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Friday, 4 November 2011

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Friday, 04 November 2011
(कर्तिक शुक्ल नवमी, वि.सं.-२०६८, शुक्रवार)

(गत ब्लागसे आगेका)

प्रभुविश्वासी, प्रभुप्रेमी शरणागत कौन ?

        प्रेमियों में प्रेम वे (संसार के रचयिता) ही हैं, ज्ञानियों में ज्ञान वे ही हैं, योगियों में योग वे ही हैं । सब कुछ वे ही हैं, और कुछ है नहीं । कोई और है नहीं, हो सकता नहीं, कभी होगा नहीं । वे ही वे हैं, वे ही वे हैं । तब उनका प्यारा कह उठता है कि तुम ही तुम हो, सब कुछ तू है, सब कुछ तेरा है, न मैं हूँ, न मेरा है; केवल तू है और तेरा है । यह प्रेमियों का सहज स्वभाव है । यह स्वभाव भी प्रेमियों को उन्हीं का दिया हुआ है । यह मानव के पुरुषार्थ से सिद्ध नहीं हुआ । पुरुषार्थियों में पुरुषार्थ करने की जो सामर्थ्य है, वह भी उन्हीं की दी हुई है ।

        वे स्वयं सामर्थ्यरूप हैं, वे ही विवेकरूप हैं और वे ही सत्तारूप हैं । सब कुछ उन्हीं का है और सब कुछ वे ही हैं । अतः हम सबको उनकी आत्मीयता चाहिए । हमारे और उनके बीच में आत्मीय सम्बन्ध है, जातीय सम्बन्ध तो है ही, नित्य सम्बन्ध तो है ही । हम सदैव उनको अपना मानते रहें और अपना जानते रहें । इससे भी अधिक ऐसा लगे कि वे ही अपने हैं, वे ही अपने हैं और कोई अपना नहीं हैं । तू मेरा है और मैं तेरा हूँ - यही सम्बन्ध अविनाशी है, अमर है । जब मैं शरीर बनता हूँ, तब प्यारे ! तुम विश्वरूप धारण करते हो, जब मैं अहं बनता हूँ, तब तुम परमतत्व बन जाते हो और जब मैं शरणागत हो जाता हूँ, तब तुम सर्वस्व हो जाते हो ।

        तुम्हारी सदा ही जय हो ! जय हो !! तुम्हारी शरणागति सभी को सम्भव हो, इसी सद्भावना के साथ ।।ॐ।। 

- संतवाणी भाग-6, प्रवचन 36 (अ)

Thursday, 3 November 2011

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Thursday, 03 November 2011
(कर्तिक शुक्ल गोपाष्टमी, वि.सं.-२०६८, गुरुवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
प्रभुविश्वासी, प्रभुप्रेमी शरणागत कौन ?

        उन्होंने (संसार के रचयिता ने) मानव पर कभी शासन नहीं किया । भला बताओ, क्या इन्द्र शासन के लिए कम है ? सुख-भोग के लिए अन्य प्राणी क्या कम हैं ? मानव का निर्माण उन्होंने न तो शासन करने के लिए किया और न भोग कराने के लिए किया । उन्होंने कहा कि तू स्वाधीन होकर, अमर होकर, अजर होकर, अविनाशी होकर एक बार कह दे कि हे प्यारे ! तुम मेरे हो । इसी उद्देश्य के लिए उस अनन्त ने मानव का निर्माण किया है ।

        आप कितने भाग्यशील हैं कि आपको मानव-जीवन मिला है ! आप मानव होने के नाते उन्हें अपना कह सकते हैं, उन्हें अपना मान सकते हैं, उनके होकर रह सकते हैं, उनके प्रेम की भूख जगा सकते हैं और बढा सकते हैं, उनकी महिमा गा सकते हैं, गवा सकते हैं, उनका चिन्तन कर सकते हैं, करा सकते हैं । इसलिए महानुभाव ! मानव और अनन्त का सदा से ही नित्य सम्बन्ध है, जातीय सम्बन्ध है और आत्मीय एकता है । हम इस महामन्त्र को कभी न भूलें । किस महामन्त्र को ? मैं सदैव तेरा हूँ, तेरी जाति का हूँ, मेरा-तेरा नित्य सम्बन्ध है, तू ही मेरा अपना है। इस महामन्त्र को हम कभी न भूलें । वे हमें कभी नहीं भूलते । वे बार-बार मानव को यही समझाते रहते हैं कि मैं तुझे प्यारा लगता रहूँ, तू मेरा होकर रह । मेरी नजर में तू-ही-तू और तेरी नजर में मैं-ही-मैं बना रहूँ ।

        आप सच मानिए, यह मानव-जीवन भोग-योनी नहीं है । यह जीवन प्रेम-योनी है । इस जीवन में ही मनुष्य को प्रेम की प्राप्ति होती है । और किसी जीवन में प्रेम की प्राप्ति नहीं होती । तो क्या आज हम उनके प्रेम की आवश्यकता अनुभव नहीं कर सकते, उनकी आत्मीयता को नहीं अपना सकते ? अवश्य अपना सकते हैं और उनके प्रेम की आवश्यकता अनुभव कर सकते हैं । यह सामर्थ्य उनकी ही दी हुई है, हमारी उपार्जित नहीं है । सच पूछिए तो दार्शनिकों को दर्शन उन्हींने दिया है, कलाकारों को कला उन्हींने दी है, लेखकों को लिखने की शक्ति उन्हींने दी है । बुद्धिमानों में बुद्धि का चमत्कार उन्हीं का दिया हुआ है, बलवानों में बल उन्होंने ही दिया है, सत्तावालों में सत्ता उन्हीं की दी हुई है।

(शेष आगेके ब्लागमें) - संतवाणी भाग-6, प्रवचन 36 (अ)

Wednesday, 2 November 2011

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Wednesday, 02 November 2011
(कर्तिक शुक्ल सप्तमी, वि.सं.-२०६८, बुधवार)

(गत ब्लागसे आगेका)

प्रभुविश्वासी, प्रभुप्रेमी शरणागत कौन ?

        हम आपको क्या बताएँ, वे (संसार के रचयिता) देखते हैं कि मनुष्य का कौन सा संकल्प ऐसा है जिसकी अपूर्ति से यह पीड़ित है ? उस संकल्प को अनायास ही वे पूरा कर देते हैं। जब वे यह देखते हैं कि संकल्पपूर्ति के सुख में यह मेरे महत्व को भूलने लगा है, तब वे करुणित होकर संकल्प-अपूर्ति की परिस्थिति बनाकर निःसंकल्प होने की प्रेरणा देते हैं, सामर्थ्य देते हैं । अन्त में निःसंकल्प भी कर देते हैं। जब वे यह देखते हैं कि निःसंकल्पता की शान्ति के आनन्द में विभोर हो गया और मुझे भूलने लगा है, यह अपने आप ही अपनी महिमा गाने लगा है, अपने आप में ही अपने को पाने लगा है । तब वे बड़ी भारी करुणा करके मुक्ति के आनन्द को भी, निःसंकल्पता के आनन्द को भी फीका-फीका कर देते हैं ।

        मैं सच कहता हूँ कि वे ऐसी लीला करने लगते हैं कि मनुष्य सोचने लगता है कि अरे, अभी तो कुछ मिला ही नहीं । फिर जब उनका शरणागत ही अधीर होता है, तब वे इस बात का प्रत्यक्ष अनुभव करा देते हैं कि भैया, तेरे लिए कुछ हुआ तो नहीं । यार ! तू वैसे ही सोच बैठा कि मैं योग्य लेखक हो गया, मैं वक्ता हो गया, मुझे गुरुपद मिल गया, मुझे तत्व-ज्ञान हो गया । तू अनेक छोटी-छोटी बातों में मेरे यार, मुझे क्यों भूल गया ? अरे भैया ! मैंने तो तेरा निर्माण इस लिए किया था कि तू मुझे सदैव अपना मानता रहेगा और मैं तुझे अपना समझता रहूँगा ।

        थोड़ी सी शान्ति के रस में, थोड़े से निजानन्द को पाकर क्या मुझे भूल गया ? अरे भैया ! तू मुझे भूल सकता है, पर मैं तुझे नहीं भूल सकता । मैं सच कहता हूँ कि यदि उन्हें हमारी याद न आई होती, तो हमें उनकी याद नहीं आती । उन्हें हमारी याद आती है, क्योंकि वे हमे अपना मानते हैं और जानते हैं । तभी हम उनसे यह कह पाते हैं कि मैं तेरा हूँ और तू मेरा है । आप सच मानिए, मानव का निर्माण इसी उद्देश्य के लिए था, मानव-जीवन इसीलिए मिला ।

(शेष आगेके ब्लागमें) - संतवाणी भाग-6, प्रवचन 36 (अ)

Tuesday, 1 November 2011

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Tuesday, 01 November 2011
(कर्तिक शुक्ल षष्ठी, वि.सं.-२०६८, मंगलवार)

(गत ब्लागसे आगेका)

प्रभुविश्वासी, प्रभुप्रेमी शरणागत कौन ?

        मैं आपको क्या बताऊँ ! मुझसे गुरुदेव ने कहा कि भैया, तू भजन किया कर । मैंने कहा कि भजन क्या होता है ? उन्होंने कहा कि राम-राम कहा कर । मैंने कहा कि मेरा तो राम-नाम में विश्वास ही नहीं है । वे गुरुदेव के रूप में प्रकट होकर प्रसन्न हुए, करुणित हुए । आप जानते हैं, कोई कहे कि हमें उनके नाम पर विश्वास नहीं है, तो कितना दुःख हो ? लेकिन उन्होंने उदारता का भेष धारण किया और कहा कि भैया ! कोई बात नहीं है । अगर तुमको राम-नाम में विश्वास नहीं है, तो कोई बात नहीं है । क्या तुमको यह भी विश्वास नहीं है कि वे हैं ? मैंने कहा कि उनके होने में तो विश्वास है । तो उन्होंने कहा कि यार ! फिर क्या है, अब क्या रह गया ? जब तुम यह मानते हो कि परमात्मा है, ईश्वर है, भगवान है; तब फिर क्या रह गया यार ? तुम उनके शरणागत हो जाओ । वे स्वयं शरणागत का भेष बना कर आए और मुझे अपनी शरणागति प्रदान कर गए ।

        आप जानते हैं, शरणागत को कुछ करना नहीं पड़ता । उसे तो याद आती है, वह याद करता नहीं है । उसे विरह होता है । वह विरही भी अपने बल से नहीं बनता, वे करुणासागर ही अपना विरह देते हैं, अपना मिलन देते हैं । उनका मिलन भी नित्य है, उनका विरह भी नित्य है । नित्य विरह और नित्य मिलन शरणागत को मिलता है । नित्य विरह न मिले, तो प्रेम की वृद्धि न हो, और नित्य मिलन न हो, तो प्रेम सजीव न हो । वे अपने दिए हुए प्रेम को सजीव भी कर देते हैं और उत्तरोत्तर बढ़ाते भी रहते हैं । यह उनकी महिमा है ।

        आप जानते हैं, यह महिमा कब अनुभव में आती है, कब भासित होती है ? जब मानव अधीर होकर, अपने बल से निराश होकर केवल यह सोचता है कि कोई अपना होता और मुझे अपनाकर मेरे ताप को हर लेता, मेरी व्यथा को हर लेता, अभाव को हर लेता, इस नीरसता को हर लेता, इस भय को हर लेता, मुझे अभय कर देता, मुझे सरस कर देता, मुझे अपना लेता ! यह आवश्यकता मात्र जब जगती है, तब वे देखते हैं कि अब तो इसने अपनी वास्तविक आवश्यकता को सोचा है, समझा है, अपनी आवश्यकता अनुभव की है, तब उनकी अनुपम लीला ऐसी विचित्र होती है कि देखते ही बनता है ।

(शेष आगेके ब्लागमें) - संतवाणी भाग-6, प्रवचन 36 (अ)

Monday, 31 October 2011

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Monday, 31 October 2011
(कर्तिक शुक्ल पंचमी, वि.सं.-२०६८, सोमवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
प्रभुविश्वासी, प्रभुप्रेमी शरणागत कौन?

        वे तो सदा-सदा ही अपनी महिमा में आप स्थित हैं । अनन्त विशेषण उनके पीछे-पीछे दौड़ते हैं, फिर भी वे सदा निर्विशेष हैं । किन्तु प्रेमियों के प्रेम का पान करने के लिए वे सविशेष हैं, सगुण हैं, साकार हैं वे मिलते हैं, बिछुड़ते हैं और वे स्वयं आकुल-व्याकुल होते हैं और अपने प्रेमियों को आकुल-व्याकुल करते हैं । उनकी लीला का कोई वारापार नहीं है । महानुभाव ! हम सबके जो प्राणधन हैं, जो प्राणेश्वर हैं, निज हैं, आज उनके जन्मोत्सव पर सब कुछ कर डालो । और कुछ करना, जानना या पाना शेष न रह जाय । सोचो भाई, क्या करना है ?  

        मैं सच कहता हूँ कि अगर सम्भव हो सके, तो उनका दिया जो आश्रम है, उनकी दी हुई जो वस्तु है आज उन पर लूटा दो । इस उत्साह में लूटा दो कि आज हमारे प्यारे ने प्रेमियों को रस देने के लिए अपने को प्रकाशित किया है, अपनी महिमा अपने आप बताई है । आप सच मानिए, अगर वे स्वयं न कहते, तो गीतकार की गीता अधूरी रह जाती । उन्होंने कहा कि भैया ! तू सब पचड़े को छोड़ दे । देख, तू मेरा अत्यन्त प्रिय है, तू मेरा अत्यन्त अन्तरंग है, अपना है । अब मैं तुझे अपनी वह बात जो अब तक नहीं बताई है, तुझे बताता हूँ कि मेरे शरण में आ जा, तू मेरी शरण में आ जा ।

        शरणागति प्रभु की अन्तिम गुह्यतम करुणा है, उदारता है, महिमा है । हम सब शरणागत हैं, वे हमारे शरण्य हैं । वे सब कुछ करते हैं और मौज करते हैं हम । हम उनको 'तुम' कहकर पुकारते हैं और वे हमको 'अपना' कहते हैं । आप सोचिए, उन्होंने शरणागतों के मोह का नाश किया है, उन्हींने शरणागतों को अपनी स्मृति दी है और शरणागतों का सब कुछ किया है । वे ही सब कुछ करते हैं । हम शरणागत हैं और उनकी ही दी हुई यह शरणागति है

(शेष आगेके ब्लागमें) - संतवाणी भाग-6, प्रवचन 36 (अ)

Sunday, 30 October 2011

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Sunday, 30 October 2011
(कर्तिक शुक्ल चतुर्थी, वि.सं.-२०६८, रविवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
प्रभुविश्वासी, प्रभुप्रेमी शरणागत कौन ?

        आज इस बात की बड़ी आवश्यकता है कि हम उनके (संसार के रचयिता के) विश्वास को अपनाएँ और उनसे कहें कि तुम स्वयं अपना विश्वास हमें दे दो, तुम अपनी महिमा में अविचल आस्था कर दो । सब कुछ है तो तुम्हारा ही । मैं भी तुम्हारा ही हूँ । तुमने मेरा निर्माण अपने में से ही किया है, और किसी में से नहीं किया। अपने में से जिसका निर्माण किया है, उसे अपनी आत्मीयता दे दो, दे दो प्यारे ! दे दो ! और कुछ नहीं चाहिए । आप ही सोचिए, और है ही क्या ?

        जिसे आप देख रहे थे, जिस पर आप सोच रहे थे, जिस पर आप मनन और निदिध्यासन कर रहे थे, वह तो सचमुच कुछ नहीं था, कुछ नहीं है । वे ही सब कुछ हैं । जब वे ही सब कुछ हैं, तो उनका विश्वास ही उनको मोहित करता है, उनकी आत्मीयता ही उनको द्रवित करती है, आनन्दित करती है । उनकी प्रियता उनको आनन्द-विभोर कर देती है । अगर माँगना है, तो यही माँगना है; पाना है, तो यही पाना है । कुछ कहना है, तो यही कहना है; कुछ सुनना है, तो यही सुनना है । और कुछ नहीं कहना है, कुछ नहीं सुनना है, कुछ नहीं माँगना है, कुछ नहीं पाना है ।

        तुम मेरे हो, तुम मेरे हो - यही कहना है, यही सुनना है, यही पाना है । और कुछ पाने, कहने और सुनने के लिए है ही नहीं । क्या आज इस महोत्सव के अवसर पर हम उस आत्मीय प्रभु को अपनाएँगे ? उन्हीं से अपने जीवन को गुंजारित करेंगे, महसूस करेंगे ? करेंगे, अवश्य करेंगे । वे ही कृपा करके अपने प्रेमियों की इस माँग को पूरा करने के लिए स्वयं किसी के गोद में लाला बनकर बैठते हैं, किसी के साथ सखा बनकर खेलते हैं, किसी के साथ प्रियतम होकर नित्य प्यार का पान करते हैं । उन्होंने अपनी ही कृपा से, अपनी ही महिमा से प्रेरित होकर अपने को प्रकाशित किया है । भला बताओ, वे अपने आपको प्रकाशित न करते, तो कौन उनकी चर्चा कर पाता, कौन उनके अस्तित्व को स्वीकार कर पाता ?  

(शेष आगेके ब्लागमें) - संतवाणी भाग-6, प्रवचन 36 (अ)

Saturday, 29 October 2011

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Saturday, 29 October 2011
(कर्तिक शुक्ल तृतीया, वि.सं.-२०६८, शनिवार)
 
(गत ब्लागसे आगेका)

प्रभुविश्वासी, प्रभुप्रेमी शरणागत कौन ?

        अनन्त की प्रियता अनन्त है, नित्य की प्रियता नित्य है, चिन्मय की प्रियता चिन्मय है । वह प्रियता जड़ नहीं है, क्रिया नहीं है, अभ्यास नहीं है । यह उनका विश्वास है । उनका विश्वास ही उनकी प्राप्ति का अन्तिम अचूक उपाय है । और कोई उपाय है ही नहीं । उनके विश्वास से ही उनको पाया है, और किसी प्रकार नहीं। महाराज ! विचारकों ने अपने को पाया है, अमरत्व को पाया है, जीवन-मुक्ति को पाया है । पर उनके विश्वासियों ने उनको पाया, उनकी प्रियता को पाया, उनकी आत्मीयता को पाया । प्रभु-विश्वास ही गुरुतत्व है, और कोई गुरुतत्व नहीं है । प्रभु-विश्वास ही प्रेमियों का गुरुतत्व है । उनका विश्वास उनका ही दिया हुआ है, यह अपना उपार्जित नहीं है ।

        उपार्जन के लिए तो उन्होंने सामर्थ्य दी है और ज्ञान का प्रकाश दिया है । उनकी दी हुई सामर्थ्य के सदुपयोग से मानव सेवक कहलाया है, उदार कहलाया है, और न जानें, संसार ने उसको क्या-क्या कहा है । किन्तु उनके विश्वास ने उनकी आत्मीयता प्रदान की है, प्रियता प्रदान की है । उनके विश्वास के बल पर अन्य सभी विश्वासों को मिटा दो, त्याग दो । उनके सम्बन्ध के लिए अन्य सभी सम्बन्धों को अपने भीतर से निकाल दो । अन्य कोई सम्बन्ध नहीं है, कोई विश्वास नहीं है । उनका विश्वास ही विश्वास है, उनका सम्बन्ध ही सम्बन्ध है । उनकी प्रियता ही जीवन है । और कोई जीवन नहीं है ।

(शेष आगेके ब्लागमें) - संतवाणी भाग-6, प्रवचन 36 (अ)

Friday, 28 October 2011

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Friday, 28 October 2011
(कर्तिक शुक्ल द्वितीया, भैयादूज, वि.सं.-२०६८, शुक्रवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
प्रभुविश्वासी, प्रभुप्रेमी शरणागत कौन ?

        उनकी (संसार के रचयिता की) प्रियता उनसे माँगो, उनकी आत्मीयता उनसे माँगो, उनकी महिमा उनसे माँगो । और कुछ माँगने योग्य है ही नहीं । क्यों नहीं है ? आप ही सोचिए कि उन्होंने अविनाशी जीवन की उपलब्धि के लिए ज्ञान का प्रकाश दिया है और विश्व-जीवन में आदर पाने के लिए उदारता का रस तथा करुणा का रस उन्होंने दिया है । अब और क्या चाहिए ? जहाँ आप रहते हैं, वहाँ आदर ही तो चाहते हैं, सम्मान ही तो चाहते हैं । हम क्या बताएँ ? उनकी दी हुई योग्यता का जब मनुष प्रकाशन करता है, तो उसमें अपना नाम लिखता है और यह चाहता है कि लोग यह समझते रहें कि इसका लेखक अमुक है । क्या सचमुच कोई लेखक, लेखक है; कोई वक्ता, वक्ता है; कोई दाता, दाता है ? वे ही लेखक हैं, वे ही वक्ता हैं, वे ही दाता हैं । किन्तु अपने को कितना छिपाते हैं ! क्या कहीं मालूम होता है कि वे बोल रहे हैं ?
 
        लोग सोचते हैं कि शरणानन्द बोल रहा है, बड़ा अच्छा बोलता है, बड़ा ठीक बोलता है, युक्तियुक्त बोलता है । लेकिन सच बात तो यह है कि भला वे वक्ता न हों और कोई वक्ता हो जाए ? वे लेखक न हों, और कोई लेखक हो जाए ? वे कलाकार न हों, और कोई कलाकार हो जाए, वे दार्शनिक न हों, और कोई दार्शनिक हो जाए ? नहीं हो सकता, नहीं हो सकता । सभी के सब-कुछ वे ही हैं ।
 
         आज हम सब उनका उत्सव मना रहे हैं, उत्साहित हो रहे हैं और उनकी करुणा, उनकी उदारता, उनकी आत्मीयता का पान कर रहे हैं । वे धन्य हैं ! वे धन्य हैं !! उनके लिए क्या कहा जाए ! वे अपनी प्रियता की भूख बढ़ाते रहें ! मैं उनके प्रेम की भूख से आकुल रहूँ, व्याकुल रहूँ, पीड़ित रहूँ - यही पुनः-पुनः माँग होती रहे, उनकी प्रियता उत्तरोत्तर बढती रहे ! उनके दिए हुए बल के द्वारा उनकी पूजा होती रहे, उनकी दी हुई आत्मीयता से उनकी स्मृति होती रहे और उत्तरोत्तर उनकी प्रियता बढ़ती रहे !

(शेष आगेके ब्लागमें) - संतवाणी भाग-6, प्रवचन 36 (अ)

Thursday, 27 October 2011

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Thursday, 27 October 2011
(कर्तिक शुक्ल प्रतिपदा, वि.सं.-२०६८, गुरुवार)

(गत ब्लागसे आगेका)                                           

प्रभुविश्वासी, प्रभुप्रेमी शरणागत कौन ?
 
        आप जानते हैं, जब कोई प्यारा लगता है, तो प्यारे को तो रस मिलता है, अपने को भी रस मिलता है और इतना रस का प्रवाह बढ़ता है कि प्यारा लगना भी ऐसा ही लगता है कि मानो, प्यार है ही नहीं । प्रेमियों को प्रेम का भास नहीं होता । उन्हें तो प्रेम की भूख रहती है । प्रेमी क्या चाहता है ? वे जहाँ रहें, आनन्द में रहें । उनको भले ही मेरी याद न आए । ऊँचे प्रेमियों की यह दशा होती है कि वे सोचते हैं कि कहीं मेरी याद में उनको पीड़ा हो गई, तो मुझसे सही नहीं जाएगी । उनकी याद में मैं पीड़ित रहूँ, मैं दुखित रहूँ, मैं तड़पता रहूँ, तरसता रहूँ । यदि मेरी याद में उन्हें पीड़ा हुई, तो यह सुनकर मेरा हृदय फट जाएगा ।

        उनकी (संसार के रचयिता की) प्रियता से ही उनकी पूजा करनी है, उनकी महिमा से ही उनकी स्तुति करनी है और उनका होकर ही उनकी उपासना करनी है । उनकी प्रियता ही मेरा जीवन हो जाए । आज उनका जन्मोत्सव है । वे प्रसन्न हैं, वे करुणित हैं, वे बड़े उदार हैं । उनके प्रेमियों ने उन्हें इतना अपनापन दिया है कि वे प्यार को बाँट रहे हैं, बरसा रहे हैं । हम यही कहें कि हे प्यारे ! तुम्हारा प्यार, तुम्हारी आत्मीयता ही मेरा जीवन है, मेरा कोई और जीवन नहीं है, तुम्हीं मेरे अपने हो । यह तुम्हीं ने मुझे अपनी ओर से दी है ।

        आप जानते हैं, मेरे इस कठोर जीवन का मौलिक प्रश्न क्या था ? यह नहीं था कि मैं उनको देखता रहूँ, उनसे मिलता रहूँ । बड़ा छोटा-सा प्रश्न था कि मुझे वह सुख दो, जिसमें दुःख न हो; वह जीवन दो, जिसमें मृत्यु न हो; वह पूर्णता दो, जिसमें अभाव न हो । वे सब कुछ देते हैं । किन्तु मैं सच कहता हूँ कि उनकी प्रियता में जो रस है, वह रस पूर्णता में नहीं है, उस सुख में नहीं है, जो दुःख से रहित है; उस जीवन में नहीं है, जो मृत्यु से रहित है । उनकी प्रियता कितनी रसरूप है ! इस सम्बन्ध में कोई कुछ कह नहीं सका, कह नहीं पाता । जितना महसूस करता है, उतना भी नहीं कह पाता । वह केवल संकेतमात्र है ।

(शेष आगेके ब्लागमें) - संतवाणी भाग-6, प्रवचन 36 (अ)

Wednesday, 26 October 2011

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Wednesday, 26 October 2011
(कर्तिक अमावस्या, शुभ दीपावली, वि.सं.-२०६८, बुधवार)
 
(गत ब्लागसे आगेका)
प्रभुविश्वासी, प्रभुप्रेमी शरणागत कौन ?

        जो साधक असमर्थता से पीड़ित होते हैं, अशान्ति से पीड़ित होते हैं, पराधीनता से पीड़ित होते हैं, उन्हें वे (संसार के रचयिता) सामर्थ्य प्रदान करते हैं, स्वाधीनता प्रदान करते हैं, अमरत्व प्रदान करते हैं । फिर वे उन्हीं में स्वयं छिपकर रहते हैं । क्यों छिपकर रहते हैं ? कोई स्वाधीन होकर, अमर होकर, शान्त होकर एक बार तो कहे कि हे प्यारे ! यह सब कुछ तुम्हारा दिया हुआ है, सबमें तुम्हीं-तुम हो, और कोई है नहीं; अब तुम प्यारे लग जाओ ! यह माँग उसकी होती है जो शुद्ध है, बुद्ध है, मुक्त है । आप कहेंगे कि शुद्ध-बुद्ध-मुक्त में भी कहीं माँग होती है ? बात तो ठीक है । पर वह काम-रहित है, कि माँग-रहित है ? विचार करो ।
 
        अरे भाई ! मुक्त किसे कहते हैं ? जो काम-रहित है । क्या अनन्त रस की माँग मुक्त में नहीं है ? यदि वह मुक्त में न होती, तो उसे मुक्ति खारी नहीं लगती । मुक्त को मुक्ति भी खारी लगती है । कब ? जब अखण्ड रस की भूख को अनन्त रस की भूख में बदला हुआ पाता है । उनका रस अपार है, अखण्ड है, अनन्त है । अनन्त रस की अभिव्यक्ति उनकी प्रियता में है, उनके बोध में नहीं। उनके बोध में अखण्ड रस है, उनकी प्रियता में अनन्त रस है । वे अपनी ही महिमा से, अपनी करुणा से, अपनी ही उदारता से प्रेरित होकर अपनी प्रियता प्रदान करें - यह भूख साधक की अन्तिम भूख है ।

        वे कैसे हैं, क्या करते हैं, कहाँ हैं - इस पचड़े में न पड़ें । केवल थोड़ी-थोड़ी देर के बाद अगर कोई हूक उठे, अगर कोई पीड़ा उठे, तो यह उठे कि तुम प्यारे लगो, तुम प्यारे लगो ! तुमने सब कुछ दिया है, सभी को दिया है, सदा देते हो; किन्तु तुम प्यारे लगो ! उनका प्यारा लगना उनके लिए रसरूप है और अपने लिए भी रसरूप है । वह रस ऐसा नहीं है कि जिसकी पूर्ति हो । बंधन की निवृति होती है, मुक्ति की पूर्ति होती है अर्थात मुक्ति प्राप्त होती है । किन्तु उनकी प्रियता से अभिव्यक्त जो उनका रस है, उसकी कभी पूर्ति नहीं होती। इसीलिए प्रेमीजन सदैव यही सोचते रहते हैं, उनकी यही पीड़ा रहती है कि हे प्यारे ! तुम प्यार देते हो, तुम सब कुछ देते हो, यह ठीक है; पर तुम मझे तो प्यारे लगो, प्यारे लगो !

(शेष आगेके ब्लागमें) - संतवाणी भाग-6, प्रवचन 36 (अ)

Tuesday, 25 October 2011

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Tuesday, 25 October 2011
(कर्तिक कृष्ण त्रयोदशी, नरक चतुर्दशी, वि.सं.-२०६८, मंगलवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
प्रभुविश्वासी, प्रभुप्रेमी शरणागत कौन ?

        महानुभाव ! क्या कहा जाय ? सच बात तो यह है कि कहने और जानने की कोई बात ही नहीं है । क्या जानें, क्या कहें ? वे (संसार के रचयिता) सदैव अपने ही हैं, सब कुछ उन्हीं का है - यह मान लेना ही मानव का परम पुरुषार्थ है, अचूक और अन्तिम उपाय है । यही एक उपाय है । यह उन्होंने स्वयं दिया है । आप सच मानिए, उनके पूजन के लिए उनकी आत्मीयता से भिन्न और कुछ नहीं है । उनकी आत्मीयता से ही उनका पूजन होता है और वे प्रसन्न होते हैं, आनन्दघन होते हुए भी आनन्दित होते हैं और स्वयं सततरूप से देखते रहते हैं । किसको ? जो उनका अपना है उसको । वे उसे देखते रहते है, अपनाते रहते हैं, अपना प्रेम उड़ेलते रहते हैं, अपना सर्वस्व न्यौछावर करते रहते हैं । यह उनका सहज स्वभाव है ।

        हम सब तैयारी के साथ नहीं, सहजभाव से स्वीकार करें कि वे सदैव अपने हैं, अपने में हैं । यह स्वीकार करना कि कोई और नहीं है, कोई गैर नहीं है - यही साधक का जीवन है । जो कुछ सुनने में आया, देखने में आया, समझ में आया, सोंचने में आया - बुद्धि इसे बता कर मौन हो जाती है । तब वे अपना निज-रस प्रदान करते हैं । उनके निज-रस में क्या है ? वह कितना मधुर है, कितना सुन्दर है, कितना प्रिय है ! इसका वर्णन किसी भाषा और भाव से सम्भव नहीं है । उनका निज-स्वभाव ही प्रेमतत्व है अथवा यों कहो निज-स्वभाव तत्व-प्रेम है, उनका निज-स्वरूप तत्व-ज्ञान है और सामर्थ्य उनकी बाह्य महिमा है, अन्तर महिमा नहीं ।

(शेष आगेके ब्लागमें) - संतवाणी भाग-6, प्रवचन 36 (अ)

Monday, 24 October 2011

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Monday, 24 October 2011
(कर्तिक कृष्ण द्वादशी, वि.सं.-२०६८, सोमवार)
    
(गत ब्लागसे आगेका)
प्रभुविश्वासी, प्रभुप्रेमी शरणागत कौन ?

        प्रिया भी वे (संसार के रचयिता), प्रीतम भी वे, दास भी वे, स्वामी भी वे, शरणागत भी वे और शरण्य भी वे । हम अपने में देखें कि ऐसे जो हम सबके अपने हैं, उनकी महिमा के अतरिक्त कोई और चीज तो नहीं रह गयी है, अथवा कहीं कोई चीज दिखाई तो नहीं देती, उनकी सत्ता से भिन्न अन्य कोई सत्ता तो नहीं मालूम होती? इस बात को हम अपने में देखें । हम देखें कि हम क्या बला हैं ? हमारा निर्माण उन्हीं ने किया है और अपने में से किया है, यह बात वे तुम्हारी वाणी से सुनना चाहते हैं । तुम्हारी वाणी से मतलब है कि यह वाणी उनकी ही दी हुई है, पर इस ढंग से दी है कि पाने वाले को यही मालूम होता है कि यह वाणी अपनी ही है । इससे अधिक आत्मीय भाव, अपनेपन का भाव और क्या हो सकता है ? उनकी दी हुई है और मालूम होती है कि अपनी है ।

        जब हम अपने को उन्हें इस भाव से देते हैं कि तेरा तुझको देता हूँ, यद्यपि यह तेरा है, लेकिन इस समय मेरा है । अब में तेरा दिया हुआ तुझको देता हूँ । तब वे स्वयं बड़े अधीर होने लगते हैं, आकुल-व्याकुल होने लगते हैं कि मैंने मानव को सब कुछ पहले ही दे दिया, अब मेरे पास क्या रह गया है कि जिससे में इसका बदला चूका सकूँ । मानव ने मेरा दिया हुआ अब मुझे दे दिया है । तब उनसे नहीं रहा जाता और वे कहने लगते हैं - में तेरा हूँ, में तेरा हूँ । जब प्रेमीजनों को उनकी यह आवाज सुनाई देती है, तो प्रेमीजन कहने लगते हैं - तुम्हीं हो, तुम्हीं हो, हर समय तुम्हीं हो, तुम्हीं मेरे जीवन हो, प्राणधन हो, प्राणेश्वर हो, प्राणवल्लभ हो, प्राणप्रिय हो, तुम्हीं हो, तुम्हीं हो । जब वे यह सुनते हैं, तब वे स्वयं कहने लगते हैं - नहीं-नहीं, मैं तेरा हूँ, मैं तेरा हूँ । यहाँ तक कहने लगते हैं कि तुने जो किया है, वह कोई नहीं कर सकता ।

        क्या दिया है तुने ? तुने अपने को मुझ पर न्यौछावर किया है, अपने आपको मेरे लिए खो दिया है । अब तो मैं तेरा ऋणी हूँ । तब प्रेमीजन कहने लगते हैं कि मेरा तो कभी कुछ था नहीं, तुम्हारा ही था और तुम्हीं थे, तुम्हीं हो, जो आकर्षण है वह तुम्हारा ही है, सब कुछ तुम्हीं से हुआ है, सब कुछ तुम्हीं में है । ऐसा जो प्रीति और प्रियतम का नित्य विहार है, यही मानव का निज-जीवन है । आप सच मानिए । उन्होंने क्या नहीं किया ? उन्होंने सभी के लिए सब कुछ किया है । वे स्वयं प्रेमियों से आशा रखते हैं कि कोई मुझे अपना कहता और अपना सर्वस्व मुझ पर उड़ेल देता ।

(शेष आगेके ब्लागमें) - संतवाणी भाग-6, प्रवचन 36 (अ)

Sunday, 23 October 2011

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Sunday, 23 October 2011
(कर्तिक कृष्ण रम्भा एकादशी, वि.सं.-२०६८, रविवार)
 
प्रभुविश्वासी, प्रभुप्रेमी शरणागत कौन ?

        प्रभु ने ज्ञान केवल इसलिये दिया है कि मानव स्वाधीन होकर, अजर-अमर होकर सदा-सदा उनको लाड़ लड़ाता रहे, रस देता रहे । उन्हीं का दिया हुआ यह प्रेम है, उससे उनकी नित्य पूजा की जाय, सतत पूजा की जाय और उन्हें रस दिया जाय । वे कैसे हैं ? इसे तो शायद वे भी नहीं जानते । किन्तु उनके सम्बन्ध में जिस किसी ने जो कुछ कहा है, वह कम है । क्यों भाई ? आप स्वयं सोचिए, सब कुछ देकर, सब कुछ लेकर जो अपने आप को न्यौछावर कर सकता है, अपने से अभिन्न कर सकता है, अपने में सदा के लिए स्थान दे सकता है, उसकी महिमा का, उसकी सामर्थ्य का, उसके सौंदर्य का क्या कोई वारापार हो सकता है ? कभी नहीं हो सकता । पर दुःख की बात तो यह है कि फिर भी क्या वे इतने अपने मालूम होते हैं, जितनी कि उनकी दी हुई वस्तु, सामर्थ्य, योग्यता अपनी मालूम होती है ?

        सच बात तो यह है कि जो उन्हें नहीं मानते हैं, उन्हें भी वे अपने समान बना लेते हैं और इतना छिपकर बनाते हैं, कि उन्हें पता भी नहीं लग पाता कि उन्होंने हमे वह बना दिया, जो वे स्वयं थे। वे क्या थे, वे कहाँ थे, वे क्या नहीं थे, वे कब नहीं थे, वे कहाँ नहीं थे ? वे सदैव थे, सदैव हैं और सभी के हैं । सभी के होते हुए भी उनकी एक महिमा है और वह यह महिमा है कि वे सभी से अतीत भी हैं, सभी के नित्य साथी भी हैं, सभी के दोस्त भी हैं, सभी के प्रिय भी हैं, सभी के मालिक भी हैं और सभी के दास भी । आप कहेंगे कि मालिक दास कैसे हो सकता है ? भाई देखो, उनके दास को जो रस मिलता है, उस रस का भी वे ही पान करते हैं और स्वयं प्रिया होकर अपने आप को भी रस देते हैं ।

        प्रिया भी वे, प्रीतम भी वे, दास भी वे, स्वामी भी वे, शरणागत भी वे और शरण्य भी वे ।

(शेष आगेके ब्लागमें) - संतवाणी भाग-6, प्रवचन 36 (अ)