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Thursday, 8 March 2012

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Thursday, 8 March 2012
(फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा, वि.सं.-२०६८, गुरुवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
सन्त हृदयोद्गार

89.    प्रवृति के द्वारा जिस किसी को कुछ मिलता है, वह कालान्तर में स्वतः मिट जाता है ।

90.    प्रार्थना इसलिए नहीं की जाती कि आप कहेंगे, तब परमात्मा सुनेंगे। प्रार्थना का असली रूप है - अपनी आवश्यकता ठीक-ठीक अनुभव करना।

91.    जिस प्रकार प्यास लगना ही पानी का माँगना है, उसी प्रकार अभाव की वेदना ही प्रार्थना है ।

92.    जो तुम्हारे सम्बन्ध में तुमसे भी अधिक जानते हैं, क्या उनसे भी कुछ कहना है ?

93.    जिस प्रकार माँ को शिशु की सभी आवश्कताओं का ज्ञान है एवं शिशु के बिना कहे ही माँ वह करती है, जो उसे करना चाहिए, उसी प्रकार आनन्दघन भगवान् हमारे बिना कहे ही वह अवश्य करते हैं, जो उन्हें करना चाहिए । परन्तु हम उनकी दी हुई शक्ति का सदुपयोग नहीं करते और निर्बलता मिटाने के लिए बनावटी प्रार्थना करते रहते हैं ।

94.    प्रभु की महिमा सुनकर जो ईश्वरवादी होते हैं, वे कामी हैं, प्रेमी नहीं ।

95.    योग की प्राप्ति में, बोध की प्राप्ति में, प्रेम की प्राप्ति में कुछ न चाहना ही मूल मन्त्र है ।

96.    अपने प्रियतम को अपने से भिन्न किसी और में अनुभव मत करो ।

97.    जिनके सम्बन्धमात्र में ही देहाभिमान गल जाता है, उनके प्रेम की प्राप्ति में भला देहादि की क्या अपेक्षा होगी ?

- 'सन्त हृदयोद्गार' पुस्तक से ।

Wednesday, 7 March 2012

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Wednesday, 07 March 2012
(फाल्गुन शुक्ल चतुर्दशी, वि.सं.-२०६८, बुधवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
सन्त हृदयोद्गार

82.    आप सच मानिए, सिद्धि वर्तमान में ही होती है। भविष्य में कभी सिद्धि नहीं होती । भविष्य में तो उसकी प्राप्ति होती है, जो वर्तमान में नहीं है अर्थात् जिसकी उत्पत्ति हो । ........... जरा सोचिए, साध्य तो हो वर्तमान में, और साधक यह माने कि हमें भविष्य में मिलेगा ! जरा ध्यान दीजिए, साध्य तो है वर्तमान में, और मिलेगा भविष्य में !

83.    मानव को प्रभु दण्ड नहीं देता, विधान मानव को दण्ड नहीं देता, तो फिर क्या देता है ? जिस परिस्थिति से आपका विकास होता है, वही परिस्थिति आपको देता है ।

84.    यह दिमागी कौतूहल है कि किसी परिस्थिति-विशेष की प्राप्ति से हम वह हो जाएँगे, जो हम आज नहीं हैं । सरकार, यहीं रहेंगे, यहीं । अन्तर यही होगा कि आप तीन बटा चार न लिखकर पचहत्तर बटा सौ लिखियेगा ।

85.    प्राकृतिक नियमानुसार प्रत्येक परिस्थिति मंगलमय है, इसी ध्रुव सत्य के कारण जो हो रहा है, वही ठीक है ।

86.    प्रतिकूल परिस्थिति भोग में भले ही बाधक हो, पर योग में नहीं ।

87.    ऐसी कोई अनुकूलता है ही नहीं, जिसने प्रतिकूलता को जन्म न दिया हो और न ऐसी कोई प्रतिकूलता ही है, जिसमें प्राणी का हित न हो ।

88.    जितने आस्तिक होते हैं, वे प्रत्येक प्रतिकूलता में अपने परम प्रेमास्पद की अनुकूलता का अनुभव करते हैं कि अब हमारे प्यारे ने अपने मन की बात करना आरम्भ कर दिया । अब वे हमें जरूर अपनायेंगे ।

- (शेष आगेके ब्लागमें) 'सन्त हृदयोद्गार' पुस्तक से ।

Tuesday, 6 March 2012

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Tuesday, 06 March 2012
(फाल्गुन शुक्ल त्रयोदशी, वि.सं.-२०६८, मंगलवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
सन्त हृदयोद्गार

76.    जब आप अकेले हो जाएँगे, तब भगवान् की कृपा से ही भगवान् को जान लेंगे। प्यारे, कोई भी प्रेमी अपने प्रेमपात्र से किसी के सामने नहीं मिलता, तो फिर जबतक आप शरीर आदि अनेक सम्बन्धियों को साथ लिए हुए हैं, आपका प्रेमपात्र आपसे कैसे मिल सकता है ? भगवान् कैसे हैं ? यदि यह जानना चाहते हो तो अकेले हो जाओ ।

77.    किसी को बुलाओ मत; क्योंकि जो आपका है, वह आपके बिना रह नहीं सकता अर्थात् अपने प्रेमपात्र को निरन्तर अपने में ही अनुभव करो । .......... अपने सिवाय अपने लिए अपने से भिन्न की आवश्यकता नहीं है ।

78.    ईश्वर-प्राप्ति के लिए वनमें जाने की जरूरत नहीं है । जो घर में आराम से रहकर भजन नहीं कर सकता, वह वनमें कष्ट सहकर कैसे कर सकता है ? वनमें रहना तो तप के लिए आवश्यक होता है ।

79.    जिसके मन में शरीर को बनाये रखने की रूचि है, जो शरीर को ही अपना स्वरूप मानता है, वह ईश्वर को प्राप्त नहीं कर सकता ।

80.    परमात्मा है तो, पर न जाने कब मिलेगा ? अरे भले आदमी, जब तुम कहते हो कि सदैव है, सर्वत्र है, सभी का है; तो कब मिलेगा कि अभी मिला है ? कितने आश्चर्य की बात है! इससे बड़ा और कोई पागलपन हो सकता है क्या, यह सोचना कि न जाने परमात्मा कब मिलेगा ? जबकि परमात्मा से आप कभी अलग हो सकते नहीं, हैं नहीं ।

81.    जिसको तुम प्राप्त करना चाहते हो, उसकी आवश्यकता अनुभव करो । उसको बलपूर्वक पकड़ने की कोशिश मत करो, केवल आवश्कता अनुभव करो । 

- (शेष आगेके ब्लागमें) 'सन्त हृदयोद्गार' पुस्तक से ।

Monday, 5 March 2012

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Monday, 05 March 2012
(फल्गुन शुक्ल द्वादशी, वि.सं.-२०६८, सोमवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
सन्त हृदयोद्गार

69.    हमें उसको प्राप्त करना है कि जिसका हम त्याग कर ही नहीं सकते ।

70.    संसार परमात्मा की प्राप्ति में बाधक नहीं है, बल्कि सहायक है । उसका जो हम सम्बन्ध स्वीकार करते हैं, वही बाधक है ।

71.    जगत् की सत्ता स्वीकार करके भगवान् को प्राप्त करना चाहते हैं ? नहीं कर सकते । होगा क्या ? भगवान् आयेंगे, लेकिन आप कहेंगे कि मेरी स्त्री बीमार है, अच्छी हो जाय । भगवान् को प्राप्त करना चाहते थे कि स्वस्थ स्त्री को देखना चाहते थे ? जरा सोचिए ।
  
72.    अगर आप कभी भी यह अनुभव करें, कभी भी मानें कि शरीर अलग हो जाएगा, तो अभी मान लीजिए कि अभी अलग है। और इस बात में विश्वास करें कि कभी भी परमात्मा मिल जाएगा, तो अभी मान लीजिए कि अभी पास है, अभी भी मिला है।   

73.    परमात्मा से आप तो मिल सकते हैं, लेकिन शरीर द्वारा नहीं मिल सकते । आप अपने द्वारा मिल सकते हैं । हाँ, शरीर द्वारा परमात्मा की सृष्टि का कार्य कर सकते हैं ।     

74.    भगवान् क्या कोई खेती है कि आज बोयेंगे तो कल उपजेगा और परसों मिलेगा ? क्या भगवान् कोई वृक्ष है, जिसे आज लगायेंगे तो बारह वर्ष में फल लगेगा ? भगवान् ऐसी चीज नहीं है । भगवान् तो वर्तमान में भी ज्यों-का-त्यों मौजूद है ।

75.    सत्य का मार्ग इतना तंग है कि उसपर आप अकेले ही जा सकते हैं । इसलिए इन्द्रिय, मन, बुद्धि आदि के साथ रहने का मोह छोड़ दें । इनके साथ रहकर आप उस तंग रास्ते पर नहीं चल सकते । अकेले होने पर मार्ग अपने-आप दिखाई देगा ।

- (शेष आगेके ब्लागमें) 'सन्त हृदयोद्गार' पुस्तक से ।

Sunday, 4 March 2012

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Sunday, 04 March 2012
(फाल्गुन शुक्ल आमलकी एकादशी, वि.सं.-२०६८, रविवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
सन्त हृदयोद्गार

63.    वे (संसार के रचयिता) अपनी वस्तु को सदैव देखते रहते हैं। उन्होंने कभी भी तुम्हें अपनी आँख से ओझल नहीं किया । ........... साधक भले ही उन्हें भूल जाय, पर वे नहीं भूलते। ........... जिसकी जो वस्तुएँ हैं, उसे वह देखता ही है, सम्भालता ही है । ............ अपनी रचना से क्या रचयिता अपरिचित होता है? कदापि नहीं ।  
      
64.    भगवान् का कोई एक ठिकाना नहीं है । ऐसा नहीं है कि संसार अलग हो, तत्वज्ञान अलग हो, भक्ति अलग हो और भगवान् अलग हो । सब मिलकर जो चीज है, उसी का नाम भगवान् है ।
             
65.    जो किसी का नहीं तथा जिसका कोई नहीं, उसके भगवान् अपने-आप हो जाते हैं; क्योंकि वे अनाथ के नाथ हैं ।

66.    भगवान् के होकर 'भगवान् का स्वरूप क्या है ?' यह प्रश्न क्या अर्थ रखता है ? गहराई से देखिए, प्यासने कभी नहीं पूछा, 'पानी क्या है ?' भूख ने किसी से नहीं पूछा, 'भोजन क्या है?' पानी पाकर प्यास तृप्त हो गई, भोजन पाकर भूख तृप्त हो गई। तृप्ति होनेपर पानी और प्यास की भिन्नता तथा भूख और भोजन की भिन्नता शेष नहीं रहती ।

67.    जब हम अपने में शरीर-भाव का अभिनय स्वीकार करते हैं, तब हमारे प्यारे (प्रभु) विश्वरूप होकर लीला करते हैं । शरीर होकर किसी भी खिलाड़ी (प्राणी) ने विश्व से भिन्न कुछ नहीं जाना । .......... हम शरीर बनकर तो केवल उनको विश्वरूप में ही देख सकते हैं ।
 
68.    ईश्वर मानव की स्वाधीनता छिनना नहीं चाहता, इसलिए मानव जबतक स्वयं अपनी ओर से ईश्वर के सम्मुख नहीं होता, तबतक ईश्वर उसके पीछे ही रहता है ।

- (शेष आगेके ब्लागमें) 'सन्त हृदयोद्गार' पुस्तक से ।

Saturday, 3 March 2012

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Saturday, 03 March 2012
(फाल्गुन शुक्ल दशमी, वि.सं.-२०६८, शनिवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
सन्त हृदयोद्गार 

56.    जिस समय अपने दोष का दर्शन हो जाय, समझ लो कि तुम जैसा विचारशील कोई नहीं । और जिस समय परदोष-दर्शन हो जाय, उस समय समझ लो कि हमारे जैसा कोई बेसमझ नहीं ।

57.    अपने दोष का दर्शन अपने को निर्दोष बनाने में समर्थ है और परदोष-दर्शन अपने को दोषी बनाने में हेतु है ।

58.    भगवान् के खिलाफ जो आवाज उठती है न, वह तर्क से नहीं उठती है । वह आवाज उठती है भगवान् को माननेवालों के दुश्चरित्र से, और कोई बात नहीं है । भगवान् को माननेवाले अगर ठीक आदमी हों तो भगवान् के खिलाफ कोई बोल ही नहीं सकता ।

59.    परमात्मा को 'अभी' न मानना बड़ी भारी भूल होगी, 'अपना' न मानना उससे बड़ी भूल होगी, और 'अपने में' न मानना सबसे बड़ी भूल होगी ।

60.    प्रभु अपने में हैं, अभी हैं और अपने हैं - इससे परमात्मा मिल जाएँगे ।

61.    याद रहे, और कुछ भी अपना है और परमात्मा भी अपना है - ये दोनों बातें एक साथ नहीं होतीं । जबतक हम और कुछ भी अपना मानते हैं, तबतक तो मुख से कहते हुए भी हमने सच्चे हृदय से भगवान को अपना नहीं माना । यही इसकी पहचान है।

62.    सर्वसमर्थ प्रभु साधक का भूतकाल नहीं देखते । उसकी वर्तमान वेदना से ही करुणित हो अपना लेते हैं ।

- (शेष आगेके ब्लागमें) 'सन्त हृदयोद्गार' पुस्तक से ।

Friday, 2 March 2012

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Friday, 02 March 2012
(फाल्गुन शुक्ल नवमी, वि.सं.-२०६८, शुक्रवार)
     
सन्त हृदयोद्गार 

50.    प्रिय-से-प्रिय वस्तु तथा व्यक्ति का त्याग गहरी नींदके किए भला किसने नहीं किया?

51.    ईश्वर, धर्म और समाज किसी के ॠणी नहीं रहते । जो इनके लिए त्याग करते हैं, उनका ये अवश्य निर्वाह करते हैं ।

52.    त्याग हो जाने पर त्याग का भास नहीं रहता; क्योंकि त्याग की स्मृति अथवा उसका अस्तित्व तभी तक प्रतीत होता है, जबतक त्याग होता नहीं ।

53.    इन तीन बातों से सारे जीवन की समस्याएँ हल हो जाती हैं - १) मुझे कुछ नहीं चाहिए, २) प्रभु अपने हैं, ३) सब कुछ प्रभु का है । यही जीवन का सत्य है। इसको स्वीकार करने से उदारता, स्वाधीनता और प्रेम प्राप्त होगा ।

54.    ध्यान किसी का नहीं करना है । किसी का ध्यान नहीं करोगे तो परमात्मा का ध्यान हो जाएगा । और किसी का ध्यान करोगे तो वह फिर किसी और का ही ध्यानमात्र रह जाएगा ।

55.    अगर परमात्मा के माननेवालों को परमात्मा की याद नहीं आती, और करनी पड़ती है - यह कोई कम दुःख की बात है ? यह कम आश्चर्य की बात है ? अरे, मरे हुए बुजुर्गों की याद आती है आपको, गये हुए धन की याद आती है आपको ! तो परमात्मा इतना घटिया हो गया कि उसकी याद आपको करनी पड़े? .......... याद नहीं आती है इसलिए कि आप उसे अपना नहीं मानते ।

- (शेष आगेके ब्लागमें) 'सन्त हृदयोद्गार' पुस्तक से ।

Saturday, 10 December 2011

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Saturday, 10 December 2011
(मार्गशीर्ष शुक्ल पूर्णिमा, वि.सं.-२०६८, शनिवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
सन्त हृदयोद्गार

89.    प्रवृति के द्वारा जिस किसी को कुछ मिलता है, वह कालान्तर में स्वतः मिट जाता है ।

90.    प्रार्थना इसलिए नहीं की जाती कि आप कहेंगे, तब परमात्मा सुनेंगे। प्रार्थना का असली रूप है - अपनी आवश्यकता ठीक-ठीक अनुभव करना।

91.    जिस प्रकार प्यास लगना ही पानी का माँगना है, उसी प्रकार अभाव की वेदना ही प्रार्थना है ।

92.    जो तुम्हारे सम्बन्ध में तुमसे भी अधिक जानते हैं, क्या उनसे भी कुछ कहना है ?

93.    जिस प्रकार माँ को शिशु की सभी आवश्कताओं का ज्ञान है एवं शिशु के बिना कहे ही माँ वह करती है, जो उसे करना चाहिए, उसी प्रकार आनन्दघन भगवान् हमारे बिना कहे ही वह अवश्य करते हैं, जो उन्हें करना चाहिए । परन्तु हम उनकी दी हुई शक्ति का सदुपयोग नहीं करते और निर्बलता मिटाने के लिए बनावटी प्रार्थना करते रहते हैं ।

94.    प्रभु की महिमा सुनकर जो ईश्वरवादी होते हैं, वे कामी हैं, प्रेमी नहीं ।

95.    योग की प्राप्ति में, बोध की प्राप्ति में, प्रेम की प्राप्ति में कुछ न चाहना ही मूल मन्त्र है ।

96.    अपने प्रियतम को अपने से भिन्न किसी और में अनुभव मत करो ।

97.    जिनके सम्बन्धमात्र में ही देहाभिमान गल जाता है, उनके प्रेम की प्राप्ति में भला देहादि की क्या अपेक्षा होगी ?

- 'सन्त हृदयोद्गार' पुस्तक से ।

Friday, 9 December 2011

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Friday, 09 December 2011
(मार्गशीर्ष शुक्ल चतुर्दशी, वि.सं.-२०६८, शुक्रवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
सन्त हृदयोद्गार

82.    आप सच मानिए, सिद्धि वर्तमान में ही होती है। भविष्य में कभी सिद्धि नहीं होती । भविष्य में तो उसकी प्राप्ति होती है, जो वर्तमान में नहीं है अर्थात् जिसकी उत्पत्ति हो । ........... जरा सोचिए, साध्य तो हो वर्तमान में, और साधक यह माने कि हमें भविष्य में मिलेगा ! जरा ध्यान दीजिए, साध्य तो है वर्तमान में, और मिलेगा भविष्य में !

83.    मानव को प्रभु दण्ड नहीं देता, विधान मानव को दण्ड नहीं देता, तो फिर क्या देता है ? जिस परिस्थिति से आपका विकास होता है, वही परिस्थिति आपको देता है ।

84.    यह दिमागी कौतूहल है कि किसी परिस्थिति-विशेष की प्राप्ति से हम वह हो जाएँगे, जो हम आज नहीं हैं । सरकार, यहीं रहेंगे, यहीं । अन्तर यही होगा कि आप तीन बटा चार न लिखकर पचहत्तर बटा सौ लिखियेगा ।

85.    प्राकृतिक नियमानुसार प्रत्येक परिस्थिति मंगलमय है, इसी ध्रुव सत्य के कारण जो हो रहा है, वही ठीक है ।

86.    प्रतिकूल परिस्थिति भोग में भले ही बाधक हो, पर योग में नहीं ।

87.    ऐसी कोई अनुकूलता है ही नहीं, जिसने प्रतिकूलता को जन्म न दिया हो और न ऐसी कोई प्रतिकूलता ही है, जिसमें प्राणी का हित न हो ।

88.    जितने आस्तिक होते हैं, वे प्रत्येक प्रतिकूलता में अपने परम प्रेमास्पद की अनुकूलता का अनुभव करते हैं कि अब हमारे प्यारे ने अपने मन की बात करना आरम्भ कर दिया । अब वे हमें जरूर अपनायेंगे ।

- (शेष आगेके ब्लागमें) 'सन्त हृदयोद्गार' पुस्तक से ।

Tuesday, 6 December 2011

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Tuesday, 06 December 2011
(मार्गशीर्ष शुक्ल मोक्षदा एकादशी, गीता जयंती, वि.सं.-२०६८, मंगलवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
सन्त हृदयोद्गार

63.    वे (संसार के रचयिता) अपनी वस्तु को सदैव देखते रहते हैं। उन्होंने कभी भी तुम्हें अपनी आँख से ओझल नहीं किया । ........... साधक भले ही उन्हें भूल जाय, पर वे नहीं भूलते। ........... जिसकी जो वस्तुएँ हैं, उसे वह देखता ही है, सम्भालता ही है । ............ अपनी रचना से क्या रचयिता अपरिचित होता है? कदापि नहीं ।  
      
64.    भगवान् का कोई एक ठिकाना नहीं है । ऐसा नहीं है कि संसार अलग हो, तत्वज्ञान अलग हो, भक्ति अलग हो और भगवान् अलग हो । सब मिलकर जो चीज है, उसी का नाम भगवान् है ।
             
65.    जो किसी का नहीं तथा जिसका कोई नहीं, उसके भगवान् अपने-आप हो जाते हैं; क्योंकि वे अनाथ के नाथ हैं ।

66.    भगवान् के होकर 'भगवान् का स्वरूप क्या है ?' यह प्रश्न क्या अर्थ रखता है ? गहराई से देखिए, प्यासने कभी नहीं पूछा, 'पानी क्या है ?' भूख ने किसी से नहीं पूछा, 'भोजन क्या है?' पानी पाकर प्यास तृप्त हो गई, भोजन पाकर भूख तृप्त हो गई। तृप्ति होनेपर पानी और प्यास की भिन्नता तथा भूख और भोजन की भिन्नता शेष नहीं रहती ।

67.    जब हम अपने में शरीर-भाव का अभिनय स्वीकार करते हैं, तब हमारे प्यारे (प्रभु) विश्वरूप होकर लीला करते हैं । शरीर होकर किसी भी खिलाड़ी (प्राणी) ने विश्व से भिन्न कुछ नहीं जाना । .......... हम शरीर बनकर तो केवल उनको विश्वरूप में ही देख सकते हैं ।
 
68.    ईश्वर मानव की स्वाधीनता छिनना नहीं चाहता, इसलिए मानव जबतक स्वयं अपनी ओर से ईश्वर के सम्मुख नहीं होता, तबतक ईश्वर उसके पीछे ही रहता है ।

- (शेष आगेके ब्लागमें) 'सन्त हृदयोद्गार' पुस्तक से ।

Monday, 5 December 2011

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Monday, 05 December 2011
(मार्गशीर्ष शुक्ल दशमी, वि.सं.-२०६८, सोमवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
सन्त हृदयोद्गार 

56.    जिस समय अपने दोष का दर्शन हो जाय, समझ लो कि तुम जैसा विचारशील कोई नहीं । और जिस समय परदोष-दर्शन हो जाय, उस समय समझ लो कि हमारे जैसा कोई बेसमझ नहीं ।

57.    अपने दोष का दर्शन अपने को निर्दोष बनाने में समर्थ है और परदोष-दर्शन अपने को दोषी बनाने में हेतु है ।

58.    भगवान् के खिलाफ जो आवाज उठती है न, वह तर्क से नहीं उठती है । वह आवाज उठती है भगवान् को माननेवालों के दुश्चरित्र से, और कोई बात नहीं है । भगवान् को माननेवाले अगर ठीक आदमी हों तो भगवान् के खिलाफ कोई बोल ही नहीं सकता ।

59.    परमात्मा को 'अभी' न मानना बड़ी भारी भूल होगी, 'अपना' न मानना उससे बड़ी भूल होगी, और 'अपने में' न मानना सबसे बड़ी भूल होगी ।

60.    प्रभु अपने में हैं, अभी हैं और अपने हैं - इससे परमात्मा मिल जाएँगे ।

61.    याद रहे, और कुछ भी अपना है और परमात्मा भी अपना है - ये दोनों बातें एक साथ नहीं होतीं । जबतक हम और कुछ भी अपना मानते हैं, तबतक तो मुख से कहते हुए भी हमने सच्चे हृदय से भगवान को अपना नहीं माना । यही इसकी पहचान है।

62.    सर्वसमर्थ प्रभु साधक का भूतकाल नहीं देखते । उसकी वर्तमान वेदना से ही करुणित हो अपना लेते हैं ।

- (शेष आगेके ब्लागमें) 'सन्त हृदयोद्गार' पुस्तक से ।

Sunday, 4 December 2011

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Sunday, 04 December 2011
(मार्गशीर्ष शुक्ल नवमी, वि.सं.-२०६८, रविवार)
     
सन्त हृदयोद्गार 

50.    प्रिय-से-प्रिय वस्तु तथा व्यक्ति का त्याग गहरी नींदके किए भला किसने नहीं किया ?

51.    ईश्वर, धर्म और समाज किसी के ॠणी नहीं रहते । जो इनके लिए त्याग करते हैं, उनका ये अवश्य निर्वाह करते हैं ।

52.    त्याग हो जाने पर त्याग का भास नहीं रहता; क्योंकि त्याग की स्मृति अथवा उसका अस्तित्व तभी तक प्रतीत होता है, जबतक त्याग होता नहीं ।

53.    इन तीन बातों से सारे जीवन की समस्याएँ हल हो जाती हैं - १) मुझे कुछ नहीं चाहिए, २) प्रभु अपने हैं, ३) सब कुछ प्रभु का है । यही जीवन का सत्य है। इसको स्वीकार करने से उदारता, स्वाधीनता और प्रेम प्राप्त होगा ।

54.    ध्यान किसी का नहीं करना है । किसी का ध्यान नहीं करोगे तो परमात्मा का ध्यान हो जाएगा । और किसी का ध्यान करोगे तो वह फिर किसी और का ही ध्यानमात्र रह जाएगा ।

55.    अगर परमात्मा के माननेवालों को परमात्मा की याद नहीं आती, और करनी पड़ती है - यह कोई कम दुःख की बात है ? यह कम आश्चर्य की बात है ? अरे, मरे हुए बुजुर्गों की याद आती है आपको, गये हुए धन की याद आती है आपको ! तो परमात्मा इतना घटिया हो गया कि उसकी याद आपको करनी पड़े? .......... याद नहीं आती है इसलिए कि आप उसे अपना नहीं मानते ।

- (शेष आगेके ब्लागमें) 'सन्त हृदयोद्गार' पुस्तक से ।

Friday, 11 November 2011

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Friday, 11 November 2011
(मार्गशीर्ष कृष्ण प्रतिपदा, वि.सं.-२०६८, शुक्रवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
सन्त हृदयोद्गार

44.    संसार की सहायता से जबतक जीवन मालूम होता है, तबतक तो मृत्यु के ही क्षेत्र में रहते हैं । शरीर के रहने का नाम जीवन नहीं है । ........... शरीर से सम्बन्ध टूटने के बाद जीवन की प्राप्ति होती है ।

45.    जिसको आप जानना और समझना कहते हैं, वह तो सीखना है । आपने सीखा है, सुना है । न आपने जाना है, न समझा है । ........... जानने का अर्थ यह है कि जब आप ठीक-ठीक जान लें कि सचमुच इतने बड़े संसार में मेरा कुछ है ही नहीं और मुझे कुछ नहीं चाहिए ।

46.    जो साधक अपने ज्ञान का आदर नहीं करता, वह गुरु और ग्रन्थ के ज्ञान का भी आदर नहीं कर सकता । जैसे, जो नेत्र के प्रकाश का उपयोग नहीं करता, वह सूर्य के प्रकाश का भी उपयोग नहीं कर पाता ।

47.    कर्म ज्ञान का साधन नहीं होता, बल्कि भोग का दाता होता है।

48.    एक शरीर को लेकर कुटिया के अन्दर बंद कर दिया और हम त्यागी हो गए । तो मैं कहूँगा कि ऐसे तो तुम्हारे बाप भी त्यागी नहीं हो सकते । यदि पूछो, क्यों त्यागी नहीं हो सकते ? तो कहना होगा कि आपने अपना {अहम् का} तो त्याग किया नहीं । भाई मेरे, अगर त्याग करना हो तो अपना त्याग करो। और प्रेम करना हो तो सभी को प्रेम करो । और यदि अपने-आप का त्याग नहीं कर सकते तो आप संसार का कभी त्याग नहीं कर सकते ।

49.    केवल गृहत्याग करने एवं वस्त्र रंगनेमात्र से किसी को योग-बोध-प्रेम की प्राप्ति नहीं हो सकती । यह त्याग नहीं वरन् त्याग के भेष में अपने कर्तव्य से पलायन करना है ।  

- सन्त हृदयोद्गार पुस्तक से ।

Thursday, 10 November 2011

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Thursday, 10 November 2011
(कर्तिक पूर्णिमा, वि.सं.-२०६८, गुरुवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
सन्त हृदयोद्गार

37.    आज उपदेष्टा गुरु की लेशमात्र भी आवश्यकता नहीं है । आवश्यकता इस बात की है कि कोई ऐसा वीर पुरुष या वीर महिला हो, जो किसी उपदेश को स्वीकार कर सके ।

38.    दुनिया का बड़े-से-बड़ा गुरु, बड़े-से-बड़ा नेता, बड़े-से-बड़ा राष्ट्र जो काम नहीं कर सकता आपके साथ, अगर आप चाहें तो अपने साथ कर सकते हैं ।

39.    शास्त्रों में नेता या गुरु बनने को पतन का हेतु माना है। इससे यह सिद्ध होता है कि यह काम महापुरुषों के ही उपयुक्त है। साधक को इस बखेड़े में कभी नहीं पड़ना चाहिए ।

40.    वास्तविक गुणों का प्रादुर्भाव होने पर उनका भास नहीं होता । अतः जबतक गुणों का भास हो, तबतक समझना चाहिए कि गुणों के स्वरूप में कोई दोष है ।

41.    जब प्राणी अपनी प्रसन्नता किसी और पर निर्भर कर लेता है, तब उसका चित्त अशुद्ध हो जाता है, जिसके होते ही अनेक दोषों की उत्पत्ति अपने-आप होने लगती है ।

42.    यह सभी जानते हैं कि गहरी नींद में प्राणी प्रिय-से-प्रिय वस्तु और व्यक्ति का त्याग स्वभाव से ही अपना लेता है और उस अवस्था में किसी प्रकार के दुःख का अनुभव नहीं करता, अपितु जाग्रत-अवस्था में यही कहता है कि बड़े सुख से सोया। प्राकृतिक नियम के अनुसार कोई भी स्मृति अनुभूति के बिना नहीं हो सकती । गहरी नींद में कोई दुःख नहीं था, यह अनुभूति क्या साधक को वस्तु, व्यक्ति आदि से अतीत के जीवन की प्रेरणा नहीं देती ? अर्थात् अवश्य देती है । ..........गहरी नींद के समान स्थिति यदि जागृत में प्राप्त कर ली जाय तो यह सन्देह निर्मूल हो जाएगा और यह स्पष्ट बोध हो जाएगा कि वस्तु, व्यक्ति आदि के बिना भी जीवन है और उस जीवन में किसी प्रकार का अभाव नहीं है ।

43.    साधक को विश्वास रखना चाहिए कि जीवन स्वयं अपनी रक्षा करता है । यदि जीवन शेष है तो जीवन के साधन स्वयं प्राप्त हो जायेंगे ।  

(शेष आगेके ब्लागमें) - सन्त हृदयोद्गार पुस्तक से ।

Wednesday, 9 November 2011

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Wednesday, 09 November 2011
(कर्तिक शुक्ल वैकुण्ठ चतुर्दशी, वि.सं.-२०६८, बुधवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
सन्त हृदयोद्गार

31.    उनकी अहैतुकी कृपा आवश्यक वस्तु बिना माँगे ही दे देती है और अनावश्यक माँगने पर भी नहीं देती । इस दृष्टि से कुछ भी माँगना अपनी बेसमझी का परिचय देना है और उनके मंगलमय विधान का अनादर करना है।

32.    अगर इन्द्रियाँ संसार की ओर जाती हैं तो अपराध क्या है उनका ? संसार की जाति की ही हैं । लेकिन आप क्यों संसार को पसन्द करते हो जी, यह बताओ ? आप तो भगवान की जाति के हैं।

33.    अपने बल का अभिमान छोड़कर साधक जब यह विकल्प-रहित दृढ़ विश्वास कर लेता है कि मुझ पर भगवान की कृपा अवश्य होगी, मैं उनका कृपापात्र हूँ, उसी समय उस पर भगवान की कृपा अवश्य हो जाती है । इसमें कोई सन्देह नहीं है।

34.    आप सच मानिए, उस अनन्त की अहैतुकी कृपा निरन्तर योग की, ज्ञान की, प्रेम की वर्षा कर रही है । परन्तु दुःख की बात तो यह है कि हम उस कृपा के द्वारा जो वर्षा हो रही है, उसका उपयोग नहीं कर पाते । आप कहें, कैसे उपयोग नहीं कर पाते ? क्या हम थोड़ी-थोड़ी देर के लिए शान्त होते हैं ? यदि शान्त हुए होते तो आपको स्वयं अनुभव होता कि प्रभु की कृपाशक्ति योग दे रही है, प्रेम दे रही है, ज्ञान दे रही है और हम उससे तद्रूप होकर कृतकृत्य हो रहे हैं ।

35.    भूतकाल के दोषों के आधार पर वर्तमान की निर्दोषता में दोष का आरोप करना अपने प्रति अन्याय है । इसका अर्थ यह नहीं है कि भूतकाल की भूल का परिणाम परिस्थिति के रूप में अपने सामने नहीं आयेगा, अवश्य आयेगा; किन्तु भूतकाल के दोष के आधार पर वर्तमान की निर्दोषता में दोष का आरोप करना दोषयुक्त प्रवृति को जन्म देना है ।

36.    पूजा-प्रार्थना सब परमात्मा के साथ करनेवाली बात है । गुरु परमात्मा का बाप हो सकता है, परमात्मा नहीं । हाँ, गुरुवाक्य ब्रह्मवाक्य हो सकता है । गुरु श्रद्धास्पद हो सकता है, प्रेमास्पद नहीं । व्यक्ति को अगर परमात्मा मानना है तो सबको मानो। गुरु साधनरूप हो सकता है, साध्यरूप नहीं ।

(शेष आगेके ब्लागमें) - सन्त हृदयोद्गार पुस्तक से ।

Tuesday, 8 November 2011

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Tuesday, 08 November 2011
(कर्तिक शुक्ल त्रयोदशी, वि.सं.-२०६८, मंगलवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
सन्त हृदयोद्गार

22.    कामना ही क्रोध में हेतु है, चाहे शुभ कामना हो अथवा अशुभ। यद्यपि अशुभ से शुभ श्रेष्ठ है, परन्तु शुभ कामना भी दुःख का कारण है ।

23.    भगवान इच्छा पूरी नहीं करते, वे तो भक्त को इच्छा-रहित करते हैं ।

24.    इच्छाओं के रहते हुए प्राण चले जायँ तो 'मृत्यु' हो गयी और प्राण रहते हुए इच्छाएँ चली जायँ तो 'मुक्ति' हो गयी ।

25.    जब अपने मन की इच्छा के विपरीत हो, तब साधक को समझना चाहिए कि अब प्रभु अपने मन की बात पूरी कर रहें हैं ।

26.    यदि भगवान के पास कामना लेकर जायँगें तो भगवान संसार बन जायँगे और यदि संसार के पास निष्काम होकर जायँगे तो संसार भी भगवान बन जाएगा । अतः भगवान के पास उनसे प्रेम करने के लिए जायँ और संसार के पास सेवा करने के लिए, और बदले में भगवान और संसार दोनों से कुछ न चाहें तो दोनों से ही प्रेम मिलेगा ।

27.    परमात्मा से यदि कुछ भी माँगेंगे तो आपका सम्बन्ध परमात्मा से तो रहेगा नहीं, जो हम माँगेंगे, उससे हो जाएगा ।

28.    अपने को जो चाहिए, वह अपने में है ।

29.    अगर आप यह मानते हैं कि सत्य की जिज्ञासा के साथ-साथ असत् की कामना भी है, तो कहना पड़ेगा कि सत्य की जिज्ञासा के नाम पर किसी असत् का ही भोग करना चाहते हैं ।

30.    हमने अपने में जो चाह पैदा कर ली है, यही हमारे और प्रभु के बीच में मोटा परदा कहो, चाहे गहरी खाई कहो, बन गयी है ।

(शेष आगेके ब्लागमें) - सन्त हृदयोद्गार पुस्तक से ।

Monday, 7 November 2011

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Monday, 07 November 2011
(कर्तिक शुक्ल द्वादशी, वि.सं.-२०६८, सोमवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
सन्त हृदयोद्गार

15.    सबसे बड़ा उपदेशक कौन है ? जो जीवन से उपदेश करता है । वह सबसे बड़ा वक्ता है, सबसे बड़ा पण्डित है, सबसे बड़ा सुधारवादी है । और सबसे घटिया कौन है ? जो परचर्चा करके उपदेश करता है । कभी व्यक्तियों की चर्चा, कभी परिस्थितियों की चर्चा ।

16.    कर्तव्यनिष्ठ होने से ही कर्तव्यपरायणता फैलती है, समझाने से नहीं, उपदेश करने से नहीं, शासन करने से नहीं, भय देने से नहीं, प्रलोभन देने से नहीं ।

17.    जहाँ तक संसार की सत्यता और सुन्दरता का भास है, वहाँ तक काम-ही-काम है ।

18.     जब साधक प्राप्त विवेक के द्वारा शरीर के वास्तविक स्वरूप का दर्शन कर लेता है, तब शरीर की सत्यता और सुन्दरता मिट जाती है । उसके मिटते ही काम का अन्त हो जाता है ।

19.    जो कुछ नहीं चाहता, वही 'प्रेम' कर सकता है और जो कुछ नहीं चाहता, वही 'मुक्त' हो सकता है ।

20.    मेरा अपना अब तक का अनुभव है कि जो हम चाहते हैं, वह न हो, इसी में हमारा हित है । हमने तो जब तक अपने मन की बात मानी है, अपने मन की बात की है, तो सिवाय पतन के, सिवाय अवनति के हमें तो कुछ परिणाम में मिला नहीं । ........मैं आपके सामने अपनी अनुभूति निवेदन कर रहा हूँ, और इससे लाभ उठाना चाहते हैं तो अपनी चाही मत करो । प्रभु की चाही होने दो । प्रभु वही चाहते हैं, जो अपने-आप हो रहा है ।

21.    किसी भी प्रकार की कामना न रखनेवाला 'राजाओं का राजा'; जो शक्ति प्राप्त है उससे कुछ कम कामना रखनेवाला 'धनी'; शक्ति के समान कामना रखनेवाला 'मजदूर'; शक्ति से अधिक कामना रखनेवाला 'कंगाल' है।

(शेष आगेके ब्लागमें) - सन्त हृदयोद्गार पुस्तक से ।

Sunday, 6 November 2011

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Sunday, 06 November 2011
(कर्तिक शुक्ल हरि प्रबोधिनी एकादशी, वि.सं.-२०६८, रविवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
सन्त हृदयोद्गार

7.    कुछ न करने से जीवन अपने लिए उपयोगी हो जाता है और सही करने से जीवन जगत् के लिए उपयोगी हो जाता है ।

8.    अपने लिए कुछ करना है - यह असत् का संग है ।

9.    यह मान लेना कि हम जब कुछ करेंगे, तभी कुछ मिलेगा, बिना किये कुछ नहीं मिलता है - इस धारणा में आस्था करना मानव को अविनाशी जीवन से विमुख करना है ।

10.    जो दिन-रात अपने अहम् के ही महत्व को बढ़ाता रहता है, दुनिया उसका मुँह देखना पसन्द नहीं करती ईमानदारी से ।

11.    'सबहिं नचावत राम गोसाईं'  - यह उस भक्त के हृदय की पुकार है कि जिसका अहंभाव मिट गया हो ।

12.    हमें अपने में से 'मैं सर्वहितैषी हूँ', 'मैं अचाह हूँ', अथवा 'मुझे अपने लिए संसार से कुछ नहीं चाहिए' - यह अहंभाव भी गला देना चाहिए यह तभी सम्भव होगा, जब सर्वहितकारी प्रवृति होने पर भी अपने में करने का अभिमान न हो और चाह-रहित होने पर भी 'मैं चाह-रहित हूँ' ऐसा भास न हो । कारण कि अहंभाव के रहते हुए वास्तव में कोई अचाह हो नहीं सकता; क्योंकि सेवा तथा त्याग का अभिमान भी किसी राग से कम नहीं है।

13.    अगर तुम दूसरों के लिए बोलते हो, दूसरों के लिए सुनते हो, दूसरों के लिए सोचते हो, दूसरों के लिए काम करते हो तो तुम्हारी भौतिक उन्नति होती चली जायगी । कोई बाधा नहीं डाल सकता । अगर तुम केवल अपने लिए सोचते हो तो दरिद्रता कभी नहीं जायगी ।

14.    मैं तो इस नतीजे पर पहुँचा हूँ कि हम सबका वर्तमान हम सबके विकास में हेतु है; चाहे दुःखमय है वर्तमान, चाहे सुखमय है।

(शेष आगेके ब्लागमें) - सन्त हृदयोद्गार पुस्तक से ।

Saturday, 5 November 2011

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Saturday, 05 November 2011
(कर्तिक शुक्ल दशमी, वि.सं.-२०६८, शनिवार)

सन्त हृदयोद्गार

1.    अगर आप भगवान को मानते हैं, तो उस मान्यता का परिचय हमारे आपके जीवन से हो, केवल विचारों से नहीं । हमारा जीवन बता दे कि हम भगवान को मानते हैं ।

2.    बहुत से लोग हैं जो प्रभु को मानते हैं । बहुत से लोग हैं जो संसार की वास्तविकता को जानते हैं । महत्व की बात यह है कि उस जाने हुए का प्रभाव कितना है जीवन में; उस माने हुए का प्रभाव कितना है जीवन में ।

3.     भगवान का स्मरण करने से जीव का कल्याण होता है - यह बात भी हम अच्छी तरह जानते हैं, फिर भी मन भगवान में नहीं लगता, तो इससे बढ़कर और नास्तिकता क्या होगी ?

4.    वस्तुविशेष में भगवद्बुद्धि होना कोई कठिन बात नहीं है । पर यह अधूरी आस्तिकता है । पूरी आस्तिकता का तो अर्थ यह है कि भगवान से भिन्न कुछ है ही नहीं । अभी भी नहीं है, पहले भी नहीं था और आगे भी नहीं होगा ।

5.    गहराई से देखिए, किसी का होना कुछ अर्थ नहीं रखता, जबतक कि उससे अपना सम्बन्ध न हो, और किसी से भी सम्बन्ध उस समय तक नहीं होता, जबतक कि उसकी आवश्यकता न हो ।   

6.    अगर आपको उनके (संसार के रचयिता के) बिना अनुकूलता प्रिय है, तो वह उसी प्रकार की है कि एक सुन्दर कमरा सजा है और आप दोस्त के बिना हैं; एक सुन्दर स्त्री श्रृंगार करे और पति से वंचित रहे, या शरीर आत्मा-रहित हो । आस्तिकवाद का न होना जीवन में अकेले पड़े रहने के समान है।

(शेष आगेके ब्लागमें) - सन्त हृदयोद्गार पुस्तक से ।