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Saturday, 4 January 2014

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Saturday, 04 January 2014 
(पौष शुक्ल चतुर्थी, वि.सं.-२०७०, शनिवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
व्यर्थ-चिन्तन और उसका दुष्परिणाम – 1

ईश्वरवादी हों, तो महाराज माफ करेंगे, अनीश्वरवादी हों, वे भी माफ करेंगे । भौतिकवादी भले ही हों, अध्यात्मवादी भले ही हों । सुख का भोगी दुःख से बचेगा नहीं, बचेगा नहीं । यह प्रभु का मंगलमय विधान है । तो मेरा चिन्तन क्या है ? आप जानते हैं, क्या है ? पहली बात, जैसा मैंने निवेदन की, कि आप प्राप्त का आदरपूर्वक स्वागत नहीं करते । एक और सूक्ष्म बात है, इससे भी सूक्ष्म, और वह है कि आप प्राप्त में प्रियता नहीं रखते । बड़ी सूक्ष्म बात है । नित्य उसे कहना चाहिये, जो नित्य प्राप्त है । और परिस्थिति उसे कहते हैं, जो मिली हुई है । मिले हुये का आदरपूर्वक स्वागत नहीं करते और नित्य प्राप्त में आत्मीयता नहीं करते, नित्य प्राप्त आपको प्यारा नहीं लगता । तो, जिसे नित्य प्राप्त प्यारा नहीं लगता, उसमें व्यर्थ का चिन्तन नहीं होगा, तो क्या होगा ? आपको नित्य प्राप्त क्या है? ईश्वरवादी को ईश्वर नित्य प्राप्त है, आत्मवादी को आत्मा नित्य प्राप्त है । शान्ति के पुजारी को शान्ति नित्य प्राप्त है । स्वाधीनता नित्य प्राप्त है, नित-नूतन रस नित्य प्राप्त है । किन्तु नित्य प्राप्त में आपकी प्रियता नहीं है, आत्मीयता नहीं है। मिले हुये का आप स्वागत नहीं करते । फिर आप व्यर्थ चिन्तन से बच नहीं सकते।

और आप जानते हैं कि बचने का क्या अर्थ होता है ? जो न कर सके, उसको तो करने की सोचे, और जो कर सके, उससे जान बचाये । क्या बतायें महाराज ! धन होता, तो दान दे देते । हमने कहा, भले आदमी, उसमें से कितना दे दिया जो पास में है ? जो है, उसमें से कितना दे दिया ? यह भी व्यर्थ-चिन्तन का हेतु है । जो कर सकेंगे, उसे करेंगे नहीं और जो नहीं कर सकेंगे, उसको करने की सोचते रहेंगे । तो यह व्यर्थ-चिन्तन प्राकृतिक दोष नहीं है । दोस्त ! बहुत गम्भीरता से सोचना । यह भूल-जनित है और सार्थक-चिन्तक, यह उपार्जित नहीं है, यह दैवी देन है । आप सार्थक चिन्तन को पुरुषार्थ के आधार पर प्राप्त करना चाहते हैं और व्यर्थ-चिन्तन को प्राकृतिक दोष मानकर उससे छुटकारा पाना चाहते हैं । नहीं पा सकते । यह बात, भैया मैं अपने विचार के आधार पर कहता हूँ । अगर आप पा सकते होते, तो मुझसे भी अकेले में बात कर लें । अगर मेरी भूल होगी, तो मैं आपकी बात मान लूँगा । परन्तु मेरे जानते, कोई भी भाई, कोई भी बहिन बलपूर्वक सार्थक-चिन्तन नहीं कर सकते, बलपूर्वक व्यर्थ-चिन्तन नहीं मिटा सकते ।


 - ‘प्रेरणा पथ' पुस्तक से, (Page No. 96-97) ।

Friday, 3 January 2014

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Friday, 03 January 2014 
(पौष शुक्ल द्वितीया, वि.सं.-२०७०, शुक्रवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
व्यर्थ-चिन्तन और उसका दुष्परिणाम – 1

दुःख आने पर भी हम दुःख के प्रभाव को नहीं अपनाते, सुख के चले जाने पर भी हम सुख की दासता को नहीं छोड़ते, फिर आप क्या सुख के हकदार हैं ? गौर तो करें जरा । जिन दिनों मेरा नाम विरक्त साधुओं में था, लँगोटी लगाये, नग-धड़ंग घूमता फिरता था । तब एक बार एक माँ ने, मैनपुरी के श्रीमन्नारायण अग्रवाल की माँ ने, देहली में मुझ से प्रश्न किया कि ईश्वर ने सृष्टि क्यों बनाई ? मैंने कहा - इससे आपको क्या परेशानी है ? उन्होंने कहा - नहीं, आपको बताना पड़ेगा । मैंने बड़ी ईमानदारी से कहा कि, “माँ, ईश्वर ने सृष्टि मेरे लिये बनाई” । यह सुनकर तो और भी चक्कर में पड़ गई । पुन: पूछा - ऐसी क्यों बनाई कि जिसमें इतना दुःख है? मैंने कहा -सृष्टिकर्ता ने ऐसा सोचकर उसे दुःखपूर्ण बनाया कि जिससे मैं ‘उसे’ भूल न जाऊँ । उसने सोचा, कहीं मुझे भूल न जाय, मुझसे अलग न हो जाय, इसलिये उसे दुःखमय बनाया । आप देख लीजिये, जीवन में आप देख लीजिये। जिस सृष्टी की आप निन्दा करते हैं, बुरा समझते हैं, उससे जब तक आप अपनी कामना पूरी नहीं करना चाहते, सृष्टी  आपको दिखती है क्या ? है किसी का अनुभव ? जब आप संकल्प पूरा करने का सुख भोगना चाहते हैं, तब सृष्टी  का भास होता है । अथवा निर्विकल्प स्थिति में सृष्टी का भास होता है ।

अच्छा, मैं आपसे पूछता हूँ कि अगर आप वह सृष्टि ऐसी बना देते हैं कि तुम्हारे सभी संकल्प पूरे हो जायँ, तो तुम न जाने कैसे संकल्प कर डालते। महाराज ! आपको अपने पर कंट्रोल है क्या ? देखिये, आपको बढ़िया सुख क्यों नहीं मिलता ? यह नहीं कि वह आपके भाग्य में नहीं । जरा ऊँचे दर्जे का दर्शन बोल रहा हूँ, घबड़ाना मत । इसलिये नहीं मिलता कि जो कह दिया, उसे करते नहीं । अगर तुम घटिया सुख को छोड़ सकते, तो बढ़िया मिले बिना रहता नहीं। आपके जीवन में अभिमान क्यों आता है ? केवल इसलिये आता है कि आप दूसरों को बुरा समझना बन्द ही नहीं करते । फिर अभिमान नहीं आयेगा ? आप भूखे क्यों रहते हैं ? इसलिये कि खिलाने में आपको मजा नहीं आता, खाने में मजा आता है । जितना दुःख आपके जीवन में है, वह एक मात्र सुख के प्रलोभन का नाश करने के लिये है । आपने तय कर लिया है कि हम सुख का अनुभव नहीं छोड़ेंगे । उधर विधान ने तय कर लिया है कि परिणाम-स्वरूप दुःख आपकी छाती पर चढ़े ।


 - (शेष आगेके ब्लाग में) ‘प्रेरणा पथ' पुस्तक से, (Page No. 95-96) ।

Thursday, 2 January 2014

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Thursday, 02 January 2014  
(पौष शुक्ल प्रतिपदा, वि.सं.-२०७०, गुरुवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
व्यर्थ-चिन्तन और उसका दुष्परिणाम – 1

आप जानते ही हैं कि अव्यक्त से व्यक्त की उत्पत्ति होती है, 'कुछ नहीं' से 'सब कुछ' बनता है । जिसमें यह सामर्थ्य है, क्या उसके पास कोई अभाव है ? जो सर्वदा है, सब कुछ जानता है, क्या वह बेसमझ है ? कदापि नहीं । इसलिये भाई मेरे ! व्यर्थ चिन्तन में प्रधान कारण है - प्राप्त परिस्थिति का आदरपूर्वक स्वागत न करना । यदि आप प्राप्त परिस्थिति का आदरपूर्वक स्वागत नहीं करते हैं, तो कभी व्यर्थ-चिन्तन से मुक्त नहीं हो सकते । जीवन का बहुत बड़ा भाग इसी चिन्ता में निकल जाता है - ऐसा क्यों हुआ ? ऐसा होता, तो अच्छा होता । ऐसा क्यों हुआ ? ऐसा होता, तो ठीक होता, और ऐसा, जो हम कहते हैं कि ऐसा क्यों हुआ ? इस के मूल में दुःख का भय छिपा रहता है, सुख का प्रलोभन छिपा रहता है । दुःख का भय और सुख के प्रलोभन को रखते हुये, क्या होना चाहिये - इसका निर्णय करना कभी भी सम्भव नहीं है । इसलिये भाई, जो मिला है - रुचि, योग्यता, सामर्थ्य, वस्तु परिस्थिति, अनुकूलता, प्रतिकूलता - कुछ लोग उसी से जीवन में आनन्द पाते हैं । बहुत से भाई -बहिनों ने मुझ से ऐसे प्रश्न भी किये हैं कि हम जिसके साथ भलाई करते हैं, वह हमारे साथ बुराई करता है । ऐसा क्यों ? अगर वे लोग अपने दिल से सोचें कि बुराई करने पर - जैसे, कल्पना करो, एक बाप कहता है कि मेरा बेटा मेरे साथ बुरा व्यवहार करता है - कोई भाई अपने पर इसी बात को घटा कर देखे। क्या मेरा भाई मेरे साथ अच्छा व्यवहार नहीं करता ? मैं भला करता हूँ वह बुरा करता है । इतने पर भी तो हजरते इंसान ! तुम्हारी यह दशा है, कि वह नालायक बेटा तुम्हें जितना प्यारा लगता है, लायक पड़ोसनी का लड़का उतना प्यारा नहीं लगता ।

जरा अपने दिमागी स्टैण्डर्ड के बारे में तो सोचिये कि उसकी क्या हालत है, हुजूर की ? यानी पड़ोसी के लायक बेटे की अपेक्षा आपको अपने नालायक बेटे को धन देना पसन्द है, कि जो आपका अपमान करता है और जिसकी आप शिकायत भी करते हैं । यह तो आपकी दशा है ! और प्रभु के न्याय की ओर देखिये कि वह प्रेम से कितना भरा है ! इतने पर भी जब हम ममता नहीं छोड़ सकते। और अगर राम जैसा आर्दश बेटा तुम्हें मिल - जाता, तो न जाने तुम्हारी क्या दशा होती, दोस्त ? कर्कशा नारी मिलने पर तो काम से रहित नहीं हो सकते। अगर सुन्दर नारी मिल जाती, तो क्या होता ? अपमान सहने पर भी देहाभिमान गला नहीं सकते । यदि सम्मान मिल गया होता, तो न जाने क्या होता ? पेट खराब होने पर भी बिना भूख के खा सकते हैं, यदि पेट ठीक होता, तो दुनियाँ को खा जाते क्या ? तात्पर्य यह है भाई ! कि जिसने आपको जो कुछ दिया है, वह तुम्हारे हित को सामने रख कर ही दिया है, आपके कामों का दंड नहीं दिया है । मैं आपसे निवेदन कर दूँ । मानव से इतर योनियों में क्या होता है, मैं नहीं जानता। परन्तु मानव को प्रभु दण्ड नहीं देता, विधान मानव को दंड नहीं देता, तो फिर क्या देता है ? जिस परिस्थिति से आपका विकास होता है, वही परिस्थिति आपको देता है ।


 - (शेष आगेके ब्लाग में) ‘प्रेरणा पथ' पुस्तक से, (Page No. 93-95) ।

Wednesday, 1 January 2014

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Wednesday, 01 January 2014  
(पौष अमावस्या, वि.सं.-२०७०, बुधवार)

व्यर्थ-चिन्तन और उसका दुष्परिणाम – 1

मानव सेवा संघ की सत्संग-योजना में जीवन है, और वह एक है । रुचि, योग्यता, सामर्थ्य, परिस्थिति का भेद होने से साधन में भेद का होना सर्वथा स्वाभाविक है । परन्तु माँग के रूप में तथा उसकी प्राप्ति के फल में, जीवन की उपलब्धि में, कोई अन्तर नहीं है, अर्थात् साधन में भेद होने पर भी साध्य की प्राप्ति में कोई अन्तर नहीं है । रुचि के आधार पर साधन एक नहीं है, परिस्थिति के आधार पर साधन एक नहीं है; किन्तु मानव होने के नाते जब हम सब एक हैं, तो हम सब की अन्तिम माँग भी एक है और अन्तिम उपाय भी एक है । 'अन्तिम उपाय' की बात सुनकर यह मत सोच बैठना कि मैं व्यक्तिगत भिन्नता मानने पर भी यह बात क्यों कहता हूँ । सोचिये, अन्तिम उपाय क्या है ? यही न, कि हम लोगों के जीवन में से व्यर्थ-चिन्तन का नाश हो जाय । व्यर्थ-चिन्तन का अर्थ क्या है ? मेरे भाई ! जो आपके न चाहने पर होता है, आपके न करने पर होता है, ऐसा जो चिन्तन है, वह 'व्यर्थ-चिन्तन' है । एक बात । दूसरी बात यह है कि जिसकी प्राप्ति कर्म-सापेक्ष है, उसका चिन्तन व्यर्थ-चिन्तन है । तीसरी बात यह है कि जिसका स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है, उसका चिन्तन व्यर्थ-चिन्तन है । इस व्यर्थ-चिन्तन से सभी साधकों को चाहे वे भौतिकवादी हों, चाहे वे अध्यात्मवादी हों, चाहे वे ईश्वरवादी हों, बचना है। क्यों बचना है ? इसलिये कि व्यर्थ-चिन्तन के रहते हुये न तो शान्ति मिलती है और न स्वाधीनता मिलती है । इतना ही नहीं, मिली हुई सामर्थ्य का ह्रास भी होता है और यह बड़ी भारी क्षति है ।

क्या आप नहीं जानते, कि प्राकृतिक-विधान के अनुसार जिस भाई को जो सामर्थ्य मिली है, जो योग्यता मिली है, जो परिस्थिति मिली है वह उसकी आवश्यकता के अनुसार ठीक-ठीक ही मिली है, अधिक नहीं मिली, कम नहीं मिली । जितनी योग्यता से हमारा विकास हो सकता है, जितनी सामर्थ्य से हमारा विकास हो सकता है, जिस परिस्थिति में हमारा विकास हो सकता है, हमें वही सब मिला है । मानव-सेवा-संघ के दर्शन में मिले हुए का आदरपूर्वक स्वागत करना है, उससे खीजना नहीं है । जिसने दिया है, उसने हम लोगों से लिया कुछ नहीं, दिया ही दिया है । तो बिना लिये जो देता है, वह आवश्यकता के अनुसार ही देता है, यह प्राकृतिक सत्य है । लेने की आशा से जो कोई देता है, वह भूल कर सकता है । किन्तु जिसने बिना किसी आशा के केवल दिया ही दिया है, लिया कुछ नहीं, उसके देने में क्षोभ नहीं है, क्रोध नहीं है, संकीर्णता नहीं है, बेसमझी नहीं है, असावधानी नहीं है, अपितु ठीक-ठीक सजगतापूर्वक सावधानीपूर्वक, विधिवत दिया है । आप कहें, कि हम कैसे मानें कि यह ठीक है ? यही प्रश्न कोई मुझसे आज से लगभग  50 वर्ष पहले करता, तो मेरा भी यही उत्तर होता । सोचता कि  'नहीं-नहीं', देने वाले को अक्ल ही नहीं है, दुनियाँ के शब्दों में एक होनहार बालक को, जो पढ़ना चाहता था, अन्धा बना दिया, इत्यादि ऐसा मैं सोचता। परन्तु आज मैं बड़ी ही ईमानदारी से कहने के लिये तत्पर हूँ कि मुझे अन्धा बनाना किसी की मेरे लिये अगाध आत्मीयता और प्रियता का ही शुभ परिचय है। आज का मानव उसी को कोसता है, जो उसका इतना अपना है कि जितना वह स्वयं भी अपना नहीं है ।


 - (शेष आगेके ब्लाग में) ‘प्रेरणा पथ' पुस्तक से, (Page No. 92-93) ।

Tuesday, 31 December 2013

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Tuesday, 31 December 2013 
(पौष कृष्ण चतुर्दशी, वि.सं.-२०७०, मंगलवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
व्यर्थ-चिन्तन का स्वरूप और माँग की पूर्ति – 2

        क्या हम मिले हुये की ममता नहीं छोड़ सकते ? अप्राप्त वस्तु अवस्था आदि की कामना नहीं छोड़ सकते ? क्या हम सुने हुये प्रभु को अपना नहीं मान सकते ? क्या हम अवस्थातीत जीवन में आस्था नहीं कर सकते ? कर सकते हैं । तो, जो कर सकते हैं, उसको न करें और जो नहीं कर सकते हैं, उसको करने का प्रयास करें, यही तो मूल भूल है । इस भूल का अन्त आप कर सकते हैं और शान्ति के द्वारा कर सकते हैं । क्योंकि शान्ति प्राप्त होने पर आपके जीवन में सजगता अपने आप आयेगी, अपने आप सामर्थ्य आयेगी । अपने आप आपकी जो वास्तविक माँग है, उसकी जागृति होगी - स्मृति के रूप में । अब प्रश्न केवल इतना रह जाता है कि हम सभी साधक 'साधक' होने के नाते, आवश्यक कार्य पूरा करें, अनावश्यक कार्य का त्याग करें, और कार्य के अन्त में शान्ति का सम्पादन सहज भाव से होने दें। जैसे-जैसे शान्ति का सम्पादन सबल और स्थायी होता जायगा, वैसे-ही-वैसे आवश्यक सामर्थ्य की अभिव्यक्ति, विचार का उदय, प्रीति की जागृति स्वत: होगी । यही है - अखण्ड स्मृति । अखण्ड स्मृति से निराश नहीं होना है । वह आपका अपना जीवन है । वह आपकी अपनी निज की सम्पत्ति है । स्मृति ही तो जीवन है । आप सोचिये कि स्मृति से भिन्न क्या प्रियता कोई अन्य वस्तु है? स्मृति से भिन्न क्या बोध कोई और वस्तु है ? स्मृति से भिन्न क्या प्राप्ति कोई और वस्तु है ? नहीं है । स्मृति का ही रूप है बोध, स्मृति का ही रूप है प्राप्ति, स्मृति का ही रूप है अगाध प्रियता ।

इस दृष्टि से जब आप विचार करेंगे, तो ज्ञात होगा कि व्यर्थ-चिन्तन के नाश में ही अखण्ड स्मृति है, और अखण्ड स्मृति की जागृति में ही जीवन की पूर्णता है । इस पूर्णता से हमें निराश नहीं होना है, अपितु इस पूर्णता के लिये नित-नव उत्कट लालसा जगाना है । लालसा कब जागेगी ? जब आप इस बात को स्वीकार करेंगे कि हम सभी को अखण्ड स्मृति प्राप्त हो सकती है, व्यर्थ चिन्तन मिट सकता है । पर उसके लिये जाने हुए के प्रभाव की आवश्यकता है । किये हुए का प्रभाव, किये हुए के द्वारा नाश नहीं होता । होता क्या है ? जिस भाई ने गुजराती दाल खाई होगी, वह जानता है कि गुजराती दाल में गुड़ भी पड़ता है, नमक भी पड़ता है और खटाई भी पड़ती है । ये तीनों ही चीजें अपना-अपना स्वाद रखती हैं । एक के द्वारा दूसरे का नाश नहीं होता । इसी प्रकार किये हुए का प्रभाव किये हुए से नाश नहीं होता । यह दार्शनिक सत्य है । यदि आप महानुभाव विचार करेंगे, तो आपका यह अपना सत्य मालूम होगा । इसलिये मेरा नम्र निवेदन है भाई, कि जो आपके बिना किये हो रहा है, बिना चाहे हो रहा है, उससे भयभीत न हों, उसका सुख न लें, उसमें तादात्म्य न जोड़ें, अपितु उससे असहयोग करें और जो सदैव आपका अपना है, उसमें चाहे आत्मीयता करें और चाहे उसकी खोज करें । देखिये, खोज और आत्मीयता - ये दोनों ही स्वतंत्र पथ हैं। विचारक खोज करते हैं, श्रद्धावान् आत्मीयता स्वीकार करते हैं । किन्तु दोनों प्रकार के पथ के अनुसरण करने के लिये मिले हुये की ममता का त्याग, अप्राप्त वस्तु की कामना का त्याग, मिले हुये के दुरुपयोग का त्याग अनिवार्य है । इस दृष्टि से हम सब व्यर्थ-चिन्तन से मुक्त होकर, अखण्ड स्मृति से अभिन्न होकर, कृतकृत्य हो सकते हैं । यह निर्विवाद सत्य है ।


 - ‘प्रेरणा पथ' पुस्तक से, (Page No. 90-92) ।

Monday, 30 December 2013

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Monday, 30 December 2013 
(पौष कृष्ण त्रयोदशी, वि.सं.-२०७०, सोमवार)

व्यर्थ-चिन्तन का स्वरूप और माँग की पूर्ति – 2

परम उदार प्रभु ने मानव का निर्माण केवल इसलिए किया है कि उसे कोई अपना कहे । आप कहेंगे, क्यों भाई ! अपना कहने में अपने के प्रति कितनी गहरी प्रियता जाग्रत होती है ? इसे वे ही जानते हैं, जिन्होंने किसी को अपना कहा है । पर, किसे अपना कहना है ? जिसे देखा नहीं है। किसे अपना कहना है ? जिसे सुना है । सुने हुए की आत्मीयता में ही प्रियता है, और देखे हुये की निर्ममता में ही निर्विकारता है । मिले हुये की असंगता में ही स्वाधीनता है । इस दृष्टि से निर्विकारता, स्वाधीनता, प्रियता प्रत्येक भाई को प्रत्येक बहिन को मिल सकती है और इसी जीवन में मिल सकती है इसी परिस्थिति में मिल सकती है । इसमें लेशमात्र भी सन्देह नहीं करना चाहिये। तात्पर्य केवल इतना है कि व्यर्थ-चिन्तन और अखण्ड स्मृति, ये दोनों एक ही जीवन में हैं, अर्थात् एक ही सिक्के के दो पहलू हैं । ममता, कामना, तादात्म्य के आधार पर व्यर्थ-चिन्तन की उत्पत्ति और आत्मीयता के द्वारा अखण्ड स्मृति की जागृति स्वत: होती है । यह ऐसी बात नहीं है, जिस पर आप केवल श्रद्धा करके रह जायँ । यह तो ऐसी बात है कि उसको अपना कर अनुभव करें । इस बात का अनुभव करें कि आपका अपना कोई है नहीं । यदि नहीं है, तो क्या आप अकेले नहीं रह सकते हैं ? यदि अकेले नहीं रह सकते, तो कोई आपका अवश्य है । परन्तु आस्था उसमें न हो, जो आपके न चाहने पर चला जाय, बुलाने पर भी न आये। क्या उसमें ममता करें ? ऐसा करते हैं, तो यह हमारी अपनी भूल है ।

सोचिए, अज्ञान है क्या ? अविद्या है क्या ? जाने हुए का अनादर, न जानना नहीं । आप जानते हैं कि जो मिला है, वह आपका व्यक्तिगत नहीं है। आप जानते हैं कि जो मिला है वह 'पर' के लिये है, 'स्व' के लिये नहीं है । किन्तु फिर भी जो अपना नहीं है, उसे अपना मानते हैं । जो  'पर' के लिये है, उसे अपने लिये सँभाल कर रखते हैं । इसी भूल का परिणाम है कि आप व्यर्थ-चिन्तन में आबद्ध हो गये । मेरे भाई ! जो सदैव अपना है, न मानने पर भी अपना है, न जानने पर  अपना है; परन्तु उसको अपना मानने की सामर्थ्य कहाँ चली गई? मेरा निवेदन है कि अखण्ड स्मृति के बिना नीरसता नहीं जायगी, पराधीनता का नाश नहीं होगा, अशान्ति का नाश नहीं होगा । अखण्ड स्मृति के बिना यह सम्भव नहीं है। और अखण्ड स्मृति निर्ममता-निष्कामतापूर्वक आत्मीयता से ही साध्य है ।


 - (शेष आगेके ब्लाग में) ‘प्रेरणा पथ' पुस्तक से, (Page No. 89-90) ।

Sunday, 29 December 2013

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Sunday, 29 December 2013 
(पौष कृष्ण द्वादशी, वि.सं.-२०७०, रविवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
व्यर्थ-चिन्तन का स्वरूप और माँग की पूर्ति – 1

आज एक प्रथा चल पड़ी है - कब से चली है, यह तो मैं नहीं कह सकता । किन्तु प्रथा है अवश्य। उसे अनादि तो मैं नहीं कह सकता; किन्तु ऐसी प्रथा है, कि जब कोई व्यर्थ-चिन्तन उत्पन्न हो जाय, तब बलपूर्वक आप किसी अन्य चिन्तन को करना आरम्भ कर दे । ऐसा प्राय: हम सभी ने किया है, और बहुत से लोग करते भी हैं। परन्तु बलपूर्वक किये हुए इस चिन्तन का भी प्रभाव अंकित होता जाता है, और जो किया हुआ है, उसका भी चिन्तन होता रहता है । हम अपना मनोनीत रुचिकर चिन्तन करते रहते हैं और किये हुए का चिन्तन अपने आप होता रहता है। इस स्थिति में हम अपने में एक मिथ्या अभिमान और लाद लेते हैं कि हमने इतनी देर बैठकर जप किया, ध्यान किया, पाठ किया । और जब दो साधक आपस में दिल खोलकर मिलते हैं, तब आपस में यही कहते हैं - क्या बतायें, अभी हमारा मन शान्त नहीं हुआ, शुद्ध नहीं हुआ, स्वस्थ नहीं हुआ । एक ओर बलपूर्वक किये हुए चिन्तन का अभिमान, दूसरी ओर व्यर्थ-चिन्तन होने की व्यथा । इस द्वन्द्वात्मक स्थिति से, मेरे जानते, सभी साधक परिचित हैं । ऐसा करते-करते आयु का बहुत बड़ा भाग बीत गया । परन्तु  रोग की निवृत्ति नहीं हुई ।

इस व्यथा से जब कोई साधक पीड़ित हुआ, तब 'उसने' जिसे हम नहीं जानते हैं, जो हमें जानता है, जो सदैव रहेगा, तब भी जब 'यह' नहीं रहेगा, उसने जो इसका आश्रय है, प्रकाशक है - उसको प्रकाश दिया । और प्रकाश यह दिया कि भाई, तुम यह जानते हो कि तुम कर नहीं रहे हो, हो रहा है, चाहते नहीं हो, फिर भी हो रहा है, और तुम उसे देख रहे हो, वह तुम्हारा दृश्य है । और तुम यह भी जानते हो कि कोई दृश्य ऐसा नहीं है, जिसमें सतत परिवर्तन न हो, जिसका विनाश न हो, जिसका अन्त न हो । जब तुम यह जानते हो, तो सतत परिवर्तन होने वाले दृश्य से इतने भयभीत क्यों होते हो ? मेरे अपने मित्र, साथी ! तु अभय हो जा । भय मत कर । उससे तादात्म्य मत जोड़, उसका सुख मत ले । जिससे आप तादात्म्य तोड़ देते हैं, जिससे आप भयभीत नहीं होते हैं, जिससे आप सुख नहीं लेते हैं, वह अपने आप सदा के लिये आपसे अलग हो जायगा । और तुम बिना ही प्रयत्न के स्वत: उस अचिन्त दशा को प्राप्त करोगे, जो तुम्हारी माँग है। किन्तु मेरे प्यारे ! जब अचिन्तता तुम्हारे मन में आ जाय, तब उसे अपना आश्रय मत बनाना, उसको अपनी खुराक मत बनाना, उससे भी तादात्म्य मत जोड़ लेना। तब, अपने आप उसकी स्मृति जागेगी, जो वास्तव में सदैव आपका अपना है । प्रिय की स्मृति अन्य की विस्मृति कराने में समर्थ है । अन्य की विस्मृति दूरी और भेद मिटाने में हेतु है । दूरी के नाश में ही योग की अभिव्यक्ति, भेद के नाश में ही बोध की अभिव्यक्ति और भिन्नता के नाश में ही प्रेम की अभिव्यक्ति होती है। इस दृष्टि से प्रत्येक भाई, प्रत्येक बहिन बड़ी ही सुगमतापूर्वक योग, बोध और प्रेम से अभिन्न हो, कृतकृत्य हो सकते हैं । यह है उस अनन्त का दिया हुआ प्रकाश। जिसका यह प्रकाश है, वह उसका भी है, जो उसे मानता है और उसका भी है, जो उसे नहीं मानता । उसके न मानने पर भी वह उतना ही आपका है, जितना उसका है, जो उसे मानता है । अथवा जितना वह अपना है, उतना ही आपका है उस समय भी, जब उसे नहीं मानते । ऐसे उदार ने मानव का निर्माण किया है ।


 - ‘प्रेरणा पथ' पुस्तक से, (Page No. 87-89) ।

Saturday, 28 December 2013

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Saturday, 28 December 2013 
(पौष कृष्ण दशमीं, वि.सं.-२०७०, शनिवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
व्यर्थ-चिन्तन का स्वरूप और माँग की पूर्ति – 1

साधकगण गम्भीरता से विचार करें । आपके द्वारा किये हुए कृत्य का परिणाम कोई दूसरा भोगे और उस पर आप आरोप लगावें तो इसमें आपकी बड़ी भारी भूल है। उस भूल को सामने रखकर जब मैं विचार करता हूँ तो मुझे तो स्पष्ट मालूम होता है कि जिसे लोग मन की चंचलता के नाम से कहते हैं, वह एक वर्तमान वस्तुस्थिति है और इसी का नाम व्यर्थ-चिन्तन है । किन्तु जब आप अपनी ओर देखेंगे, तो उस व्यर्थ-चिन्तन के साथ-साथ आपके जीवन में जो आपकी वास्तविक माँग है, उसकी स्मृति भी मौजूद है । परन्तु यह स्मृति बहुत शिथिल है, और व्यर्थ-चिन्तन बहुत सबल है । इस भयंकर परिस्थिति में हमें क्या करना चाहिये ? यही आज का मूल प्रस्तावित विषय है ।

महानुभाव ! धीरजपूर्वक विचार करें । जिस समय आप अपने व्यक्तित्व में अपनी बुद्धि-दृष्टि के द्वारा किये हुए का चिन्तन पाते हैं, उस समय आप यह भी जानते हैं कि यह चिन्तन हमारे न चाहने पर भी हो रहा है । हम नहीं चाहते थे कि किये हुए की पुनरावृत्ति जीवन में हो; किन्तु हमारे न चाहने पर भी ऐसा हो रहा है । यह आप सभी भाई-बहिन जानते हैं । दूसरी बात यह है कि हम कर नहीं रहे हैं, वह स्वत: हो रहा है । इतना ही नहीं, हम चाहते तो हैं कि चिन्तन न हो, किन्तु हमारे न चाहने पर भी, न करने पर भी चिन्तन दिखाई देता है । यह क्या है? यह वही बात है, जैसे निर्मल दर्पण में आप अपना चित्र देखते हैं । मन रूपी निर्मल दर्पण में आप अपने पूर्व कृत्य के चित्र को देखते हैं । अथवा भविष्य में जो करना चाहते हैं, उसको देखते हैं । तात्पर्य यह है कि जो कार्य जमा है, उसे देखते हैं, जो कर चुके हैं, उसे देखते हैं । और ऐसा जो आप देखते हैं, वह आपको अच्छा क्यों नहीं लगता ? वह इसलिये अच्छा नहीं लगता कि जो कर चुके हैं, उसके परिणाम से आप परिचित हैं । उसका परिणाम क्या है ? न वह वस्तु है, न वह परिस्थिति है, न वह अवस्था है, जिसमें उसका चिन्तन किया गया । केवल उसका चिन्तन मात्र है । और चिन्तन आपके जीवन में उस स्मृति को ढक लेता है, जो किसी की प्रियता है, जो किसी का बोध है, जो किसी का योग है ।


 - (शेष आगेके ब्लाग में) ‘प्रेरणा पथ' पुस्तक से, (Page No. 86-87) ।

Friday, 27 December 2013

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Friday, 27 December 2013 
(पौष कृष्ण नवमीं, वि.सं.-२०७०, शुक्रवार)

व्यर्थ-चिन्तन का स्वरूप और माँग की पूर्ति – 1

उपस्थित महानुभाव तथा भाई और बहिन ! हम सब मानव होने के नाते साधक हैं । साधक उसको कहते हैं जिसका कोई साध्य है, जिसकी कोई माँग है और जिस पर कोई दायित्व है । अब विचार यह करना है कि हमारी जो माँग है क्या हमें उसका भलीभाँति अनुभव है ? यदि अनुभव है, तो माँग की जाग्रति में ही काम की निवृत्ति होती है, अर्थात माँग की जागृति से मानव अकाम हो जाता है, अपनी आवश्यकता का अनुभव करने पर। आवश्यकता का अनुभव कब होता है ? जब हम अपनी वर्तमान वस्तु-स्थिति से परिचित होते हैं, और वर्तमान वस्तुस्थिति से परिचित कब होते हैं ? जब कार्य के आदि और अन्त में हम शान्त रहने का स्वभाव बनाते हैं । जब तक हम आवश्यक कार्य को पूरा करके और अनावश्यक कार्य का त्याग करके शान्त नहीं हो जाते, तब तक हमें अपनी वस्तु-स्थिति का यथेष्ट परिचय नहीं होता । और जब हम अपनी वस्तु-स्थिति से ही अपरिचित रहते हैं, तब हमारी माँग क्या है, हम पर दायित्व क्या है, यह प्रश्न जीवन का प्रश्न नहीं होता, वर्तमान का प्रश्न नहीं होता।

आप सभी भाई-बहिनों को इस बात का अनुभव होगा कि जब आप थोड़ी देर के लिये भी श्रमरहित होते हैं, अहंकृति-रहित होते हैं, तब अपनी वर्तमान वस्तुस्थिति में आगे-पीछे का चिन्तन पाते हैं । आगे-पीछे के चिन्तन का अर्थ क्या है ? उसका अर्थ है, जो कर चुके हैं, उसका चिन्तन, अथवा जो करना चाहते हैं, उसका चिन्तन ।

गम्भीरता से विचार करें । जो कर चुके हैं वह स्वरूप से विहीन है और जो करना चाहते हैं, वह भी वर्तमान में उपस्थित नहीं है । इससे यही सिद्ध हुआ न, कि व्यर्थ-चिन्तन के रूप में जिस वस्तु, व्यक्ति, परिस्थिति, अवस्था आदि का चिन्तन हो रहा है, वह वर्तमान में नहीं है, अर्थात 'नहीं' का चिन्तन ही व्यर्थ-चिन्तन है । इस दशा को ही कुछ लोग अपनी भाषा में कहते हैं - मन की चंचलता । मन की चंचलता कहो, अथवा व्यर्थ-चिन्तन कहो, यह एक दशा है। और दशा के मूल में भूल यह है कि जो वर्तमान में नहीं है, उसका जब चिन्तन होता है, तब हम उस होने वाले चिन्तन के प्रभाव से या तो भयभीत हो जाते हैं या उसका सुख लेने लगते हैं । इतना ही नहीं, उससे इतने तद्रूप हो जाते हैं और कहने लगते हैं - क्या बतायें, हमारा मन बड़ा खराब है, वह इधर-उधर की बातें सोचता है । परन्तु यहाँ पर गम्भीरता से विचार करना है कि मन क्या कोई स्वतन्त्र कर्त्ता है ? कोई लेखक कहे कि कलम बहुत खराब है, हम नहीं चाहते, पर वह अपने आप लिखने लगती है । यदि ऐसा कोई लेखक कहे, तो आप क्या निर्णय देंगे ? यही न कहेंगे, मालूम होता है, उसका मस्तिष्क ठीक नहीं है । क्योंकि कलम तो लिखने का साधन है, करण है । क्या कलम लेखक है ? लेखक स्वयं लिखता है, और कहता है, कलम लिखती है । इसी प्रकार अपने किये हुए का प्रभाव अपने में अंकित है, अथवा जो हम करना चाहते हैं, उसका प्रभाव अपने में अंकित है । और जब वह प्राकृतिक नियम के अनुसार हमारे न चाहने पर भी विश्राम काल में उत्पन्न होता है, तब हम अपने उस प्रभाव को मन की चंचलता के नाम से कहने लगते हैं । इतना ही नहीं, बड़े-बड़े धुरन्धर लोगों ने मन की बड़ी घोर निन्दा की है । किन्तु मन यदि हमारी तरह बात करता होता, उसका स्वतन्त्र व्यक्तित्व होता, तो मेरे जानते, वह आपको ऐसी बात नहीं करने देता । परन्तु वह तो बेचारा कर्त्ता है नहीं, कर्त्ता तो आप हैं । इसलिये आप मनमाने ढंग से अपने ही मन की, अपने ही द्वारा निन्दा करते रहते हैं, और उस कृत्य को आप अपनी समझदारी समझते हैं । सोचते हैं, हम बड़े अच्छे आदमी हैं, हम अपने मन की बुराई कर सकते हैं, और हम मन के दोषों को जानते हैं ।


 - (शेष आगेके ब्लाग में) ‘प्रेरणा पथ' पुस्तक से, (Page No. 84-86) ।

Thursday, 26 December 2013

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Thursday, 26 December 2013 
(पौष कृष्ण अष्टमी, वि.सं.-२०७०, गुरुवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
वर्तमान निर्दोषता में आस्था - 2

आप जानते हैं, दिखाई वह चीज देती है, जो दूर हो । जो चीज दूर होती है, वही दिखाई देती है । जो भिन्न होती है, वह भासित होती है। अगर किसी को अपने में ईमानदारी दिखाई देती है, तो कम से कम वह उससे दूर जरूर है; अगर भासित होती है, तो भिन्न जरूर है । जो चीज अभिन्न हो जाती है, जो चीज प्राप्त हो जाती है, वह न दिखाई देती है, न उसका भास होता है। इसलिये मेरे भाई, अगर हमें अपना दोष दिखाई देता है, तो हम उससे अलग जरूर हैं, भिन्न जरूर हैं । तो देखना किसको है ? अपने दोष को, पर हम देखते क्या हैं ? पराये को, पराये दोष को और पराये को देखते ही हम दोषी हो जाते हैं और अपने दोष को देखते ही निर्दोषता की ओर अग्रसर होते हैं । अब आप सोचिये, पर-दोष दर्शन में क्या लाभ है और निज दोष-दर्शन में क्या लाभ है? आपको मानना ही पड़ेगा कि पर-दोष-दर्शन के समान अपनी कोई क्षति नहीं है और निज-दोष-दर्शन के समान अपना कोई लाभ नहीं है । इस दृष्टि से जब हम लोग अपने-अपने सम्बन्ध में विचार करेंगे, तब बड़ी ही सुगमतापूर्वक जो मानव-जीवन का चरम लक्ष्य है, जो मानव-जीवन की महिमा है कि हम अपने लिए, जगत् के लिए, प्रभु के लिए उपयोगी हो सकते हैं, वह प्रत्यक्ष हो जायगी । इसमें लेशमात्र भी सन्देह नहीं है ।

आप जानते हैं ? आज यदि कोई यह कहे कि हम भूतकाल के आधार पर किसी निर्दोष को अपना मित्र बनाना चाहते हैं, तो उसे निराश होना पड़ेगा। भगवान् यदि यह विधान बनायें कि हमें ऐसा भक्त चाहिए, जिसका भूतकाल सर्वांश में निर्दोष रहा हो, तो भगवान को अकेला ही रहना पड़ेगा । परन्तु आप जानते हैं, कि प्रभु पतित-पावन हैं । इसका मतलब क्या यह नहीं हुआ कि हम पतित से दोस्ती कर सकते हैं, पतित के साथ सम्बन्ध जोड़ सकते हैं ? परन्तु कब? जब वर्तमान निर्दोषता में आस्था रखे, तब । देखिये, न्याय का अर्थ क्या है? न्याय का अर्थ है अपने अपराध से परिचित होना । न्याय का यह पहला अंग है। दूसरा अंग है, उससे पीड़ित होना । उसका तीसरा अंग है, अपराध को न दोहराने का निर्णय करना । यह हुआ न्याय । इसका फल है, निर्दोषता के साथ अभिन्नता। उसका फल है, जीवन का उपयोगी सिद्ध होना । इस प्रकार का न्याय प्रत्येक भाई, प्रत्येक बहिन अपने साथ कर सकने में समर्थ हैं । अपने प्रति किया हुआ न्याय अपने को निर्दोषता से अभिन्न करता है और आप जानते हैं, कि निर्दोष जीवन में ही आवश्यक सामर्थ्य की अभिव्यक्ति होती है, निर्दोष जीवन में ही निस्न्देहता के लिए विचार का उदय होता है और निर्दोष जीवन में ही प्रेम का प्रादुर्भाव होता है ।

इस दृष्टि से यह निर्विवाद है कि सर्वतोमुखी विकास एक मात्र निर्दोष जीवन में ही निहित है और उसका उपाय है - की हुई भूल को न दोहराना, जानी हुई बुराई को न करना, अपने दोषों को देखना और निर्दोषता की स्थापना कर निश्चिन्त तथा निर्भय हो जाना । यही अचूक उपाय है अपने को सफल बनाने का। यदि आपको यह उपाय जँचे, रुचे तो आप उसको अपनायें और उसको अपनाकर मानव-जीवन के महत्त्व को अनुभव करें । अपने को अपने लिए, जगत् के लिये, प्रभु के लिये उपयोगी बनाकर कृतकृत्य हो जायँ, यही मेरी सद्भावना है।


 - ‘प्रेरणा पथ' पुस्तक से, (Page No. 82-84) ।

Wednesday, 25 December 2013

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Wednesday, 25 December 2013 
(पौष कृष्ण सप्तमी, वि.सं.-२०७०, बुधवार)

वर्तमान निर्दोषता में आस्था - 2

आप स्वयं अपने सम्बन्ध में देखें कि क्या कारण है कि लोग मेरी ईमानदारी को, मेरी सहृदयता को, मेरी उदारता को महत्त्व नहीं देते? मेरे जानते, जिस गुण के साथ अहं लग जाता है, वह गुण भयंकर दोष में बदल जाता है । इसलिए भाई, मानव होने के नाते आपका जो महत्त्व है, वह वैभव होने के नाते नहीं है । वैभव वह रस नहीं दे सकता, जो रस मानवता में है, जो जीवन मानवता में है । जो महत्ता मानवता में है, वह महत्ता आपको किसी की उदारता से कभी भी नहीं मिल सकती, यह निर्विवाद सत्य है । इसलिये भाई, आप बड़े ही सुन्दर हैं ।

क्यों ? इसलिये कि आपका वर्तमान निर्दोष है, यों । आप जानते हैं अपनी भूल को, आप छोड़ सकते हैं अपनी भूल को । जब आप अपनी भूल को जानकर उसे छोड़ सकते हैं और वर्तमान आपका निर्दोष है, तो बताइये, आपको और क्या चाहिए ? आप तो सुन्दर हैं ही, इसमें कोई सन्देह थोड़े ही है । लेकिन यदि आप अपनी वर्तमान निर्दोषता को सुरक्षित नहीं रख रकते, की हुई भूल को दोहराना ही चाहते हैं, जानी हुई बुराई को करना ही चाहते हैं तो दुनियाँ में किसी की शक्ति नहीं है, जो आपको शान्ति दे सके, जो आपको प्रसन्न रख सके । आपकी शान्ति आपके अधीन है, आपकी प्रसन्नता आपके अधीन है, आपकी महिमा आपके अधीन है । यह स्वाधीनता मंगलमय विधान से प्रत्येक भाई को, प्रत्येक बहिन को मिली है । इस मिली हुई स्वाधीनता का आदर करें, उपयोग करें । आप अपने को दूसरों की दृष्टि में जैसा देखना चाहते हैं, अपनी दृष्टि में हो जायेंगे । यह कसौटी है कि जब हम अपनी दृष्टि में सुन्दर हो जाते हैं, तब सुन्दर कहलाने की रुचि नाश हो जाती है । आज यदि हम चाहते हैं कि लोग हमें भला समझें, तो उसका अर्थ है कि हम सचमुच उतने भले नहीं हैं । लोग तो भला समझते ही हैं, लोग तो भला समझेंगे ही; किन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि हम भले हो गये । भले होने की कसौटी यह है - भले कहलाने की रुचि नाश हो जाय, जीवन में यह प्रश्न ही न आये कि लोग हमें भला समझें । जिसे यह मालूम होता है कि मैं ईमानदार हूँ लोग मुझे ईमानदार मानें, तो समझना चाहिए कि इसमें कोई बेईमानी छिपी हुई है ।


 - (शेष आगेके ब्लाग में) ‘प्रेरणा पथ' पुस्तक से, (Page No. 81-82) ।

Tuesday, 24 December 2013

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Tuesday, 24 December 2013 
(पौष कृष्ण सप्तमी, वि.सं.-२०७०, मंगलवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
वर्तमान निर्दोषता में आस्था - 2

आप मानव है, आपकी बड़ी महिमा है, आपका बड़ा महत्त्व है आप बड़े सुन्दर हैं । परन्तु मेरे भाई, वह कौनसी घड़ी होगी, जब आपके लिये पराधीनता की वेदना असह्य होगी, जब आप पराधीनतापूर्वक रहना सहन न कर सकें ? पराधीनता इस बात में नहीं है कि मैं भूखा हूँ, मुझे भोजन नहीं मिलता । ऐसी पराधीनता पराधीनता नहीं है । निर्णय कर लो, प्यारे भोजन! यदि तुम्हारे बिना शरीर नाश हो सकता है, तो तुम भी मेरे बिना सड़ सकते हो! तब फिर पराधीनता क्या है ? यदि हमारा जीवन किसी की उदारता पर जीवित रहा, तो वह जीवन नहीं है । दुखी से दुखी मानव भी उतना ही बड़ा मानव है, जितना अपने को सुखी से सुखी मानव मानता है । क्यों ? इसलिये नहीं कि वह अमुक परिस्थिति में है, वरन् इसलिये कि वह मानव है । इसलिये मेरे भाई, अगर कोई सुख में उदार नहीं है, तो हम दुखियों को तो दुःख में विरक्त होना चाहिए । विरक्ति का अर्थ क्रोध नहीं है, विरक्ति का अर्थ क्षोभ नहीं है, विरक्ति का अर्थ विद्रोह नहीं है । विरक्ति का अर्थ है - असंग हो जाना, निरपेक्ष हो जाना, अनपेक्ष हो जाना । तो, मेरा निवेदन है - अगर सुखी उदारता के बिना भी रह सकता है, तो दुःखियों को तो विरक्ति के बिना नहीं रहना चाहिये । जब दुखी विरक्ति को अपनायेंगे, तब सुखी की उदारता आपके पीछे-पीछे दौड़ेगी; किन्तु इसे अपना महत्व मत मान लेना । यह मत मान लेना कि यह मेरा महत्त्व है कि मेरे पीछे बहुजन चलता है, मेरे पीछे आदर चलता है, मुझे मान-पत्र मिलते हैं, मुझे ऊँचा स्थान मिलता है । यही महत्ता, यही प्रमाद आपको फिर पराधीन बना देगा ।

इसलिये भाई, दूसरे लोग मुझे कैसा मानते हैं, यह तो वे जानें ! पर मैं तो आपसे कह सकता हूँ कि मुझे लोग जितना अच्छा कहते हैं, उससे मैं कम अच्छा हूँ और लोग मुझे जितना बुरा समझते हैं, उससे अधिक बुरा हूँ । कहो तो लिख कर दे दूँ । अगर आपको इसी में सन्तोष है कि हमारी बुराई सारा संसार जान ले, तो मैं भरी सभा में कहता हूँ कि आप लोग जितना मुझको बुरा समझते हैं, उससे मैं अधिक बुरा हूँ और जितना आप लोग अच्छा समझते हैं, उससे कम अच्छा हूँ। अब देखिये, इसमें मेरा क्या बिगड़ गया ? बताओ जरा ! क्या मैं उस जीवन को पसन्द करूँगा, जो आपकी उदारता पर टिका हो ? नहीं-नहीं, कोई विचारशील मानव उस जीवन को पसन्द नहीं करेगा । इसलिये मेरे भाई, इस भ्रमात्मक धारणा को जीवन से निकाल दो कि लोग हमें कैसा समझते हैं, लोग हमें क्या समझते हैं । अब कोई मुझसे पूछे कि इस सम्बन्ध में मेरा विचार क्या है ? तो मैं कहूँगा कि मेरा यह विचार है, यह अनुभव है कि संसार इतना सुन्दर है कि वह मुझको ही नहीं, सभी के सम्बन्ध में उसकी यह उदार मान्यता है कि वह सभी को जितने वे अच्छे होते हैं, उससे अधिक अच्छा समझता है और जितने बुरे होते हैं, उससे कम बुरा समझता है । क्यों, ऐसा क्यों है ? तो कहना होगा कि यह इसलिये ऐसा है कि संसार ने हमें 'गैर' नहीं माना, संसार ने हमें 'और' नहीं कहा। माँ अपने बच्चों के दोषों को न देख कर गुणों को ही देखती है और दोषों को देखकर स्वयं दुःखी होती है, स्वयं व्यथित होती है, क्षोभित नहीं होती । तो जिस प्रकृति की गोद में हम पले हैं, उसका यह स्वभाव है कि संसार किसी का ऋणी नहीं रहता, प्रभु किसी के ऋणी नहीं रहते, कर्त्तव्य-निष्ठ किसी का ऋणी नहीं रहता, गुरु किसी का ऋणी नहीं रहता । यह निर्विवाद सत्य है । इसलिये मेरे भाई, इस बात को आप अपने मन से निकाल दें और सदा के लिये निकाल दें कि लोग हमारे बारे में सोचते क्या हैं ?


 - ‘प्रेरणा पथ' पुस्तक से, (Page No. 79-81) ।

Monday, 23 December 2013

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Monday, 23 December 2013 
(पौष कृष्ण षष्ठी, वि.सं.-२०७०, सोमवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
वर्तमान निर्दोषता में आस्था - 2

यदि कोई कहे, नहीं-नहीं, हम तो भौतिकवादी हैं । तो भैया, सोचो, अगर तुम भौतिकवादी हो, तो विचार करो कि भौतिकवादी का अर्थ क्या है? अगर तुम्हारी मान्यता में जगत् है, तो फिर कोई भी वस्तु तुम्हारी है या जगत् की ? आप विचार करें । अगर जगत् की स्वीकृति है, तो आपके पास जो कुछ है, वह जगत् का है । निर्मम होकर यदि विश्व-प्रेम से आपका जीवन परिपूर्ण नहीं है, तो फिर कैसा भौतिकवाद ? आत्मरति से भी जब आपका अपना जीवन परिपूर्ण नहीं है, तो कैसा अध्यात्मवाद ? प्रभु-प्रेम से यदि आपका जीवन परिपूर्ण नहीं है, तो कैसा ईश्वरवाद ? विचार करें, और गम्भीरता से विचार करें । इस प्रकार विचार करना ही मानव-सेवा-संघ की सत्संग-योजना है ।

परन्तु कितने दुःख की बात है कि हम अपनी ओर देखते ही नहीं और देखते भी हैं, तो इस विचार के साथ कि किस अंश में उन्होंने मेरे साथ वह किया, जो उन्हें मेरे साथ नहीं करना चाहिये था । मान लो, किसी ने वैसा नहीं किया; किन्तु यह भी तो सोचो कि तुम्हें उसके साथ क्या करना चाहिए । हमें तो उसके साथ वही करना है कि जो करना चाहिये । यदि आप ऐसा करते हैं, तो मैं आपसे पूछता हूँ कि फिर दुबारा क्या कोई आपके साथ बुराई करने का साहस कर सकता है ? मेरे जानते तो नहीं कर सकता । किन्तु अनेक बार हमारे ऊपर जो दूसरों के द्वारा आक्रमण होते हैं, दूसरों के आक्षेप होते हैं, दूसरों की आलोचनायें होती हैं, वे क्यों ? स्पष्ट है कि हम वह नहीं करते, जो हमें उनके साथ करना चाहिये । परिणाम यह होता है कि हमारे साथ वह होता रहता है, जो दूसरों को नहीं करना चाहिये । मैं जानना चाहूँगा कि यह रोग कब तक रखना है ? कब तक हम यह सोचते रहेंगे कि हमको दूसरों ने आदर नहीं दिया, प्यार नहीं दिया, हमारी ईमानदारी में विश्वास नहीं किया, हमको अच्छा आदमी नहीं समझा। इस बेबसी के जीवन से क्या शान्ति मिलेगी ? भाई, मेरा तो विश्वास है कि सारी दुनियाँ मुझे चाहे जैसा समझे, पर मैं वैसा रहूँ जैसा रहना चाहिये । यही उपाय है अनादर की पीड़ा से, अपमान की पीड़ा से बचने का । किन्तु हम आज दूसरों के सर्टीफिकेट पर अपने को शान्त रखना चाहते हैं, दूसरों की उदारता पर आज हम जीना चाहते है । मेरा विचार है कि यह मानव-जीवन का घोर अपमान है ।


 - (शेष आगेके ब्लाग में) ‘प्रेरणा पथ' पुस्तक से, (Page No. 78-79) ।

Sunday, 22 December 2013

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Sunday, 22 December 2013 
(पौष कृष्ण पंचमी, वि.सं.-२०७०, रविवार)

वर्तमान निर्दोषता में आस्था - 2

हम सब साधक हैं । साधक होने के नाते हम सबको अपने-अपने सम्बन्ध में विचार करना है । आप कहेंगे, कैसे विचार करें ? इस सम्बन्ध में मेरा यह निवेदन है कि भाई, अगर आप ईश्वरवादी हैं, ईश्वर-विश्वास आपके जीवन में है, तो अपने से पूछें कि ईश्वर से अच्छी भी क्या कोई चीज है? अगर ईश्वरवादी की दृष्टि में ईश्वर से अच्छी भी कोई चीज है, तब तो वह यह कह सकता है कि मुझे ईश्वर प्यारा नहीं लगता, उसमें मेरा मन नहीं लगता । किन्तु यदि वह मानता है कि ईश्वरवादी के लिये ईश्वर सबसे अच्छा है और एक ही है, और फिर भी वह यह कहता है कि मेरा प्रभु में मन नहीं लगता, तब यह बात कहाँ तक तर्कयुक्त है ? भाई, क्या सबसे अच्छी चीज में आपका मन नहीं लगेगा? मानव-सेवा-संघ इस प्रकार का सुझाव ईश्वरवादी को देगा कि भाई, देखो, यदि तुम ईश्वर को मानते हो, तो क्या यह मानते हो कि उससे अच्छी और भी कोई चीज है ? उससे अच्छी यदि और कोई चीज है, तो फिर ईश्वर कैसा ? और यदि तुम ईश्वर को मानते हो, तो क्या वह तुम्हारा अपना नहीं है ? अब आप स्वयं विचार करें ! सबसे अच्छा हो, अपना हो, फिर भी प्यारा न लगे और प्यारा लगे, तब भी उसमें मन न लगे, क्या यह सम्भव है ? यह कभी सम्भव नहीं है । अब आप विचार करें, आपका ईश्वरवाद आपके लिये उपयोगी है ।

यदि आप कहें कि नहीं-नहीं, हम तो अध्यात्मवादी हैं । अच्छा भाई, अध्यात्मवाद की दृष्टि से 'अपने' से सुन्दर कोई चीज है क्या ? किसी भी अध्यात्मवादी से पूछिये । किसी अध्यात्मवादी ने 'यह' के सम्बन्ध में ऐसा विचार नहीं किया है । 'यह' के सम्बन्ध में यह राय कायम नहीं की । सभी अध्यात्मवादियों ने 'यह' को 'अपने' से निम्न कोटि का ही स्वीकार किया है । मेरे जानते, तो किसी अध्यात्मवादी ने यह स्वीकार नहीं किया कि आत्मा से शरीर अधिक महत्त्व की वस्तु है, आत्मा से जगत अधिक महत्त्व की वस्तु है । ऐसा मेरे जानते, किसी अध्यात्मवादी ने नहीं कहा । जब नहीं कहा, तब आप अपने में संतुष्ट क्यों नहीं होते ? यदि आप अपने में संतुष्ट नहीं हैं, तो आपका जीवन तो यही सिद्ध करता है कि आप अध्यात्मवादी नहीं हैं । यदि मैं अपने में सन्तुष्ट नहीं हूँ तो मेरा जीवन तो यही सिद्ध करेगा कि मैं अध्यात्मवादी नहीं हूँ । फिर भी कथन करें आप अध्यात्मवाद का, तो इससे कोई लाभ होने वाला नहीं है। इसलिये मेरे भाई, अगर आप अध्यात्मवादी हैं, आपने अपनी सत्ता को स्वीकार किया है, तो अपने में आपकी अपनी रति होनी चाहिये । आप अपने में अपने को सन्तुष्ट रख सकें, तब न आपका अध्यात्मवाद सिद्ध होगा, तब न हमारा अध्यात्मवाद सिद्ध होगा । इसलिये मेरा निवेदन है कि अपने सम्बन्ध में विचार करना तभी सार्थक होगा कि जैसा आप मानते हैं, वैसे आप अभी, अभी, अभी हो जायँ ।


 - (शेष आगेके ब्लाग में) ‘प्रेरणा पथ' पुस्तक से, (Page No. 77-78) ।