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Sunday, 15 July 2012

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Sunday, 15 July 2012  
(श्रावण कृष्ण द्वादशी, कामदा एकादशीव्रत, वि.सं.-२०६९, रविवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
किसी का बुरा न चाहना

        भौतिक बल कभी भी साधन-निधि से सम्पन्न पर विजयी नहीं हो सकता। उसकी दृष्टि में शरीर का रहना, न रहना समान अर्थ रखता है; कारण, कि उसने अपने ही में सब कुछ पा लिया है । उसमें पराधीनता की गन्ध भी नहीं है। यह साधननिष्ठ होने की महिमा है । इस कारण कितना ही भौतिक बल क्यों न हो, यदि मानव साधक होकर साधननिष्ठ हो जाता है, तब किसी सबल का अत्याचार उसे अपनी निष्ठा से विचलित नहीं कर सकता, उसके शरीर आदि वस्तुओं का भले ही नाश कर दे । बल के दुरूपयोग से उसे कोई अपने अधीन नहीं कर सकता। 

        साधन-निधि से सम्पन्न साधक की दृष्टि में शरीर आदि वस्तुओं का नाश कुछ अर्थ नहीं रखता; कारण, कि वह अविनाशी जीवन से अभिन्न हो जाता है । इतना ही नहीं, सर्वात्मभाव होने के कारण वह बल के दुरूपयोग करनेवाले पर भी अपने प्राणों की आहुति देता हुआ उसकी हित-कामना से उस पर विजयी होता है।

        प्राकृतिक नियमानुसार बल का दुरूपयोग निर्बलता को जन्म देता है, अर्थात् सबल बल के दुरूपयोग के कारण स्वयं निर्बल हो जाता है । हाँ, यह अवश्य है कि जो साधक साधन-निधि से सम्पन्न नहीं है, उसी पर भौतिक बल का प्रहार अपना अधिकार जमाता है । अतः किसी को बुरा न समझ कर, किसी का बुरा न चाह कर तथा किसी के साथ बुराई न करके साधन-निधि से सम्पन्न साधक बल के दुरूपयोग की भावना के नाश करने में समर्थ होता है । पराधीनता से उत्पन्न हुई सुख-लोलुपता उससे सबल के अत्याचार को सहन कराती है, जिसका नाश एकमात्र दुःख के प्रभाव से प्रभावित होकर साधन-निधि से सम्पन्न होने से ही सम्भव है ।

- (शेष आगेके ब्लागमें) 'साधन-निधि' पुस्तक से, (Page No. 37-38) ।

Thursday, 10 May 2012

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Thursday, 10 May 2012  
(ज्येष्ठ कृष्ण पंचमी, वि.सं.-२०६९, गुरुवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
किसी का बुरा न चाहना

        जब यह कहा जाता है कि किसी को बुरा न समझो, किसी का बुरा न चाहो एवं किसी की बुराई न करो, तब यह प्रश्न स्वतः उत्पन्न होता है कि जब सबल निर्बलों को सता रहे हैं, तब बेचारा निर्बल कैसे किसी को बुरा न समझे, तथा किसी का बुरा न चाहे? इस समस्या पर विचार करने पर ऐसा विदित होता है कि सबल निर्बल के प्रति बल का रूपयोग तभी करता है, जब किसी को निर्बल पाता है । यदि जीवन में निर्बलता न रहे, तो सबल अत्याचार नहीं कर सकता, यह निर्विवाद सिद्ध है ।

       सबसे बड़ी निर्बलता जीवन में कब आती है ? जब मानव प्रसन्नतापूर्वक मृत्यु को नहीं अपनाता, अपितु सबल के अत्याचार को स्वीकार कर जीना चाहता है । इस निर्बलता ने ही सबल की बल के दुरूपयोग करने की प्रवृति को पोषित किया है। मानव को अपना लक्ष्य अपने प्राणों से अधिक प्रिय होना चाहिए। लक्ष्य की सिद्धि के लिए हर्षपूर्वक प्राणों का त्याग करना आ जाय, तो कोई भी सबल निर्बल को अपने अधीन नहीं कर सकता। परन्तु प्राणों का प्रलोभन उससे अमानवतापूर्ण अत्याचार सहन कराता है ।

        भौतिक निर्बलताओं के कारण सबल के द्वारा किए गए बल के दुरूपयोग को सहन करना और उसके अधीन हो जाना, यह साधक का प्रमाद है, और कुछ नहीं ।

- (शेष आगेके ब्लागमें) 'साधन-निधि' पुस्तक से, (Page No. 36-37) ।

Wednesday, 9 May 2012

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Wednesday, 09 May 2012
(ज्येष्ठ कृष्ण चतुर्थी, वि.सं.-२०६९, बुधवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
किसी का बुरा न चाहना

        अपने पर अपना शासन करने की भावना एवं प्रवृति तभी जाग्रत होती है, जब उसे कोई दूसरा शासित न करे, अपितु आत्मीयतापूर्वक पीड़ित होकर सहयोग प्रदान करे। इस कारण किसी को बुरा समझना, किसी का बुरा चाहना और किसी के प्रति बुराई करना सर्वथा त्याज्य है । यही सर्वांश में बुराई-रहित होने का अचूक उपाय है ।

        बुराई-रहित जीवन की माँग सदैव सभी को रहती है । और बुराई-रहित जीवन में ही साधक का सर्वोतोमुखी विकास होता है। इस दृष्टि से बुराई-रहित होना वर्तमान का  प्रश्न है, जो एकमात्र साधन-निधि के सम्पादन से ही सम्भव है । साधन-निधि में ही साधक का जीवन और साध्य की प्रसन्नता निहित है। साधन-निधि प्रत्येक साधक को उपलब्ध हो सकती है । उससे निराश होना, अपने को उसका अधिकारी न मानना साधक की ही भारी भूल है, जिसका शीघ्रातिशीघ्र अन्त करना अनिवार्य है ।

        किसी को बुरा न समझने, किसी का बुरा न चाहने और किसी के प्रति बुराई बुराई न करने का निर्विकल्प निर्णय श्रम-साध्य उपाय नहीं है, अपितु अपने ही द्वारा अपने को स्वीकार करना है । जो अपने द्वारा करना है, उसमें पराधीनता तथा असमर्थता नहीं है - यह प्राकृतिक विधान है । विधान के आदर में ही मानव का अधिकार है । यह स्वाधीनता उसे उसके निर्माता ने दी है । मिली हुई स्वाधीनता का सदुपयोग ही तो मानव का परम पुरुषार्थ है । इस दृष्टि से साधन-निधि के सम्पादन में प्रत्येक साधक सर्वदा समर्थ है ।

- (शेष आगेके ब्लागमें) 'साधन-निधि' पुस्तक से, (Page No. 36) ।

Tuesday, 8 May 2012

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Tuesday, 08 May 2012
(ज्येष्ठ कृष्ण द्वितीया, वि.सं.-२०६९, मंगलवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
किसी का बुरा न चाहना

     क्षुभित तथा क्रोधित होने पर तो मानव में विनाश की भावना उत्पन्न होती है, जो किसी भी बुराई से कम नहीं है। विनाश की भावना में अपना ही विनाश निहित है; कारण कि 'पर' के प्रति जो किया जाता है, वह अपने प्रति हो जाता है, यह वैधानिक तथ्य है ।

        परहित में, पर-सेवा में साधक का अधिकार है । किसी को बुरा समझने, बुरा चाहने एवं किसी के साथ बुराई करने में साधक को कोई अधिकार नहीं है । इतना ही नहीं, परचिन्तन मात्र से ही साधक का अहित होता है । यद्यपि किसी न किसी नाते सभी अपने हैं । परन्तु जिसके नाते सभी अपने हैं, अपना तो वही है, अपने की प्रियता और उनके नाते सभी की सेवा ही तो साधक का जीवन है ।

       सेवा तभी सिद्ध होती है, जब शासक की भावना का सर्वांश में नाश हो जाय । सेवक शासक नहीं होता और शासक सेवा नहीं कर पाता । किसी को बुरा समझना, किसी का बुरा चाहना और किसी के प्रति किसी भी कारण से बुराई करना शासन की प्रवृति है, सेवा नहीं । शासक शासित का विकास नहीं कर पाता । सेवक के द्वारा सभी का विकास होता है । साधक सभी  के लिए उपयोगी हो, यही तो उसकी वास्तविक माँग है ।

        जो किसी के लिए भी अनुपयोगी होता है, वह साधक नहीं है। किसी के लिए उपयोगी और किसी के लिए अनुपयोगी हो जाना शासन करना है, सेवा नहीं । उसका परिणाम कभी भी हितकर सिद्ध नहीं होता । इतना ही नहीं, दो देशों, दलों, वर्गों, व्यक्तियों आदि में परस्पर वैर-भाव ही दृढ़ होता है, जो विनाश का मूल है। हाँ, साधक अपने ही द्वारा अपने पर शासन करता है और की हुई भूल नहीं दोहराता, अर्थात् वर्तमान निर्दोषता सुरक्षित रखता है, जो सर्वतोमुखी विकास की भूमि है ।

- (शेष आगेके ब्लागमें) 'साधन-निधि' पुस्तक से, (Page No. 35-36) ।

Monday, 7 May 2012

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Monday, 07 May 2012
(ज्येष्ठ कृष्ण प्रतिपदा, वि.सं.-२०६९, सोमवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
किसी का बुरा न चाहना

        बुराई करने की अपेक्षा किसी का बुरा चाहना बहुत बड़ी बुराई है । यद्यपि किसी का बुरा चाहने से उसका बुरा हो नहीं जाता, परन्तु बुरा चाहने से बुरा चाहनेवाले की बहुत  भारी क्षति होती है । इतना ही नहीं, बुराई करने पर तो करनेवाले में परिवर्तन भी आता है और वह बुराई करने से अपने को बचाने का प्रयास भी करने लगता है, किन्तु बुरा चाहने से तो भाव में अशुद्धि आ जाती है ।

      भाव कर्म की अपेक्षा अधिक विभु और स्थायी होता है । इस कारण बुरा चाहने से बुराई करने की अपेक्षा अधिक क्षति होती है। जो किसी का बुरा नहीं चाहता, उसमें सर्वहितकारी भावना तथा करुणा स्वतः जाग्रत होती है । इस दृष्टि से बुरा चाहने की प्रवृति सर्वथा त्याज्य है ।

        जब साधक किसी का बुरा नहीं चाहता, तब उसमें उसके प्रति भी करुणा जाग्रत होती है, जो उसे बुराई करता हुआ प्रतीत होता है और उसके प्रति भी, जिसके प्रति बुराई की जा रही है।  उसकी सद्भावना दोनों ही पक्षों के प्रति समान रहती है । इस कारण उसमें क्षोभ तथा क्रोध की उत्पत्ति ही नहीं होती, जिससे वह स्वभाव से ही कर्तव्यनिष्ठ हो जाता है और उससे सभी का हित होने लगता है । यह ध्रुव सत्य है ।

- (शेष आगेके ब्लागमें) 'साधन-निधि' पुस्तक से, (Page No. 34-35) ।

Sunday, 6 May 2012

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Sunday, 06 May 2012
(वैशाख पूर्णिमा, वि.सं.-२०६९, रविवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
किसी के साथ बुराई न करना

       यदि कोई स्वयं अपने को दोषी स्वीकार करे, तब भी साधक उसे उसकी वर्तमान निर्दोषता का स्मरण दिलाकर उसे सदा के लिए निर्दोषता सुरक्षित रखने की प्रेरणा देता है और उससे वर्तमान निर्दोषता के अनुरूप ही व्यवहार करता है । इस दृष्टि से परस्पर निर्दोषता सुरक्षित रखने का बल प्राप्त होता है ।

        जगत् के प्रति इस प्रकार का सम्बन्ध स्थापित करना जगत् के लिए मंगलकारी है । अपने द्वारा जगत् का अहित न हो, इसमें साधक की अविचल निष्ठा रहनी चाहिए । यह तभी सम्भव होगा, जब वह वर्तमान निर्दोषता के आधार पर किसी को बुरा न समझे और न किसी का बुरा चाहे एवं न किसी के साथ बुराई करे । 

       ऐसा होने पर ही सुगमतापूर्वक जीवन जगत् के लिए उपयोगी होता है, अथवा यों कहो कि जगत् के अधिकार की रक्षा हो जाती है । साधक पर जगत् और जगतपति दोनों का ही अधिकार है । अपने लिए उपयोगी हो जाने पर, अपने अधिकार का प्रश्न ही शेष नहीं रहता, किन्तु साधक के प्रति जगत् की उदारता और जगतपति की कृपालुता सदैव रहती है, यह मंगलमय विधान है ।

- (शेष आगेके ब्लागमें) 'साधन-निधि' पुस्तक से, (Page No. 29-30) ।

Saturday, 5 May 2012

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Saturday, 05 May 2012
(वैशाख शुक्ल चतुर्दशी, वि.सं.-२०६९, शनिवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
किसी के साथ बुराई न करना

       यह सभी को मान्य होगा, कि सर्वांश में कोई बुरा नहीं होता, सभी के लिए कोई बुरा नहीं हो सकता और बुराई नहीं कर सकता । बुराई की उत्पत्ति होती है, अर्थात् उसका कोई स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं है । इसी कारण बुराई न दोहराने से बुराई सदा के लिए मिट जाती है, यह मंगलमय विधान है । इस विधान का आदर करना प्रत्येक साधक के लिए अनिवार्य है । अतः बुराई करने का साधक के जीवन में कोई स्थान ही नहीं है ।

       जब साधक इस महाव्रत को अपना लेता है, तब बुरा नहीं रहता और जब बुरा नहीं रहता, तब बुराई की उत्पत्ति ही नहीं होती, जिसके न होने पर कर्तव्यपरायणता स्वतः आ जाती है, यह निर्विवाद सत्य है ।

        बुराई न करने का व्रत साधक को वर्तमान निर्दोषता से अभिन्न करता है । इस कारण उसके अहम् में से यह धारणा सदा के लिए निकल जाती है कि 'मैं बुरा हूँ' । प्राकृतिक नियमानुसार कर्ता में से ही कर्म की उत्पत्ति होती है । 

        जब साधक वर्तमान निर्दोषता के आधार पर अपने को निर्दोष स्वीकार कर लेता है, तब उसमें पुनः दोषों की उत्पत्ति नहीं होती । इस दृष्टि से बुराई-रहित होने का व्रत प्रत्येक साधक के लिए अनिवार्य है । इतना ही नहीं, दूसरों के सम्बन्ध में भी उसकी यही धारणा हो जाती है कि वर्तमान तो सभी का निर्दोष है।

- (शेष आगेके ब्लागमें) 'साधन-निधि' पुस्तक से, (Page No. 28-29) ।

Monday, 30 April 2012

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Monday, 30 April 2012
(वैशाख शुक्ल नवमी, वि.सं.-२०६९, सोमवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
किसी के साथ बुराई न करना

      निर्दोष जीवन से ही समाज में निर्दोषता व्यापक होती है ।  निर्दोष साधक दोषयुक्त मानव को देख, करुणित होता है, क्षोभित नहीं। उसे परदुःख अपना ही दुःख प्रतीत होता है और करुणित होकर उसके प्रति क्रियात्मक तथा भावात्मक सहयोग देने के लिए तत्पर हो जाता है ।

        उसका परिणाम यह होता है कि अपराधी स्वयं अपने अपराध को देख, निर्दोष होने के लिए आकुल तथा व्याकुल हो जाता है, और फिर वह बड़ी ही सुगमतापूर्वक वर्तमान निर्दोषता को सुरक्षित रखने में समर्थ होता है । इस प्रकार साधननिष्ठ जीवन से समाज में निर्दोषता व्यापक होती है ।

       बल का दुरूपयोग न करने से ही कर्तव्यपरायणता आती है और फिर उसके द्वारा सभी के अधिकार सुरक्षित हो जाते हैं, जिससे समाज में कर्तव्यपरायणता की अभिरुचि जाग्रत होती है।

      कर्तव्यनिष्ठ होने की माँग साधक को अकर्तव्य से रहित कर देती है, जिसके होते ही स्वतः कर्तव्यपरायणता आ जाती है। बुराई-रहित होने से बुराई का नाश होता है, किसी अन्य प्रकार से नहीं । इतना ही नहीं, बुराई के बदले में भी जब भलाई की जाती है तब बुराई करनेवाला बुराई-रहित होने के लिए तत्पर हो जाता है।

- (शेष आगेके ब्लागमें) 'साधन-निधि' पुस्तक से, (Page No. 28) ।

Sunday, 29 April 2012

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Sunday, 29 April 2012
(वैशाख शुक्ल अष्टमी, वि.सं.-२०६९, रविवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
किसी के साथ बुराई न करना

        परिवर्तनशील परिस्थिति मानव का जीवन नहीं हो सकती; कारण, कि जीवन अविनाशी है, विनाशी नहीं। अविनाशी जीवन की उपलब्द्धि किसी परिस्थिति विशेष से सम्बन्ध नहीं रखती । इसी कारण सभी परिस्थितियों में साधक को जीवन की उपलब्धि हो सकती है। इस दृष्टि से साधक का अपना मूल्य प्रत्येक परिस्थिति से अधिक है । पर यह रहस्य तभी स्पष्ट होता है, जब साधक को कर्तव्य-विज्ञान का बोध होता है ।

        यह सभी को मान्य है कि जबतक भूल-रहित होने की तीव्र माँग जाग्रत नहीं होती, तबतक निज-विवेक के प्रकाश में अपनी भूल देखना सम्भव नहीं होता, अर्थात अपने द्वारा अपनी भूल का ज्ञान नहीं होता । भूल के ज्ञान में ही भूल का नाश है । यह मंगलमय विधान है ।

       कर्तव्यनिष्ठ जीवन से दूसरों में अपनी-अपनी भूल देखने की माँग जाग्रत हो जाती है । कर्तव्य-निष्ठ मानव किसी को भयभीत नहीं करता, अपितु भय-रहित होने के लिए सहयोग प्रदान करता है । किसी को भयभीत करने से उसका कल्याण नहीं होता, अपितु किसी-न-किसी अंश में अहित ही होता है । भय देकर कोई भी राष्ट्र अपनी प्रजा को निर्दोष नहीं बना सका, यह अनुभव-सिद्ध सत्य है ।

- (शेष आगेके ब्लागमें) 'साधन-निधि' पुस्तक से, (Page No. 27-28) । 

Saturday, 28 April 2012

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Saturday, 28 April 2012
(वैशाख शुक्ल सप्तमी, वि.सं.-२०६९, शनिवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
किसी के साथ बुराई न करना

       अब विचार यह करना है कि कोई भी व्यक्ति बुराई क्यों करता है ? कर्म कर्ता का चित्र है और कुछ नहीं, अर्थात् कर्ता में से कर्म की उत्पत्ति होती है। जबतक मानव भूल से अपने को बुरा नहीं बना लेता, तबतक उससे बुराई नहीं होती । बुराई तभी कम हो सकती है, जब कर्ता बुरा न रहे । बुराई के बदले में बुराई करने से उत्तरोत्तर बुराई की वृद्धि होती है । उससे बुराई की निवृति नहीं होती । अतएव बुराई के बदले में भी बुराई न करना बुराई मिटाने में हेतु है ।

       इस दृष्टि से सर्वप्रथम प्रत्येक मानव को अपने को साधक स्वीकार करना अनिवार्य है । फिर अपने और जगत् के सम्बन्ध पर विचार करना चाहिए, तभी कर्तव्य-विज्ञान का भलीभाँती परिचय होगा, जिसके होने पर कर्तव्यपरायणता आएगी, जो जगत् के लिए उपयोगी सिद्ध होगी । 

        कर्तव्यपरायणता प्राप्त परिस्थिति से सम्बन्ध रखती है। इसी कारण उसको पालन करने में मानव सर्वदा स्वाधीन तथा समर्थ है । परन्तु अपने को साधक स्वीकार किए बिना परिस्थिति में जीवन-बुद्धि उत्पन्न होती है, जिसके होने से मानव परिस्थितियों का दास हो जाता है और फिर प्राप्त परिस्थिति का सदुपयोग नहीं कर पाता और अप्राप्त परिस्थितियों के चिन्तन में आबद्ध हो जाता है, जो विनाश का मूल है ।

- (शेष आगेके ब्लागमें) 'साधन-निधि' पुस्तक से, (Page No. 26-27) । 

Friday, 27 April 2012

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Friday, 27 April 2012
(वैशाख शुक्ल षष्ठी, वि.सं.-२०६९, शुक्रवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
किसी के साथ बुराई न करना

     बुराई को 'बुराई' जानकर न करना कर्तव्य-विज्ञान का आरम्भ है, किन्तु बुराई की उत्पत्ति ही न हो, यह कर्तव्य-विज्ञान की पूर्णता है ।

      किसी भय से भयभीत होकर बुराई न करना कर्तव्य की ओर अग्रसर होने का सहयोगी उपाय मात्र है, बुराई-रहित होना नहीं है। बुराई-रहित हुए बिना कर्तव्यपरायणता की अभिव्यक्ति ही नहीं होती ।

        बलपूर्वक की हुई भलाई कर्ता में अभिमान को जन्म देती है, जो भारी भूल है । जबतक मानव बलपूर्वक की हुई भलाई के आधार पर जीवित रहता है, तबतक उसमें प्रदोष-दर्शन की रूचि बनी रहती है, जो उसे कर्तव्य-विज्ञान से परिचित नहीं होने देती। इसका परिणाम यह होता है कि वह दूसरों पर शासन करने लगता है, जिसका साधक के जीवन में कोई स्थान ही नहीं है ।

      शासन के द्वारा समाज में से अकर्तव्य का अन्त नहीं हुआ, यह सभी विचारशीलों का अनुभव है । भूल-जनित वेदना से ही मानव बुराई-रहित होता है । सजगता आने पर ही भूल-जनित वेदना उदित होती है, जो कर्तव्यनिष्ठ बनाने में समर्थ है। अतएव यह निर्विवाद सिद्ध है कि व्यक्ति को समाज के प्रति बुराई नहीं करनी है, अपितु अपने प्रति होनेवाली बुराई का उत्तर भी बुराई से नहीं देना है ।

- (शेष आगेके ब्लागमें) 'साधन-निधि' पुस्तक से, (Page No. 26) । 

Wednesday, 25 April 2012

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Wednesday, 25 April 2012
(वैशाख शुक्ल चतुर्थी, वि.सं.-२०६९, बुधवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
किसी को बुरा न समझना 

        पराधीनता से ही विवश होकर मानव वह करने लगता है, जो नहीं करना चाहिए। उससे उत्तरोत्तर पराधीनता की ही वृद्धि होती है । वास्तव में तो जो नहीं करना चाहिए, उसके न करने में ही मानव की स्वाधीनता है, और इसी प्रयोग से पराधीनता नष्ट होती है । इस दृष्टि से स्वाधीनतापूर्वक ही स्वाधीनता की उपलब्धि होती है ।

      स्वाधीन होने के लिए अपनी ओर न देखना और दूसरों से आशा करना भारी भूल है । 'पर' के द्वारा हमें जो कुछ मिलता है, वह पराधीनता में ही आबद्ध करता है । साधक को जगत् के लिए उपयोगी होना है, जगत् से कुछ लेना नहीं है । भला पर-प्रकाश्य, परिवर्तनशील, उत्पत्ति-विनाश-युक्त जगत् से आशा की जाय! वह बेचारा दे ही क्या सकता है ?

        जब साधक किसी को बुरा नहीं समझता, किसी की बुराई नहीं चाहता और किसी भी भय तथा प्रलोभन से बुराई करने के लिए तत्पर नहीं होता, तब उसका जीवन जगत् के लिए अनुपयोगी नहीं रहता, अपितु उपयोगी हो जाता है । यह मंगलमय विधान है ।

- (शेष आगेके ब्लागमें) 'साधन-निधि' पुस्तक से, (Page No. 34) । 

Tuesday, 24 April 2012

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Tuesday, 24 April 2012
(वैशाख शुक्ल अक्षयतृतीया, वि.सं.-२०६९, मंगलवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
किसी को बुरा न समझना 

       अब विचार यह करना है कि व्यक्ति तथा समाज में से असमर्थता का नाश कैसे हो? सर्वहितकारी सद्भावना तथा प्राप्त सामर्थ्य के सदुपयोग से ही असमर्थता मिट सकती है। सामर्थ्य के सदुपयोग से उत्तरोत्तर सामर्थ्य की वृद्धि होती है, यह प्राकृतिक विधान है ।

        सामर्थ्य का दुरूपयोग न करें, इसके लिए यह आवश्यक है कि साधक किसी को बुरा न समझे । दूसरों को बुरा समझने मात्र से ही क्षोभ तथा क्रोध उत्पन्न होता है, जो सामर्थ्य का सदुपयोग नहीं करने देते । इस कारण बड़ी ही सजगतापूर्वक दूसरों के प्रति अपने कर्तव्य का निर्णय करना चाहिए ।

       असमर्थता का भूल मानव की अपनी भूल है और कुछ नहीं। भूल-रहित करने के लिए साधक को स्वयं भूल-रहित होना अनिवार्य है । अपनी भूल से ही मानव आप पराधीनता में जीवन-बुद्धि स्वीकार करता है और जन्मजात स्वाधीनता से विमुख हो जाता है । 

        जिसमें पराधीनता नहीं रहती, वह असमर्थ नहीं रहता, और जो असमर्थ नहीं रहता, वह मिली हुई सामर्थ्य का दुरूपयोग नहीं करता । इस दृष्टि से पराधीनता का सर्वांश में नाश करना अनिवार्य है, जो एकमात्र सत्संग से प्राप्त साधन-निधि से ही सम्भव है ।

- (शेष आगेके ब्लागमें) 'साधन-निधि' पुस्तक से, (Page No. 33) । 

Monday, 23 April 2012

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Monday, 23 April 2012
(वैशाख शुक्ल द्वितीया, वि.सं.-२०६९, सोमवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
किसी को बुरा न समझना 

         अधिकतर तो सुनकर, अथवा अनुमानमात्र से ही दूसरों को बुरा समझ लिया जाता है । इतना ही नहीं, इन्द्रिय दृष्टि से किसी की वास्तविकता का बोध ही नहीं होता । अधूरी जानकारी के आधार पर किसी को दोषी मान लेना, उसके प्रति अन्याय और अपने में बुराई को जन्म देने के अतिरिक्त और कुछ नहीं है । पर यह रहस्य वे ही साधक जान पाते हैं, जिन्होंने सभी के प्रति सद्भावना तथा आत्मीयता स्वीकार की है ।

        समस्त दोषों का मूल मानव की अपनी असमर्थता है और कुछ नहीं । असमर्थता जीवन में तब आती है, जब मानव अपने लक्ष्य को भूलता है । लक्ष्य की विस्मृति से ही मिली हुई सामर्थ्य का दुरूपयोग करता है और उसके परिणाम में स्वयं असमर्थ हो जाता है ।

        सामर्थ्य के दुरूपयोग से ही समाज में दोषों की उत्पत्ति होती है । सामर्थ्य का सदुपयोग असमर्थ की असमर्थता मिटाने में है, किसी को असमर्थ बनाने में नहीं । पर इस वास्तविकता को भूल जाने से सामर्थ्य का दुरूपयोग रोकने के लिए मिली हुई सामर्थ्य द्वारा उसे असमर्थ बनाते हैं । उसका परिणाम कभी भी हितकर नहीं होता ।

        थोड़ी देर के लिए ऐसा प्रतीत होने लगता है कि बलपूर्वक सामर्थ्य का दुरूपयोग रोक दिया, पर वास्तव में ऐसा होता नहीं। सामर्थ्य के दुरूपयोग से सभी में असमर्थता की ही वृद्धि होती है और उसकी प्रतिक्रिया सामर्थ्य का दुरूपयोग करने के लिए ही प्रेरित करती है । अतः सामर्थ्य का उपयोग असमर्थता के मिटाने में है, किसी को असमर्थ  बनाने में नहीं ।

- (शेष आगेके ब्लागमें) 'साधन-निधि' पुस्तक से, (Page No. 32-33) । 

Sunday, 22 April 2012

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Sunday, 22 April 2012
(वैशाख शुक्ल प्रतिपदा, वि.सं.-२०६९, रविवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
किसी को बुरा न समझना 

        किसी में बुराई की स्थापना करना, उसके लिए और अपने लिए अहितकर ही है । किसी को बुरा समझने पर अपने में अशुद्ध संकल्पों की उत्पत्ति होती है और क्षोभ तथा क्रोध उत्पन्न होता है, जो कर्तव्य की विस्मृति में हेतु है। अशुद्ध संकल्पों से किसी-न-किसी अंश में अशुद्ध कर्म होने ही लगता है । इस दृष्टि से दूसरों को बुरा समझने से अपने में बुराई उत्पन्न हो जाती है ।

       यदि किसी को बुरा न समझे, तो उसमें अशुद्ध संकल्प उत्पन्न नहीं होते और न वैर-भाव की उत्पत्ति होती है, अपितु समता आ जाती है, जिसके आते ही सर्वात्म-भाव जाग्रत होता है, जो विकास की भूमि है । किसी-न-किसी नाते समस्त विश्व अपना है । अपने में दोष की स्थापना करना, न तो न्याय है और न प्रेम ।

        अब यदि कोई यह कहे कि दोषी न मानने से, उसे भयभीत न करने से दोषी में दोषों की प्रवृति उत्तरोत्तर बढ़ती ही रहेगी, जो समाज के लिए अहितकर है । पर वास्तव में बात ऐसी नहीं है; कारण, कि किसी में दोषों की उत्पत्ति होती ही कब है ? जब वह अपने को दोषी बना लेता है ।

        अब विचार यह करना है कि वह अपने को दोषी क्यों बना लेता है ? पर-दोष देख, क्षुभित होने से, अथवा यों कहो कि जब उसके साथ कोई बुराई करता है, तब अपने को निर्दोष मानकर बुराई के बदले में बुराई करने के लिए अपने को बुरा बनाता है। पर उसे इस बातका स्वयं पता नहीं रहता कि बुराई का प्रतिकार करने के लिए मैं स्वयं बुरा हो गया ।

        बुराई का प्रतिकार प्राकृतिक नियमानुसार बुराई करना नहीं है, अपितु क्षमाशील होकर, करूणित होकर उसके प्रति भलाई करना अथवा हित-कामना करना है । सभी के प्रति हित-कामना बिना स्वीकार किए, निर्दोषता व्यापक नहीं हो सकती । इस कारण बुराई-काल में ही यदि हम उसे बुराई न करने दें, आत्मीयतापूर्वक आदर और प्यार दें, करूणित होकर उसकी भूल से स्वयं दुखी हो जाएँ, उसके कर्तव्य की ओर संकेत करें तथा उसे उसकी महिमा से परिचित कराकर हृदय से लगाएँ तो वह अवश्य बुराई-रहित  हो जाएगा ।  

- (शेष आगेके ब्लागमें) 'साधन-निधि' पुस्तक से, (Page No. 31-32) । 

Saturday, 21 April 2012

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Saturday, 21 April 2012
(वैशाख अमावस्या, वि.सं.-२०६९, शनिवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
किसी को बुरा न समझना 

        जब अपराधी भूल-जनित दोष से पीड़ित होता है, तब उसमें से दोष-जनित सुख-लोलुपता मिट जाती है, जिसके मिटते ही पुनः दोष न दोहराने की तीव्र माँग जाग्रत होती है । पर जब उसे दूसरा अपराधी मानने लगता है, तब वह क्षुभित तथा क्रोधित होकर दूसरों के दोष देखने लगता है । दूसरों का दोष देखते ही अपने में से दोषी होने की वेदना शिथिल होने लगती है । इससे उसका और दूसरों का अहित ही होता है ।

         इसी कारण दूसरों के द्वारा किया हुआ न्याय निर्दोषता की स्थापना नहीं कर पाता । परन्तु जब वर्तमान निर्दोषता के आधार पर अपराधी को कोई दोषी नहीं मानता, तब अपराधी स्वयं भूतकाल की भूल को न दोहराने के लिए तत्पर हो जाता है और वर्तमान निर्दोषता में स्थिर होकर सदा के लिए निर्दोष हो जाता है। इस दृष्टि से अपने द्वारा ही अपने प्रति न्याय करना हितकर सिद्ध होता है ।

        यदि अपराधी की वर्तमान निर्दोषता को स्वीकार नहीं किया जाता, तो उसकी अहंता में से अपराधी-भाव निवृत नहीं होता और फिर वह अपराधी होकर अपराध करने में तत्पर हो जाता है।

        सर्वांश में तो कोई अपराधी होता ही नहीं । बड़े-से-बड़े हिंसक में भी किसी न किसी के प्रति करुणा होती है । बेईमान भी अपने साथी के लिए ईमानदार सिद्ध होता है । इतना बुरा कोई हो ही नहीं सकता, जो सभी के साथ सदैव बुराई करे । सर्वांश में निज-ज्ञान का अनादर करना किसी भी मानव के लिए सम्भव ही नहीं है । इस दृष्टि से सर्वांश में कोई दोषी होता ही नहीं, यह प्राकृतिक तथ्य है । अतः किसी को बुरा समझना बुराई करने की अपेक्षा गुरुतर भूल है ।  

- (शेष आगेके ब्लागमें) 'साधन-निधि' पुस्तक से, (Page No. 30-31) । 

Friday, 20 April 2012

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Friday, 20 April 2012
(वैशाख कृष्ण चतुर्दशी, वि.सं.-२०६९, शुक्रवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
किसी को बुरा न समझना 

        किसी भी साधक को किसी को बुरा समझने का अधिकार ही नहीं है; कारण, कि दूसरे के सम्बन्ध में पूरा जानना सम्भव नहीं है। अधूरी जानकारी के आधार पर निर्णय  देना न्याय नहीं है । न्याय करने का अधिकार किसी व्यक्ति को किसी भी व्यक्ति के प्रति नहीं है । व्यक्ति समाज के अधिकार की रक्षा कर सकता है, किसी के प्रति बलपूर्वक न्याय नहीं कर सकता ।

      न्याय तो प्रत्येक साधक अपने ही प्रति कर सकता है । न्याय का सर्वप्रथम अंग है, "अपराधी अपने अपराध से परिचित हो जाय, अर्थात् अपनी भूल से उत्पन्न अपराध को स्वीकार करे, किन्तु सदा के लिए सर्वांश में अपने को अपराधी न माने ।"

        प्राकृतिक नियमानुसार कोई भी सदा के लिए दोषी होकर नहीं रहना चाहता और सर्वांश में कोई दोषी भी नहीं है । सभी में स्वभाव से ही निर्दोषता की माँग है । आंशिक दोष की उत्पत्ति भूल-जनित है, स्वभाव-जनित नहीं; कारण, कि दोष का स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं है ।

- (शेष आगेके ब्लागमें) 'साधन-निधि' पुस्तक से, (Page No. 30) । 

Thursday, 19 April 2012

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Thursday, 19 April 2012
(वैशाख कृष्ण त्रयोदशी, वि.सं.-२०६९, गुरुवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
जगत् के लिए उपयोगी होना

         अपने लिए उपयोगी होने पर जीवन जगत् और जगत्पति के लिए उपयोगी होता है, यह निर्विवाद सत्य है। परन्तु अब विचार यह करना है कि जगत् के लिए उपयोगी होने के लिए साधक में किस साधन-निधि की अभिव्यक्ति होती है ? इस सम्बन्ध में विचार करने से यह स्पष्ट विदित होता है कि जब साधक अपने लिए उपयोगी हो जाता है, तब उसे मिली हुई वस्तु, योग्यता, सामर्थ्य आदि की अपेक्षा नहीं रहती ।

        उसका परिणाम यह होता है कि उसके द्वारा मिली हुई वस्तु, योग्यता, सामर्थ्य का दुरूपयोग नहीं होता, अपितु स्वभाव से ही सदुपयोग होने लगता है । इतना ही नहीं, बुराई के बदले में भी वह बुराई नहीं करता । यही कर्तव्य-विज्ञान है । कर्तव्य-विज्ञान से सुन्दर समाज का निर्माण होता है, यह मंगलमय विधान है । 

- (शेष आगेके ब्लागमें) 'साधन-निधि' पुस्तक से, (Page No. 25-26) ।

Monday, 9 January 2012

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Monday, 09 January 2012
(पौष शुक्ल पूर्णिमा, वि.सं.-२०६८, सोमवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
अहंकृत-रहित होना

        जिसने हमारा और जगत् का निर्माण किया, उसने अपने ही में से किया है । इस दृष्टि से हम और जगत् उससे अभिन्न हैं। किन्तु प्रमाद के कारण आज हमें जगत् और जगत्पति से भिन्नता प्रतीत होती है । इस भिन्नता का अन्त किए बिना जीवन उपयोगी नहीं हो सकता ।

        जब हम जगत् से कुछ आशा करते हैं, तब जगत् से भिन्नता प्रतीत होती है और जब जगत्पति में हमारी अगाध प्रियता नहीं रहती, तब उनसे हमारी भिन्नता प्रतीत होती है ।

        यदि विचारपूर्वक जगत् से आशा न करें और मिली हुई वस्तु, योग्यता, सामर्थ्य, जो जगत्पति ने जगत् की सेवा के लिए दी है, वे उसी कि सेवा में अर्पित कर दें, तो शरीर आदि से असंगता और जगत् से अभिन्नता स्वतः हो जाएगी, जिसके होते ही शरीर और विश्व की एकता स्वतः सिद्ध होगी । शरीर और विश्व की एकता का अनुभव हमें जगत्पति से नित्य सम्बन्ध तथा आत्मीयता जाग्रत करने में सहयोगी होगा, कारण, कि जब शरीर अपना करके नहीं रहा, तब अपनी अहंता उन्हीं की आत्मीयता में परिणत हो गई, जिन्होंने मेरा और जगत् का निर्माण किया था । इस दृष्टि से मानव अचाह हो कर जगत्पति से अभिन्न हो, कृतकृत्य हो जाता है ।

        अचाह होते ही सेवा और प्रेम सहज हो जाता है । प्रेम से सेवा और सेवा से प्रेम पोषित होता है । अथवा यों कहो कि प्रेम का क्रियात्मक रूप सेवा और सेवा का लक्ष्य प्रेम है । प्रेम किसी प्रकार की भिन्नता नहीं रहने देता, यह प्रेम की महिमा है ।

        पर जबतक साधक अपने लिए कुछ भी करता है, तबतक सेवा और प्रेम का अधिकारी नहीं होता । जिसे अपने लिए कुछ भी करना नहीं है, वही अपने लिए उपयोगी सिद्ध होकर सभी के लिए उपयोगी होता है ।

 -  'साधन-निधि' पुस्तक से । (Page No. 24-25)

Sunday, 8 January 2012

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Sunday, 08 January 2012
(पौष शुक्ल चतुर्दशी, वि.सं.-२०६८, रविवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
अहंकृत-रहित होना

        प्राप्त ज्ञान का प्रकाश मिली हुई सामर्थ्य, वस्तु, योग्यता आदि से सम्बन्ध-विच्छेद करने की प्रेरणा देता है, अर्थात् वास्तविकता को स्पष्ट करता है । वास्तविकता को अपनाते ही अपना करके वही सिद्ध होता है, जो अपने को जानता है । साधक जिसको (संसार को) जानता है, वह उसका अपना नहीं है, अपने लिए नहीं है, यही सिद्ध होता है ।

        कैसी विचित्र बात है कि अपने वे (संसार के रचयिता) हैं, जिन्हें हम नहीं जानते, अपितु जो हमें जानते हैं । उन्हीं में अविचल आस्था-श्रद्धा और विश्वास पूर्वक आत्मीयता स्वीकार करना है । मिली हुई किसी भी वस्तु, योग्यता, सामर्थ्य आदि ने एक बार भी नहीं कहा कि हम तुम्हारे हैं ।

        हम जो (संसार के रचयिता) अपने हैं, उन्हें अपना न मानकर, जो अपना नहीं हैं, उसे (संसार को) अपना मानते हैं। इस भूल का अन्त करने के लिए प्रत्येक साधक को ममता, कामना, तथा अधिकार-लोलुपता को त्याग, अहंकृत-रहित होना अनिवार्य है । तभी जीवन अपने लिए उपयोगी होगा । अपने लिए उपयोगी होते ही जगत् के प्रति उदारता और जगत्पति के लिए प्रेम स्वतः जाग्रत होता है । यह मंगलमय विधान है ।

 - (शेष आगेके ब्लाग में) 'साधन-निधि' पुस्तक से । (Page No. 24)