Wednesday, 28 May 2014

।। हरिः शरणम् !।।

Wednesday, 28 May 2014 
(ज्येष्ठ कृष्ण अमावश्या, वि.सं.-२०७१, बुधवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
कर्तव्य-अकर्तव्य का विवेचन

प्रत्येक व्यक्ति का जीवन उस अनन्त जीवन का एक अंशमात्र है । प्रत्येक अंश उससे अभिन्न हो सकता है, जिसका वह अंश है; पर उसके सम्बन्ध में कोई निर्णय नहीं दे सकता । जिस सीमित परिवर्तनशील योग्यता से हम निर्णय देते हैं, वह योग्यता क्या हमारी अपनी वस्तु है ? यदि हमारी वस्तु है, तो उसमें, परिवतन क्यों है ? और उसका विनाश क्यों है ? यदि हमारी नहीं है, तो क्या हमें जिससे मिली है, उसकी और गतिशील होने का कभी प्रयत्न किया ? यदि नहीं किया, तो हमें किसी प्रकार के निर्णय करने का क्या अधिकार है ? व्यक्ति मिली हुई योग्यता का सदुपयोग ही कर सकता है; किसी प्रकार का अनर्गल निर्णय देकर खीझना व्यर्थ है ।

दुःख उतनी बुरी वस्तु नहीं, जितना हम मान लेते हैं । दुःख के आधार पर ही हम आनन्द की प्राप्ति कर सकते हैं । जिस प्रकार भूख ही भोजन-प्राप्ति में हेतु है, उसी प्रकार दुःख तथा मृत्यु ही अमरत्व तथा आनन्द की प्राप्ति में हेतु है । पर ऐसा तभी हो सकता है, जब हम दुःख होने पर विचार करें, भयभीत न हों । दुःख हमारे बिना ही बुलाए आया है, हम उसे रोक नहीं सकते । जिसे रोक नहीं सकते और जो अपने-आप आता है, वह किसी ऐसे की देन है जो अनन्त है ।

उस अनन्त की देन में सभी का हित विद्यमान है । उससे भयभीत होना हमारी अपनी भूल है । जिस काल में दुःख पूर्ण जागृत होता है, उसी काल में सब प्रकार की आसक्तियाँ अपने-आप मिट जाती हैं, जिनके मिटते ही हम उस अनन्त की महिमा देखने के अधिकारी हो जाते हैं । अथवा यों कहो कि उसकी महिमा का आश्रय लेकर ही उससे नित्य-सम्बन्ध स्वीकार कर लेते हैं । अत: जो कुछ हो रहा है, वह हमें 'नहीं’ से 'है' की ओर गतिशील करने में समर्थ है । 'नहीं' का अर्थ अभाव है और 'है' का अर्थ अभाव-का-अभाव । इस दृष्टि से प्रत्येक 'अभाव', अभाव-का-अभाव करने में समर्थ है और प्रत्येक रचना उस अनन्त की लालसा जागृत करने में हेतु है । अत: जो हो रहा है; उसमें सब कुछ मिल सकता है ।


 - ‘जीवन-दर्शन भाग 2' पुस्तक से, (Page No. 26-27)

Tuesday, 27 May 2014

।। हरिः शरणम् !।।

Tuesday, 27 May 2014 
(ज्येष्ठ कृष्ण चतुर्दशी, वि.सं.-२०७१, मंगलवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
कर्तव्य-अकर्तव्य का विवेचन

अब यदि कोई यह कहे कि वस्तु आदि के सौन्दर्य को देखकर हमारे जीवन में काम की उत्पत्ति होती है और दुख-मृत्यु आदि को देखकर भय उत्पन्न होता है । तो कहना होगा कि हमारे देखने में दोष है । हम सीमित सौन्दर्य देखकर ही उसमें आबद्ध हो जाते हैं और उसका भोग करने लगते हैं, अनन्त और नित्य सौन्दर्य की लालसा को सबल नहीं होते देते । प्रत्येक भोग के परिणाम में भयंकर रोग उत्पन्न होता है, जो जिज्ञासा जागृत करने में हेतु है । पर हम जिज्ञासु न होकर उस रोग-शोक आदि को देखकर खीझने लगते हैं और मनमाना कोई-न-कोई निर्णय कर बैठते हैं कि उस अनन्त की रचना में इतना दुख क्यों है !

इतना ही नहीं, कभी-कभी तो यहाँ तक कहने लगते हैं कि सृष्टि का कोई कर्ता नहीं है, घटनाएँ अकस्मात् हो रही हैं, मृत्यु-ही-मृत्यु है, जीवन-जैसी कोई वस्तु है ही नहीं; जहाँ तक सुख सम्पादित कर सकें, करते रहें । यद्यपि सुख-सम्पादन के परिणाम में दुःख-ही-दुख भोगते रहते हैं और खीझते रहते हैं; परन्तु न तो घटनाओं के अर्थों पर विचार करते हैं, न उस कर्ता की कारीगरी को देखते हैं और न अपने को उसका जिज्ञासु अथवा भक्त ही मानते हैं । अपितु भोगी तथा रोगी बनकर ही जीवित रहते हैं । दुःख तथा मृत्यु के दर्शन से तो हमारे जीवन में अमरत्व तथा आनन्द की लालसा जागृत होनी चाहिए थी, पर ऐसा नहीं होता । उसका कारण यह है कि हम मनमाना निर्णय कर लेते हैं, जो हमारा अपना ही दोष है । हमारा निर्णय ऐसा ही होता है, जैसे कोई जल-कण सागर के विषय में मनमाना निर्णय कर ले ।


 - (शेष आगेके ब्लाग में) ‘जीवन-दर्शन भाग 2' पुस्तक से, (Page No. 25-26)

Monday, 26 May 2014

।। हरिः शरणम् !।।

Monday, 26 May 2014 
(ज्येष्ठ कृष्ण त्रयोदशी, वि.सं.-२०७१, सोमवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
कर्तव्य-अकर्तव्य का विवेचन

अनन्त की लीला भी अनन्त ही है और उसका दर्शन भी अनन्त है । लीला का बाह्य स्वरूप भले ही सीमित तथा परिवर्तनशील हो, पर उसके मूल में तो अनन्त नित्य चिन्मय तत्व ही विद्यमान है । उनकी अनुपम लीला का दर्शन उनकी चिन्मय दिव्य प्रीति जागृत करने में समर्थ है ।

अत: जो हो रहा है, उसका प्रभाव प्रेमी बनाकर प्रेमास्पद से अभिन्न करने में हेतु है । अब रहा वस्तु आदि में परिवर्तन के दर्शन का प्रभाव; परिवर्तन का दर्शन होते ही स्वभावत: अविनाशी की जिज्ञासा जागृत होती है । ज्यों-ज्यों जिज्ञासा सबल तथा स्थाई होती जाती है, त्यो-त्यों, कामनाएँ स्वत: मिटने लगती हैं । कामनाओं का अन्त होते ही जिज्ञासा की पूर्ति हो जाती है और जिज्ञासा की पूर्ति में ही अमर जीवन निहित है ।

जो हो रहा है, उससे तो हमें प्रेम तथा जीवन की ही उपलब्धि होती है । इस दृष्टि से जो हो रहा है, उसमें सभी का हित विद्यमान है । अत: 'होनें' मैं प्रसन्न तथा 'करने' में सावधान रहने के लिए सतत प्रयत्नशील रहना चाहिए ।


 - (शेष आगेके ब्लाग में) ‘जीवन-दर्शन भाग 2' पुस्तक से, (Page No. 24-25)

Sunday, 25 May 2014

।। हरिः शरणम् !।।

Sunday, 25 May 2014 
(ज्येष्ठ कृष्ण द्वादशी, वि.सं.-२०७१, सोमवार)

(गत ब्लागसे आगेका) 
कर्तव्य-अकर्तव्य का विवेचन

यह तो सभी को मान्य होगा कि कर्तृत्वकाल में भोग हो सकता है, देखना नहीं; क्योंकि जब हम कुछ करते हैं, तब देखते नहीं और जब देखते हैं, तब करते नहीं । इस दृष्टि से विषयों के उपभोगकाल में विषयों को देख नहीं पाते और जब विषयों को देखते हैं, तब उनका उपभोग नहीं कर सकते । अत: देखना तभी सम्भव हो सकता है, जब उपभोगकाल न हो । भोग-प्रवृत्ति भोग का देखना नहीं, अपितु भोग के आरम्भ का सुख और परिणाम का दुःख भोगना है । सुख-दुःख का भोग करते हुए हम जो स्वत: हो रहा है, उसे यथार्थ देख नहीं सकते । अत: जो हो रहा है, उसको देखने के हमें रागरहित दृष्टि की अपेक्षा है, जो विवेकसिद्ध है ।

जो हो रहा है, उसके दो रूप दिखाई देते हैं - एक तो सीमित सौन्दर्य और दूसरा प्रत्येक वस्तु आदि का सतत परिवर्तन । वस्तु आदि के सौन्दर्य को देखकर हमें उस अनन्त सौन्दर्य की महिमा का अनुभव स्वत: होने लगता है । जिस प्रकार किसी सुन्दर वाटिका को देखकर वाटिका के माली की स्मृति स्वत: जागृत होती है, उसी प्रकार प्रत्येक रचना को देखकर संसाररूपी वाटिका के माली की स्मृति जागृत होती है; क्योंकि किसी की रचना का दर्शन रचयिता की महिमा को प्रकाशित करता है । इस दृष्टि से प्रत्येक वस्तु हमें उस अनन्त की और ले जाने में हेतु बन जाती है और हम उसकी रचना देख-देखकर नित-नव प्रसन्नता का अनुभव करने लगते हैं । यहाँ तक कि प्रत्येक रचना में उस कलाकार का ही दर्शन होने लगता है । ऐसा प्रतीत होने लगता है कि यह सब उस अनन्त की लीला ही है, और कुछ नहीं ।


 - (शेष आगेके ब्लाग में) ‘जीवन-दर्शन भाग 2' पुस्तक से, (Page No. 23-24)

Friday, 23 May 2014

।। हरिः शरणम् !।।

Friday, 23 May 2014 
(ज्येष्ठ कृष्ण दशमीं, वि.सं.-२०७१, शुक्रवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
कर्तव्य-अकर्तव्य का विवेचन

इन्द्रियों की दृष्टि से समस्त विषय सुखद तथा सत्य प्रतीत होते हैं। जब तक इन्द्रिय-दृष्टि का प्रभाव मन पर रहता है, तब तक मन इन्द्रियों के अधीन होकर विषयों की ओर गतिशील रहता है और जब मन पर बुद्धि-दृष्टि का प्रभाव होने लगता है, तब इन्द्रियों का प्रभाव मिटने लगता है; क्योंकि जो वस्तु इन्द्रिय-दृष्टि से सत्य और सुन्दर मालूम होती है, वही वस्तु बुद्धि-दृष्टि से असत्य और असुन्दर मालूम होती है । बुद्धि-दृष्टि का प्रभाव होते ही मन विषयों से विमुख हो जाता है । उसके विमुख होते ही इन्द्रियाँ स्वत: विषयों से विमुख होकर मन में विलीन हो जाती हैं और मन बुद्धि में विलीन हो जाता है । उसके विलीन होते ही बुद्धि सम हो जाता है । फिर उस समता का जो दृष्टा है, वह किसी मान्यता में आबद्ध नहीं हो सकता । उस दृष्टा की दृष्टि में सृष्टि-जैसी कोई वस्तु ही नहीं है; क्योंकि समस्त सृष्टि तो बुद्धि के सम होते ही विलीन हो जाती है; केवल समता रह जाती है । उस समता का प्रकाशक जो नित्य-ज्ञान है, उसमें सृष्टि-जैसी कोई वस्तु ही नहीं प्रतीत होती अथवा यों कहो कि उस ज्ञान से अभिन्न होने पर सब प्रकार के प्रभावों का अभाव हो जाता है; अर्थात् कामनाओं की निवृत्ति तथा जिज्ञासा की पूर्ति हो जाती है, जो वास्तव में जीवन है ।

इन्द्रिय-दृष्टि की सत्यता का प्रभाव राग उत्पन्न करता है और राग भोग में प्रवृत्त करता है; किन्तु बुद्धि-दृष्टि की सत्यता राग को वैराग्य में और भोग को योग में परिवर्तित करने में समर्थ है । जब राग वैराग्य में और भोग योग में बदल जाता है, तब दृष्टा में मान्यताओं से अतीत होकर देखने की योग्यता आ जाती है । उससे पूर्व हम जो कुछ देखते हैं, वह किसी-न-किसी मान्यता में आबद्ध होकर ही देखते हैं, अर्थात् उस समय हमारी दृष्टि सीमित रहती है, दूरदर्शिनी नहीं रहती । इस कारण जो वस्तु जैसी है उसे वैसी ही नहीं जान पाते । अत: हम अनेक प्रकार के प्रभावों में आबद्ध रहते हैं ।


 - (शेष आगेके ब्लाग में) ‘जीवन-दर्शन भाग 2' पुस्तक से, (Page No. 22-23)

Thursday, 22 May 2014

।। हरिः शरणम् !।।

Thursday, 22 May 2014 
(ज्येष्ठ कृष्ण अष्टमी, वि.सं.-२०७१, गुरुवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
कर्तव्य-अकर्तव्य का विवेचन

यह सभी को मान्य होगा कि जो देख रहा है, वह स्वयं नहीं कर रहा है, अर्थात् कर्ता और दृष्टा एक नहीं होते । हाँ, यह अवश्य जानना है कि जो देख रहा है, उस पर देखने का प्रभाव क्या है ? देखने वाला अपने को कुछ मानकर देख रहा है अथवा सभी मान्यताओं से रहित होकर देख रहा है ? अब विचार यह करना है कि मान्यताओं में आबद्ध होकर देखना क्या है और सभी मान्यताओं से रहित होकर देखना क्या है ? तो कहना होगा कि अपने को इन्द्रियाँ मानकर हम विषयों को देखते हैं, अपने को मन मानकर इन्द्रियों को देखते हैं, बुद्धि होकर मन को देखते हैं और इन सब के अभिमानी होकर बुद्धि को देखते हैं तथा सभी मान्यताओं से रहित होकर उस अभिमानी को देखते हैं, जो सीमित है ।

जब हम अपने को कुछ मानकर देखते हैं, तब देखे हुए में हमारी आसक्ति हो जाती है अथवा अरुचि । अरुचि और आसक्ति के कारण हम उस देखे हुए में बँध जाते हैं । फिर जो कुछ देखने में आता है, उसकी वास्तविकता हम नहीं जान पाते । पर जब विवेक दृष्टि से देखते हैं, तब जो कुछ हमें दिखाई देता है, वह सब या तो अनित्य प्रतीत होता है अथवा केवल अभाव-ही-अभाव या दुख-ही-दु:ख ।

इन्द्रियाँ विषयों की दृष्टा हैं, मन इन्द्रियों का दृष्टा है, बुद्धि मन की दृष्टा है और अभिमानी बुद्धि का भी दृष्टा है । जब तक हम उसे ही दृष्टा मान लेते हैं, जो दृश्य है, तब तक जो सर्व का दृष्टा है, उसको अथवा यों कहो कि जो सभी मान्यताओं से अतीत दृष्टा है, उसको नहीं जान पाते ।


 - (शेष आगेके ब्लाग में) ‘जीवन-दर्शन भाग 2' पुस्तक से, (Page No. 21-22)

Wednesday, 21 May 2014

।। हरिः शरणम् !।।

Wednesday, 21 May 2014 
(ज्येष्ठ कृष्ण सप्तमी, वि.सं.-२०७१, बुधवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
कर्तव्य-अकर्तव्य का विवेचन

यदि हमारे द्वारा होने वाले कर्मों से दूसरों का अहित हो रहा है, तो हमारा भी अहित निश्चित है; क्योंकि दूसरों के प्रति जो कुछ किया जाता है, वह कई गुना अधिक होकर हमारे प्रति स्वत: होने लगता है । अत: इस कर्म-विज्ञान की दृष्टि से हमें वह नहीं करना चाहिए, जिसमें किसी अन्य का अहित हो, अपितु वह अवश्य करना चाहिए, जिसमें सभी का हित हो ।

अब यदि कोई यह पूछे कि हम यह कैसे जानें कि किसमें दूसरे का अहित है? तो इसका निर्णय करने के लिए हमें एक ही बात पर ध्यान देना चाहिए कि हम जो कुछ दूसरों के प्रति कर रहे हैं, क्या वही दूसरों के द्वारा अपने प्रति किये जाने की आशा करते हैं ? दूसरों के द्वारा अपने प्रति हम वही आशा करते हैं, जो करने के योग्य है; क्योंकि हम अपने प्रति दूसरों से न्याय, प्रेम, उदारता, आदर, करुणा एवं क्षमा आदि व्यवहार की ही आशा रखते हैं । जो अपने प्रति चाहते हैं, वही हमें दूसरों के प्रति करना है । ऐसा करने से 'करना', 'होने' में विलीन हो जाता है । फिर हम, जो हो रहा है, उसे देखने लगते हैं ।


 - (शेष आगेके ब्लाग में) ‘जीवन-दर्शन भाग 2' पुस्तक से, (Page No. 20-21)

Saturday, 17 May 2014

।। हरिः शरणम् !।।

Saturday, 17 May 2014 
(ज्येष्ठ कृष्ण तृतीया, वि.सं.-२०७१, शनिवार)

कर्तव्य-अकर्तव्य का विवेचन

वस्तुस्थिति पर विचार करने से ये दो प्रश्न उत्पन्न होते हैं - प्रथम यह कि क्या हम वही कर रहे हैं, जो हमें करना चाहिए अथवा वह भी करते हैं, जो नहीं करना चाहिए ? और दूसरा यह कि जो स्वत: हो रहा है उसका हम पर क्या प्रभाव है ? अब विचार यह करना है कि हम जो कुछ करते हैं, उसकी उत्पत्ति का कारण क्या है ? तो कहना होगा कि कुछ कार्य तो हम ऐसे करते हैं, जिनका कारण अपने को देह मान लेना है और कुछ कार्य ऐसे होते हैं कि जिनका सम्बन्ध बाह्य सम्पर्क से है, अथवा यों कहो कि करने का उदय हमारी मान्यता में तथा हमारे सम्बन्धों में निहित है ।

हाँ, एक बात और है, कुछ क्रियाएँ ऐसी भी होती हैं, जिन्हें हम देहजनित कह सकते हैं । वे क्रियाएँ कर्म नहीं, प्रत्युत देह का स्वभाव हैं । देह के स्वभाव से अतीत की ओर जाने के लिए कर्तव्य का विधान बना है, क्योंकि यदि ऐसा न होता, तो विवेक की कोई अपेक्षा ही न होती । विवेकयुक्त जीवन में ही यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि क्या करने योग्य है और क्या नहीं करने योग्य है ? विवेक-रहित जीवन में तो यह प्रश्न ही नहीं उठता कि हमें क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए । जहाँ यह प्रश्न ही नहीं है कि हमें क्या करना चाहिए और क्या नहीं, उस जीवन में तो केवल स्वत: आने वाले सुख-दुःख का भोग है, सदुपयोग अथवा दुरुपयोग नहीं ।

इस दृष्टि से अब हमें अपने द्वारा होने वाली सभी चेष्टाओं को निज-विवेक के प्रकाश में देखना है कि क्या हम वही करते हैं, जो करने योग्य है, अथवा निज-ज्ञान का अनादर करके वह भी कर बैठते हैं, जो नहीं करना चाहिए ! जो नहीं करना चाहिए, उसको करने से अपना तथा दूसरों का अहित ही होता है ।

कर्तृत्व के स्थल पर एक बात और विचारणीय है, वह यह कि हम जो कुछ करते हैं, उसका परिणाम हमीं तक सीमित नहीं रहता, अपितु समस्त विश्व में फैलता है; क्योंकि कर्म बिना संगठन के नहीं होता । अत: संगठन से उत्पन्न होने वाले कर्म का परिणाम व्यापक होना स्वाभाविक है । इस दृष्टि से हम जो कुछ करें, वह इस उद्देश्य को सामने रखकर करना चाहिए कि हमारे द्वारा दूसरों का अहित तो नहीं हो रहा है ।


 - (शेष आगेके ब्लाग में) ‘जीवन-दर्शन भाग 2' पुस्तक से, (Page No. 19-20)

Friday, 16 May 2014

।। हरिः शरणम् !।।

Friday, 16 May 2014 
(ज्येष्ठ कृष्ण द्वितीया, वि.सं.-२०७१, शुक्रवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
पराश्रय का त्याग और सेवा

यह भलीभाँति जान लेना चाहिए कि सेवा का अन्त भोग में नहीं, अपितु त्याग में है और त्याग का अन्त है, केवल शान्ति और प्रेम में । यह नियम है कि जिन साधनों से हम सेवा करते हैं, उनकी ममता मिट जाती है और जिनकी हम सेवा करते हैं, उनमें सौन्दर्य आ जाता है । ममतारहित होने से स्वाधीनता प्राप्त होती है और हमारे तथा सभी व्यक्तियों के निर्माण से सुन्दर समाज का निर्माण स्वत: हो जाता है ।

इस दृष्टि से 'पर' की सेवा में अपना कल्याण और सुन्दर समाज का निर्माण निहित है । एवं 'पर' के आश्रय में अपना और समाज का भी अहित है; क्योंकि जिससे हम ममता कर लेते हैं, वह वस्तु और व्यक्ति दोनों ही विनाश को प्राप्त होते हैं । वस्तु की ममता हमें लोभी बनाकर संग्रह की इच्छा उत्पन्न कर देती है एवं व्यक्तियों की ममता हमें तो मोही बनाती है और उन्हें पराश्रित कर देती है, जिनमें हमारा मोह होता है । लोभ की बुद्धि ने ही वस्तुओं का अभाव और मोह की बुद्धि ने ही परस्पर में संघर्ष उत्पन्न कर दिया है, जो विनाश का मूल है ।

वस्तुओं का उपयोग व्यक्तियों की सेवा में और व्यक्तियों की सेवा व्यक्तियों को विवेकयुक्त बनाने में निहित है; क्योंकि विवेकयुक्त जीवन में ही अपना कल्याण तथा सबका हित विद्यमान है ।

पराश्रय मृत्यु की ओर एवं उसका त्याग अमरत्व की ओर ले जाता है । पराश्रय जड़ता में आबद्ध करता है और उसका त्याग चिन्मय जीवन से अभिन्न कर देता है तथा लोभ और मोह का अन्त कर निर्लोभता, निर्मोहता एवं प्रेम प्रदान करता है । निर्लोभता से दरिद्रता और निर्मोहता से अविवेक मिट जाता है तथा प्रेम से अगाध, अनन्त रस की उपलब्धि होती है, जो वास्तविक जीवन है ।


 - ‘जीवन-दर्शन भाग 2' पुस्तक से, (Page No. 17-18)

Thursday, 15 May 2014

।। हरिः शरणम् !।।

Thursday, 15 May 2014 
(ज्येष्ठ कृष्ण प्रतिपदा, वि.सं.-२०७१, गुरुवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
पराश्रय का त्याग और सेवा

अब विचार यह करना है कि 'पर' का अर्थ क्या है ? तो कहना होगा कि जिसका वियोग अनिवार्य हो, वही 'पर’ है । इस दृष्टि से किसी अन्य की तो बात ही क्या है, शरीर भी 'पर' के ही अर्थ में आता है । अत: सर्व प्रथम हमें शरीर की सेवा करनी है । यह तभी सम्भव होगा, जब हम शरीर के अभिमान का त्याग करें । शरीर के अभिमान का त्याग करते ही निर्वासना आ जाएगी । वासनाओं का अन्त होते ही इन्द्रिय, मन, बुद्धि आदि सभी शुद्ध हो जाएँगे । फिर समस्त विश्व की सेवा स्वत: होने लगेगी; क्योंकि सेवा उन्हीं साधनों से की जा सकती है, जिनमें शुद्धता हो । इन्द्रियों की शुद्धता से सदाचार की प्राप्ति और समाज के चरित्र का निर्माण होगा । मन की शुद्धता से अशुद्ध संकल्प मिट जाएँगे और निर्विकल्पता आ जाएगी ।

निर्विकल्पता आते ही मन विभु हो जाएगा, जिससे समस्त विश्व की मूक सेवा होने लगेगी । बुद्धि की शुद्धता विषमता का विनाश कर देगी, जिससे भिन्नता मिट जाएगी और एकता आ जाएगी, जो चिर-शान्ति की स्थापना करने में समर्थ है और जिसमें सब प्रकार: के विकास की सामर्थ्य निहित है । इस दृष्टि से शरीर की सेवा में ही समस्त विश्व की सेवा विद्यमान है ।

सेवा वही कर सकता है, जो किसी का बुरा न चाहे । जो किसी का बुरा नहीं चाहता, वह अपने से दुखियों को देखकर करुणा से द्रवित और सुखियों को देखकर प्रसन्न होने लगता है, अथवा यों कहो कि करुणा और प्रसन्नता उसका स्वभाव बन जाता है । करुणा सुख-भोग की आसक्ति को और प्रसन्नता सुख-भोग की कामना को खा लेती है । कामना और आसक्ति के मिटते ही बाह्य-सेवा भी स्वत: होने लगती है, अर्थात् न्यायपूर्वक उपार्जित अर्थ और सम्पादित सामर्थ्य तथा योग्यता से रोगी, बालक, विरक्त, जो सत्य के अन्वेषण में लगे हैं, की सेवा स्वाभाविक होने लगती है क्योंकि ये तीनों ही सेवा के पात्र हैं ।


 - (शेष आगेके ब्लाग में) ‘जीवन-दर्शन भाग 2' पुस्तक से, (Page No. 16-17)

Wednesday, 14 May 2014

।। हरिः शरणम् !।।

Wednesday, 14 May 2014 
(वैशाख बुद्ध पूर्णिमा, वि.सं.-२०७१, बुधवार)

पराश्रय का त्याग और सेवा

जीवन का अध्ययन करने पर यह स्पष्ट विदित होता है कि सब प्रकार के अभाव का कारण एकमात्र पराश्रय है; क्योंकि 'पर' का आश्रय ही हमें जड़ता में आबद्ध करता है, सीमित बनाता है और अनेक प्रकार की आसक्तियों को जन्म देता है । इस दृष्टि से पराश्रय का साधक के जीवन में कोई स्थान ही नहीं है ।

आसक्तियों के रहते हुए प्रीति का उदय नहीं होता । प्रीति के बिना नित-नव रस की उपलब्धि नहीं होती, अपितु चित्त में खिन्नता ही निवास करती है, जो हमें क्रोधी बनाकर कर्तव्य से च्युत कर देती है । अत: किसी भी आसक्ति का साधक के जीवन में कोई स्थान ही नहीं है ।

सीमित होते ही कामनाओं का उदय होता है, जो स्वाधीनता का अपहरण करने में हेतु है । स्वाधीनता का अपहरण होते ही हम जड़ता में आबद्ध होकर दिव्य चिन्मय जीवन से विमुख हो जाते हैं । अत: पराश्रय का अन्त करने के लिए हमें वर्तमान में ही प्रयत्नशील होना चाहिए ।

पराश्रय का अन्त करने के लिए हमें सर्वप्रथम पर-आश्रय के भाव को पर-सेवा की सद्भावना में परिवर्तित करना होगा; क्योंकि जिसकी सेवा करने का सुअवसर मिल जाता है, उसकी आसक्ति मिट जाती है और जिसमें आसक्ति नहीं रहती, उससे सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है । अत: पर-सेवा की सद्भावना हमें 'पर' के आश्रय से मुक्त करने में समर्थ है ।


 - (शेष आगेके ब्लाग में) ‘जीवन-दर्शन भाग 2' पुस्तक से, (Page No. 15-16)

Tuesday, 13 May 2014

।। हरिः शरणम् !।।

Tuesday, 13 May 2014 
(वैशाख शुक्ल चतुर्दशी, वि.सं.-२०७१, मंगलवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
निष्कामता में ही सफलता है

प्राप्त वस्तु, बल और विवेक किसी व्यक्ति की निजी सम्पत्ति नहीं है, अपितु किसी की देन है । अब यदि कोई यह कहे कि हमें जो कुछ मिला है, वह हमारे ही कर्म का फल है । तो कहना होगा कि कर्म करने की सामर्थ्य क्या आपकी अपनी है ? यदि आपकी अपनी है तो आप किसी प्रकार का अभाव क्यों अनुभव करते हैं और प्रवृत्ति के अन्त में शक्तिहीन क्यों होते हैं ? शक्तिहीनता की अनुभूति यह सिद्ध करती है कि सामर्थ्य किसी व्यक्ति की अपनी नहीं है । वह उसी की देन है, जिसके प्रकाश से समस्त विश्व प्रकाशित है । उसकी दी हुई सामर्थ्य को अपनी मान लेना कहाँ तक न्याय संगत है ?

हाँ, यह अवश्य है कि जिसने हमें सब कुछ दिया है, उसने अपने को गुप्त रखा है, अर्थात् 'मैं देता हूँ', यह प्रकाशित नहीं किया । इतना ही नहीं, उसने अपने को इतना छिपाया है कि जिसे देता है, उसे वह मिली हुई वस्तु अपनी ही मालूम होती है, किसी और की नहीं । भला, जिसमें इतनी आत्मीयता है इतना सौहार्द है, क्या हमने कभी एक बार भी वस्तुओं से विमुख होकर उसकी ओर देखा ?

जिसकी ओर हम एक बार भी नहीं देख सके, वह सर्वदा हमारी ओर देखता है । यदि ऐसा न होता, तो असमर्थ होने पर बिना ही यत्न के सामर्थ्य कैसे मिलती ? इस दृष्टि से हमें निष्काम होकर मिली हुई सामर्थ्य का प्राप्त विवेक के प्रकाश में उसी के नाते उपयोग करना है और उसी अनन्त की ओर देखना है, जो हमारी ओर सदैव देखता है । उसकी और देखते ही हम उसके हो जाएँगे, जिसके होते ही सब प्रकार के अभाव का अभाव हो जाएगा और दिव्य चिन्मय जीवन प्राप्त होगा, जो हमारी वास्तविक आवश्यकता है ।


 - ‘जीवन-दर्शन भाग 2' पुस्तक से, (Page No. 13-14)

Monday, 12 May 2014

।। हरिः शरणम् !।।

Monday, 12 May 2014 
(वैशाख शुक्ल त्रयोदशी, वि.सं.-२०७१, सोमवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
निष्कामता में ही सफलता है

अब यदि कोई यह कहे कि वस्तुओं के बिना तो हमारा अस्तित्व ही नहीं रह सकता । तो कहना होगा कि जो अस्तित्व वस्तुओं के आश्रित है, वह क्या हमारा अस्तित्व है ? कदापि नहीं । इस दृष्टि से तो वस्तुओं का ही अस्तित्व सिद्ध होगा, हमारा नहीं । हमारा अस्तित्व तो तभी सिद्ध हो सकता है, जब हम वस्तुओं से अतीत के उस जीवन को प्राप्त कर लें, जो निष्कामता से ही प्राप्त हो सकता है । निष्कामता हमें प्राप्त वस्तुओं के सदुपयोग और अप्राप्त वस्तुओं की  कामना के त्याग का पाठ पढ़ाती है, न तो वस्तुओं के संग्रह की प्रेरणा देती है और न अप्राप्त वस्तुओं के आह्वान की ही ।

          वस्तुओं का संग्रही तथा वस्तुओं का आह्वान करने वाला निष्काम नहीं हो सकता । निष्कामता आ जाने पर प्राप्त वस्तुओं का सदुपयोग होने लगता है और आवश्यक वस्तुएँ प्रकृति के विधान से स्वत: मिलने लगती हैं । परन्तु कब ? जब न तो वस्तुओं के अभाव से हम क्षुब्ध हों, न प्राप्त वस्तुओं में हमारी ममता हो, न उनका दुरुपयोग हो और न वस्तुओं के आधार पर हम अपना अस्तित्व ही मानें ।

जिस प्रकार सूर्य के सम्मुख होते ही छाया हमारे पीछे दौड़ती है और सूर्य से विमुख होने पर हम छाया के पीछे दौडते हैं, पर उसे पकड़ नहीं पाते; उसी प्रकार निष्कामता-रूपी सूर्य के सम्मुख होते ही छायारूपी वस्तुएँ हमारे पीछे दौड़ती हैं और विमुख होते ही हम छायारूपी वस्तुओं के पीछे दौड़ते हैं, पर उन्हें प्राप्त नहीं कर पाते ।


 - (शेष आगेके ब्लाग में) ‘जीवन-दर्शन भाग 2' पुस्तक से, (Page No. 12-13)

Sunday, 11 May 2014

।। हरिः शरणम् !।।

Sunday, 11 May 2014 
(वैशाख शुक्ल द्वादशी, वि.सं.-२०७१, रविवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
निष्कामता में ही सफलता है

प्रत्येक परिस्थिति प्राकृतिक न्याय है, उसके आदरपूर्वक सदुपयोग में ही सभी का हित निहित है । परन्तु कामना-अपूर्ति के भय और कामना-पूर्ति की आसक्ति के कारण हम परिस्थितियों में भेद करने लगते हैं तथा प्राप्त परिस्थिति के सदुपयोग की अपेक्षा परिस्थिति-परिवर्तन के लिए प्रयत्नशील रहते हैं । इसका परिणाम यह होता है कि जो सामर्थ्य वर्तमान परिस्थिति के सदुपयोग के लिए मिली थी, उसे अप्राप्त परिस्थिति की प्राप्ति के प्रयास में लगा देते हैं, जिससे प्राप्त परिस्थिति का भी सदुपयोग नहीं हो पाता और उत्कृष्ट परिस्थिति भी प्राप्त नहीं होती । प्राकृतिक नियम के अनुसार प्राप्त परिस्थिति के सदुपयोग से ही उत्कृष्ट परिस्थिति अथवा परिस्थितियों से असंगता प्राप्त होती है, जो वास्तविक निष्कामता है ।

अब यदि कोई यह कहे कि हम उस प्राकृतिक विधान का आदर कैसे करें, जो कामना-अपूर्ति के दुःख में हेतु है ? तो कहना होगा कि कामना-अपूर्ति का दुःख कामना-पूर्ति के सुख की दासता से मुक्त करने के लिए आया था, जिसे पाकर हम भयभीत हो गए । यह भूल गए कि कामना-पूर्ति के सुख से अतीत भी एक जीवन है, जो कामना-पूर्ति की अपेक्षा कहीं अधिक महत्वपूर्ण है । इस दृष्टि से प्राकृतिक न्याय में हमारा हित ही निहित है । अत: उसका आदर करना अनिवार्य है ।

भौतिक विज्ञान की दृष्टि से प्रत्येक वस्तु अनन्त है, उसमें कमी नहीं है । फिर भी हमें यदि वस्तुएँ प्राप्त नहीं हैं, तो समझना चाहिए कि हम वस्तुओं के अधिकारी नहीं हैं । प्रकृति के विधान में किसी से राग-द्वेष नहीं है, उसमें तो सभी के प्रति समानता है । अत: जो वस्तुएँ हमारे बिना रह सकती हैं अथवा हमें अप्राप्त हैं, उनकी अप्राप्ति मैं ही हमारा विकास निहित है ।


 - (शेष आगेके ब्लाग में) ‘जीवन-दर्शन भाग 2' पुस्तक से, (Page No. 11-12)

Saturday, 10 May 2014

।। हरिः शरणम् !।।

Saturday, 10 May 2014 
(वैशाख शुक्ल एकादशी, वि.सं.-२०७१, शनिवार)

निष्कामता में ही सफलता है

जीवन का अध्ययन करने पर यह स्पष्ट विदित होता है कि निष्कामता ही सफलता की कुन्जी है । निष्कामता के बिना निर्दोषता नहीं आती और दोषरहित हुए बिना हम अपने लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर सकते । दोषी की आवश्यकता तो किसी को भी नहीं होती, सभी को अपना साथी निर्दोष चाहिए । इस दृष्टि से निष्कामता जीवन की वास्तविक आवश्यकता है ।

अब विचार यह करना है कि निष्कामता प्राप्त करने के लिए हमें क्या करना चाहिए ? तो कहना होगा कि निष्कामता उसे ही प्राप्त हो सकती है, जो वस्तु, अवस्था, परिस्थिति आदि से अपना मूल्य बढ़ा लेता है । यद्यपि कोई भी वस्तु, अवस्था, परिस्थिति ऐसी हो ही नहीं सकती, जो हमारे दिये हुए महत्व एवं सहयोग के बिना हम पर शासन कर सके, परन्तु हम इस रहस्य को भूल जाते हैं; प्रत्युत वस्तु, अवस्था, परिस्थितियों के आधार पर अपना मूल्य आँकने लगते हैं । बस, हमारी यही भूल हमें निष्काम नहीं होने देती ।

हाँ, यह अवश्य है कि प्राप्त परिस्थिति का सदुपयोग करना है पर न तो उसकी दासता में आबद्ध होना है और न किसी अप्राप्त परिस्थिति का आह्वान करना है; क्योंकि सभी परिस्थितियाँ समान अर्थ रखती हैं । कोई परिस्थिति किसी परिस्थिति की अपेक्षा भले ही सुन्दर प्रतीत हो, परन्तु वास्तविकता की दृष्टि से उनमें कोई भेद नहीं है; क्योंकि प्रत्येक परिस्थिति साधनरूप है, साध्यरूप नहीं । अत: प्रत्येक परिस्थिति का महत्व उसके सदुपयोग में है, किसी परिस्थिति-विशेष में नहीं । हमें प्राप्त परिस्थिति का आदर करना चाहिए, पर उससे ममता और उसमें जीवन-बुद्धि नहीं करनी चाहिए, अपितु साधन-बुद्धि रखनी चाहिए । ऐसा करने से बड़ी ही सुगमतापूर्वक परिस्थितियों से अतीत के उस जीवन पर विश्वास हो जाएगा, जो निष्कामता प्रदान करने में समर्थ है ।


 - (शेष आगेके ब्लाग में) ‘जीवन-दर्शन भाग 2' पुस्तक से, (Page No. 10-11)

Friday, 9 May 2014

।। हरिः शरणम् !।।

Friday, 09 May 2014 
(वैशाख शुक्ल दशमीं, वि.सं.-२०७१, शुक्रवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
प्रवृत्ति और निवृत्ति

सर्वहितकारी प्रवृत्ति की रुचि सहज निवृत्ति के लिए अपेक्षित है और सहज निवृत्ति काम का अन्त करने का साधन है । साधन में कर्तृत्वभाव तभी तक रहता है, जब तक साधक का समस्त जीवन साधन नहीं बन जाता । साधक का समस्त जीवन तब तक साधन नहीं बन सकता, जब तक वह करने और पाने की रुचि में आबद्ध रहता है ।

करने और पाने की रुचि तब तक रहती है, जब तक हम उस अनन्त से मिली हुई योग्यता, सामर्थ्य तथा वस्तुओं को अपनी मानते हैं और उनके आधार पर अपना व्यक्तित्व स्वीकार करते हैं, जो अविवेकसिद्ध है; कारण, कि समस्त सृष्टि एक है, उसका प्रकाशक, उसका ज्ञाता और उसका आधार भी एक है, तो फिर हमारे व्यक्तित्व के लिए स्थान ही कहाँ है ? जिसे हम अपना मानते हैं, वह उस सृष्टि का ही एक अंश है । अत: वह उसी की वस्तु है, जिसकी यह सृष्टि है । व्यक्तित्व का अभिमान गलाने के लिए सर्वहितकारी प्रवृत्ति तथा निवृत्ति की अपेक्षा है । सर्वहितकारी प्रवृत्ति हमें ऋण से मुक्त कर सुन्दर समाज का निर्माण करती है और निवृत्ति हमें स्वाधीनता प्रदान कर अनन्त से अभिन्न करती है, जिसमें वास्तविक जीवन है ।

सब प्रकार के संघर्ष का अन्त सर्वहितकारी प्रवृत्ति में निहित है; क्योंकि सर्वहितकारी प्रवृत्ति स्नेह की एकता प्रदान करती है । प्रवृत्ति स्वरूप से छोटी हो या बड़ी; परन्तु उसके मूल में यदि सर्वहितकारी भाव है, तो वह विभु हो जाती है। वह विश्व-शान्ति की स्थापना में समर्थ है; क्योंकि स्नेह की एकता वह काम नहीं करने देती, जो नहीं करना चाहिए और वह स्वत: होने लगता है, जो करना चाहिए । उसके होते ही जीवन में व्यापकता आ जाती है, जिसके आते ही सब प्रकार की आसक्तियों का अन्त हो जाता है । आसक्तियों का अन्त होते ही उस दिव्य चिन्मय प्रीति का उदय होता है, जो अपने ही में अपने प्रीतम को मिलाकर नित-नव रस प्रदान करती है । यही हमारी वास्तविक आवश्यकता है ।


 - ‘जीवन-दर्शन भाग 2' पुस्तक से, (Page No. 8-9)

Thursday, 8 May 2014

।। हरिः शरणम् !।।

Thursday, 08 May 2014 
(वैशाख शुक्ल नवमी, वि.सं.-२०७१, गुरुवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
प्रवृत्ति और निवृत्ति

रागरहित होने के लिए सर्वहितकारी प्रवृत्ति और सहज निवृत्ति साधनरूप है, साध्य नहीं । अत: हमें अपने में से, 'मैं सर्वहितैषी हूँ', 'मैं अचाह हूँ' अथवा 'मुझे अपने लिए संसार से कुछ नहीं चाहिए' - यह अहंभाव भी गला देना चाहिए । यह तभी सम्भव होगा, जब सर्वहितक।री प्रवृत्ति होने पर भी अपने में करने का अभिमान न हो और चाहरहित होने पर भी, 'मैं चाहरहित हूँ' -ऐसा भास न हो; कारण, कि अहंभाव के रहते हुए वास्तव में कोई अचाह हो नहीं सकता, क्योंकि सेवा तथा त्याग का अभिमान भी किसी राग से कम नहीं है ।

सूक्ष्म राग कालान्तर में घोर राग में आबद्ध कर देता है । राग का अत्यन्त अभाव तभी हो सकता है, जब दोष की उत्पत्ति न हो और गुण का अभिमान न हो; क्योंकि अभिमान के रहते हुए अनन्त से अभिन्नता सम्भव नहीं है और उसके बिना कोई भी वीतराग हो ही नहीं सकता; कारण, कि सीमित अहंभाव के रहते हुए राग का अत्यन्त अभाव नहीं हो सकता ।

सर्वहितकारी प्रवृत्ति ही वास्तविक निवृत्ति की जननी है; क्योंकि सर्वात्म-भाव दृढ़ होने पर ही निवृत्ति आती है और सर्वहितकारी प्रवृत्ति से ही सर्वात्म-भाव की उपलब्धि होती है । अपने ही समान सभी के प्रति प्रियता उदय हो जाने पर ही सर्वहितकारी प्रवृत्ति की सिद्धि होती है । सर्वहितकारी प्रवृत्ति वास्तव में किए हुए संग्रह का प्रायश्चित्त है, कोई विशेष महत्व की बात नहीं है और निवृत्ति प्राकृतिक विधान है; उसे अपनी महिमा मान लेना मिथ्या अभिमान को ही जन्म देना है, और कुछ नहीं । अत: प्रवृत्ति और निवृत्ति को ही जीवन मत मान लो । प्रवृत्ति-निवृत्ति रूप साधन से वास्तविक जीवन की प्राप्ति हो सकती है ।


 - (शेष आगेके ब्लाग में) ‘जीवन-दर्शन भाग 2' पुस्तक से, (Page No. 7-8)

Wednesday, 7 May 2014

।। हरिः शरणम् !।।

Wednesday, 07 May 2014 
(वैशाख शुक्ल अष्टमी, वि.सं.-२०७१, बुधवार)

प्रवृत्ति और निवृत्ति

जीवन का अध्ययन करने पर यह विदित होता है कि समस्त जीवन दो भागों में विभाजित है - प्रवृत्ति और निवृत्ति । यद्यपि उन दोनों भागों का उद्देश्य एक है; क्योंकि जीवन एक है; परन्तु उद्देश्य-पूर्ति के लिए साधन-दृष्टि से दो भागों में विभाजन हो सकता है ।

प्रत्येक प्रवृत्ति का उद्गम स्थान देहाभिमान तथा विद्यमान राग है । प्रत्येक प्रवृत्ति के अन्त में निवृत्ति का आना स्वाभाविक है; क्योंकि प्रवृत्ति से प्राप्त शक्ति का व्यय होता है और निवृत्ति द्वारा पुन: शक्ति का संचय होता है । विद्यमान राग की निवृत्ति में ही प्रवृत्ति का सदुपयोग निहित है और नवीन राग की उत्पत्ति न होने तथा प्रवृत्ति की सामर्थ्य प्राप्त करने के लिए ही निवृत्ति अपेक्षित है ।

अब हमें अपनी प्रवृत्तियों का निरीक्षण करना है कि हमारी प्रवृत्तियाँ सुख-भोग की आसक्ति तथा देहाभिमान को पुष्ट करने में हैं अथवा बिद्यमान राग की निवृत्ति में । जिन प्रवृत्तियों के द्वारा हम वस्तु व्यक्ति आदि से अपने सुख-सम्पादन की आशा करते हैं - वे सभी देहाभिमान को पुष्ट करती हैं और हमें लोभ, मोह आदि दोषों में आबद्ध करती हैं । अत: ऐसी प्रवृत्तियों के द्वारा प्रवृत्ति की सार्थकता सिद्ध नहीं होती, अपितु दोषों की ही वृद्धि होती है, जिससे हम जड़ता और शक्तिहीनता में आबद्ध हो जाते हैं ।

परन्तु जिन प्रवृत्तियों में दूसरों का हित तथा प्रसन्नता निहित है, वे प्रवृत्तियाँ विद्यमान राग की निवृत्ति करने में समर्थ हैं और उनके अन्त में स्वभाव से ही वास्तविकता की जिज्ञासा जागृत होती है । जिज्ञासा नवीन राग को उत्पन्न नहीं होने देती, अपितु सहज निवृत्ति को जन्म देती है, जो विकास का मूल है । सहज निवृत्ति से आवश्यक सामर्थ्य स्वत: प्राप्त होती है ।


 - (शेष आगेके ब्लाग में) ‘जीवन-दर्शन भाग 2' पुस्तक से, (Page No. 6-7)