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Thursday, 15 March 2012

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Thursday, 15 March 2012
(चैत्र कृष्ण अष्टमी, वि.सं.-२०६८, गुरुवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
सन्त उद्बोधन

45.    जो अपने में नहीं है, वह कभी भी अपने को नहीं चाहिए - यही वास्तविक त्याग है। इसको अपनाये बिना चिर-शान्ति, जीवन-मुक्ति तथा परम प्रेम की प्राप्ति नहीं हो सकती ।

46.    निर्लोभता के बिना दरिद्रता का, निर्मोहता के बिना भय का, निष्कामता के बिना अशान्ति का और असंगता के बिना पराधीनता का नाश नहीं होता । यह दैवी विधान है ।

47.    देहाभिमान रहते हुए कभी भी कोई भी पराधीनता आदि विकारों से रहित नहीं हो सकता । इस दृष्टि से सुख, सुविधा, सम्मान की वासना का अन्त करना अनिवार्य है, जो एकमात्र सत्य को स्वीकार करने पर ही सम्भव है ।

48.    आंशिक साधना के आधार पर अपने को सन्तुष्ट करना बड़ी ही भयंकर असाधना है । इससे सजग साधक को बड़ी ही सावधानीपूर्वक अपने को बचाना चाहिए । यह तभी सम्भव होगा जब साधक को आंशिक असाधना भी असह्य हो जाय । उसके लिए आंशिक साधना को साधना नहीं मानना चाहिए ।

49.    असाधन प्राकृतिक नहीं है । मानव अपनी ही भूल से असत् के संग को अपनाकर असाधन को जन्म देता है । जिसे मानव ने अपनी भूल से उत्पन्न किया है, उसका नाश भूल-रहित होने पर ही होगा । इस दृष्टि से भूल-रहित होने में ही मानव का पुरुषार्थ है। भूल-रहित होने के लिए अपनी भूल का अनुभव करना अत्यन्त आवश्यक है । अपनी भूल का अनुभव तभी होगा, जब आंशिक साधना को अपनी साधना स्वीकार न किया जाय, अपितु आंशिक असाधन को भूल मान लिया जाय । 

- ‘सन्त उद्बोधन’ पुस्तक से (Page No. 24-26) [For details, please read the book]

Wednesday, 14 March 2012

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Wednesday, 14 March 2012
(चैत्र कृष्ण सप्तमी, वि.सं.-२०६८, बुधवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
सन्त उद्बोधन

39.    मेरा कुछ नहीं है, यह जानने की बात है और बुराई रहित होना, यह धर्म है, धारण करने की बात है । तो धर्म को धारण करो, भूल रहित हो जाओ और परमात्मा को मान लो। आपका जीवन कल्याणमय हो जाएगा ।

40.    भगवान् की दृष्टि से हम कभी ओझल नहीं हैं, उनकी सत्ता से हम कभी बाहर नहीं हैं । हम भगवान् की महिमा स्वीकार नहीं करते, उनके अस्तित्व को स्वीकार नहीं करते, तो उससे भगवान् हमको दूर मालूम होते हैं ।

41.    भगवान् के अस्तित्व को स्वीकार करना ही तो आस्तिकता है और महत्व को स्वीकार करना ही भगवान् की स्तुति है और भगवान् के सम्बन्ध को स्वीकार करना ही उपासना है।

42.    भगवान् के अस्तित्व को, महत्व को और सम्बन्ध को स्वीकार करना अपना काम है और उस स्वीकृति को सजीव कर देना, यह प्रभु का काम है । जब हम अपना काम ठीक कर देते हैं तो प्रभु का काम ठीक होता रहता है, इसमें कमी होती नहीं है।

43.     साधक के जीवन में असफलता के लिए कोई स्थान ही नहीं है - इस महावाक्य में अविचल आस्था करते ही सफलता की उत्कृष्ट लालसा तीव्र होती है, जो समस्त कामनाओं को भस्मीभूत कर साधक को साध्य से अभिन्न कर देती है । यह सजग साधकों का अनुभव है ।

44.    अपने परम प्रेमास्पद सदैव अपने ही में हैं । उनमें अपनी अविचल आस्था रहनी चाहिए । प्रेमास्पद के अस्तित्व तथा महत्व को स्वीकार कर उनसे आत्मीय सम्बन्ध अत्यन्त आवश्यक है । आत्मीय सम्बन्ध से ही साधक में अखण्ड स्मृति तथा अगाध प्रियता की अभिव्यक्ति होती है ।

(शेष आगेके ब्लागमें) - ‘सन्त उद्बोधन’ पुस्तक से (Page No. 19-24) [For details, please read the book]

Tuesday, 13 March 2012

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Tuesday, 13 March 2012
(चैत्र कृष्ण षष्ठी, वि.सं.-२०६८, मंगलवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
सन्त उद्बोधन

31.    जगत् की उदारता, प्रभु की कृपालुता और सत्पुरुषों की सद्भावना - ये प्रत्येक साधक के साथ सदैव रहती हैं ।

32.    एकान्त का पूरा लाभ तब होता है जब हमारा सम्बन्ध एक ही से रह जाये । अनेक सम्बन्ध लेकर एकान्त में जाते हैं तो उतना लाभ नहीं होता, जितना होना चाहिए । हमारे सम्बन्ध पहले बदलने चाहिए । एक से रहे, अनेक से नहीं ।

33.    संसार परमात्मा की प्राप्ति में बाधक नहीं है, बल्कि सहायक है । उसका जो हम सम्बन्ध स्वीकार करते हैं वही बाधक है।

34.    परमात्मा कहाँ है, कैसा है, क्या है - इसके पीछे न पड़ते हुए 'परमात्मा' है, यह मान लेना चाहिए । इससे बहुत लाभ होता है ।

35.    अपनी भूल को जान लेने से भी बड़ा लाभ होता है । क्योंकि भूल को जानने से वेदना होती है और वेदना से भूल नाश होती है और भूल रहित होने से अपना हित होता है ।

36.    मौन का अर्थ खाली चुप होना नहीं है, बल्कि न सोचना भी है, न देखना भी है अपनी ओर से । मुझे जो चाहिए सो तो मुझमें है, फिर इंद्रियों की क्या अपेक्षा ?

37.    मौन के पीछे एक दर्शन है कि हमको जो चाहिए वह अपने में है, अपना है और अभी है । यही सर्वश्रेष्ठ परमात्मवाद है ।

38.    भगवान की महिमा का कोई वारापार नहीं है । पसन्द भर करना हमारा काम है; बाकी तो भगवान की अहैतुकी कृपा सारा काम स्वतः कर देती है ।

(शेष आगेके ब्लागमें) - ‘सन्त उद्बोधन’ पुस्तक से (Page No. 17-19) [For details, please read the book]

Monday, 12 March 2012

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Monday, 12 November 2012
(चैत्र कृष्ण चतुर्थी, वि.सं.-२०६८, सोमवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
सन्त उद्बोधन

25.    जबतक तुम बुरे नहीं होते, बुराई नहीं पैदा होती। मन में कोई विकृति नहीं है। ........... अपनी खराबी ठीक करो, मन ठीक हो जाएगा। तुम किसी को बुरा मत समझो, मन में बुरी बात कभी नहीं आएगी । तुम किसी का बुरा मत चाहो, मन में बुरी बात कभी नहीं आएगी । तुम किसी के साथ बुराई मत करो, मन में बुरी बात कभी नहीं आएगी । हमारी भूल मन में दिखती है । भूल हम करते हैं और नाम मन का रख देते हैं। बुराई करनेवाला खुद दुःखी होता है और दूसरों को भी दुःखी करता है ।

26.    अपने को बुरा मानोगे, तो बुराई करोगे । अपने को भला मानोगे, तो भलाई करोगे । और भला-बुरा कुछ नहीं मानोगे, तो परमात्मा में रहोगे ।

27.    मनुष्य सर्वांश में बुरा नहीं हो सकता, पर सर्वांश में भला हो सकता है ।

28.    जिसके करने की सामर्थ्य प्राप्त हो, जिसमें किसी का अहित न हो, जिसके बिना करे नहीं रह सकते हो और जिसका सम्बन्ध वर्तमान से हो - ऐसा काम ही जरूरी होता है ।

29.    संसार कभी आपसे नहीं कहता कि मुझे पसन्द करो, तुम्हीं पसन्द करते हो । संसार की किसी वस्तु ने कभी कहा है कि मैं तुम्हारी हूँ ? तुम्हारे मकान ने कहा हो, तुम्हारी जेब के पैसों ने कहा हो, तुम्हारी इंद्रियों ने कहा हो । तुम्हारे शरीर से लेकर संसार की जितनी भी चीजें हैं, उनमें से किसने कहा कि मैं तुम्हारी हूँ ? तुम बिना वजह 'अपना-अपना' गीत गाते हो । कहते हो 'मेरा मन', 'मेरा हाथ' आदि ।

30.    जानी हुई बुराई करो मत और जो बुराई कर चुके हो, उसे दोहराओ मत । तो आगे बढ़ जाओगे ।

(शेष आगेके ब्लागमें) - ‘सन्त उद्बोधन’ पुस्तक से (Page No. 15-17) [For details, please read the book]

Sunday, 11 March 2012

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Sunday, 11 March 2012
(चैत्र कृष्ण तृतीया, वि.सं.-२०६८, रविवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
सन्त उद्बोधन

18.    सेवा, त्याग और प्रेम तीनों इकट्ठे हो गए, भजन हो गया । भजन में सेवा भी है, त्याग भी है और प्रेम भी है।

19.    भगवान को जबतक अपना नहीं मानोगो तबतक भगवान प्यारा लगेगा नहीं और भगवान जबतक प्यारा लगेगा नहीं, तबतक उसकी याद आयेगी नहीं और जबतक याद नहीं आयेगी, तबतक भजन होगा नहीं ।

20.    प्रभु की महिमा स्वीकार करो, स्तुति हो गयी । प्रभु से सम्बन्ध स्वीकार करो, उपासना हो गयी । प्रभु के प्रेम की आवश्यकता अनुभव करो, प्रार्थना हो गयी ।

21.    मनुष्य में तीन बातें होती हैं - भोग की वृति होती है, जिज्ञासा होती है और भगवद्-प्राप्ति की लालसा होती है । तो भोग की वृति का त्याग कर दो, जिज्ञासा पूरी हो जाएगी और भगवद्-प्राप्ति की लालसा उदय हो जाएगी ।

22.    हमें देखना चाहिए कि हमारा सम्बन्ध हमारी ओर से किसके साथ है ? परमात्मा के साथ है या जगत् के साथ है; अच्छाई के साथ है या बुराई के साथ है ? हमको क्या पसन्द आता है ? अगर हमको परमात्मा का सम्बन्ध अच्छा लगता है, तो संसार का सम्बन्ध अपने आप ही टूट जाएगा । अगर संसार का सम्बन्ध हमने तोड़ दिया है, तो परमात्मा से सम्बन्ध अपने आप हो जाएगा । तो आपके और परमात्मा के बीच संसार पर्दा नहीं है, उससे सम्बन्ध पर्दा है ।

23.    प्रेम करने का तरीका आज तक संसार में कोई बतला नहीं सका, और निकला भी नहीं है । तरीके से प्रेम नहीं हुआ करता, क्योंकि प्रेम का तरीका होता, तो जो काम तरीके से हो सकता है वह मशीन से भी हो सकता है । तब तो आज के वैज्ञानिक युग में प्रेम प्राप्त करने की मशीन भी बन जातीं । तो प्रेम करने का कोई तरीका नहीं है, पर प्रेम करना सबको आता है । ......... परमात्मा अपना है, उसे अपना बनालें, तो वह प्यारा लगता है ।

24.    आप सुनना और सीखना बंद करें और जानना और मानना प्रारम्भ करें, तो काम बन जाएगा । जानने के स्थान पर - "मेरा कुछ नहीं है" - इसके सिवाय और कुछ नहीं जानना है । और मानने के स्थान पर सिवाय परमात्मा के और कोई मानने में आता नहीं है ।

(शेष आगेके ब्लागमें) - ‘सन्त उद्बोधन’ पुस्तक से (Page No. 13-15) [For details, please read the book]

Saturday, 10 March 2012

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Saturday, 10 March 2012
(चैत्र कृष्ण द्वितीया, वि.सं.-२०६८, शनिवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
सन्त उद्बोधन

9.    सही काम करने से मनुष्य काम-रहित हो जाता है । काम-रहित होने से योग की प्राप्ति होती है । योग की पूर्णता में बोध और प्रेम है ।

10.    जो नहीं कर सकते हो, उसे करने की सोचो मत और जो नहीं करना चाहिए उसे करो मत । जो कर सकते हो, उसे जमा मत रखो, कर डालो । उसके अन्त में आपको योग की प्राप्ति हो जाएगी ।

11.    भोग जब आप करते हैं, तो भोगे हुए का प्रभाव मन पर अंकित हो जाता है, उसका संस्कार जमता है और जब आप शान्त होते हैं, तब वही प्रकट होता है । वह प्रकट होता है नाश होने के लिए, वह नया कर्म नहीं है । आपके भोजन कर लेने के बाद जैसे आपका भोजन बिना जाने और बिना कुछ किए पचता है । तो एक होता है 'करना' और एक होता है 'होना' । ........ तो होने वाली बात को कर्म मत मानो, वह कर्म नहीं है । अगर उससे असहयोग कर लोगे, तो उसका प्रभाव अपने आप नाश हो जाएगा।

12.    संसार से सम्बन्ध है सेवा करने के लिए और परमात्मा से सम्बन्ध है प्रेम करने के लिए । न संसार से कुछ चाहिए, न परमात्मा से कुछ चाहिए ।

13.    संकल्प तो भुक्त इच्छाओं का प्रभाव है और जो पहले भोग कर चुके हैं, उसी के प्रभाव से उठता है ।

14.    संकल्पपूर्ति का सुख ही नवीन संकल्प को जन्म देता है । यदि हम संकल्पपूर्ति का सुख पसन्द करते रहेंगे, तो एक के बाद एक नवीन संकल्प उत्पन्न होता ही रहेगा और अभाव-ही-अभाव पल्ले पड़ेगा ।

15.    संकल्पपूर्ति का सुख मत भोगो व संकल्प-निवृति की शान्ति में रमण मत करो । बस, तब जीवन-मुक्ति प्राप्ति हो जाएगी । 

16.    ज्ञान और सामर्थ्य के अनुसार जो संकल्प उठे, उसे पूरा करके खत्म कर दो । संकल्प वह पूरा करना है जिसमें दूसरों का हित है । उसी को कर्तव्य कहते हैं ।

17.    जो संकल्प कभी पूरा न हो, बार-बार उठे वह ज्ञान विरोधी है, सामर्थ्य विरोधी है । अतः उसका त्याग कर दो । इस प्रकार आप निर्विकल्प हो जाएँगे ।

(शेष आगेके ब्लागमें) - ‘सन्त उद्बोधन’ पुस्तक से (Page No. 11-13) [For details, please read the book]

Friday, 9 March 2012

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Friday, 09 March 2012
(चैत्र कृष्ण प्रतिपदा, होली वसंतोत्सव, वि.सं.-२०६८, शुक्रवार)

सन्त उद्बोधन

1.    शरणागत विश्वासी साधक अपने सभी आत्मीयजनों को समर्थ के हाथों समर्पित करके, निश्चिन्त तथा निर्भय हो जाता है ।

2.    किसी भी विश्वासी शरणागत साधक को कभी भी अधीर नहीं होना चाहिए, कारण कि वह सनाथ है, अनाथ नहीं ।

3.    कुछ नहीं चाहने से ही मोक्ष मिलता है । चाहना ही बन्धन होता है । अगर मालूम होता है कि मेरा कुछ है, मुझे कुछ चाहिए, तो बस बँध गए । अगर तुम्हें यह अनुभव हो जाय कि मेरा कुछ नहीं है, मुझे कुछ नहीं चाहिए, बस मुक्त हो गए ।

4.    जो होती है, उसको मुक्ति थोड़े ही कहते हैं, जो है, उसे मुक्ति कहते हैं । बन्धन बनाने की सामर्थ्य आप ही में है और मुक्त होने की सामर्थ्य भी आप में ही है ।

5.    परमात्मा को जानना चाहिए या मानना चाहिए?......परमात्मा माना जाता है, जाना नहीं जाता । माना हुआ वह परमात्मा माना हुआ नहीं रहता, प्राप्त हो जाता है ।

6.    श्रम और विश्राम जीवन के दो पहलू हैं । श्रम है संसार के लिए और विश्राम है अपने लिए ।

7.    जब कोई काम करने चलो, तो यह मानकर मत चलो कि मुझे क्या लाभ होगा ? बल्कि यह सोचकर चलो कि इससे परिवार को क्या लाभ होगा, संसार को क्या लाभ होगा । बल का जब उपयोग करो तो इस बात को सामने रखो कि किसी दूसरे को उससे हानि तो नहीं होती । यदि हानि है तो वह नहीं करूँगा । तो दूसरों के हित के लिए काम करो, उसको कहते हैं श्रम और अपने लिए विश्राम करो । विश्राम में अमर जीवन है, विश्राम में स्वाधीन जीवन है, विश्राम में सरस जीवन है ।

8.    विश्राम का अर्थ होता है - काम रहित होना । विश्राम सहज है, स्वाभाविक है । सभी के लिए समान रूप से सम्भव है ।

(शेष आगेके ब्लागमें) - ‘सन्त उद्बोधन’ पुस्तक से (Page no. 7-11)

Friday, 18 November 2011

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Friday, 18 November 2011
(मार्गशीर्ष कृष्ण अष्टमी, वि.सं.-२०६८, शुक्रवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
सन्त उद्बोधन

45.    जो अपने में नहीं है, वह कभी भी अपने को नहीं चाहिए - यही वास्तविक त्याग है। इसको अपनाये बिना चिर-शान्ति, जीवन-मुक्ति तथा परम प्रेम की प्राप्ति नहीं हो सकती ।

46.    निर्लोभता के बिना दरिद्रता का, निर्मोहता के बिना भय का, निष्कामता के बिना अशान्ति का और असंगता के बिना पराधीनता का नाश नहीं होता । यह दैवी विधान है ।

47.    देहाभिमान रहते हुए कभी भी कोई भी पराधीनता आदि विकारों से रहित नहीं हो सकता । इस दृष्टि से सुख, सुविधा, सम्मान की वासना का अन्त करना अनिवार्य है, जो एकमात्र सत्य को स्वीकार करने पर ही सम्भव है ।

48.    आंशिक साधना के आधार पर अपने को सन्तुष्ट करना बड़ी ही भयंकर असाधना है । इससे सजग साधक को बड़ी ही सावधानीपूर्वक अपने को बचाना चाहिए । यह तभी सम्भव होगा जब साधक को आंशिक असाधना भी असह्य हो जाय । उसके लिए आंशिक साधना को साधना नहीं मानना चाहिए ।

49.    असाधन प्राकृतिक नहीं है । मानव अपनी ही भूल से असत् के संग को अपनाकर असाधन को जन्म देता है । जिसे मानव ने अपनी भूल से उत्पन्न किया है, उसका नाश भूल-रहित होने पर ही होगा । इस दृष्टि से भूल-रहित होने में ही मानव का पुरुषार्थ है। भूल-रहित होने के लिए अपनी भूल का अनुभव करना अत्यन्त आवश्यक है । अपनी भूल का अनुभव तभी होगा, जब आंशिक साधना को अपनी साधना स्वीकार न किया जाय, अपितु आंशिक असाधन को भूल मान लिया जाय । 

- ‘सन्त उद्बोधन’ पुस्तक से (Page No. 24-26) [For details, please read the book]

Thursday, 17 November 2011

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Thursday, 17 November 2011
(मार्गशीर्ष कृष्ण सप्तमी, वि.सं.-२०६८, गुरुवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
सन्त उद्बोधन

39.    मेरा कुछ नहीं है, यह जानने की बात है और बुराई रहित होना, यह धर्म है, धारण करने की बात है । तो धर्म को धारण करो, भूल रहित हो जाओ और परमात्मा को मान लो। आपका जीवन कल्याणमय हो जाएगा ।

40.    भगवान् की दृष्टि से हम कभी ओझल नहीं हैं, उनकी सत्ता से हम कभी बाहर नहीं हैं । हम भगवान् की महिमा स्वीकार नहीं करते, उनके अस्तित्व को स्वीकार नहीं करते, तो उससे भगवान् हमको दूर मालूम होते हैं ।

41.    भगवान् के अस्तित्व को स्वीकार करना ही तो आस्तिकता है और महत्व को स्वीकार करना ही भगवान् की स्तुति है और भगवान् के सम्बन्ध को स्वीकार करना ही उपासना है।

42.    भगवान् के अस्तित्व को, महत्व को और सम्बन्ध को स्वीकार करना अपना काम है और उस स्वीकृति को सजीव कर देना, यह प्रभु का काम है । जब हम अपना काम ठीक कर देते हैं तो प्रभु का काम ठीक होता रहता है, इसमें कमी होती नहीं है।

43.     साधक के जीवन में असफलता के लिए कोई स्थान ही नहीं है - इस महावाक्य में अविचल आस्था करते ही सफलता की उत्कृष्ट लालसा तीव्र होती है, जो समस्त कामनाओं को भस्मीभूत कर साधक को साध्य से अभिन्न कर देती है । यह सजग साधकों का अनुभव है ।

44.    अपने परम प्रेमास्पद सदैव अपने ही में हैं । उनमें अपनी अविचल आस्था रहनी चाहिए । प्रेमास्पद के अस्तित्व तथा महत्व को स्वीकार कर उनसे आत्मीय सम्बन्ध अत्यन्त आवश्यक है । आत्मीय सम्बन्ध से ही साधक में अखण्ड स्मृति तथा अगाध प्रियता की अभिव्यक्ति होती है ।

(शेष आगेके ब्लागमें) - ‘सन्त उद्बोधन’ पुस्तक से (Page No. 19-24) [For details, please read the book]

Wednesday, 16 November 2011

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Wednesday, 16 November 2011
(मार्गशीर्ष कृष्ण षष्ठी, वि.सं.-२०६८, बुधवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
सन्त उद्बोधन

31.    जगत् की उदारता, प्रभु की कृपालुता और सत्पुरुषों की सद्भावना - ये प्रत्येक साधक के साथ सदैव रहती हैं ।

32.    एकान्त का पूरा लाभ तब होता है जब हमारा सम्बन्ध एक ही से रह जाये । अनेक सम्बन्ध लेकर एकान्त में जाते हैं तो उतना लाभ नहीं होता, जितना होना चाहिए । हमारे सम्बन्ध पहले बदलने चाहिए । एक से रहे, अनेक से नहीं ।

33.    संसार परमात्मा की प्राप्ति में बाधक नहीं है, बल्कि सहायक है । उसका जो हम सम्बन्ध स्वीकार करते हैं वही बाधक है।

34.    परमात्मा कहाँ है, कैसा है, क्या है - इसके पीछे न पड़ते हुए 'परमात्मा' है, यह मान लेना चाहिए । इससे बहुत लाभ होता है ।

35.    अपनी भूल को जान लेने से भी बड़ा लाभ होता है । क्योंकि भूल को जानने से वेदना होती है और वेदना से भूल नाश होती है और भूल रहित होने से अपना हित होता है ।

36.    मौन का अर्थ खाली चुप होना नहीं है, बल्कि न सोचना भी है, न देखना भी है अपनी ओर से । मुझे जो चाहिए सो तो मुझमें है, फिर इंद्रियों की क्या अपेक्षा ?

37.    मौन के पीछे एक दर्शन है कि हमको जो चाहिए वह अपने में है, अपना है और अभी है । यही सर्वश्रेष्ठ परमात्मवाद है ।

38.    भगवान की महिमा का कोई वारापार नहीं है । पसन्द भर करना हमारा काम है; बाकी तो भगवान की अहैतुकी कृपा सारा काम स्वतः कर देती है ।

(शेष आगेके ब्लागमें) - ‘सन्त उद्बोधन’ पुस्तक से (Page No. 17-19) [For details, please read the book]

Tuesday, 15 November 2011

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Tuesday, 15 November 2011
(मार्गशीर्ष कृष्ण पंचमी, वि.सं.-२०६८, मंगलवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
सन्त उद्बोधन

25.    जबतक तुम बुरे नहीं होते, बुराई नहीं पैदा होती। मन में कोई विकृति नहीं है। ........... अपनी खराबी ठीक करो, मन ठीक हो जाएगा। तुम किसी को बुरा मत समझो, मन में बुरी बात कभी नहीं आएगी । तुम किसी का बुरा मत चाहो, मन में बुरी बात कभी नहीं आएगी । तुम किसी के साथ बुराई मत करो, मन में बुरी बात कभी नहीं आएगी । हमारी भूल मन में दिखती है । भूल हम करते हैं और नाम मन का रख देते हैं। बुराई करनेवाला खुद दुःखी होता है और दूसरों को भी दुःखी करता है ।

26.    अपने को बुरा मानोगे, तो बुराई करोगे । अपने को भला मानोगे, तो भलाई करोगे । और भला-बुरा कुछ नहीं मानोगे, तो परमात्मा में रहोगे ।

27.    मनुष्य सर्वांश में बुरा नहीं हो सकता, पर सर्वांश में भला हो सकता है ।

28.    जिसके करने की सामर्थ्य प्राप्त हो, जिसमें किसी का अहित न हो, जिसके बिना करे नहीं रह सकते हो और जिसका सम्बन्ध वर्तमान से हो - ऐसा काम ही जरूरी होता है ।

29.    संसार कभी आपसे नहीं कहता कि मुझे पसन्द करो, तुम्हीं पसन्द करते हो । संसार की किसी वस्तु ने कभी कहा है कि मैं तुम्हारी हूँ ? तुम्हारे मकान ने कहा हो, तुम्हारी जेब के पैसों ने कहा हो, तुम्हारी इंद्रियों ने कहा हो । तुम्हारे शरीर से लेकर संसार की जितनी भी चीजें हैं, उनमें से किसने कहा कि मैं तुम्हारी हूँ ? तुम बिना वजह 'अपना-अपना' गीत गाते हो । कहते हो 'मेरा मन', 'मेरा हाथ' आदि ।

30.    जानी हुई बुराई करो मत और जो बुराई कर चुके हो, उसे दोहराओ मत । तो आगे बढ़ जाओगे ।

(शेष आगेके ब्लागमें) - ‘सन्त उद्बोधन’ पुस्तक से (Page No. 15-17) [For details, please read the book]

Monday, 14 November 2011

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Monday, 14 November 2011
(मार्गशीर्ष कृष्ण गणेश-चतुर्थी, वि.सं.-२०६८, सोमवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
सन्त उद्बोधन

18.    सेवा, त्याग और प्रेम तीनों इकट्ठे हो गए, भजन हो गया । भजन में सेवा भी है, त्याग भी है और प्रेम भी है।

19.    भगवान को जबतक अपना नहीं मानोगो तबतक भगवान प्यारा लगेगा नहीं और भगवान जबतक प्यारा लगेगा नहीं, तबतक उसकी याद आयेगी नहीं और जबतक याद नहीं आयेगी, तबतक भजन होगा नहीं ।

20.    प्रभु की महिमा स्वीकार करो, स्तुति हो गयी । प्रभु से सम्बन्ध स्वीकार करो, उपासना हो गयी । प्रभु के प्रेम की आवश्यकता अनुभव करो, प्रार्थना हो गयी ।

21.    मनुष्य में तीन बातें होती हैं - भोग की वृति होती है, जिज्ञासा होती है और भगवद्-प्राप्ति की लालसा होती है । तो भोग की वृति का त्याग कर दो, जिज्ञासा पूरी हो जाएगी और भगवद्-प्राप्ति की लालसा उदय हो जाएगी ।

22.    हमें देखना चाहिए कि हमारा सम्बन्ध हमारी ओर से किसके साथ है ? परमात्मा के साथ है या जगत् के साथ है; अच्छाई के साथ है या बुराई के साथ है ? हमको क्या पसन्द आता है ? अगर हमको परमात्मा का सम्बन्ध अच्छा लगता है, तो संसार का सम्बन्ध अपने आप ही टूट जाएगा । अगर संसार का सम्बन्ध हमने तोड़ दिया है, तो परमात्मा से सम्बन्ध अपने आप हो जाएगा । तो आपके और परमात्मा के बीच संसार पर्दा नहीं है, उससे सम्बन्ध पर्दा है ।

23.    प्रेम करने का तरीका आज तक संसार में कोई बतला नहीं सका, और निकला भी नहीं है । तरीके से प्रेम नहीं हुआ करता, क्योंकि प्रेम का तरीका होता, तो जो काम तरीके से हो सकता है वह मशीन से भी हो सकता है । तब तो आज के वैज्ञानिक युग में प्रेम प्राप्त करने की मशीन भी बन जातीं । तो प्रेम करने का कोई तरीका नहीं है, पर प्रेम करना सबको आता है । ......... परमात्मा अपना है, उसे अपना बनालें, तो वह प्यारा लगता है ।

24.    आप सुनना और सीखना बंद करें और जानना और मानना प्रारम्भ करें, तो काम बन जाएगा । जानने के स्थान पर - "मेरा कुछ नहीं है" - इसके सिवाय और कुछ नहीं जानना है । और मानने के स्थान पर सिवाय परमात्मा के और कोई मानने में आता नहीं है ।

(शेष आगेके ब्लागमें) - ‘सन्त उद्बोधन’ पुस्तक से (Page No. 13-15) [For details, please read the book]

Sunday, 13 November 2011

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Sunday, 13 November 2011
(मार्गशीर्ष कृष्ण तृतीया, वि.सं.-२०६८, रविवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
सन्त उद्बोधन

9.    सही काम करने से मनुष्य काम-रहित हो जाता है । काम-रहित होने से योग की प्राप्ति होती है । योग की पूर्णता में बोध और प्रेम है ।

10.    जो नहीं कर सकते हो, उसे करने की सोचो मत और जो नहीं करना चाहिए उसे करो मत । जो कर सकते हो, उसे जमा मत रखो, कर डालो । उसके अन्त में आपको योग की प्राप्ति हो जाएगी ।

11.    भोग जब आप करते हैं, तो भोगे हुए का प्रभाव मन पर अंकित हो जाता है, उसका संस्कार जमता है और जब आप शान्त होते हैं, तब वही प्रकट होता है । वह प्रकट होता है नाश होने के लिए, वह नया कर्म नहीं है । आपके भोजन कर लेने के बाद जैसे आपका भोजन बिना जाने और बिना कुछ किए पचता है । तो एक होता है 'करना' और एक होता है 'होना' । ........ तो होने वाली बात को कर्म मत मानो, वह कर्म नहीं है । अगर उससे असहयोग कर लोगे, तो उसका प्रभाव अपने आप नाश हो जाएगा।

12.    संसार से सम्बन्ध है सेवा करने के लिए और परमात्मा से सम्बन्ध है प्रेम करने के लिए । न संसार से कुछ चाहिए, न परमात्मा से कुछ चाहिए ।

13.    संकल्प तो भुक्त इच्छाओं का प्रभाव है और जो पहले भोग कर चुके हैं, उसी के प्रभाव से उठता है ।

14.    संकल्पपूर्ति का सुख ही नवीन संकल्प को जन्म देता है । यदि हम संकल्पपूर्ति का सुख पसन्द करते रहेंगे, तो एक के बाद एक नवीन संकल्प उत्पन्न होता ही रहेगा और अभाव-ही-अभाव पल्ले पड़ेगा ।

15.    संकल्पपूर्ति का सुख मत भोगो व संकल्प-निवृति की शान्ति में रमण मत करो । बस, तब जीवन-मुक्ति प्राप्ति हो जाएगी । 

16.    ज्ञान और सामर्थ्य के अनुसार जो संकल्प उठे, उसे पूरा करके खत्म कर दो । संकल्प वह पूरा करना है जिसमें दूसरों का हित है । उसी को कर्तव्य कहते हैं ।

17.    जो संकल्प कभी पूरा न हो, बार-बार उठे वह ज्ञान विरोधी है, सामर्थ्य विरोधी है । अतः उसका त्याग कर दो । इस प्रकार आप निर्विकल्प हो जाएँगे ।

(शेष आगेके ब्लागमें) - ‘सन्त उद्बोधन’ पुस्तक से (Page No. 11-13) [For details, please read the book]

Saturday, 12 November 2011

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Saturday, 12 November 2011
(मार्गशीर्ष कृष्ण द्वितीया, वि.सं.-२०६८, शनिवार)

सन्त उद्बोधन

1.    शरणागत विश्वासी साधक अपने सभी आत्मीयजनों को समर्थ के हाथों समर्पित करके, निश्चिन्त तथा निर्भय हो जाता है ।

2.    किसी भी विश्वासी शरणागत साधक को कभी भी अधीर नहीं होना चाहिए, कारण कि वह सनाथ है, अनाथ नहीं ।

3.    कुछ नहीं चाहने से ही मोक्ष मिलता है । चाहना ही बन्धन होता है । अगर मालूम होता है कि मेरा कुछ है, मुझे कुछ चाहिए, तो बस बँध गए । अगर तुम्हें यह अनुभव हो जाय कि मेरा कुछ नहीं है, मुझे कुछ नहीं चाहिए, बस मुक्त हो गए ।

4.    जो होती है, उसको मुक्ति थोड़े ही कहते हैं, जो है, उसे मुक्ति कहते हैं । बन्धन बनाने की सामर्थ्य आप ही में है और मुक्त होने की सामर्थ्य भी आप में ही है ।

5.    परमात्मा को जानना चाहिए या मानना चाहिए?......परमात्मा माना जाता है, जाना नहीं जाता । माना हुआ वह परमात्मा माना हुआ नहीं रहता, प्राप्त हो जाता है ।

6.    श्रम और विश्राम जीवन के दो पहलू हैं । श्रम है संसार के लिए और विश्राम है अपने लिए ।

7.    जब कोई काम करने चलो, तो यह मानकर मत चलो कि मुझे क्या लाभ होगा ? बल्कि यह सोचकर चलो कि इससे परिवार को क्या लाभ होगा, संसार को क्या लाभ होगा । बल का जब उपयोग करो तो इस बात को सामने रखो कि किसी दूसरे को उससे हानि तो नहीं होती । यदि हानि है तो वह नहीं करूँगा । तो दूसरों के हित के लिए काम करो, उसको कहते हैं श्रम और अपने लिए विश्राम करो । विश्राम में अमर जीवन है, विश्राम में स्वाधीन जीवन है, विश्राम में सरस जीवन है ।

8.    विश्राम का अर्थ होता है - काम रहित होना । विश्राम सहज है, स्वाभाविक है । सभी के लिए समान रूप से सम्भव है ।

(शेष आगेके ब्लागमें) - ‘सन्त उद्बोधन’ पुस्तक से (Page no. 7-11)