के लिए ऐसा प्रतीत होने लगता है कि बलपूर्वक सामर्थ्य का दुरूपयोग रोक दिया, पर वास्तव में ऐसा होता नहीं। सामर्थ्य के दुरूपयोग से सभी में असमर्थता की ही वृद्धि होती है और उसकी प्रतिक्रिया सामर्थ्य का दुरूपयोग करने के लिए ही प्रेरित करती है । अतः सामर्थ्य का उपयोग असमर्थता के मिटाने में है, किसी को असमर्थ  बनाने में नहीं ।

- (शेष आगेके ब्लागमें) 'साधन-निधि' पुस्तक से, (Page No. 32-33) । 

Sunday, 22 April 2012

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Sunday, 22 April 2012
(वैशाख शुक्ल प्रतिपदा, वि.सं.-२०६९, रविवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
किसी को बुरा न समझना 

        किसी में बुराई की स्थापना करना, उसके लिए और अपने लिए अहितकर ही है । किसी को बुरा समझने पर अपने में अशुद्ध संकल्पों की उत्पत्ति होती है और क्षोभ तथा क्रोध उत्पन्न होता है, जो कर्तव्य की विस्मृति में हेतु है। अशुद्ध संकल्पों से किसी-न-किसी अंश में अशुद्ध कर्म होने ही लगता है । इस दृष्टि से दूसरों को बुरा समझने से अपने में बुराई उत्पन्न हो जाती है ।

       यदि किसी को बुरा न समझे, तो उसमें अशुद्ध संकल्प उत्पन्न नहीं होते और न वैर-भाव की उत्पत्ति होती है, अपितु समता आ जाती है, जिसके आते ही सर्वात्म-भाव जाग्रत होता है, जो विकास की भूमि है । किसी-न-किसी नाते समस्त विश्व अपना है । अपने में दोष की स्थापना करना, न तो न्याय है और न प्रेम ।

        अब यदि कोई यह कहे कि दोषी न मानने से, उसे भयभीत न करने से दोषी में दोषों की प्रवृति उत्तरोत्तर बढ़ती ही रहेगी, जो समाज के लिए अहितकर है । पर वास्तव में बात ऐसी नहीं है; कारण, कि किसी में दोषों की उत्पत्ति होती ही कब है ? जब वह अपने को दोषी बना लेता है ।

        अब विचार यह करना है कि वह अपने को दोषी क्यों बना लेता है ? पर-दोष देख, क्षुभित होने से, अथवा यों कहो कि जब उसके साथ कोई बुराई करता है, तब अपने को निर्दोष मानकर बुराई के बदले में बुराई करने के लिए अपने को बुरा बनाता है। पर उसे इस बातका स्वयं पता नहीं रहता कि बुराई का प्रतिकार करने के लिए मैं स्वयं बुरा हो गया ।

        बुराई का प्रतिकार प्राकृतिक नियमानुसार बुराई करना नहीं है, अपितु क्षमाशील होकर, करूणित होकर उसके प्रति भलाई करना अथवा हित-कामना करना है । सभी के प्रति हित-कामना बिना स्वीकार किए, निर्दोषता व्यापक नहीं हो सकती । इस कारण बुराई-काल में ही यदि हम उसे बुराई न करने दें, आत्मीयतापूर्वक आदर और प्यार दें, करूणित होकर उसकी भूल से स्वयं दुखी हो जाएँ, उसके कर्तव्य की ओर संकेत करें तथा उसे उसकी महिमा से परिचित कराकर हृदय से लगाएँ तो वह अवश्य बुराई-रहित  हो जाएगा ।  

- (शेष आगेके ब्लागमें) 'साधन-निधि' पुस्तक से, (Page No. 31-32) । 

Saturday, 21 April 2012

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Saturday, 21 April 2012
(वैशाख अमावस्या, वि.सं.-२०६९, शनिवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
किसी को बुरा न समझना 

        जब अपराधी भूल-जनित दोष से पीड़ित होता है, तब उसमें से दोष-जनित सुख-लोलुपता मिट जाती है, जिसके मिटते ही पुनः दोष न दोहराने की तीव्र माँग जाग्रत होती है । पर जब उसे दूसरा अपराधी मानने लगता है, तब वह क्षुभित तथा क्रोधित होकर दूसरों के दोष देखने लगता है । दूसरों का दोष देखते ही अपने में से दोषी होने की वेदना शिथिल होने लगती है । इससे उसका और दूसरों का अहित ही होता है ।

         इसी कारण दूसरों के द्वारा किया हुआ न्याय निर्दोषता की स्थापना नहीं कर पाता । परन्तु जब वर्तमान निर्दोषता के आधार पर अपराधी को कोई दोषी नहीं मानता, तब अपराधी स्वयं भूतकाल की भूल को न दोहराने के लिए तत्पर हो जाता है और वर्तमान निर्दोषता में स्थिर होकर सदा के लिए निर्दोष हो जाता है। इस दृष्टि से अपने द्वारा ही अपने प्रति न्याय करना हितकर सिद्ध होता है ।

        यदि अपराधी की वर्तमान निर्दोषता को स्वीकार नहीं किया जाता, तो उसकी अहंता में से अपराधी-भाव निवृत नहीं होता और फिर वह अपराधी होकर अपराध करने में तत्पर हो जाता है।

        सर्वांश में तो कोई अपराधी होता ही नहीं । बड़े-से-बड़े हिंसक में भी किसी न किसी के प्रति करुणा होती है । बेईमान भी अपने साथी के लिए ईमानदार सिद्ध होता है । इतना बुरा कोई हो ही नहीं सकता, जो सभी के साथ सदैव बुराई करे । सर्वांश में निज-ज्ञान का अनादर करना किसी भी मानव के लिए सम्भव ही नहीं है । इस दृष्टि से सर्वांश में कोई दोषी होता ही नहीं, यह प्राकृतिक तथ्य है । अतः किसी को बुरा समझना बुराई करने की अपेक्षा गुरुतर भूल है ।  

- (शेष आगेके ब्लागमें) 'साधन-निधि' पुस्तक से, (Page No. 30-31) । 

Friday, 20 April 2012

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Friday, 20 April 2012
(वैशाख कृष्ण चतुर्दशी, वि.सं.-२०६९, शुक्रवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
किसी को बुरा न समझना 

        किसी भी साधक को किसी को बुरा समझने का अधिकार ही नहीं है; कारण, कि दूसरे के सम्बन्ध में पूरा जानना सम्भव नहीं है। अधूरी जानकारी के आधार पर निर्णय  देना न्याय नहीं है । न्याय करने का अधिकार किसी व्यक्ति को किसी भी व्यक्ति के प्रति नहीं है । व्यक्ति समाज के अधिकार की रक्षा कर सकता है, किसी के प्रति बलपूर्वक न्याय नहीं कर सकता ।

      न्याय तो प्रत्येक साधक अपने ही प्रति कर सकता है । न्याय का सर्वप्रथम अंग है, "अपराधी अपने अपराध से परिचित हो जाय, अर्थात् अपनी भूल से उत्पन्न अपराध को स्वीकार करे, किन्तु सदा के लिए सर्वांश में अपने को अपराधी न माने ।"

        प्राकृतिक नियमानुसार कोई भी सदा के लिए दोषी होकर नहीं रहना चाहता और सर्वांश में कोई दोषी भी नहीं है । सभी में स्वभाव से ही निर्दोषता की माँग है । आंशिक दोष की उत्पत्ति भूल-जनित है, स्वभाव-जनित नहीं; कारण, कि दोष का स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं है ।

- (शेष आगेके ब्लागमें) 'साधन-निधि' पुस्तक से, (Page No. 30) । 

Thursday, 19 April 2012

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Thursday, 19 April 2012
(वैशाख कृष्ण त्रयोदशी, वि.सं.-२०६९, गुरुवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
जगत् के लिए उपयोगी होना

         अपने लिए उपयोगी होने पर जीवन जगत् और जगत्पति के लिए उपयोगी होता है, यह निर्विवाद सत्य है। परन्तु अब विचार यह करना है कि जगत् के लिए उपयोगी होने के लिए साधक में किस साधन-निधि की अभिव्यक्ति होती है ? इस सम्बन्ध में विचार करने से यह स्पष्ट विदित होता है कि जब साधक अपने लिए उपयोगी हो जाता है, तब उसे मिली हुई वस्तु, योग्यता, सामर्थ्य आदि की अपेक्षा नहीं रहती ।

        उसका परिणाम यह होता है कि उसके द्वारा मिली हुई वस्तु, योग्यता, सामर्थ्य का दुरूपयोग नहीं होता, अपितु स्वभाव से ही सदुपयोग होने लगता है । इतना ही नहीं, बुराई के बदले में भी वह बुराई नहीं करता । यही कर्तव्य-विज्ञान है । कर्तव्य-विज्ञान से सुन्दर समाज का निर्माण होता है, यह मंगलमय विधान है । 

- (शेष आगेके ब्लागमें) 'साधन-निधि' पुस्तक से, (Page No. 25-26) ।

Wednesday, 18 April 2012

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Wednesday, 18 April 2012
(वैशाख कृष्ण द्वादशी, वि.सं.-२०६९, बुधवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
प्रवचन - 4

        तो भाई, यह तो प्रेम का साम्राज्य है । प्रेम के साम्राज्य में नित नव-रस है, अगाध अनन्त रस है । यह रहस्य कब समझ में आता है ? जब प्रेम के साम्राज्य में प्रवेश हो । तो प्रेम के साम्राज्य में कब प्रवेश होता है ? जब साधक प्रेमास्पद के अस्तित्व को निस्संदेहतापूर्वक स्वीकार कर ले। यही प्रेम के साम्राज्य में प्रवेश होने का उपाय है । हमारे प्रेमास्पद हैं और वे हमारे अपने ही हैं ।

        अब आप सोचिए, प्रार्थना का जो सबसे पहला वाक्य है, उसमें यही है - "मेरे नाथ" । मेरे नाथ का अर्थ क्या है ? कोई और मेरा नहीं है, मैं अनाथ नहीं हूँ । न तो मैं अनाथ हूँ और न कोई मेरा है । भाई, यह तन भी मेरा नहीं है, यह मन भी मेरा नहीं है, यह प्राण भी मेरे नहीं हैं । यह सब कुछ तेरा है और तू केवल मेरा है । यही प्रेम प्राप्ति का सुगम उपाय है ।

        जब कोई अपना है ही नहीं, तो आप विचार करें किसी व्यक्ति से सम्बन्ध रहेगा । लेकिन क्या वस्तु नहीं रहेगी ? तो यह मानना पड़ेगा कि वस्तु रहेगी, उससे सम्बन्ध नहीं रहेगा। वस्तु रहे और उससे सम्बन्ध न रहे, तो क्या हो जाएगा ? कि वस्तु के सम्बन्ध से जो लोभ, मोह, काम आदि जो विकार उत्पन्न हो गया था, वह विकार नाश हो जाएगा ।

        कहने का तात्पर्य मेरा यह था  कि भाई, अब हमारा सम्बन्ध अपने प्रेमास्पद से हो गया, किसी और से नहीं रहा ।

- 'सन्तवाणी प्रवचनमाला, भाग-8' पुस्तक से, (Page No. 60)।