Saturday, 30 November 2013

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Saturday, 30 November 2013 
(मार्गशीर्ष कृष्ण द्वादशी, वि.सं.-२०७०, शनिवार)

सत्संग एवं श्रम-रहित साधन की महत्ता - 3
                   
अब आप विचार करें कि मानव-जीवन और सत्संग - इन दोनों में कितना घनिष्ट सम्बन्ध है । हमारे एक भाई आज बहुत बिगड़ रहे थे। मैंने पूछा, बताओ तो भाई, क्या अपराध मुझसे हो गया ? मैंने आपसे निवेदन किया कि मेरे समान पराधीन आपको कोई दूसरा नहीं मिलेगा । हर आदमी का मुझ पर अधिकार है कि मुझको डाँटे । मुझ पर सभी का यह अधिकार है । ऐसा मेरा जीवन है, यह मेरा दुःख नहीं है। कहते हैं - 'देखिये, आप सत्संग-समारोह करते हैं और उस पर इतना खर्चा। आपको सत्संग-समारोह बहुत ही सादगी के साथ करना चाहिए । नहीं, तो और कोई हिम्मत नहीं करेगा, उत्साहित नहीं होगा ।' मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि इतने खर्चे के बाद अगर एक भी भाई के जीवन में, एक भी बहिन के जीवन में जीवन की माँग जाग्रत हो जाय, तो उस पर सारे विश्व की सम्पत्ति निछावर कर देना भी कम है । आपने सत्संग का महत्त्व नहीं समझा, नहीं समझा ! सत्संग के लिए हँसते-हँसते प्राण दिये जा सकते हैं । सत्संग के लिए क्या नहीं दिया जा सकता ? सब कुछ दिया जा सकता है ।

इसलिये भाई मेरे, सत्संग का मूल्य चुकाने के लिए मैं सत्संग का ऋणी हूँ । सच कहता हूँ, मैं सत्संग के बदले में कुछ भी नहीं कर सका । इसलिये मेरा निवेदन है कि आप यह सोचें कि सत्संग जीवन की कितनी आवश्यक वस्तु है। अगर आपके जीवन में सफलता होगी, तो सत्संग से ही होगी । अगर जीवन में असफलता है, तो वह असत् के संग से है । इसलिए मेरे भाई ! प्रत्येक कार्य के आदि और अन्त में सत् का संग सुरक्षित रहे, इसके लिए आप अथक प्रयत्नशील बने रहें । सफलता अनिवार्य है । परन्तु अधीर नहीं होना है, घबड़ाना नहीं है, वरन् बड़े ही धीरज के साथ इस बात पर विचार करना है कि अब हम सत्संग के बिना किसी भी प्रकार नहीं रहेंगे । देखिये, सत्संग के जो सहयोगी अंग हैं, जो उपाय हैं, जो प्रकार हैं - यद्यपि वास्तविक सत्संग का एक ही प्रकार है, और वह है - जो 'है' उसका संग । संग किस प्रकार होता है ? इस पर थोड़ा विचार कीजिये । आस्था से संग होता है, अभित्रता से संग होता है और आत्मीयता से संग होता है । जैसे अविनाशी जीवन है, आप नहीं जानते कि वह कैसा है, और कहाँ है। पर केवल आप इतना स्वीकार करें कि 'अविनाशी जीवन है ।‘ यहीं से सत्संग आरम्भ हो गया ।


 - (शेष आगेके ब्लाग में) ‘प्रेरणा पथ' पुस्तक से, (Page No. 45-46)

Friday, 29 November 2013

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Friday, 29 November 2013 
(मार्गशीर्ष कृष्ण एकादशी, वि.सं.-२०७०, शुक्रवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
सत्संग एवं श्रम-रहित साधन की महत्ता - 2
                   
मेरा नम्र निवेदन है कि सत्संग श्रम-रहित जीवन में स्वत: सिद्ध है। आवश्यक कार्य पूरा करने पर, अनावश्यक कार्य का त्याग करने पर श्रम-रहित जीवन का अनुभव स्वत: होता है - कर्त्तव्य-पथ । विवेकपूर्वक अचाह, अप्रयत्न, निर्मम, निष्काम होने पर स्वत: सत् का संग होता है - विचार पथ । और अविचल आस्था, श्रद्धा, विश्वासपूर्वक शरणागत होने पर स्वत: सत् का संग होता है - विश्वास-पथ! आप किसी भी पथ के साधक हों, इसमें कोई भी अन्तर नहीं पड़ता है । सत्संग की दृष्टि से ईश्वरवादी, अनीश्वरवादी, भौतिकवादी अध्यात्मवादी, किसी मजहब का, किसी इल्म का, किसी देश का, किसी वर्ग का भाई हो, बहिन हो, कोई भी हो, मनुष्य होने के नाते वह सत्संग का जन्मजात अधिकारी है, और जो सत्संग का अधिकारी है, उसके जीवन में असाधन का नाश, साधन की अभिव्यक्ति स्वत: होगी । जब साधन की अभिव्यक्ति होगी, तब साधन और जीवन में एकता हो जायगी । साधन और जीवन की एकता होने पर हम सब, चाहे जिस परिस्थिति में हों, कृतकृत्य हो जायेंगे । इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिये मानव-सेवा-संघ का प्रादुर्भाव हुआ है । मेरा नम्र निवेदन यह था कि सत्संग के बिना आप न रह सकें । भूखे रह जायँ, नंगे रह जायँ, बड़ी से बड़ी कठिनाइयों को सह लें, पर सत्संग के बिना न रहें । यह बात तभी सम्भव होगी, जब आप इस बात को स्वीकार करें कि मानव-जीवन के पुरुषार्थ की परावधि एक-मात्र सत्संग में है। आप जानते हैं कि सत्संग से क्या मिलता है ? सत्संग से चार बातें जीवन में आ जाती हैं । आज प्रात: काल का प्रस्तावित विषय था - उदारता । जिसको सत्संग प्राप्त है, उसके जीवन में उदारता आ जाती है, उसे उदार बनना नहीं पड़ता, प्रयत्न नहीं करना पड़ता । बोलो ! उदारता का अर्थ क्या है ? उदारता का अर्थ है कि जिसका हृदय दुखियों को देख करुणित हो जाय, सुखियों को देख प्रसन्न हो जाय। उसे सोचना नहीं पड़ता, उसे इस बात का अभ्यास नहीं करना पड़ता कि मेरा ऐसा काम हुआ कि नहीं हुआ । क्यों ? सत्संग होने से सर्वात्मभाव की अभिव्यक्ति होती है । सत्संग होने से विश्व के साथ एकता का बोध हो जाता है । आप जानते हैं कि जो अपना है और सुखी है, क्या उसे देखकर प्रसन्नता नहीं होगी ? जो अपना है और दुखी है, उसे देख करुणा नहीं जाग्रत होगी ? यह है मानव-सेवा-संघ की सेवा । इसमें क्या है ? इसमें रस है, सुख नहीं है । रस में और सुख में एक बड़ा भेद है । रस उत्तरोत्तर बढ़ता रहता है, कभी घटता नहीं और सुख उत्तरोत्तर घटता रहता है, कभी बढ़ता नहीं । सुख उत्तरोत्तर घटता रहता है, रहता नहीं, और रस उत्तरोत्तर बढ़ता रहता है, कभी मिटता नहीं । आप कहेंगे कि बस ! दूसरी बात क्या मिलती है ? परम शान्ति । परम शान्ति में भी रस है । जिस प्रकार उदारता में रस है उसी प्रकार परम शान्ति में भी रस है । और तीसरी चीज क्या मिलती है ? स्वाधीनता । स्वाधीनता में भी रस है और चौथी चीज क्या मिलती है ? प्रेम की प्राप्ति, इसमें भी रस है । इस प्रकार मानव का जीवन रस से परिपूर्ण हो जाता है ।
                                                                                                       
आप बड़े से बड़े विज्ञानवेत्ताओं से, मनोविज्ञान वेत्ताओं से पूछें और उनसे कुछ न कहें कि हमारे जीवन में काम आदि विकारों की उत्पत्ति क्यों होती है? अगर ठीक मनोविज्ञान का ज्ञाता है, तो उसे ईमानदारी से कहना पड़ेगा कि नीरसता के बिना काम की उत्पत्ति नहीं होती । काम की उत्पत्ति के बिना दोषों की उत्पत्ति नहीं होती । इस प्रकार दोषों का मूल कारण निकला नीरसता। और रस कहाँ है ? उदारता में । रस कहाँ है ? शान्ति में । रस कहाँ है? स्वाधीनता में । रस कहाँ है ? प्रेम में । उदारता कहाँ है ? सत् के संग में । परम शान्ति कहाँ है ? सत् के रस में । स्वाधीनता कहाँ है ? सत् के संग में । प्रेम कहाँ है? सत् के राग में ।


 - ‘प्रेरणा पथ' पुस्तक से, (Page No. 43-45)

Thursday, 28 November 2013

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Thursday, 28 November 2013 
(मार्गशीर्ष कृष्ण दशमीं, वि.सं.-२०७०, गुरुवार)

सत्संग एवं श्रम-रहित साधन की महत्ता - 2
                   
बड़े दुःख के साथ मुझे यह कहना पड़ता है कि आज का साधक ऐसा कहता है कि 'मैं साधन करता हूँ और असाधन होता है ।' जरा सोचिये तो सही, असाधन माने क्या ? यही न कि जिसकी उत्पत्ति असत् के राग से हुई हो । तो वह तो, आप कहते हैं कि होता है और साधन आप करते हैं । किये हुये का अन्त स्वाभाविक रूप से अपने आप हो जाता है । अत: इस द्वन्दात्मक स्थिति में साधन करने का अभिमान और असाधन की वेदना में फँसे हुये साधक को देखकर मुझे बड़ी पीड़ा होती है । और ऐसा लगता है कि हाय-हाय ! साधनयुक्त मानव-जीवन आज किस दुर्दशा में पड़ा है !

मेरा नम्र निवेदन है कि मानव-जीवन का एकमात्र पुरुषार्थ स्वत: होने वाले सत्संग को सुरक्षित रखने में है, और किसी बात में नहीं है । यही है, आपका पुरुषार्थ । और कर्त्तव्य-कर्म जो है, वह मिले हुये के सदुपयोग में है । यह है, आपका पुरुषार्थ ! मेरा निवेदन है कि जाग्रत-सुषुप्ति को प्राप्त किये बिना आप जीवन से वंचित हैं । कारण कि, यह वर्तमान जीवन की माँग है, यह वर्तमान की बात है । यह धीरे-धीरे होने वाली बात नहीं है, यह कालान्तर में होने वाली बात नहीं है । इसी आधार पर मैं यह मानता हूँ कि अल्प-से-अल्प काल में भी मानव सिद्धि प्राप्त कर सकता है । क्यों ? सिद्धि का हेतु एकमात्र सत्संग है और सत्संग वर्तमान में सिद्ध हो सकता है । इसी दृष्टि से मैं पूछता हूँ कि आज का साधक-समाज अपनी असफलता से पीड़ित क्यों नहीं है ? आप कैसे चैन से जीते हैं? आप कैसे चैन से सोते हैं ? आप कैसे चैन से खाते हैं ? असाधन के साथ-साथ साधन के आधार पर । मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि यही इसका कारण है। कोई भी भाई, कोई भी बहिन, सर्वांश में असाधनयुक्त नहीं हैं, जो साधन करते हैं वे और जो साधन नहीं करते हैं वे भी । सभी भाई, सभी बहिनों के जीवन में असाधन आंशिक ही है । सर्वांश में असाधन, सर्वांश में अकर्त्तव्य, सर्वांश में आसक्ति किसी भाई में नहीं, किसी बहिन में नहीं । और जो लोग शिक्षित भी हैं, दीक्षित भी हैं, वे मुझे क्षमा करें । मेरी भाषा कटु हो जाती है कभी-कभी। इसलिये मैं डरता हूँ कि आपका दिल न दुःख जाय । शिक्षा भी है, दीक्षा भी है और चाट गये साधुओं के चरणों को, चाट गये पुस्तकालय के पुस्तकालय । और कहाँ तक बताऊँ, इससे आगे की अपनी व्यथा, अपना दुःख । यही मेरा दुःख है। अजी जनाब ! उपनिषदों और वेदान्त पर टीकायें कर डालीं और फिर भी दशा यह है कि ममता नाश नहीं हुई, कामना नाश नहीं हुई । और बुद्धिमानी ? यह कि बात समझ में तो आती है, ठीक भी है, पर जीवन में नहीं उतरती । मैं नहीं सोच पाता कि इस दुःखद दशा में आप चैन से कैसे जीते हैं ? क्या आप नहीं सोचते कि सत्य क्या देश-काल की दूरी पर है ? क्या सत्य कालान्तर में प्राप्त होता है ? जो सत्य वर्तमान जीवन की वस्तु है, आप आज उसके बिना चैन से रहते हैं और लेबिल लगा हुआ है कि हम साधक हैं। हम 20 वर्ष से सत्संग करते हैं, हम 30 वर्ष से सत्संग करते हैं, हम 50 वर्ष से सत्संग करते हैं । इस सब दुर्दशा को देखकर मेरा हृदय फटता है । मुझे बड़ी व्यथा होती है । मैं इस दुर्दशा को मानव-जीवन का अपमान मानता हूँ कलंक मानता हूँ।


 - (शेष आगेके ब्लाग में) ‘प्रेरणा पथ' पुस्तक से, (Page No. 42-43)

Wednesday, 27 November 2013

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Wednesday, 27 November 2013 
(मार्गशीर्ष कृष्ण नवमीं, वि.सं.-२०७०, बुधवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
सत्संग एवं श्रम-रहित साधन की महत्ता - 1
                   
अब आप विचार करें वर्तमान कर्त्तव्य-कर्म पर, जिसके लिये शरीर की अपेक्षा, योग्यता की अपेक्षा, सामर्थ्य की अपेक्षा आपको है । वह वर्तमान कर्त्तव्य-कर्म सत्संग में बाधक नहीं है । आप कितने ही कर्मठ क्यों न हों, 24 घण्टे में 18 घण्टे काम करें, 10 घण्टे काम करें । मैं ऐसे साधकों को जानता हूँ, जिनके सम्बन्ध में मैंने सुना है कि वे केवल 2 घण्टे आराम करते हैं और 22 घण्टे काम करते हैं । जो भी हो, काम कितना ही अधिक आपके सामने हो; किन्तु वह वर्तमान का कर्त्तव्य-कर्म हो और उस कर्म के फल में आपकी आसक्ति न हो, उस किये हुये कर्म का अभिमान न हो, करने की आसक्ति न हो । इस विधान के अनुसार आप चाहे जितना कार्य करें, कार्य के अन्त में आपको सत् का संग, अविनाशी का रस, 'है' का राग स्वत: हो जायगा । किन्तु यदि आप कार्य का फल चाहते हैं, तो सत् का संग होने पर भी आपको शक्ति मिलेगी । इसमें कोई संदेह नहीं । परन्तु आपकी निष्ठा 'सत्' में नहीं होगी, आपकी प्रियता 'सत्' में नहीं होगी । तब यह होगा कि जो शक्ति आपको मिलेगी, फिर उसको आप श्रम-युक्त जीवन में व्यय कर देंगे । कैसे ? जो शक्ति मिलेगी, उसको व्यय करके आप फिर असमर्थता में आबद्ध होंगे ।

इस विपत्ति से बचने के लिये प्रत्येक भाई-बहिन के लिये यह अनिवार्य है कि आवश्यक कार्य के अन्त में, उससे श्रम-रहित होकर सत् का संग करना चाहिये, चाहे यों कहो । चाहे यह कहो कि सत् का संग सुरक्षित रहना चाहिये। क्यों ? यह इसलिये कि इसी सत् के संग से जिज्ञासा-पूर्ति के लिये विचार का उदय होगा ? कर्त्तव्य-पालन के लिये सामर्थ्य की अभिव्यक्ति होगी और प्रभु से मिलने के लिये विरह की जागृति होगी । देखिये, भजन किसी अभ्यास का नाम है - ऐसा, कम से कम मैं व्यक्तिगत रूप से बिल्कुल नहीं मानता हूँ । भजन का अर्थ क्या है ? भजन के दो भाग हैं - एक भाग है - सेवा और दूसरा प्रियता । सेवा प्रवृत्ति-काल में और प्रियता निवृत्ति-काल में । इसका नाम है, भजन । तो यह जो भजन है, यह सत्संग से स्वत: होता है । मुझे तो इस बात में बिल्कुल भी सन्देह नहीं है । किन्तु मैं इस बात को आपके सामने इस रूप में नहीं कहना चाहता कि आप इसको मान ही लें । मुझे अपनी ईमानदारी पर पूरा विश्वास है । मैं प्रमाण नहीं देता । नहीं तो, अनेक प्रमाण दे सकता हूँ । इस सम्बन्ध में मेरा निवेदन केवल इतना ही था कि अगर आपको भजन सचमुच अभीष्ट है, तो भी सत्संग चाहिये और यदि साधन अभीष्ट है, तो भी सत्संग चाहिये ।

आप जानते ही हैं कि साधन किसे कहते हैं । असाधन-रहित होने पर जब परम शान्ति की, स्वाधीनता की, अमरत्व की, चिन्मय-जीवन की अभिव्यक्ति होती है, उसी को साधन कहते हैं । साधन और जीवन में विभाजन नहीं हो सकता।


 - ‘प्रेरणा पथ' पुस्तक से, (Page No. 40-42)

Tuesday, 26 November 2013

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Tuesday, 26 November 2013 
(मार्गशीर्ष कृष्ण अष्टमी, वि.सं.-२०७०, मंगलवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
सत्संग एवं श्रम-रहित साधन की महत्ता - 1
                   
मुझ जैसा पराधीन व्यक्ति कोई नहीं मिलेगा । मेरे ऊपर बहुत से 'आर्डीनेन्स’ लगे हुए हैं - इतना बोलो, इतना मत बोलो, इतना खाओ, इतना लेटो आदि-आदि । मैं यह निवेदन कर रहा था कि 'जाग्रत-सुषुप्ति’ का नाम ही 'मूक सत्संग’ है । और यदि मैं यह कह दूँ कि इसी का नाम 'सत्संग' है, तो कोई अत्युक्ति की बात नहीं होगी । कोई भाई बिगड़ न जायँ, मेरी वाणी जरा कटु है । आज की दुनियाँ में साधक-समाज में आप जानते हैं, क्या हो रहा है? सत् की चर्चा को सत् का संग कहने लगे हैं । अगर कोई पोथी पढ़ रहा है, तो सत्संग, कोई साधन कर रहा है, तो सत्संग । अगर कोई व्याख्यान दे रहा है, तो सत्संग । यह आज की प्रचलित प्रथा है ।

मेरा निवेदन है कि यह सब सत्संग नहीं है । 'सत्संग' का अर्थ है, सत् का संग, अविनाशी का संग, नित्य-प्राप्त का संग । मिले हुये की ममता का नाम सत्संग नहीं है । अप्राप्त की कामना का नाम सत्संग नहीं है । किसी इन्द्रिय-जन्य, बुद्धि-जन्य श्रम का नाम सत्संग नहीं है । सत्संग का अर्थ ही है कि 'है' का संग । और 'है' का संग होता है तब, जब जाग्रत-सुषुप्ति हो । जाग्रत-सुषुप्ति कब होती है? वह तब होती है, जब आप आवश्यक कार्य को पूरा करने के पश्चात्, अनावश्यक कार्य का त्याग करने के पश्चात्, अल्प काल के लिये, काम-रहित होते हैं, श्रम-रहित होते हैं, तब । उस समय 'है' का राग होता है । इससे क्या सिद्ध हुआ ? हमें सत् का राग करना नहीं है, वह तो होगा । यहाँ एक और सूक्ष्म बात है और वह यह कि सत् का संग होगा तभी, जब सत्संग की अभिरुचि, सत्संग की उत्कट लालसा जीवन में हो । सत् के संग के बिना 'मैं' एक क्षण भी चैन से नहीं रह सकता - इस प्रकार की तीव्र लालसा, उत्कट लालसा, जीवन में सत्संग की हो । इस प्रकार की लालसा से यह होगा कि असत् के त्याग का बल आप में आ जायेगा । और जब असत् के त्याग का बल आप में आ जायेगा, तब सत् का राग स्वत: हो जायेगा ।


 - (शेष आगेके ब्लाग में) ‘प्रेरणा पथ' पुस्तक से, (Page No. 39-40)

Monday, 25 November 2013

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Monday, 25 November 2013 
(मार्गशीर्ष कृष्ण सप्तमी, वि.सं.-२०७०, सोमवार)

सत्संग एवं श्रम-रहित साधन की महत्ता - 1
                   
मानव-सेवा-संघ 'विचार-संघ' है, प्रचार-संघ नहीं । इसलिये अभी जो चर्चा आपके सामने करनी है, वह जीवन उपयोगी है । कल सायंकाल की चर्चा में सम्भवतः ऐसा निवेदन किया था कि हम सब भाई-बहिन इस बात को ठीक-ठीक जानते हैं कि सुषुप्ति में अर्थात् गहरी नींद में हम बे-सामान और बे-साथी के होते हुये भी दुःख से रहित होते हैं, और उस सुखद अनुभूति को हम लोग, प्राय: जगने पर कहते हैं कि आज बड़े आराम से सोये, बड़ा मजा रहा, इत्यादि । अर्थात् बे-सामान और बे-साथी के होने पर भी हम सुख भोगते हैं; किन्तु उसकी वास्तविकता क्या है, उसको ठीक-ठीक अनुभव नहीं कर पाते । यदि आप यह जानना चाहते हैं कि बिना सामान व साथी के और बिना परिश्रम के जो जीवन है, वह जीवन क्या है ? तो उसके लिये जाग्रत-सुषुप्ति आवश्यक है । जाग्रत-सुषुप्ति कैसे होती है ? इस सम्बन्ध में विचार करने से ऐसा मालूम होता है कि जिस समय आप अपने आवश्यक कार्य को पूरा करके श्रम-रहित होते हैं तथा दूसरे किसी कार्य का आरम्भ नहीं करते, यानी एक कार्य की समाप्ति और दूसरे कार्य के प्रारम्भ करने से पूर्व, उस मध्य काल में किये हुये का स्मरण आता है अथवा जो करना चाहते हैं, उसका चिन्तन होता है । इस दशा को हम सभी समझते हैं । सभी उससे परिचित हैं । इसी दशा को लोगों ने 'मन की चंचलता' के नाम से कथन किया है और इसी श्रम के फलस्वरूप ऐसा कहने लगते हैं कि हम तो जैसे होंगे वैसे होंगे, पर मन हमारा बहुत ही चंचल है। और मन के सुधार की बात आज का साधक-समाज प्राय: कहता-सुनता रहता है। बड़े-बड़े गुरु-शिष्य-सम्वाद के रूप में अनेक पुस्तकें लिखी गई हैं - मन के स्वरूप को समझाने के सम्बन्ध में । किन्तु इस विषय में मेरा ऐसा नम्र निवेदन है कि जो करण है वह कर्त्ता नहीं होता ।

कोई भी फाउण्टेनपेन लेखक नहीं है । इसी न्याय के अनुसार कोई मस्तिष्क, कोई भी करण, शरीर का कोई भी अवयव अथवा शरीर कर्त्ता नहीं है। फिर कर्त्ता कौन है ? आप कहेंगे, शरीर से अतीत, दिव्य चिन्मय परम तत्त्व जो आत्मा-परमात्मा है । क्या वह कर्त्ता है ? वह कर्त्ता नहीं है । क्यों ? क्योंकि कर्त्ता वह होता है, जो भोक्ता हो । वह भोक्ता है नहीं । वह क्या है ? वह सर्व का आश्रय है, सर्व का प्रकाशक है, किन्तु कर्त्ता है नहीं । और 'यह' करके जिसे आप सम्बोधन करते हैं वह भी कर्त्ता नहीं है । तो कर्त्ता फिर कौन है ? यह एक दार्शनिक प्रश्न है । इस दार्शनिक प्रश्न पर विचार करने से ऐसा मालूम होता है कि जिसका स्वतंत्र अस्तित्व न हो और जिससे वह मिल जाय, उसी जैसा भासित होने लगे, वही देवता कर्त्ता है । उसी का नाम है - 'मैं' । यह 'मैं' 'यह' है, न 'वह'। यह  'मैं' जब जाग्रत-सुषुप्ति को प्राप्त करता है, अर्थात् जाग्रत में जब सुषुप्त हो जाता है, तब उसे इस बात का स्वयं बोध हो जाता है कि मैं बिना सामान के, बिना साथी के, बहुत ही आराम से रह सकता हूँ । सुख-दुःख में यह सामर्थ्य नहीं है कि वे मुझ तक पहुँच सकें । इसी की चर्चा कल प्रवचन समाप्त करते समय की गई थी ।


 - (शेष आगेके ब्लाग में) ‘प्रेरणा पथ' पुस्तक से, (Page No. 38-39)

Sunday, 24 November 2013

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Sunday, 24 November 2013 
(मार्गशीर्ष कृष्ण षष्ठी, वि.सं.-२०७०, रविवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
साधना की अभिव्यक्ति के लिये जीवन के सत्य को स्वीकार 
करो - 2
                   
मानव-सेवा-संघ ने कहा - तुम पहले सत्य को स्वीकार करो, सत्य को स्वीकार करने से अकर्त्तव्य, असाधन और आसक्ति मिटेगी । यह पहले मिटेगी । और जब अकर्त्तव्य मिट जायगा, तब जो कर्त्तव्य-परायणता आयेगी और जब आसक्ति मिट जायगी, तब जो प्रियता आयेगी, वह कर्त्तव्य-परायणता, वह असंगता और वह प्रियता आपके जीवन में साधना के रूप में प्रकट होगी, यानी वह आपकी साधना हो जायगी । और जब साधना के रूप में असंगता, कर्त्तव्य-परायणता और प्रियता आपको प्राप्त होगी, तब निर्विकारता, शान्ति, मुक्ति और भक्ति भी आपको प्राप्त हो जायगी । ऐसी बात नहीं है कि कर्त्तव्य-परायणता के बिना आपको निर्विकारता और शान्ति मिल जाय, असंगता के बिना आपको मुक्ति मिल जाय और आत्मीयता के बिना भक्ति मिल जाय । यह कभी नहीं होगा। भक्ति जब मिलेगी, तो आत्मीयता से ही मिलेगी और मुक्ति जब मिलेगी, तो असंगता से ही मिलेगी, निर्विकारता जब मिलेगी, तब निर्ममता से ही मिलेगी और चिर-शान्ति जब मिलेगी, तो निष्कामता से ही मिलेगी । यह जीवन का अटल सत्य है ।

तो, मैं यह निवेदन कर रहा था कि निर्मम होना, असंग होना अथवा परमात्मा से आत्मीय सम्बन्ध स्वीकार करना - यह सत्संग हुआ । अगर आप सत्संग करेंगे, तो साधना स्वत: प्रकट हो जायगी । और महाराज, साधना और साध्य में विभाजन नहीं होता, साधना और साध्य में दूरी नहीं रहती, भेद और भिन्नता नहीं रहती । तो साधना साध्य से अभिन्न हो जायगी । इसमें कोई सन्देह की बात नहीं है । परन्तु जीवन में साधना की अभिव्यक्ति होनी चाहिये और साधना की यह अभिव्यक्ति एक-मात्र सत्संग से ही होगी, अन्य किसी प्रकार नहीं हो सकती । आप सोचिये कि सत्संग के बिना भी आप बलपूर्वक साधना तो कर सकते हैं, लेकिन वह जीवन के साथ अभिन्न नहीं होगी। इस प्रकार की हुई साधना से आप अपने को अलग अनुभव करेंगे और बलपूर्वक की हुई साधना को अलग अनुभव करेंगे और कहेंगे कि आज मैंने इतनी देर ध्यान किया । ध्यान अलग और आप अलग । आज मैंने इतना जप किया । जप अलग और आप अलग । आज मैंने इतना तप किया । तप अलग और आप अलग । आज मैंने इतना दान दिया । दान अलग और आप अलग । इस प्रकार की भिन्नता रहेगी ही और जब इस प्रकार की भिन्नता रहेगी, तो 'आपका' जो अस्तित्व रहेगा, वह साधन रूप नहीं हो पाएगा । इसलिये सत्संग के द्वारा आपके अस्तित्व में ही, किसी और में नहीं, आपके अस्तित्व में ही, साधना की अभिव्यक्ति हो जायेगी ।

जब मनुष्य के अस्तित्व में साधना की अभिव्यक्ति हो जाती है, तो फिर असाधन की उत्पत्ति नहीं होती । क्योंकि अगर साधन से अलग यदि अपना कोई अस्तित्व रहता, तो सम्भव है, फिर कभी असाधना आ जाती । लेकिन जब साधक की साधना से भिन्न उसका अलग कोई अस्तित्व रहता ही नहीं, तो फिर सदा के लिये असाधन का नाश हो जाता है, और जब असाधन का नाश सदा के लिये हो गया, तो फिर साधना और साध्य तो अभिन्न हैं ही, बल्कि ऐसा कहना चाहिये कि साधना तो साध्य की ही महिमा है, और कुछ नहीं है । तो साधना का जो रूप हुआ वह साधक का जीवन भी है और साध्य की महिमा भी है । इससे यह सिद्ध हुआ कि साध्य की महिमा साधक का जीवन है । यह बड़े रहस्य की और गम्भीर बात है । साध्य की महिमा, और महिमा किसे कहते हैं ? महिमा का अर्थ होता है, जो हमें आकर्षित कर सके, खींच ले । इस प्रकार हमारा जीवन ही साध्य की महिमा हो गई । तो फिर महिमा हम को खींच लेगी न । जरूर खींच लेगी । इसी सत्य को समझाने के लिए हमने विद्वान् महानुभावों के श्रीमुख से सुना है कि परमात्मा, जिसे पसन्द करता है, उसको स्वयं वरण कर लेता है । अब प्रश्न होगा कि परमात्मा किसे पसन्द करता है ? मानव-सेवा-संघ की विचारधारा के अनुसार इसका उत्तर होगा कि जो सत्संग के द्वारा अपने में साधना को प्रकट कर लेता है, अथवा सत्संग के द्वारा जिसमें साधना प्रकट हो जाती है, परमात्मा उसी को पसन्द करता है ।


 - ‘प्रेरणा पथ' पुस्तक से, (Page No. 36-38)

Saturday, 23 November 2013

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Saturday, 23 November 2013 
(मार्गशीर्ष कृष्ण पंचमी, वि.सं.-२०७०, शनिवार)

साधना की अभिव्यक्ति के लिये जीवन के सत्य को स्वीकार 
करो - 2

जीवन के सत्य को स्वीकार किये बिना, सत्संग से वंचित होकर, सत्संग से विमुख होकर-हमारे किये सत्कार्य का, सत्-चिन्तन का और हमारी की हुई सत्-चर्चा का यह फल नहीं होगा कि हमारे जीवन में साधना की अभिव्यक्ति हो जाय और हम सत्य से अभिन्न हो जायें । यही कारण है कि आज आप समय का बहुत बड़ा भाग सत्-चर्चा और सत्-चिन्तन में लगा देते हैं और समय और सम्पत्ति का बहुत बड़ा भाग आप सत्कार्यों में लगा देते हैं । आपने समय और सम्पत्ति को सत्कार्यों में लगाया, आपने सत्-चर्चा और सत्-चिन्तन किया । परन्तु सत्संग न करने से आपके जीवन में साधना की अभिव्यक्ति नहीं हुई। और जब जीवन में साधना की अभिव्यक्ति नहीं होती, तब साधना हमारे लिए एक भार हो जाती है, एक अस्वाभाविक बात हो जाती है । कभी-कभी, आपने देखा होगा कि बड़े उत्साह से, बड़े प्रेम से हम नित्यकर्म करने बैठ गये, किया और जिस समय नित्यकर्म पूरा हो जाता है, उस समय जैसी  'रिलीफ' आपको मालूम होती है, वैसी रिलीफ नित्यकर्म करते समय मालूम होती है क्या? आपने इस विषय में विचार नहीं किया होगा तो ठीक उत्तर दे नहीं पायेंगे। आप कभी अनुभव करके देखिये । आप किसी भी अनुष्ठान को करने के लिये तत्पर हो जाइये। जिस समय अनुष्ठान सम्पन्न होता है और आप थोड़ी देर के लिए न करने की स्थिति में आते हैं, उस समय जैसा संतोष आपको मालूम होता है, वैसा संतोष अनुष्ठान-काल में नहीं मालूम होता ।
             
भागलपुर में एक महात्मा बड़े यज्ञ कराया करते हैं, बहुत से यज्ञ उन्होंने कराये हैं । और उनके यज्ञों में लाखों रुपये का व्यय होता है, और लाखों रुपया एकत्रित भी हो जाता है - ऐसे यज्ञ कराते हैं वे । हमने सोचा कि चलें, महात्मा से भेंट कर आवें । जब हम उनसे भेंट करने गये, तो उनके मुँह से सबसे पहले यही बात निकली - 'महाराज, ऐसी कृपा कीजिये कि अनुष्ठान सानन्द सम्पन्न हो जाय'। उन्होंने यह कहा तो ठीक ही कहा - सच्ची बात ही कही । पर हमें लगा कि हमने जो सोचा था कि ये अनेक यज्ञ कर चुके हैं, लाखों रुपये व्यय कर चुके हैं, तो ये बिल्कुल निश्चिन्त जरूर होंगे । पर ऐसी बात नहीं थी, ऐसा होता नहीं है। कितना भी बड़ा काम कीजिए और सफल भी हो जाइये, फिर भी उस कार्य की पूर्ति-काल में जो सन्तोष होता है, वह कार्य-काल में नहीं । एक बात । दूसरी बात यह है कि कार्य के द्वारा आपको जो थोड़ा सा सन्तोष होता है, वह पुन: कार्य करने के संकल्प को जन्म दे देता है । यह बड़ी ऊँची बात है, बड़ी गम्भीर बात है ।


 - (शेष आगेके ब्लाग में) ‘प्रेरणा पथ' पुस्तक से, (Page No. 34-36)

Friday, 22 November 2013

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Friday, 22 November 2013 
(मार्गशीर्ष कृष्ण पंचमी, वि.सं.-२०७०, शुक्रवार)

साधना की अभिव्यक्ति के लिये जीवन के सत्य को स्वीकार करो - 1

मिली हुई वस्तु पर हमारा अधिकार नहीं है और देखी हुई सृष्टि का स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं है। जिस का स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं है, उसकी हम कामना नहीं करेंगे, और जिस पर हमारा स्वतन्त्र अधिकार नहीं है, उसमें ममता नहीं करेंगे । तो दो बातें सामने आती हैं, - अगर हम शरीर से ममता नहीं करते और संसार की कामना नहीं करते, तो निर्मम होने से निर्विकारता और निष्काम होने से चिर-शान्ति प्राप्त होती है । अब यह जो निर्विकारता और चिरशान्ति आपको प्राप्त हुई, यह आपकी उपार्जित वस्तु नहीं है । यह सर्वमान्य तथ्य है कि निर्विकारता का तत्त्व स्वाभाविक तत्त्व है और शान्ति का तत्त्व भी स्वाभाविक तत्त्व है । ऐसे ही असंगता से प्राप्त स्वाधीनता है । वह भी स्वाभाविक तत्त्व है । इसी प्रकार आत्मीयता से प्राप्त जो अखण्ड स्मृति तथा अगाध प्रियता है, वह भी स्वाभाविक तत्त्व है । तो निर्विकारता, शान्ति, मुक्ति और अखण्ड-स्मृति तथा अगाध-प्रियता का स्वतन्त्र अस्तित्व है । अब देखिये, जिसका स्वतन्त्र अस्तित्व है, उसी को हमें पसन्द करना चाहिये । यदि इस बात को आप मान लें तो बड़ी सुगमतापूर्वक साधन-तत्त्व से, साधना से अभिन्न हो सकते हैं । परन्तु हम सबसे गलती यह होती है कि निर्मम होना पसन्द नहीं करते और हमारे पास यदि धन है, तो उसको अपना मानकर लोभ करते हैं । यदि ऐसा न करें, तो धन के लोभ की उत्पत्ति ही नहीं होती है । इस प्रकार धन से आपकी कोई हानि नहीं होती, हानि तो उसे अपना मानने से होती है; क्योंकि धन से तो लोभ की उत्पत्ति है ही नहीं, लोभ की उत्पत्ति हुई धन को अपना मानने से ।

जो साधक 'अपना' मान करके दान भी कर देता है, तो महाराज ! उलटी ही प्रतिक्रिया होती है । हमारे पास अभी एक बहिन ने कुछ रुपया भेजा है - अपनी बहिन का रुपया, आप जानकर ताज्जुब करेंगे कि उसके लिये उन्होंने अपनी तीन पुश्तों के नाम लिखाने को कहा है कि अमुक-अमुक के नाम लिखा दें। लेकिन सोचिये तो सही, दान देने के बाद भी, उस धन के बदले में न जाने क्या-क्या चाहते हैं । अब आप सोचिये, उसका परिणाम यही होगा कि हम धन देने का सुख-भोग, नाम और यश की दासता में बँध गये ।

ऐसी दशा में क्या धन से हमारा सम्बन्ध टूट गया ? या हम निर्लोभ हो गये ? क्या यह सम्भव होगा ? परिणाम यही होगा कि इस प्रकार के दान से हमको यश और नाम तो मिल गया; लेकिन वह दान जो दिया गया, उसके बदले में यदि आपने आत्म-ख्याति चाही, उसका फल चाहा, तो आपने दिया या लिया? यह ऐसा ही दान हुआ जैसे कोई-कोई किसान खेत में बीज डाले और कहे कि हमने भूमि को दाना भेंट कर दिया, दान दे दिया । यह तो भूमि जानती है कि इसने जो एक दाना डाला है, उसके बदले में मुझसे कई गुना उसे लेना चाहता है। तो, लेने के लिए जो दिया जाता है, वह दान नहीं है । वह पुण्य कर्म कहलाता है, वह त्याग नहीं कहलाता । उससे आपको निर्दोषता प्राप्त नहीं हो सकती, उससे आपको निरभिमानता प्राप्त नहीं हो सकती ।

इसलिये मानव-सेवा-संघ ने कहा कि ऐसा मानो, जीवन के इस सत्य को स्वीकार करो कि मुझे जो कुछ मिला है, वह मेरा नहीं है । अगर आप यह बात मान लेंगे, तो निर्विकारता आ जायगी । उसके बदले में मुझे कुछ नहीं चाहिए - यह बात मान लें, तो चिर-शान्ति आ जायगी । और फिर सृष्टि पर मेरा कोई अधिकार नहीं है - अगर इस सत्य को मान लेंगे, तो असंग होकर स्वाधीनता प्राप्त हो जायगी । ऐसे ही, जब प्रभु को आप अपना मान लेंगे, तो प्रियता आ जायगी ।
                   
अब आप देखिए, जितनी साधना है, वह सत्य को स्वीकार करने से प्राप्त हुई, साधना सत्य को स्वीकार करने से आप में प्रकट हो गई । परन्तु हम सत्य को स्वीकार करना तो छोड़ देते हैं और सत्-कार्य, सत्-चर्चा और सत्-चिन्तन को पकड़ लेते हैं । मैं यह नहीं कहता कि सत्-कार्य नहीं करना चाहिये या सत्-चर्चा और सत्-चिन्तन नहीं करना चाहिये । ऐसा मेरा मत नहीं है । लेकिन सत्संग से वंचित होकर, सत्संग से विमुख होकर, हमारा किया हुआ जो सत्कार्य है, हमारा किया हुआ जो सत्-चिन्तन है, हमारी की हुई जो सत्-चर्चा है, उसका वह फल नहीं होगा कि जीवन में साधना की अभिव्यक्ति हो जाय, और हम साध्य से अभिन्न हो जायँ ।


 - ‘प्रेरणा पथ' पुस्तक से, (Page No. 32-34)

Thursday, 21 November 2013

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Thursday, 21 November 2013 
(मार्गशीर्ष कृष्ण चतुर्थी, वि.सं.-२०७०, गुरुवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
अपनी ओर निहारो - 3

एक होता है मिला हुआ, एक होता है प्राप्त । मिला हुआ वही है, जिसको आप 'यह' कहकर सम्बोधन करते हैं, और प्राप्त वह है जिसको आप 'है' करके सम्बोधन करते हैं । और किसको मिला है ? जिसको आप 'मैं' करके सम्बोधन करते हैं । तो 'मैं' को कुछ मिला है और भाई, और कुछ मौजूद है । जब मैं पहले मिले हुये में ममता करता हूँ तो असत् का संग हो जाता है, और मौजूद में आस्था करता हूँ तो सत् का संग हो जाता है । सत् का संग होते ही वह ज्ञान जिसको गुरु ने कहा है - 'यह गुरु का ज्ञान है ।' वह ज्ञान जिसको शास्त्रों ने कहा है -'यह शास्त्र का ज्ञान है', वह ज्ञान जिसको पीर और पैगम्बर ने कहा है कि यह पीर और पैगम्बर का ज्ञान है, वही ज्ञान आप के जीवन में स्वत: अवतरित होता है, स्वत: स्फुरित होता है । ऐसा क्यों ? यह मंगलमय विधान है, यों । इसी आधार पर मानव-सेवा-संघ ने कहा कि 'हे मानव ! तू क्यों निराश होकर बैठा है ? तू क्यों हार मानकर बैठा है ? तू क्यों भय से भयभीत हो कर बैठा है ?’

एक दिन मैं मानव-सेवा-संघ के निर्माण निकेतन आश्रम राँची में बैठा हुआ था । एक विदेशी डाक्टर आये, जो लिटरेचर के डाक्टर थे । उन्होंने एक प्रश्न किया । वे हिन्दी नहीं जानते थे और मैं इंगलिश नहीं जानता था । मेरे चार-पाँच मित्र वहाँ बैठे हुये थे । उन्होंने कहा – महाराज, हमारे सामने एक प्रौबलम है, समस्या है, और वह यह है कि आज ऐसे विनाशकारी आविष्कार हो गये हैं, जिनको देखकर आशंका होती है कि संसार का न जाने कब नाश हो जाय ! इस सम्बन्ध में आपका क्या विचार है ? मैंने अपनी मिली हुई प्रेरणा के अनुसार कहा - 'मेरे भाई, मुझे तो लेशमात्र भी इसका भय नहीं है । बोले, क्यों ? मैंने कहा, 'जो व्यक्ति सृष्टि बना नहीं सकता, उसको चैलेंज है कि वह उसे मिटा भी नहीं सकता । उसने कहा - सोचता मैं भी ऐसा ही था, परन्तु उसे कहने का मेरा साहस नहीं होता था । उसने अपनी डायरी निकाली और नोट कर लिया । हमारे देश के लोगों में और दूसरे देश के लोगों में एक बड़ा अन्तर है । हमारे देश के लोग इस बात पर ध्यान देते हैं कि बोलने वाला कौन है, उसका मुँह कैसा है, उसकी शिक्षा-दीक्षा क्या है, आदि । विदेशी ऐसा नहीं करते । वे जो बोला गया, उस पर विचार करते हैं । हमारे देश की आज यह दशा है कि जो मुझसे प्रेम करते हैं, वे मेरे व्याख्यान के बाद उठ जायेंगे । जो स्वामी जी महाराज से प्रेम करते हैं, वे उनके व्याख्यान के बाद उठ जायेंगे । क्योंकि उन्हें इससे मतलब नहीं कि बात क्या है । उन्हें तो सिर्फ इससे मतलब है कि मुँह कौन सा है ? यह मुँह कौन सा है, यह भाषा कौन सी है ? यह तरीका कौन सा है ? परन्तु जहाँ आप लोग भाषा पर दृष्टि रखते हैं,  मुँह पर दृष्टि रखते हैं, तरीके पर दृष्टि रखते हैं और जो शब्द कहे गये, उनके अर्थ पर दृष्टि नहीं रखते, वहाँ यही परिणाम होता है कि दिमागी उन्नति तो बहुत हो जाती है, मस्तिष्क में संग्रह तो बहुत हो जाता है; लेकिन हृदय का पल्ला बहुत नीचे गिर जाता है । क्रियात्मक जीवन बहुत निम्नकोटि का हो जाता है । परन्तु वह विदेशी जिज्ञासु भाई, हम लोगों की भाँति नहीं था । उसने डायरी निकाली, नोट किया और मुझे विश्वास दिलाया कि मैं आपका यह सन्देश अपने देश में कहूँगा । कहने का मेरा तात्पर्य केवल इतना ही है कि आप इस बात से हार मान कर न बैठ जायँ कि हम साधारण प्राणी हैं, भला हम सृष्टि के लिए कैसे उपयोगी हो सकते हैं ? परन्तु मैं सच कहता हूँ यह मिथ्या धारणा है ।


 - ‘प्रेरणा पथ' पुस्तक से, (Page No. 30-32)

Wednesday, 20 November 2013

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Wednesday, 20 November 2013 
(मार्गशीर्ष कृष्ण तृतीया, वि.सं.-२०७०, बुधवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
अपनी ओर निहारो - 3

जब हम मिले हुये का दुरुपयोग नहीं करते हैं, तब हमारे द्वारा दूसरों के अधिकार सुरक्षित होते हैं और जब हमारे द्वारा दूसरों के अधिकार सुरक्षित होते हैं, तो परस्पर एकता होती है । जब एकता होती है, तो स्नेह की वृद्धि होती है, विश्वास की वृद्धि होती है। जब परस्पर स्नेह और विश्वास की वृद्धि होती है, तब जो नहीं करना चाहिए, उसकी उत्पत्ति ही नहीं होती । तब अपने आप एक ऐसे सुन्दर समाज का निर्माण हो जाता है कि जिसको पुलिस की, फौज की, न्यायालय की, लड़ाई के सामान की जरूरत ही नहीं होती । इस बात को सुनकर मेरे बहुत से मित्र यह सन्देह करते हैं, कहते हैं, 'महाराज ! आप ऐसी जो बात कहते हैं, वह व्यक्तिगत रूप से तो बिलकुल ठीक मालूम होती है; किन्तु सामूहिक रूप से ऐसा होना सम्भव नहीं है । परन्तु यदि आप गम्भीरतापूर्वक विचार करें, तो आपको यह स्वीकार करना ही पड़ेगा कि जो बात हमारे अहं में आ जाती है, वह विभु हो जाती है । आप सोचिये कि पहले आपको किस का भास होता है? आप कहेगे कि स्वयं अपना - यानी 'मैं हूँ’ । इससे यही तो सिद्ध हुआ कि आपसे पुराना इस दृश्य में कोई नहीं है । यह कल्पना नहीं है, एक वैज्ञानिक तथ्य है। इसमें दार्शनिक रहस्य है । आपके अहं से पुराना इस सारी सृष्टि में कोई नहीं है। अत: सृष्टि का कोई भाग ऐसा नहीं है कि जहाँ अहं न हो ।

अहं विभु है; लेकिन विभु होने पर भी उसके गुणों में भेद होता है । अहं बुद्धि से भी सूक्ष्म है और सूक्ष्म होने के नाते सबसे अधिक व्यापक है । इसीलिये वह बुद्धि से भी अधिक सूक्ष्म है । बुद्धि मन से सूक्ष्म है, मन इन्द्रियों से सूक्ष्म है और इन्द्रियाँ इस दृश्य से सूक्ष्म हैं । अत: जो न्याय, जो ईमानदारी, जो प्रेम, जो श्रद्धा, जो विश्वास और जो सच्चरित्रता स्वयं आपके जीवन में आ जाती है, वह व्यापक हुये बिना नहीं रह राकती । इसीलिये व्यक्ति की सुन्दरता पर ही समाज की सुन्दरता निर्भर करती है । और इसीलिये यह बात कही गई है कि व्यक्ति अपने जीवन को सुन्दर बना कर ही समाज में सुन्दरता ला सकता है । जीवन सुन्दर कैसे होता है ? जीवन सुन्दर होता है, सत्संग से । और हम सत्संग करने में क्या स्वाधीन नहीं हैं ? हैं, सभी स्वाधीन हैं । अपने जीवन में से अपने जाने हुये असत् के त्याग में हम सभी स्वाधीन हैं । कोई भाई, कोई बहिन ऐसी नहीं है, जो सत्संग में स्वाधीन न हो । सत्संग का अर्थ है 'है' का संग । 'है' माने, जो मौजूद है । तो, मौजूद का राग करने में कोई पराधीन नहीं है । ऐसा मैं अपनी भाषा में कहता हूँ, मैं बे-पढा-लिखा आदमी हूँ, इसलिए उसमें कुछ दोष रह जाते हैं । यहाँ पर 'मौजूद' का अर्थ वैसा नहीं है, जैसा कि 'आप लोग यहाँ मौजूद हैं' ऐसा कहने में है ।


 - (शेष आगेके ब्लाग में) ‘प्रेरणा पथ' पुस्तक से, (Page No. 29- 30)

Tuesday, 19 November 2013

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Tuesday, 19 November 2013 
(मार्गशीर्ष कृष्ण द्वितीया, वि.सं.-२०७०, मंगलवार)

अपनी ओर निहारो - 3

हम स्वयं अपने नेता बनें और यह समझें कि नेता किसे कहते हैं ? और राष्ट्र किसे कहते हैं? राष्ट्र में बल का उपयोग होता है और जो नेता है, वह समझदारी का उपयोग करता है, समझाता-बुझाता है । नेता उसी को कहते हैं । आपके जीवन में जो बुद्धि का स्तर है, समाज में वही नेता का स्तर है। आपके जीवन में जो मन का स्थान है, समाज में वही राष्ट्र का स्थान है । मन के द्वारा इन्द्रियों पर शासन होता है, किन्तु बुद्धि के द्वारा हम स्वयं अपने को समझाते हैं । जो अपने को समझा सके । क्या समझा सके ? समझा सके कि जाने हुये का अनादर नहीं करूँगा, मिले हुये का दुरुपयोग नहीं करूँगा, सुने हुये प्रभु में अश्रद्धा नहीं करूँगा । आप श्रद्धा करें या न करें, आपकी रुचि।

अगर आपने अपने को यह समझा लिया कि मैं जाने हुये का अनादर नहीं करूँगा, मिले हुये का दुरुपयोग नहीं करूँगा, सुने हुये प्रभु में अश्रद्धा नहीं करूँगा, तब परिणाम होगा कि जाने हुये का अनादर न करने से, सिर्फ अनादर न करने से, क्या होगा ? जब आप जाने हुये का अनादर नहीं करेंगे, तब आपके जीवन में तीन प्रकार की स्मृति जाग्रत होगी, - कर्त्तव्य की स्मृति, स्वरूप की स्मृति और अपने प्रभु की स्मृति, अथवा यों कहिये कि जब आप जाने हुये का अनादर नहीं करेंगे, तब आपके जीवन में से राग का नाश होगा, असंगता प्राप्त होगी । आपके जीवन में से अकर्त्तव्य का नाश होगा, कर्त्तव्य-परायणता प्राप्त होगी । आपके जीवन में से आसक्तियों का नाश होगा, प्रेम का प्रादुर्भाव होगा । जाने हुये के आदर में ही कर्त्तव्य-परायणता, असंगता और आत्मीयता निहित है । दूसरी बात यह कि जब आप मिले हुये का दुरुपयोग नहीं करेंगे, तब सबल और निर्बल में एकता होगी। यह जो सुन्दर समाज का निर्माण होता है, यह खाली स्कीमों से नहीं होता है, योजनाओं से नहीं होता है, कानूनों से नहीं होता है । सुन्दर समाज का निर्माण होता है - बल का दुरुपयोग न करने से, मिले हुये का दुरुपयोग न करने से।


 - (शेष आगेके ब्लाग में) ‘प्रेरणा पथ' पुस्तक से, (Page No. 28- 29)

Monday, 18 November 2013

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Monday, 18 November 2013  
(मार्घशीर्ष कृष्ण प्रतिपदा, वि.सं.-२०७०, सोमवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
हमारी आवश्यकता

        कोई भी प्राणी तबतक उन्नति नहीं कर सकता, जबतक उसे स्वयं अपनी दृष्टि से अपनी कमी का अनुभव न हो। विचारशील प्राणी कमी का अनुभव कर उसका नितान्त अन्त करने के लिए घोर प्रयत्न करते हैं । अतः हमको अपनी कमी का अन्त करने के लिए अखण्ड प्रयत्न करना चाहिए ।

        हम कब तक दुखी होते रहते हैं ? जबतक हम किसी को भी अपने से सबल, स्वतन्त्र तथा श्रेष्ठ पाते हैं । अतः हमारी पूर्ण स्वतन्त्र, सबल तथा श्रेष्ठ होने की स्वभाविक अभिलाषा है । जो स्वतन्त्र है, वही सबल तथा श्रेष्ठ है । यह नियम है कि 'क्रिया से भिन्न कर्ता का स्वरूप कुछ नहीं होता ।' जैसे, देखने की क्रिया से भिन्न नेत्र कुछ नहीं है । अभिलाषा क्रिया है । अतः जो हमारी अभिलाषा है, वही हमारा स्वरूप है । इस दृष्टि से यह सिद्धान्त निर्विवाद सिद्ध हो जाता है कि हम पूर्ण स्वतन्त्र, सबल तथा श्रेष्ठ हो सकते हैं, क्योंकि अपने को अपने स्वरूप से कोई भी भिन्न नहीं कर सकता । अतएव स्वभाविक अभिलाषा का पूर्ण होना अनिवार्य है ।

        क्या हमारी स्वभाविक अभिलाषा की पूर्ति के लिए यह संसार, जो प्रतीत होता है, समर्थ है ? यदि बेचारा संसार समर्थ होता, तो क्या हम इसके होते हुए भी निर्बलता एवं परतन्त्रता आदि बन्धनों में बँधें रहते ? कदापि नहीं । हमको परतन्त्रता, निर्बलता आदि बन्धनों से छुटकारा पाने के लिए केवल अपनी ओर देखना होगा । हम उसी दोष का अन्त कर सकते हैं, जो हमारा बनाया हुआ है; क्योंकि किसी और की बनाई हुई वस्तु को कोई और नहीं मिटा सकता है । 

- (शेष आगेके ब्लाग में) 'सन्त-समागम भाग-2' पुस्तक से, (Page No. 11-12) ।

Sunday, 17 November 2013

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Sunday, 17 November 2013  
(कार्तिक पूर्णिमा, वि.सं.-२०७०, रविवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
हमारी आवश्यकता

        काल्पनिक सम्बन्ध भी दो प्रकार के होते हैं - भेद-भाव का सम्बन्ध तथा अभेद-भाव का सम्बन्ध। माना हुआ 'मैंअभेद भाव का सम्बन्ध है और माना हुआ 'मेराभेद-भाव का सम्बन्ध है। अभेद भाव का सम्बन्ध केवल अपनी स्वीकृति के आधार पर जीवित रहता है और भेद-भाव का सम्बन्ध माने हुए सम्बन्ध के अनुरूप चेष्टा करने पर प्रतीत होता रहता है । प्रतीति निज-सत्ता के बिना किसी और की सत्ता के आधार पर भी किसी कारणवश हो सकती है - जैसे, मृगतृष्णा का जल ।

        जिस प्रकार प्रत्येक मित्र अपने मित्र के सुख-दुःख से मैत्री सम्बन्ध के कारण दुखी-सुखी होकर अपने को दुखी-सुखी समझने लगता है, उसी प्रकार हम शरीर के सुख-दुःख आदि स्वभाव को अपने में आरोपित करने लगते हैं । किन्तु हमारी स्वभाविक अभिलाषा शरीर-सम्बन्ध से पूर्ण नहीं हो पाती। अतः हमको अपने लिए अपने प्रेमपात्र अर्थात् नित्य-जीवन की आवश्यकता शेष रहती है । उसी आवश्यकता की पूर्ति के लिए हमको अनित्य जीवन से भिन्न नित्य-जीवन की ओर जाना अनिवार्य हो जाता है ।

        अब हम अपने नित्य-जीवन को कैसे जानें ? यह प्रश्न स्वभाविक उत्पन्न होता है । यद्यपि प्रत्येक प्राणी अपनी स्वीकृति करता है, परन्तु अपने वास्तविक निज-स्वरूप, नित्य-जीवन को जानने से इन्कार करता है । यह कैसे आश्चर्य की बात है! 'स्वभाविक अभिलाषा से भिन्न अभिलाषी का निज-स्वरूप कुछ नहीं हो सकता ।'

        अब विचार यह करना है कि हमारी स्वभाविक अभिलाषा क्या है ? प्रत्येक प्राणी अपने में किसी प्रकार की कमी रखना नहीं चाहता; क्योंकि कमी का अनुभव होते ही दुःख का अनुभव होता है। यद्यपि दुःख किसी भी प्राणी को प्रिय नहीं है, फिर भी अपने-आप आता है । जो अपने-आप आता है, उससे हमारा हित अवश्य होगा, यदि उसका सदुपयोग किया जाय । क्योंकि यदि दुःख न आता, तो हम अस्वभाविक अनित्य जीवन से विरक्त नहीं हो सकते थे । अथवा यों कहो कि हमारी स्वभाविक अभिलाषा, जो अस्वभाविक इच्छाओं द्वारा दबाकर निर्बल बना दी गई थी, सबल न हो पाती । अतः दुःख की कृपा से हम जाग्रत हो जाते हैं । इस दृष्टि से दुःख आदरणीय अवश्य है ।

- (शेष आगेके ब्लाग में) 'सन्त-समागम भाग-2' पुस्तक से, (Page No. 10-11) ।