Tuesday, 31 January 2012

॥ हरि: शरणम्‌ !॥ (Read in English below Hindi post)

Tuesday, 31 January 2012
(माघ शुक्ल अष्टमी, वि.सं.-२०६८, मंगलवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
हमारी आवश्यकता

        देह के तादात्म्य से ही देह का अभिमान उत्पन्न होता है और देह के अभिमान से ममता और कामनाओं का जन्म होता है । देहाभिमान का परिणाम क्या है - ममता और कामना । इनकी निवृति कैसे होगी? जब यह विचार करके देखें कि भाई, सृष्टि एक इकाई है और इसी के अन्तर्गत मिला हुआ शरीर है, मिली हुई वस्तु है, मिली हुई योग्यता है । तो सृष्टि कहो, चाहे वस्तु, योग्यता, सामर्थ्य कहो, क्या फर्क पड़ता है ।

        हमसे गलती क्या होती है कि यह सृष्टि है, इस बात को भूल जाते हैं और इसके अतर्गत अपनी सृष्टि अलग बनाते हैं, मैं अमुक हूँ, मेरा यह है । जहाँ 'मैं' है और 'मेरा यह है' वहाँ अनेक प्रकार की कामना पैदा होती है । कामना पैदा होने से पूर्ति-अपूर्ति का सुख-दुःख पैदा होता है । सुख-दुःख के द्वारा ही देहाभिमान पुष्ट होता है । तो अगर हमारे सामने देहाभिमान-रहित होने का प्रश्न है तो आप सोचिए ।

-(शेष आगेके ब्लागमें) 'साधन त्रिवेणी' पुस्तक से, (Page No. 18-19) । 

Our urgent need

(Continuance from the last blog-post)

        Identification with the body alone gives rise to vanity of the body which in its turn breeds the sense and feeling of ‘me’, ‘mine’ and desires. What is the result of vanity of the body – the sentiments of ‘me-mine’ and desire? How can one get rid of these? Let us examine the matter in a wider perspective. Consider perceptually the creation as a unity and contained within it alone is the allotted body, the object and the ability. Either call it creation or object, ability, power what difference is there?

        The error we lapse into it is that of forgetting that the creation is an entity on its own and make a separate personal world of our own within it. Whereas the natural creation is a monolithic unity of oneness. But we fabricate a self-image within it – I am so-and-so, this belongs to me, this is mine. Desire of many kinds proliferates in greater number where there is ego, ‘I’ and ‘this is mine’. Mushrooming desires precipitate situations of joy and sorrow born of their fulfillment or non-fulfillment. Feeling of joy and sorrow alone strengthen identity with and conceit of the body. So we have to ponder over the consequential situation as a spiritual aspirant seeking release from vanity of the body.

-(Remaining in the next blog) From the book 'Ascent Triconfluent', (Page No. 27) 

Monday, 30 January 2012

॥ हरि: शरणम्‌ !॥ (Read in English below Hindi post)

Monday, 30 January 2012
(माघ शुक्ल सप्तमी, वि.सं.-२०६८, सोमवार)

हमारी आवश्यकता

        मानव जन्मजात साधक है। साधक की क्या-क्या आवश्यकता है इस सम्बन्ध में विचार करने से ऐसा लगता है कि साधक के सामने सबसे बड़ी समस्या क्या है ? एक समस्या तो मुझे यह मालूम होती है कि साधक के सामने मौलिक प्रश्न है देहाभिमान गलित होने कादूसरा प्रश्न है अप्राप्त परिस्थिति के चिन्तन का । अप्राप्त परिस्थिति का चिन्तन न रहे । तीसरा प्रश्न यह है कि जीवन में नीरसता न आये । और चौथा प्रश्न है कि अभाव का अन्त हो जाय । ये चार समस्याएँ साधक के सामने रहनी चाहिए । इन समस्यायों का हल होना सम्भव है ।

        अब देहाभिमान-रहित होने के लिए कोई उपाय नहीं है सिवाय इसके कि वह अकिंचन और अचाह हो जाय । और कोई उपाय ही नहीं है । कितना ही तप करे, कितनी ही योग्यता का सम्पादन करे, बलपूर्वक कितनी प्रकार की साधनाएँ करे, लेकिन जबतक अकिंचन और अचाह नहीं होगा तबतक देहाभिमान का नाश नहीं होगा । अर्थात् जबतक यह निर्णय न करे कि मेरा कुछ नहीं है, मुझे कुछ नहीं चाहिए । 

-(शेष आगेके ब्लागमें) 'साधन त्रिवेणी' पुस्तक से, (Page No. 18) । 

Our urgent need

        Man is a born sadhaka, innately, a spiritual aspirant. What confronts him as prime problem comes to the fore by considering what the needs of the sadhaka are in this regard. One of the fundamental questions that faces the sadhaka, it appears to me, is that of dissolution of conceit of the body. The second question is his brooding on a situation that does not obtain. That is to say, thoughts on non-existent circumstances should leave off. The third question is that there should be no apathy, no listless boredom, and no monotony in life. The fourth question is the tortuous feeling of want. The sadhaka should address himself to the four problems which are likely to be solved.

        There is no measure to get rid of vanity of the body except getting free of the sense of belongings and desire. There is absolutely no other way out of it. No amount of austere tapas, nor cultivation of abilities nor stubborn resort to many kinds of spiritual practices can do for attaining non-attachment to possessions and desirelessness which alone ensure the demolition of the conceit of the body. That is to say, this requires an unflinching determination by the aspirant that nothing belongs to him, he wants nothing.

-(Remaining in the next blog) From the book 'Ascent Triconfluent', (Page No. 27) 

Sunday, 29 January 2012

॥ हरि: शरणम्‌ !॥ (Read in English below Hindi post)

Sunday, 29 January 2012
(माघ शुक्ल षष्ठी, वि.सं.-२०६८, रविवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
जीवन का सत्य

        देखिए जर्मन बर्बाद हुआ और हिन्दुस्तान आजाद हुआ। जर्मन लोगों ने आठ-आठ घण्टे, दस-दस घण्टे, बारह-बारह घण्टे काम किया और वहाँ के कारखानों में लाखों का फायदा हुआ और हिन्दुस्तान के लोगों ने बोनस माँगना शुरू कर दिया । काम करना कम कर दिया और लाखों का नुकसान हुआ । जो काम तुम्हें मिला है, तुम अपने काम को ठीक-ठीक ईमानदारी से पूरा कर दो । 

        तुम संसार के ठेकेदार नहीं हो । ज्यादा तो तुम कर ही नहीं सकते । आठ घण्टे काम करते हैं तो उसके बाद काम करने की तबियत ही नहीं होती । अभी अमेरिका से एक आदमी आया तो उसने कहा कि अमेरिका में सप्ताह में दो दिन की छुट्टी होती है लेकिन वहाँ आठ घण्टे काम करते हैं । इस प्रकार वे सप्ताह में चालीस घण्टे काम करते हैं और हिन्दुस्तान में सप्ताह में 25 घण्टे काम करते हैं । यहाँ एक दिन की छुट्टी होती है तब भी 25 घण्टे से ज्यादा काम करते ही नहीं । यह काम करने की पद्धति में अन्तर है ।

        क्रियात्मक सेवा निकटवर्ती प्रियजनों की करो और भावात्मक सेवा सारे संसार की करो । किसी का बुरा मत चाहो यह भावात्मक सेवा हो गई और यथाशक्ति किसी की मदद कर दो यह क्रियात्मक सेवा हो गई । किसी को बुरा न समझो, यह भावात्मक सेवा हो गई । बुराई न करना, यह क्रियात्मक सेवा हो गई । बुरा न चाहना, यह भावात्मक सेवा हो गई । 

-'साधन त्रिवेणी' पुस्तक से, (Page No. 16-17) । 

Truth of life

(Continuance from the last blog-post)

        Look! Germany was dismantled during the war but Hindustan emerged a free country. The Germans performed the schedule of ten to twelve hours of work during eight hours only and the factories there gained lacs of benefit of deutschmark whereas the Indians began demanding bonus. They minimized working and there was a loss of lacs of currency. Whatever the job allotted to you, perform it methodically, honestly to the point of completion. 

        You are not in the role of a managing contractor of the world. In no case can you do more than your allotted schedule. You don’t have disposition to work after doing the work for eight hours. Recently, a man coming from America reported that there were two days of leave a week there but work-schedule a day was of eight hours. Thus they work for forty hours a week there. But here in India we work worth only twenty-five hours a week. Here, we have only a day’s leave; nevertheless we don’t work for more than twenty-five hours in any case. This difference is because of method of working.

        Render active service to adjacent near and dear ones and empathetic service to the whole world. Don’t wish ill of anyone – this is an empathetic service and help someone as much as you can - this is active service. It is active service to help anyone according to one’s capacity. Not to think of anyone as evil is a service of empathy of emotion. Refusing to commit evil amounts to active service. Not to wish ill of anyone amounts to empathetic service. 

-From the book 'Ascent Triconfluent', (Page No. 25-26) 

Saturday, 28 January 2012

॥ हरि: शरणम्‌ !॥ (Read in English below Hindi post)

Saturday, 28 January 2012
(माघ शुक्ल वसंतपंचमी, सरस्वती-पूजन, वि.सं.-२०६८, शनिवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
जीवन का सत्य

        देखो आफिस की पराधीनता थोड़ी देर की छह घण्टे की, तो अठ्ठारह घण्टे तो आप स्वाधीन हो । पराधीन कौन होता है ? जिसे अपने में यह अनुभव है कि मेरा कुछ है वह सबसे बड़ा पराधीन है ? और मुझे कुछ चाहिए वह उससे बड़ा पराधीन । जो निर्भय और निष्काम है वही स्वाधीन होता है। परिस्थिति में सब पराधीन रहते हैं ।

        आप विचार करके देखो - शरीर संसार की शक्तियों के अधीन है । आफिस का काम तो आप आफिस के समय पर ठीक कर दो, पूरी शक्ति लगा दो, आदरपूर्वक कर दो, पवित्र भाव से कर दो । इस प्रकार पराधीनता पर-सेवा में व्यय कर दो। मुश्किल तो तब है न, जब आपके कार्य का कोई लक्ष्य न हो ।

        आप इस दृष्टि से ठीक-ठीक कर्तव्यपालन कीजिए तो मुश्किल बहुत आसान हो जाएगी । हानि बिना पहुँचाए कोई काम करोगे तो वह सेवा हो जाएगी ।

-(शेष आगेके ब्लागमें) 'साधन त्रिवेणी' पुस्तक से, (Page No. 16) । 

Truth of life

(Continuance from the last blog-post)

        Look! You are accountable, and under subjection, to the office for sometime- for six hours but you are free for eighteen hours. Who falls in subjection? The worst subjugation is the sense that I own something. He is the most tightly fastened to the bondage. The feeling that I want something is a greater bondage than that. Only those who are fearless and desireless become free. Otherwise all are in thrall of circumstances.

        Deliberate and see: the body exists under the forces of the world. Complete the office works on time, properly, applying total energy to it, with reverence and genuine feeling. Thus expand obligation to duty through service to the other. Problem arises only when there is no goal of the work done.

        If you discharge your duty righteously in this way, the problem will be considerably eased off. If you do the work avoiding harm to anyone, it will be transformed into service.

-(Remaining in the next blog) From the book 'Ascent Triconfluent', (Page No. 25) 

Friday, 27 January 2012

॥ हरि: शरणम्‌ !॥ (Read in English below Hindi post)

Friday, 27 January 2012
(माघ शुक्ल चतुर्थी, वि.सं.-२०६८, शुक्रवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
जीवन का सत्य

        काम तो होता ही पराश्रय और परिश्रम से है । काम माने पराश्रय और परिश्रम । पराश्रय और परिश्रम का स्थान है पर-सेवा में यानि शरीर की सेवा में, परिवार की सेवा में, समाज की सेवा में, विश्व की सेवा में । बिना दूसरों को हानि पहुँचाए जो कार्य है वह सेवा है । और दूसरों को हानि पहुँचाकर जो कार्य है वही भोग है । पर-सेवा के लिए आप स्वाधीन हैं, भोग के लिए नहीं ।

        पराश्रय और परिश्रम का उपयोग है पर-सेवा में । पर-सेवा में आप भलाई चाहे जिस के साथ करें लेकिन बुराई आप किसी के साथ न करें । तो बुराई न करना यह विश्व की सेवा है, भलाई करना यह परिवार, समाज और देश की सेवा है, अचाह होना अपनी सेवा है और प्रेमी होना प्रभु की सेवा है ।

        तो सेवा आप चाहे जिसकी करें । अभी प्रभु की सेवा करने की फुर्सत न हो, तो कोई चिन्ता की बात नहीं है, अपनी सेवा करें और अपनी सेवा की फुर्सत न हो, तो शरीर की, समाज की और परिवार की सेवा करें परन्तु हानि तो किसी को न पहुँचाएँ ।

-(शेष आगेके ब्लागमें) 'साधन त्रिवेणी' पुस्तक से, (Page No. 15-16) । 

Truth of life

(Continuance from the last blog-post)

        Work is bound to happen with dependence on the other involving effort, labor. Work means depending on other, labor, exertion. Labor and dependence on the other are apposite to the service of the other-service to the body, service to family, society and world. Any work that doesn’t harm the other is service. Any work done by harming other is self-indulgence. You are free to serve the other, but not to yield to pleasure of self-indulgence.

        Labor, exertion and dependence on the other should be put to good use for serving the other. While serving the other you may do good to anyone whoever but don’t be evildoing to anyone. Doing no evil, offending none is service to the world; doing good is service to the family, society and the country; to be desireless is the service to oneself and to transform oneself into a lover of God is service to the Lord. 

        So, you can serve anyone - yourself, your family, society, country and the world. Don’t worry if you have no space of leisure to serve God forthwith, serve yourself with desirelessness. If you are unable to serve your own self for want of leisure, serve the body for its upkeep, the society and the family for their well-being, but don’t harm anyone.

-(Remaining in the next blog) From the book 'Ascent Triconfluent', (Page No. 24-25) 

Thursday, 26 January 2012

॥ हरि: शरणम्‌ !॥ (Read in English below Hindi post)

Thursday, 26 January 2012
(माघ शुक्ल तृतीया, गणतन्त्र दिवस, वि.सं.-२०६८, गुरुवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
जीवन का सत्य

        मैं आपसे यह निवेदन करना चाहता हूँ कि आपका ज्ञान, ध्यान और जीवन एक हो जाना चाहिए । जिस प्यार से ध्यान करो उसी प्यार से काम हो जाय, जिस प्यार से काम करो उसी प्यार से ध्यान हो जाय । ये अलग-अलग नहीं है । हम लोग जो अलग-अलग मान लेते हैं कि ध्यान अलग चीज है और ज्ञान अलग चीज है । सो नहीं है । दोनों एक ही चीज हैं ।

        ज्ञान आपको क्या प्रेरणा देता है ? ज्ञान आपको प्रेरणा देता है निर्मम होने की, निष्काम होने की । ध्यान आपको क्या प्रेरणा देता है ? शान्त होने की । काम भी करो और शान्त भी रहो तथा निर्मम भी हो जाओ । तब ज्ञान, ध्यान और कर्म एक हो जाते हैं।

-(शेष आगेके ब्लागमें) 'साधन त्रिवेणी' पुस्तक से, (Page No. 15) । 

Truth of life

(Continuance from the last blog-post)

        I want to submit to you that your knowledge, the mode of your being, your meditation and life should become one and identical. Just as meditation happens in the inward ambience of loving adoration, work too should be done with identical attention of love. Work should be done as loving surrender of worship exactly as meditation should happen. These are not isolated happenings. Our conception of regarding awareness and meditation as distinct and isolated is not true. Both are identical, going deep into the inward being.

        Awareness inspires you to be free of me-mine and get desireless. What does meditation inspire you into? It inspires to be poised in peace and serenity. Work in peace, work as well as remain centered in tranquility and rise above me-mine. Then, awareness, meditation and work become one.

-(Remaining in the next blog) From the book 'Ascent Triconfluent', (Page No. 24) 

Wednesday, 25 January 2012

॥ हरि: शरणम्‌ !॥ (Read in English below Hindi post)

Wednesday, 25 January 2012
(माघ शुक्ल द्वितीया, वि.सं.-२०६८, बुधवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
जीवन का सत्य

        जहाँ शान्ति और स्वाधीनता है वहाँ हम प्रेमी हो सकते हैं, उदार  हो सकते हैं। अगर हमारे जीवन में शान्ति नहीं है, अगर हमारे जीवन में स्वाधीनता नहीं है, तो हम सच्चाई के साथ न तो उदार हो सकते हैं, न प्रेमी हो सकते हैं और न अचाह हो सकते हैं ।

       इस प्रकार जब हम सबकी बुद्धि सम हो जाय यानि विवेकवती हो जाय तो हृदय अनुरागी हो जाएगा और अहं अभिमान-शून्य हो जाएगा । प्रेम की अभिव्यक्ति के लिए आप परमात्मा से सम्बन्ध स्वीकार करें । स्वीकार करना कोई क्रिया थोड़े ही है ।

        जैसे आपने अपनी माँ को माँ स्वीकार किया, बाप को बाप स्वीकार किया, भाई को भाई स्वीकार किया वैसे ही आप परमात्मा के साथ सम्बन्ध स्वीकार करें । यह सम्बन्ध जोड़ने की स्वाधीनता तो आपको है न ? जैसी मेरी माता है, मेरे पिता है, मेरे भाई है, मेरे बन्धु हैं ऐसे ही मेरे प्रभु हैं ।

        जैसे आप धन की महिमा को मानते हैं कि धन होगा तो काम चल जाएगा ऐसे ही प्रभु की महिमा स्वीकार करें और फिर परमात्मा की प्राप्ति की आवश्यकता अनुभव करें । स्वीकृति तो तुम्हारे अपने द्वारा ही होगी । 

        देखो, अगर क्रिया के द्वारा काम बन जाता तो, आज के वैज्ञानिक युग में ऐसे यन्त्र बन जाते कि यन्त्र के द्वारा गायत्री मन्त्र सिद्ध हो जाता । लेकिन जो अपने द्वारा करने वाली बात है वह क्रिया के द्वारा कैसे हो जाएगी भाई ?

-(शेष आगेके ब्लागमें) 'साधन त्रिवेणी' पुस्तक से, (Page No. 14-15) । 

Truth of life

(Continuance from the last blog-post)

        In the inner ambience of peace and freedom, we can be transformed into lover of God and afford to be magnanimous to the world. In case there is no peace in our life, no freedom, we can neither be truly generous to the world nor a Divine lover nor a desireless aspirant.

        In this way, when our intelligence, luminous with innate wisdom, attains to equanimity, the heart will get enamored of love for God and the ego will get absolutely free of vanity. For manifestation of love you ought to admit and recognize your innate rapport with God, the Supreme Spirit. This acceptance is neither action nor ritual doing of any kind at all. 

        The Lord God is mine just as my mother is mine, my father is mine, my brother or my friendly fellow-being is mine. 

        Just as you cherish the glory of wealth so much so that if it is plentiful, all your needs will be fulfilled, similarly, accept the triumphant magnificence of all-powered God and feel the need of realizing Him. This acceptance or commitment in faith will be a choice of your own, an accomplishment of the core of your being.

        Look! If such a soulful need for God could be fulfilled mechanically, through ritual exercises, the hi-tech scientists of today could have devised instruments to prove the esoteric power of Gayatri mantra. But brother, how can that which is a realization of the inmost being, on one’s own, can be effected by mere ritual of doings?

-(Remaining in the next blog) From the book 'Ascent Triconfluent', (Page No. 23-24) 

Tuesday, 24 January 2012

॥ हरि: शरणम्‌ !॥ (Read in English below Hindi post)

Tuesday, 24 January 2012
(माघ शुक्ल प्रतिपदा, वि.सं.-२०६८, मंगलवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
जीवन का सत्य

        अगर आपकी कोई शारीरिक सेवा करता है तो आप उसके उपकार को इसलिए नहीं मानते कि उसने सेवा की है, आप उपकार को इसलिए मानते हैं क्योंकि शरीर को आपने अपना माना है । ऐसे ही सेवा करनेवाला अगर आप पर एहसान करता है, तो वह सेवा नहीं करता, वह परमात्मा की दी हुई वस्तु को अपनी मानकर बेईमान बनकर संसार में मिथ्या अभिमान करता है ।

        तो मैं यह निवेदन कर रहा था आपसे, कि ये सारी बातें क्यों नहीं जीवन में आती ? इसलिए नहीं आती कि सचमुच हम अचाह होकर रहते ही नहीं । हम निर्मम होकर रहते ही नहीं ।

         अगर हम अचाह होना पसन्द करें, अगर हम निर्मम होना पसन्द करें तो हमारा करके कुछ है ही नहीं और हमें संसार से कुछ चाहिए ही नहीं, तो संसार हमारा क्या अपमान करेगा? संसार हमें क्या हानि पहुँचायेगा ? न हानि पहुँचायेगा और न अपमान करेगा । संसार तब अपमानित करेगा जब संसार कि वस्तु को अपना मानेंगे, जो संसार से कुछ चाहेगा । संसार की वस्तु का उपयोग संसार की सेवा में करना और संसार (शरीर) के लिए संसार से भिक्षा माँगना यह अपमान तो नहीं है, बन्धन तो नहीं है ।

        जो उनका अपना बनाया हुआ बन्धन है । जो सम्पत्ति, योग्यता, वस्तु को अपनी मानकर, उनपर अधिकार जमाकर उसका उपयोग करते हैं, वह बन्धन अपना मानने में है या अपना न मानने में है । तो आपको साफ दिखाई देगा कि अपना न मानने में बन्धन नहीं है । अपना न मानने में अशान्ति नहीं है। अपना न मानने में अगर बन्धन नहीं है, अशान्ति नहीं है तो फिर क्या है ? शान्ति है, स्वाधीनता है ।

-(शेष आगेके ब्लागमें) 'साधन त्रिवेणी' पुस्तक से, (Page No. 13-14) । 

Truth of life

(Continuance from the last blog-post)

        If someone offers you physical service, you regard the beneficence valuable not because he has rendered service, you deem the help valuable because you believe the body to be your own. Similarly, if the helping person feels that he has obliged you, he doesn't actually serve. In fact, he has become dishonest by believing Divine gifts as his own, he indulges in false pride and displays it in the world.

        Thus, I was submitting to you, why all these truths don't get translated in your life ? The only reason is that we don't live desirelessly, free from the egoistic sense of 'me' and 'mine'.

        If we were keen on being desireless, if we would rise above 'me-mine', and as such there would be nothing as our own and we would require nothing at all from the world, what insult the world would deal out to hurt us ? It will neither insult nor harm us. The world insults when we thrust our right on its objects and want something from it. To expend the resources or objects of the world for utilizing to serve it or even to beg from it for doing good to it is neither insult nor bondage.

        Bondage is self-made, self-induced, fomented by egocentricity. Those who regard wealth, abilities and objects as their own to serve selfish ends have put themselves in bondage. If they don't regard them as their own, they would be free of it. It would be clear that there is no bondage in abnegation of ownership. There is no restlessness in renunciation. If there is no bondage in forgoing, in letting go, what then remains? Only peace, only freedom remains. 

-(Remaining in the next blog) From the book 'Ascent Triconfluent', (Page No. 23) 

Monday, 23 January 2012

॥ हरि: शरणम्‌ !॥ (Read in English below Hindi post)

 Monday, 23 January 2012
(माघ मौनी एवं सोमवती अमावस्या, वि.सं.-२०६८, सोमवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
जीवन का सत्य

        भक्त होने से आपमें भक्ति-रस की अभिव्यक्ति होती है और भक्ति-रस की अभिव्यक्ति से आप भगवान् को रस दे सकते हैं या भक्ति-रस से भगवान् को रस मिलता है।

        तो मनुष्य का जो भगवान् के साथ सम्बन्ध है, वह भगवान् से कुछ माँगने के लिए नहीं है; भगवान् का प्रेमी होने के लिए है; और मनुष्य का जो सम्बन्ध संसार के साथ है, वह संसार से कुछ लेने के लिए नहीं है अपितु उदार होने के लिए है । अब आप सोचिए, भगवान् के लिए हम प्रेमी हो जाएँ, संसार के लिए हम उदार हो जाएँ । यह कब होगा ? जब संसार से हम कुछ न चाहें और भगवान् से भी हम कुछ न चाहें ।

        अब आप देखिए, जिसे अपने लिए कुछ नहीं चाहिए, वह अशान्त होगा क्या ? वह पराधीन होगा क्या ? वह देहाभिमानी रहेगा क्या ? उसका देहाभिमान भी गल जाएगा, पराधीनता भी मिट जाएगी, अशान्ति भी मिट जाएगी । समस्त विकार नाश हो जाएँगे और वह निर्विकार जीवन से अभिन्न होकर कृतकृत्य हो जाएगा ।

        इस दृष्टि से विचार किया जाय तो आपके इस मानव-जीवन का बड़ा भारी महत्व है । आप संसार के लिए उदार हो सकते हैं, प्रभु के लिए प्रेमी ही सकते हैं और आप अपने लिए अचाह हो सकते हैं ।

        लेकिन अचाह का अर्थ बड़ा पेचीदा है । पैर में दर्द हो रहा है, डाक्टर मौजूद है । अब हम कैसे कहें, कैसे दिखाएँ, यह कैसे कहें कि हमारे पैर में दर्द है, देख लीजिए । क्यों ? ऐसा कहने से अगर उसने नहीं देखा, तब तो बड़ा अपमान हो जाएगा । लेकिन अपमान तब हो जाएगा, जब आप यह समझेंगे कि यह मेरा पैर है। 

        अरे भाई ! यह उसी का पैर है, जिसका डाक्टर है । तो डाक्टर किसी बीमार के कष्ट को नहीं देखेगा, तो परमात्मा के विधान को तोड़कर वह परमात्मा का अपमान करेगा कि आपका अपमान करेगा । लेकिन अगर आपको अपमान मालूम होता है तो इसलिए मालूम होता है क्योंकि आप परमात्मा की वस्तु को अपनी वस्तु मान लेते हैं ।    

-(शेष आगेके ब्लागमें) 'साधन त्रिवेणी' पुस्तक से, (Page No. 12-13) । 

Truth of life

(Continuance from the last blog-post)

        Ecstatic elixir of Divine devotion can manifest in you by your dedication to it and God Himself is thrilled when you offer the bliss of ecstacy to him.

        It follows from the above that the rapport of man with God is not for begging something from him, it is to be metamorphosed into His lover-devotee, and the relationship of man to the world is not to take anything from it but to remain generously responsive to it. Now, let us reflect on our potentiality of becoming a lover-devotee of God and generous, magnanimous to the world. How or when can it happen ? it can be realized only when we don't want anything from the world nor do we seek anything whatever from God.

        Now see the point : would he be restless who wants nothing for himself ? Would he be under any state of subjection to the other ? Would he have any vanity of the body caused by identity with it ? His vanity of the body will melt away, his subjection to others will vanish and his restlessness will disappear. All his impurities will desolve and he will be self-fulfilled in oneness with a life of sterling purity. 

        If considered with this viewpoint, your human life is blessed with stupendous importance. You can be generous, open-handed, to the world, a lover-devotee of God and desireless for your own self.  

      But the meaning of being desireless is highly complicated. Let us imagine a situation to illustrate its complexity. There is pain in leg and the doctor is present. How can i speak to him, how to consult him, how can i tell him that there is pain in my leg, examine it. Why ? If I complain about the pain and he doesn't attend to it, I shall be grievously insulted. But the feeling of insult will be registered only if I conceive the leg as my own, belonging to me.

        But the truth is that the leg belongs to the one to whom the doctor belongs. So that if the doctor doesn't attend to your trouble, he violates the law of God. Then in that case, does he insult the Supreme Spirit or does he insult you ? But if you deem it as an insult to yourself, it is so because you regard the object of God, your leg, as your own. 

-(Remaining in the next blog) From the book 'Ascent Triconfluent', (Page No. 22-23) 

Sunday, 22 January 2012

॥ हरि: शरणम्‌ !॥ (Read in English below Hindi post)

Sunday, 22 January 2012
(माघ कृष्ण चतुर्दशी, वि.सं.-२०६८, रविवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
जीवन का सत्य

        आप कहेंगे कि अगर हमें जो करना चाहिए वह कर लिया तो वेदना नहीं होगी, लक्ष्य की प्राप्ति होगी । लक्ष्य की प्राप्ति होने के बाद - सभी को लक्ष्य प्राप्त हो जाय - यह वेदना होगी । इसी बात को बताने के लिए किसी लेखक ने लिखा था कि भगवान् बुद्ध कहते हैं कि जो मानव उस जीवन का अधिकारी है, जहाँ पराधीनता का, अशान्ति का, जड़ता का, अभाव का और नीरसता का प्रवेश ही नहीं हो सकता; जो मानव इतने ऊँचे जीवन का अधिकारी है, वही मानव आज अपनी ही भूल से कीड़े-मकौड़ों की तरह जीता है । क्या है यह ? क्या यह वेदना नहीं है ?

        मैं यह निवेदन कर रहा था कि जो सही कर्तव्य-पालन करके अपने लक्ष्य को प्राप्त कर लेते हैं, उन्हें इस तरह की वेदना होती है कि सभी को सफलता मिलनी चाहिए । ऐसे पर-दुःख-कातर व्यक्तियों को समाज ने महापुरुष कहा । 

        उनको समाज ने कभी महापुरुष नहीं कहा जिनके जीवन में समाज के हित का उत्तरदायित्व नहीं जगा । जिन्होंने समाज को विश्वास दिलाया कि जो जीवन मुझे मिला है वह तुम्हें भी मिल सकता है उनको समाज ने कभी नापसन्द नहीं किया ।

        इसलिए महानुभाव, आप अपने ही द्वारा बुराई-रहित होकर धर्मात्मा हो सकते हैं, धर्म के अभिमान और फल को छोड़कर आप मुक्त हो सकते हैं, और मुक्ति से मुक्त होकर आप भक्त हो सकते हैं ।  

-(शेष आगेके ब्लागमें) 'साधन त्रिवेणी' पुस्तक से, (Page No. 11-12) । 

Truth of life

(Continuance from the last blog-post)

        If you maintain that you have done all that should be done and as such you have no regret of missing out effort, then you will realize the goal. After your realization of peace, enlightenment and love you will have the anguished concern of compassion that all who seek should obtain the goal. It was in order to point out this concern of compassion that a certain author had cited Lord Buddha as saying that man with birthright to a life where captivity, restlessness, inertia, want and boredom can't even enter, man who deserves rightfully such an elevated life, the same human being by his own omission, grovels like vermins and insects on the earth. What is this ? Isn't it a pained concern of compassion ?

        I was submitting that those who realize the goal of life by discharging their right duty are inspired by the benevolent concern that all might realize the goal of integral fulfillment. Such individuals distressed by anguish of debasement in others were marked greatmen by the society. 

        Never did society regard them great in whose life, responsibility for the well-being of society was not called forth. Society never disliked, disregarded, those who created the faith and confidence in it that the life of unbounded awareness and bliss they have experienced can be realized also by all of them.

        Therefore, celebrated beings, by getting rid of evil with self-effort alone, you can get to the religious soul in you, and be blessed with spiritual freedom by eschewing the fruit and pride of evolution to the religious being. And then, you can be transmuted into the devotee of the Lord God by rising beyond freedom of enlightenment. 

-(Remaining in the next blog) From the book 'Ascent Triconfluent', (Page No. 21-22) 

Saturday, 21 January 2012

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Saturday, 21 January 2012
(माघ कृष्ण त्रयोदशी, वि.सं.-२०६८, शनिवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
जीवन का सत्य

        अपने में सन्तुष्ट हुए बिना भगवान् बुद्ध का 'निर्वाण' सिद्ध नहीं होगा, शंकराचार्य का 'निजानन्द' सिद्ध नहीं होगा और चैतन्य महाप्रभु का प्रेम सिद्ध नहीं होगा । ये तीनों सत्य तभी सिद्ध होंगे, जब हम अपने को अपने में सन्तुष्ट पायेंगे । और अपने को अपने में तभी सन्तुष्ट पायेंगे जब आप संसार के सम्बन्ध से मुक्त हो जाएँगे ।

        संसार के सम्बन्ध से तभी मुक्त होंगे जब आप बुराई-रहित होकर भलाई के फल और अभिमान को छोड़ देंगे । यह वास्तव में सम्पूर्ण जीवन की साधना का क्रम आपकी सेवा में निवेदन किया।

        अब आप दूसरी दृष्टि से सोचिए, कि आप बुराई-रहित होना तो चाहते हैं, पर हो नहीं पाते । या भलाई का अभिमान और फल छोड़ना तो चाहते हैं, पर छोड़ नहीं पाते । यानि जो चाहते हैं सो कर नहीं पाते । इसका परिणाम क्या होना चाहिए ? इसका परिणाम यह होना चाहिए कि हम भले ही कर न पायें परन्तु जीवन की जो माँग है, उससे निराश तो न हो जाएँ ।

        यदि हम निराश नहीं होंगे और अपने द्वारा करने में अपने को असमर्थ पायेंगे तब अपने आप एक वेदना जाग्रत होगी । यह वेदना ईश्वरवादी की प्रार्थना है, यह वेदना अध्यात्मवादी की साधना है और यह वेदना भौतिकवादी की उदारता है, करुणा है। तो यह वेदना जाग्रत होनी चाहिए । कौन-सी वेदना ? अपने लक्ष्य को प्राप्त न कर पाने की वेदना, अपनी निर्बलता का अनुभव करने पर जो वेदना होती है वह वेदना तो जाग्रत होनी चाहिए ।  

-(शेष आगेके ब्लागमें) 'साधन त्रिवेणी' पुस्तक से, (Page No. 11) । 

Truth of life

(Continuance from the last blog-post)

        Stating in a layman's way the Buddhistic 'Nirvana' means an enduring state of bliss in which there is no suffering or desire and no sense of self. This 'Nirvana' of the Buddha can't be realized experience without inner contentment, without being cheerfully serene within oneself. The self-bliss of Shankaracharya couldn't have been his proven experience without self-content of the inward being is serenity. The exemplary Divine Love of Chaitanya Mahaprabhu couldn't have been his vibrant experience without his inner self-content of desirelessness. It is only when we find ourselves self-contented, serene and cheerful in the inward being that these three truths of the Divine experience will be proven in veritable realization. And you will find yourself contented in your inward being when you are free from thralldom of world. 

        You will be freed of subjection to the world only when you get rid of evil and eschew the fruit of doing good and being proud of it. This, in reality, is the sequence of Sadhana of whole of life submitted to your service.

        Now think over the issue of your willingness for riddance from evil and your inability to be freed of it. Or that you want to give up the fruit and pride of beneficence but are unable to do so. That is to say, you are unable to act in accordance with wisdom or inner light of discrimination. What should follow from this inability ? The consequence should be that although unable to do the needful we should not be hopeless about fulfillment of this genuine demand of life.

        If we don't get listlessly hopeless and find ourselves incapable of working it out on ower own. Awakening of remorse from failure to do the prudent act and the grief triggering from it is the prayer of the theist, this compunction is the ascending endeavor of the spiritual seeker and this suffering of the materialist is his flowering into magnanimity and compassion. What sorrow of compunction ? It is the anguish of failure to attain the goal of life, the sorrow caused by realizing one's want of energy, ardor and will-power that must be awakened.

-(Remaining in the next blog) From the book 'Ascent Triconfluent', (Page No. 20-21) 

Friday, 20 January 2012

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Friday, 20 January 2012
(माघ कृष्ण द्वादशी, वि.सं.-२०६८, शुक्रवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
जीवन का सत्य

        हमारी साधना में संसार का सम्बन्ध बाधक है; संसार बाधक नहीं है। इसलिए संसार का सम्बन्ध टूटने से साधना में जो बाधा थी, वह नष्ट हो गई ।

        अब बाधा का नाश तो हो गया, अब इसका विकास क्रम क्या होगा - इस पर थोड़ा विचार कीजिए । जिस समय बल के दुरूपयोग को छोड़कर उसके फल और अभिमान को छोड़ देंगे तो आप थोड़ी देर के लिए अपने को अपने में सन्तुष्ट पाएँगें । तो संसार से सम्बन्ध टूटने का फल क्या हुआ कि मानव अपने में अपने को सन्तुष्ट पाता है ।

        अब अपने में अपने को सन्तुष्ट पाने का फल क्या है? अपने में जो अपना जीवन है वह उसे प्राप्त हो जाएगा । अपने में  अपना जो परमात्मा है वह उसे प्राप्त हो जाएगा या अपने में जो सर्व दुःखों की निवृति है, वह उसको प्राप्त हो जाएगी या अपने में जो अपना आनन्द है वह हमको प्राप्त हो जाएगा ।

        यह जो अनेक ढंग से एक बात कही गई, यह अनेक मान्यताओं के कारण कही गई । नहीं तो, सीधी बात यह है कि बुराई-रहित होकर, भलाई का फल और अभिमान छोड़कर साधक अपने में सन्तुष्ट होकर सब कुछ पा जाता है । इतना कहना पर्याप्त था। लेकिन आप लोगों के मस्तिष्क में विभिन्न विचार अंकित होते हैं इसलिए सभी दृष्टियों से विवेचन की जरूरत होती है।  

-(शेष आगेके ब्लागमें) 'साधन त्रिवेणी' पुस्तक से, (Page No. 10-11) । 

Truth of life

(Continuance from the last blog-post)

        Our entanglement in the world is the obstruction in sadhana bringing it to inert standstill; the world itself is no hindrance on its own. Therefore, with the break-up of attachment to the world, whatever has been the barrier in sadhana, is eliminated forever.

        Now that obstacles are eliminated in the above mentioned way, let us consider a bit the sequence of evolution in sadhana. As you steer clear of the misuse of innate energy, its fruit and the pride of it, you will realize for a while a contentment of calm placidity in your inner self. The consequence of detachment from the world is that man realizes a calm content within himself.

        Now, what is the result of realizing this calm content within oneself ? He will find the innate, existent life in him. He will obtain the live ever-presence of God in him or the unbounded space of consciousness free from all traces of suffering will unfold within him or he will be graced by the shower of his own inward self-bliss.

        This predication of a singular, unique realization in many ways has been made because of many concepts derived from variety of spiritual experience. Otherwise, the plain fact is that eschewing all evil, renouncing the fruit of doing good, transcending its pride as a good Samaritan, the sadhak, the spiritual aspirant, realizes all things in the content of inward being in egoless consciousness. This much was adequate to state the unique, impeccable experience beyond words. But the listener's - the sadhak's minds are imprinted, programmed, with different concepts in this regard so that commentary according to all angles of observation is required.

-(Remaining in the next blog) From the book 'Ascent Triconfluent', (Page No. 20) 

Thursday, 19 January 2012

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Thursday, 19 January 2012
(माघ कृष्ण षट्तिला एकादशी, वि.सं.-२०६८, गुरुवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
जीवन का सत्य

        मूल बल आपको मिलता है, आपको भेंट किया जाता है । ऐसे ही मूल ज्ञान आपको मिलता है; मूल विश्वास आपको मिलता है । तो मिले हुए मूल बल के द्वारा आप संसार के काम आएँ; मूल ज्ञान के द्वारा आप निर्मम, निष्काम, असंग होकर मुक्त हो जाएँ और मूल विश्वास के द्वारा आप प्रभु से आत्मीय सम्बन्ध स्वीकार करके भक्त हो जाएँ ।

        अब आप देखिए न, ये तीनों बातें आपने अपने द्वारा की। कौन-कौन सी ? बल के दुरूपयोग न करने का निर्णय अथवा बल के सदुपयोग का अभिमान और फल का त्याग, यह आपने अपने द्वारा किया । मैं बल का दुरूपयोग नहीं करूँगा यह निर्णय करने में शरीर की सहायता नहीं लेनी पड़ेगी; इसमें संसार की सहायता नहीं लेनी पड़ी । मैं बल के सदुपयोग का फल नहीं माँगूँगा, इसका अभिमान नहीं करूँगा, इसमें आपको शरीर और संसार की सहायता अपेक्षित नहीं हुई ।

        तो जो अपने द्वारा किया जाय, उसी को सत्संग कहते हैं। और सत्संग क्या है ? सत्संग माने मनुष्य का 'स्वधर्म' । तो जो आपने बल का दुरूपयोग छोड़ दिया; सदुपयोग का फल और अभिमान छोड़ दिया, तो आपका संसार से सम्बन्ध टूट गया। देखिए, संसार से सम्बन्ध टूट गया; संसार नहीं छुट गया । एक बात और, संसार का सम्बन्ध ही बाधक था, संसार बाधक नहीं था।

-(शेष आगेके ब्लागमें) 'साधन त्रिवेणी' पुस्तक से, (Page No. 9-10) । 

Truth of life
            
(Continuance from the last blog-post)

        The basic power of energy, strength, is gifted to you. Accordingly, intrinsic awareness and faith are granted to you. So that you should be useful to the world by the power of your given strength, energy. You may get release from the feeling of me-mine, desire and attachment and get liberated, enlightened, by innately given luminosity of awareness. The primordial faith gifted to you can be quickened enough to transform you into a soulful kinship with God to become his devotee.

        Now, look ! you have worked out the three life-projects on your own. Which are the schedules, the projects on the path ? You have decided not to misuse your energy or have decided to eschew the vanity of putting it to good use and renounce its consequent fruition. You have accomplished the sequence on your own. You didn't have to take help of the body for making your mind not to misuse your strength. You didn't have to derive help from the world for its execution. You didn't require the help of the body and the world for refusing to seek the result of the beneficent use of your energy or any boost to your ego for this abnegation. 

        Thus, that which is done by oneself in harmony with the truth of life is called Satsang. What else is Satsang ? It is autonomous, self-reliant, independent fulfillment of responsibility. Satsang emanates from the intrinsic centre, the mode of being of man. Satsang is 'Swadharm' of man. As you awakened, eschewed misuse of energy; gave up the result and the vanity of putting it to good use, your attachment to the world was broken off. But look, your entanglement with the world is dismantled; you are not alienated from the world, it is not deserted or given up. Moreover, your being enmeshed in the world obstructed the sadhana, not the world itself.

-(Remaining in the next blog) From the book 'Ascent Triconfluent', (Page No. 19) 

Wednesday, 18 January 2012

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Wednesday, 18 January 2012
(माघ कृष्ण दशमी, वि.सं.-२०६८, बुधवार)

जीवन का सत्य

        आपके जीवन का जो सत्य है, वह आपके पुरुषार्थ का फल नहीं है । यह तो आपको स्वतः प्रदान किया गया है । यह ज्ञान से सिद्ध है कि मेरा कुछ नहीं है; मुझे कुछ नहीं चाहिए । मेरा किसी वस्तु पर अधिकार नहीं है - यह ज्ञान से सिद्ध है । और यह ज्ञान आपको मिला है । ऐसे ही प्रभु मेरे अपने हैं - यह आस्था से सिद्ध है । यह आस्था का तत्व आपको मिला है।

        ऐसे ही बल के सदुपयोग से विश्वशान्ति की समस्या हल होती है, यह बल आपको मिला हुआ है । बल आपको मिला हुआ है; ज्ञान आपको मिला हुआ है; आस्था आपको मिली हुई है । यह जो बल, ज्ञान और आस्था का तत्व आपके जीवन में है, यह आपके किसी कर्म विशेष का फल नहीं है ।

        यदि कर्म विशेष का यह फल होता, तब तो आप ऐसे यन्त्र बना सकते थे, जिनसे आपको आस्था, ज्ञान और बल मिल जाता। हाँ, बल के सदुपयोग से बल मिलता हैज्ञान के सदुपयोग से मुक्ति मिलती है, आस्था के सदुपयोग से भक्ति मिलती है - यह आपके जीवन का अनुभव सिद्ध सत्य है । 

-(शेष आगेके ब्लागमें) 'साधन त्रिवेणी' पुस्तक से, (Page No. 9) । 

Truth of life

        That which is the truth of your life is not the fruition of your travail, your laborious effort. It is innately profferred to you. It is realized in awareness that nothing is mine, i don't want anything whatever. That i don't possess anything is a realization through awareness. Accordingly the truth that God is my own is realized in faith. you are already provided with this elemental essence of faith.

        Similarly, the problem of world-peace is resolved by bringing strength of energy into beneficent services to the people; strength, energy is already granted to you. You are endowed with energy, wisdom and faith. This quintessential strength, wisdom and faith in your life is not the fruit of any of your special work done by diligence of self-effort.

        Had it been the upshot of special effort, some skilled exertion, you could have constructed the machinery to produce and procure faith, awareness and capable strength. Nevertheless, it is a truth proved through experience that strength flourishes by prudent, beneficent use, freedom is attained by reverence for awareness and devotion to God is earned through abiding by faith in him.

-(Remaining in the next blog) From the book 'Ascent Triconfluent', (Page No. 19) 

Tuesday, 17 January 2012

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Tuesday, 17 January 2012
(माघ कृष्ण नवमी, वि.सं.-२०६८, मंगलवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
प्रश्नोत्तरी

प्रश्न - स्वामीजी ! वैराग्य का क्या स्वरूप है और वह कैसे होता है ?
उत्तर - देखो, मनुष्य को जब वैराग्य होता है, तब सत्य की खोज के अलावा और कोई बात उसे नहीं सूझती । वह तो सबकुछ त्याग करके तत्परता से सत्य की खोज में लग जाता है । वह किसी की कुछ परवाह नहीं करता। वह अपने शारीरिक सुखों का त्याग कर देता है । जबतक सत्य की प्राप्ति नहीं होती, तबतक वह किसी भी हालत में चैन से नहीं रहता । जब मनुष्य संसार से अपना सम्बन्ध-विच्छेद कर देता है, उससे मिलनेवाले सुखों को ठुकरा देता है तथा सब का परित्याग करके सत्य की खोज के लिए निकल पड़ता है, तब संसार के प्रति उसका कुछ भी कर्तव्य शेष नहीं रह जाता है ।
        अब प्रश्न यह है कि वैराग्य की प्राप्ति कैसे हो ? जबतक जीवन में राग है, तबतक वैराग्य की प्राप्ति नहीं हो सकती। वैराग्य की प्राप्ति का अचूक साधन तो अपने विवेक का आदर करना है ।  

प्रश्न - शिवलिंग की पूजा क्यों की जाती है ?
उत्तर - लिंग की नहीं, शिव की पूजा की जाती है । जिसकी स्वयं की कोई आकृति नहीं होती, उसमें प्रतीक की स्थापना की जाती है । "मैं" भी तो एक लिंग है । अपने में ही निराकार की स्थापना कर लो । मनुष्य तीन गुणों से बना है । कोई सत् प्रधान है, कोई रज प्रधान है, तो कोई तम प्रधान है । भगवान् राम में राजसी स्वभाव है । श्रीकृष्ण में अनन्त सौंदर्य-माधुर्य है । श्रीशिव वैराग्य प्रधान हैं, आशुतोष हैं, विचारक और गुणातीत हैं ।

प्रश्न - 'स्वधर्म' का मतलब क्या है ?
उत्तर - 'स्वधर्म' सर्वश्रेष्ठ है । स्वधर्म पालन से व्यक्ति साधन-निष्ठ हो जाता है । ज्ञानपूर्वक अनुभव करें कि सृष्टि में मेरा कुछ नहीं है । सृष्टि से सम्बन्ध तोड़ने की प्रेरणा और परमात्मा से सम्बन्ध जोड़ने की प्रेरणा 'स्वधर्म' देता है । 'स्वधर्म' का मतलब है, 'स्व' का धर्म । श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा था कि सर्व धर्मों को छोड़कर मेरी शरण में आ जा ।

प्रश्न - आजकल आदमी धर्म पर क्यों नहीं चलते ?
उत्तर - भोग में रूचि रखते हैं, योग में नहीं ।

प्रश्न - आत्मा क्या है ?
उत्तर - अपने को जो अनुभव करे वह है आत्मा । आत्मा में जो बैठा हुआ है वह है परमात्मा । जो देखा जाय, वह है अनात्मा। जो माना जाय वह है परमात्मा । अतः जो अनात्मा से भिन्न है, वह है आत्मा ।  

-'प्रश्नोत्तरी' पुस्तक से, (Page No. 20-21) । 

Monday, 16 January 2012

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Monday, 16 January 2012
(माघ कृष्ण अष्टमी, वि.सं.-२०६८, सोमवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
प्रश्नोत्तरी

प्रश्न - मार खाना भी उदारता है क्या ?
उत्तर - कमजोर हमेशा पिटता रहता है । उदारता आत्मीय सम्बन्ध से होती है। उदारता माने, विश्व-जीवन से एकता । बलवान बनिए । करुणित होइए । 

प्रश्न - हनुमानजी के चित्र में, हृदय में रामजी की फोटो बनी है। क्या यह सही है ?
उत्तर - अरे ! भाव पर फोटो बनी है, चित्र में नहीं ।
दिल का हुजरा साफ कर, आनेवाले के लिए ।
ख्याल गैरों का उठा, उसे बैठाने के लिए ।।
पहले दिल की सफाई करनी है । 

प्रश्न - प्राण क्या है ?
उत्तर - प्राण कहते हैं, जिससे शरीर काम करे । प्राण जीवनी-शक्ति है ।

प्रश्न - स्वामीजी ! साधन करने में स्वस्थ शरीर की भी जरूरत है क्या ?
उत्तर - साधन में वास्तव में तो स्वस्थ शरीर की जरूरत नहीं है। शरीर का स्वस्थ अथवा रोगी रहना, यह तो एक परिस्थिति है। परिस्थिति चाहे कैसी भी हो, साधन-सामग्री से भिन्न कुछ है ही नहीं । शरीर चाहे स्वस्थ रहे, अथवा रोगी । साधक इसे महत्व न दे। फिर भी यदि शरीर स्वस्थ रहे, तो अच्छी बात है । साधन का निर्माण तो सत्संग से होता है । सत्संग स्वधर्म है, शरीर धर्म नहीं। उसमें तो प्राप्त परिस्थिति का सदुपयोग करना है ।

प्रश्न - प्रत्यक्ष जगत् की तरह भगवत् सत्ता पर किस प्रकार विश्वास हो ? इसका कोई सुगम उपाय बताने की कृपा करें ।
उत्तर - इंद्रियों के ज्ञान में सद्भाव एवं विषयों की वासना तथा शरीर में अहं-बुद्धि, इन तीनों कारणों से जगत् की सत्ता प्रत्यक्ष प्रतीत होती है । इन तीनों कारणों के मिट जाने पर भगवत् सत्ता पर विश्वास हो जाता है । 

प्रश्न - मुझे साधन करते हुए एक अर्सा हो गया, किन्तु अभी तक सफलता के दर्शन नहीं हुए, क्या कारण है ?
उत्तर - जो मनुष्य असाधन को बनाए रखकर साधन करते हैं, उनको बहुत दिनों तक साधन करने पर भी वर्तमान में सिद्धि नहीं मिल सकती ।
        जो मनुष्य वस्तु और व्यक्ति का आश्रय लेकर साधन करना चाहते हैं, उनको भी सफलता नहीं मिलती । इसलिए भगवान् का आश्रय लेकर साधन करो, सफलता अवश्य मिलेगी।
        जो साधक देशकाल, परिस्थिति, वस्तु व व्यक्ति का आश्रय छोड़कर साधन करता है, उसको शीघ्र सफलता मिलती है।
          'स्व' में सन्तुष्ट रहो, मानवता को महत्व दो और प्रभु पर विश्वास करो - यही साधन है और इसी का नाम जीवन है। जिसके जीवन में ये बातें आ जाती हैं, उसको सफलता अवश्य मिलती है । 

-(शेष आगेके ब्लागमें) 'प्रश्नोत्तरी' पुस्तक से, (Page No. 18-20) । 

Sunday, 15 January 2012

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Sunday, 15 January 2012
(माघ कृष्ण सप्तमी, मकरसंक्रान्ति, वि.सं.-२०६८, रविवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
प्रश्नोत्तरी

प्रश्न - स्वामीजी ! होली का क्या महत्व है ?
उत्तर - राग-द्वेष को अग्नि में जला दो, देहाभिमान को मिट्टी में मिला दो और प्रेम के रंग में रँग जाओ । 

प्रश्न - क्या व्यक्तिगत सम्पत्ति होनी चाहिए ?
उत्तर - व्यक्तिगत सम्पत्ति अवश्य होनी चाहिए, परन्तु उसे अपनी और अपने लिए नहीं मानना चाहिए ।

प्रश्न - स्वामीजी ! बोध किसे कहते हैं ?
उत्तर - सभी के मूल में एक अनुत्पन्न नित्य तत्व है । उसी की स्वतन्त्र सत्ता है । इसका ज्ञान होना ही बोध है ।

प्रश्न - स्वामीजी ! समाज के संघर्ष का क्या कारण है ?
उत्तर - हम दूसरों को क्षति पहुँचाकर जीना चाहते हैं । यही कारण है समाज में संघर्ष का ।

प्रश्न - महाराजजी ! मोह को बड़ा बलवान कहा जाता है, क्यों ?
उत्तर - देखो ! मायिक पदार्थ और ऐहिक सुख, यह सब नाशवान है। इनमें ममता करना तथा इनकी कामना करना - यह मनुष्य की भूल ही है । इनका वियोग तो एक दिन होगा ही । अगर इनमें ममता होगी, तो इनके वियोग-काल में दुःख ही होगा । इसलिए इनको दुःख रूप भी कहा है । अतः इन नाशवान और दुःखरूप पदार्थों के लिए अपना परलोक बिगाड़ देना बड़ी भारी भूल है ।
        सच्चा बुद्धिमान तो वही है, जिसने सुख-भोग की आसक्ति को त्याग कर भगवान् में आत्मीयता करके शरणागत होकर अपना लोक व परलोक बना लिया एवं अपना कल्याण कर लिया। भोगों की आसक्ति त्याग कर भगवान् की शरण ग्रहण करो। यही कल्याण का सही व सच्चा मार्ग है । इसी में मानव-जीवन की सफलता व सार्थकता है । 

प्रश्न - पता चलता है कि संसार है और आगे भी रहेगा । क्या यह सत्य है ?
उत्तर - यह जो मानते हो संसार है, यह गलत है । जो दिख रहा है उसकी स्थिति नहीं है । उसे क्यों मानते हो ?

-(शेष आगेके ब्लागमें) 'प्रश्नोत्तरी' पुस्तक से, (Page No. 17-18) । 

Saturday, 14 January 2012

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Saturday, 14 January 2012
(माघ कृष्ण पंचमी, वि.सं.-२०६८, शनिवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
प्रश्नोत्तरी

प्रश्न - महाराजजी ! सत्य की प्राप्ति में कितना समय लगता है ?
उत्तर - जिसकी जितनी तीव्र जिज्ञासा होती है, उसे उतना ही कम समय लगता है । जब आप सत्य के बिना चैन से न रहेंगे, वह उसी समय मिल जाएगा। 

प्रश्न - स्वामीजी, यदि घर की प्रतिकूलता के कारण साधन न हो सके, तो क्या साधक को घर छोड़ देना चाहिए ?
उत्तर - सच्चा मानव-सेवा-संघी कभी घर नहीं छोड़ता, बल्कि ममता, कामना और अपना अधिकार छोड़ता है ।

प्रश्न - महाराजजी, क्या मैं घरबार छोड़कर आश्रम में रह सकता हूँ ?
उत्तर - मानव-सेवा संघ किसी का घर बर्बाद करके आश्रम को आबाद नहीं करना चाहता । परन्तु यदि आपका परिवार आप पर निर्भर न हो और घर में आप सुख-दुःख का सदुपयोग न कर सकें, तो आ जायें ।

प्रश्न - महाराजजी ! धन का अभाव क्यों सताता है ?
उत्तर - तुम धन को अधिक महत्व देते हो ।

प्रश्न - महाराजजी ! जब मैं ध्यान करने बैठता हूँ, तो कभी तो खूब शान्ति रहती है और कभी ऐसा लगता है कि क्रिया-शक्ति का वेग अभी बाकी है ।
उत्तर - करने का राग अभी निवृत नहीं हुआ ।

प्रश्न - स्वामीजी ! साधन में सफलता नहीं मिल रही है ।
उत्तर - अपनी रूचि, योग्यता और सामर्थ्य के अनुरूप साधन-निर्माण नहीं किया ।

प्रश्न - स्वामीजी ! भगवान् छिपा क्यों रहता है ?
उत्तर - भगवान् के प्रति आस्था, श्रद्धा, विश्वासपूर्वक आत्मीयता और प्रियता जाग्रत नहीं हुई । 

प्रश्न - स्वामीजी, मन में बहुत विकार पैदा होते हैं, क्या करूँ ?
उत्तर - गहरी वेदना होनी चाहिए ।

-(शेष आगेके ब्लागमें) 'प्रश्नोत्तरी' पुस्तक से, (Page No. 16-17) ।