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Tuesday, 17 January 2012

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Tuesday, 17 January 2012
(माघ कृष्ण नवमी, वि.सं.-२०६८, मंगलवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
प्रश्नोत्तरी

प्रश्न - स्वामीजी ! वैराग्य का क्या स्वरूप है और वह कैसे होता है ?
उत्तर - देखो, मनुष्य को जब वैराग्य होता है, तब सत्य की खोज के अलावा और कोई बात उसे नहीं सूझती । वह तो सबकुछ त्याग करके तत्परता से सत्य की खोज में लग जाता है । वह किसी की कुछ परवाह नहीं करता। वह अपने शारीरिक सुखों का त्याग कर देता है । जबतक सत्य की प्राप्ति नहीं होती, तबतक वह किसी भी हालत में चैन से नहीं रहता । जब मनुष्य संसार से अपना सम्बन्ध-विच्छेद कर देता है, उससे मिलनेवाले सुखों को ठुकरा देता है तथा सब का परित्याग करके सत्य की खोज के लिए निकल पड़ता है, तब संसार के प्रति उसका कुछ भी कर्तव्य शेष नहीं रह जाता है ।
        अब प्रश्न यह है कि वैराग्य की प्राप्ति कैसे हो ? जबतक जीवन में राग है, तबतक वैराग्य की प्राप्ति नहीं हो सकती। वैराग्य की प्राप्ति का अचूक साधन तो अपने विवेक का आदर करना है ।  

प्रश्न - शिवलिंग की पूजा क्यों की जाती है ?
उत्तर - लिंग की नहीं, शिव की पूजा की जाती है । जिसकी स्वयं की कोई आकृति नहीं होती, उसमें प्रतीक की स्थापना की जाती है । "मैं" भी तो एक लिंग है । अपने में ही निराकार की स्थापना कर लो । मनुष्य तीन गुणों से बना है । कोई सत् प्रधान है, कोई रज प्रधान है, तो कोई तम प्रधान है । भगवान् राम में राजसी स्वभाव है । श्रीकृष्ण में अनन्त सौंदर्य-माधुर्य है । श्रीशिव वैराग्य प्रधान हैं, आशुतोष हैं, विचारक और गुणातीत हैं ।

प्रश्न - 'स्वधर्म' का मतलब क्या है ?
उत्तर - 'स्वधर्म' सर्वश्रेष्ठ है । स्वधर्म पालन से व्यक्ति साधन-निष्ठ हो जाता है । ज्ञानपूर्वक अनुभव करें कि सृष्टि में मेरा कुछ नहीं है । सृष्टि से सम्बन्ध तोड़ने की प्रेरणा और परमात्मा से सम्बन्ध जोड़ने की प्रेरणा 'स्वधर्म' देता है । 'स्वधर्म' का मतलब है, 'स्व' का धर्म । श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा था कि सर्व धर्मों को छोड़कर मेरी शरण में आ जा ।

प्रश्न - आजकल आदमी धर्म पर क्यों नहीं चलते ?
उत्तर - भोग में रूचि रखते हैं, योग में नहीं ।

प्रश्न - आत्मा क्या है ?
उत्तर - अपने को जो अनुभव करे वह है आत्मा । आत्मा में जो बैठा हुआ है वह है परमात्मा । जो देखा जाय, वह है अनात्मा। जो माना जाय वह है परमात्मा । अतः जो अनात्मा से भिन्न है, वह है आत्मा ।  

-'प्रश्नोत्तरी' पुस्तक से, (Page No. 20-21) । 

Monday, 16 January 2012

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Monday, 16 January 2012
(माघ कृष्ण अष्टमी, वि.सं.-२०६८, सोमवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
प्रश्नोत्तरी

प्रश्न - मार खाना भी उदारता है क्या ?
उत्तर - कमजोर हमेशा पिटता रहता है । उदारता आत्मीय सम्बन्ध से होती है। उदारता माने, विश्व-जीवन से एकता । बलवान बनिए । करुणित होइए । 

प्रश्न - हनुमानजी के चित्र में, हृदय में रामजी की फोटो बनी है। क्या यह सही है ?
उत्तर - अरे ! भाव पर फोटो बनी है, चित्र में नहीं ।
दिल का हुजरा साफ कर, आनेवाले के लिए ।
ख्याल गैरों का उठा, उसे बैठाने के लिए ।।
पहले दिल की सफाई करनी है । 

प्रश्न - प्राण क्या है ?
उत्तर - प्राण कहते हैं, जिससे शरीर काम करे । प्राण जीवनी-शक्ति है ।

प्रश्न - स्वामीजी ! साधन करने में स्वस्थ शरीर की भी जरूरत है क्या ?
उत्तर - साधन में वास्तव में तो स्वस्थ शरीर की जरूरत नहीं है। शरीर का स्वस्थ अथवा रोगी रहना, यह तो एक परिस्थिति है। परिस्थिति चाहे कैसी भी हो, साधन-सामग्री से भिन्न कुछ है ही नहीं । शरीर चाहे स्वस्थ रहे, अथवा रोगी । साधक इसे महत्व न दे। फिर भी यदि शरीर स्वस्थ रहे, तो अच्छी बात है । साधन का निर्माण तो सत्संग से होता है । सत्संग स्वधर्म है, शरीर धर्म नहीं। उसमें तो प्राप्त परिस्थिति का सदुपयोग करना है ।

प्रश्न - प्रत्यक्ष जगत् की तरह भगवत् सत्ता पर किस प्रकार विश्वास हो ? इसका कोई सुगम उपाय बताने की कृपा करें ।
उत्तर - इंद्रियों के ज्ञान में सद्भाव एवं विषयों की वासना तथा शरीर में अहं-बुद्धि, इन तीनों कारणों से जगत् की सत्ता प्रत्यक्ष प्रतीत होती है । इन तीनों कारणों के मिट जाने पर भगवत् सत्ता पर विश्वास हो जाता है । 

प्रश्न - मुझे साधन करते हुए एक अर्सा हो गया, किन्तु अभी तक सफलता के दर्शन नहीं हुए, क्या कारण है ?
उत्तर - जो मनुष्य असाधन को बनाए रखकर साधन करते हैं, उनको बहुत दिनों तक साधन करने पर भी वर्तमान में सिद्धि नहीं मिल सकती ।
        जो मनुष्य वस्तु और व्यक्ति का आश्रय लेकर साधन करना चाहते हैं, उनको भी सफलता नहीं मिलती । इसलिए भगवान् का आश्रय लेकर साधन करो, सफलता अवश्य मिलेगी।
        जो साधक देशकाल, परिस्थिति, वस्तु व व्यक्ति का आश्रय छोड़कर साधन करता है, उसको शीघ्र सफलता मिलती है।
          'स्व' में सन्तुष्ट रहो, मानवता को महत्व दो और प्रभु पर विश्वास करो - यही साधन है और इसी का नाम जीवन है। जिसके जीवन में ये बातें आ जाती हैं, उसको सफलता अवश्य मिलती है । 

-(शेष आगेके ब्लागमें) 'प्रश्नोत्तरी' पुस्तक से, (Page No. 18-20) । 

Sunday, 15 January 2012

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Sunday, 15 January 2012
(माघ कृष्ण सप्तमी, मकरसंक्रान्ति, वि.सं.-२०६८, रविवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
प्रश्नोत्तरी

प्रश्न - स्वामीजी ! होली का क्या महत्व है ?
उत्तर - राग-द्वेष को अग्नि में जला दो, देहाभिमान को मिट्टी में मिला दो और प्रेम के रंग में रँग जाओ । 

प्रश्न - क्या व्यक्तिगत सम्पत्ति होनी चाहिए ?
उत्तर - व्यक्तिगत सम्पत्ति अवश्य होनी चाहिए, परन्तु उसे अपनी और अपने लिए नहीं मानना चाहिए ।

प्रश्न - स्वामीजी ! बोध किसे कहते हैं ?
उत्तर - सभी के मूल में एक अनुत्पन्न नित्य तत्व है । उसी की स्वतन्त्र सत्ता है । इसका ज्ञान होना ही बोध है ।

प्रश्न - स्वामीजी ! समाज के संघर्ष का क्या कारण है ?
उत्तर - हम दूसरों को क्षति पहुँचाकर जीना चाहते हैं । यही कारण है समाज में संघर्ष का ।

प्रश्न - महाराजजी ! मोह को बड़ा बलवान कहा जाता है, क्यों ?
उत्तर - देखो ! मायिक पदार्थ और ऐहिक सुख, यह सब नाशवान है। इनमें ममता करना तथा इनकी कामना करना - यह मनुष्य की भूल ही है । इनका वियोग तो एक दिन होगा ही । अगर इनमें ममता होगी, तो इनके वियोग-काल में दुःख ही होगा । इसलिए इनको दुःख रूप भी कहा है । अतः इन नाशवान और दुःखरूप पदार्थों के लिए अपना परलोक बिगाड़ देना बड़ी भारी भूल है ।
        सच्चा बुद्धिमान तो वही है, जिसने सुख-भोग की आसक्ति को त्याग कर भगवान् में आत्मीयता करके शरणागत होकर अपना लोक व परलोक बना लिया एवं अपना कल्याण कर लिया। भोगों की आसक्ति त्याग कर भगवान् की शरण ग्रहण करो। यही कल्याण का सही व सच्चा मार्ग है । इसी में मानव-जीवन की सफलता व सार्थकता है । 

प्रश्न - पता चलता है कि संसार है और आगे भी रहेगा । क्या यह सत्य है ?
उत्तर - यह जो मानते हो संसार है, यह गलत है । जो दिख रहा है उसकी स्थिति नहीं है । उसे क्यों मानते हो ?

-(शेष आगेके ब्लागमें) 'प्रश्नोत्तरी' पुस्तक से, (Page No. 17-18) । 

Saturday, 14 January 2012

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Saturday, 14 January 2012
(माघ कृष्ण पंचमी, वि.सं.-२०६८, शनिवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
प्रश्नोत्तरी

प्रश्न - महाराजजी ! सत्य की प्राप्ति में कितना समय लगता है ?
उत्तर - जिसकी जितनी तीव्र जिज्ञासा होती है, उसे उतना ही कम समय लगता है । जब आप सत्य के बिना चैन से न रहेंगे, वह उसी समय मिल जाएगा। 

प्रश्न - स्वामीजी, यदि घर की प्रतिकूलता के कारण साधन न हो सके, तो क्या साधक को घर छोड़ देना चाहिए ?
उत्तर - सच्चा मानव-सेवा-संघी कभी घर नहीं छोड़ता, बल्कि ममता, कामना और अपना अधिकार छोड़ता है ।

प्रश्न - महाराजजी, क्या मैं घरबार छोड़कर आश्रम में रह सकता हूँ ?
उत्तर - मानव-सेवा संघ किसी का घर बर्बाद करके आश्रम को आबाद नहीं करना चाहता । परन्तु यदि आपका परिवार आप पर निर्भर न हो और घर में आप सुख-दुःख का सदुपयोग न कर सकें, तो आ जायें ।

प्रश्न - महाराजजी ! धन का अभाव क्यों सताता है ?
उत्तर - तुम धन को अधिक महत्व देते हो ।

प्रश्न - महाराजजी ! जब मैं ध्यान करने बैठता हूँ, तो कभी तो खूब शान्ति रहती है और कभी ऐसा लगता है कि क्रिया-शक्ति का वेग अभी बाकी है ।
उत्तर - करने का राग अभी निवृत नहीं हुआ ।

प्रश्न - स्वामीजी ! साधन में सफलता नहीं मिल रही है ।
उत्तर - अपनी रूचि, योग्यता और सामर्थ्य के अनुरूप साधन-निर्माण नहीं किया ।

प्रश्न - स्वामीजी ! भगवान् छिपा क्यों रहता है ?
उत्तर - भगवान् के प्रति आस्था, श्रद्धा, विश्वासपूर्वक आत्मीयता और प्रियता जाग्रत नहीं हुई । 

प्रश्न - स्वामीजी, मन में बहुत विकार पैदा होते हैं, क्या करूँ ?
उत्तर - गहरी वेदना होनी चाहिए ।

-(शेष आगेके ब्लागमें) 'प्रश्नोत्तरी' पुस्तक से, (Page No. 16-17) । 

Friday, 13 January 2012

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Friday, 13 January 2012
(माघ कृष्ण चतुर्थी, वि.सं.-२०६८, शुक्रवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
प्रश्नोत्तरी

प्रश्न - विवेक और बुद्धि में क्या अन्तर है ?
उत्तर - विवेक प्रकाश है, बुद्धि दृष्टि है । जैसे दृष्टि प्रकाश में काम करती है, वैसे ही बुद्धि विवेक के प्रकाश में काम करती है । विवेक का आदर करने से बुद्धि विवेकवती हो जाती है । विवेकवती बुद्धि की बड़ी महिमा है । 

प्रश्न - जिज्ञासा तीव्र क्यों नहीं होती ?
उत्तर - क्योंकि सन्देह की वेदना निर्जीव है ।

प्रश्न - कैसे समझें कि ममता का नाश हो गया ?
उत्तर - पेट भरने पर क्या आपने परोसने वाले से पूछा कि मेरा पेट भरा या नहीं ? ममता का त्याग होने पर आपको स्वतः विदित हो जाएगा ।

प्रश्न - मानव सेवा संघ के दर्शन में सेवा, त्याग और प्रेम की बात कही जाती है । इनमें से किसी एक को लेकर चला जाय या तीनों को ?
उत्तर - हर मानव को तीन शक्तियाँ विधान से मिली हैं  - 
1. करने की शक्ति (कर्तव्य-पथ)
2. जानने की शक्ति (ज्ञान-पथ)
3. मानने की शक्ति (विश्वास-पथ)
इन तीनों शक्तियों में से किसी एक शक्ति की प्रधानता होती है। अतः साधक में जिस शक्ति की प्रधानता हो, उसी को लेकर चलना चाहिए । शेष दो शक्तियों का विकास और सदुपयोग अपने आप हो जाएगा । साधक चाहे तो तीनों को साथ-साथ लेकर भी चल सकता है ।

प्रश्न - यह जानते हुए भी कि ममता और कामना जीवन में नहीं रखनी चाहिए, जब हमारे उपर कोई दुःख आता है तो दुखी होकर विचलित हो जाते हैं । इससे छुटकारा पाने का उपाय क्या है ?
उत्तर - जिन वस्तुओं और व्यक्तियों द्वारा हम सुख भोगने की आशा करते हैं, उनके वियोग से अवश्य ही दुखी होना पड़ेगा। अतः यदि हम चाहें कि दुःख से छुटकारा मिले, तो वस्तु, व्यक्ति, परिस्थिति एवं अवस्था से हमें सुख भोगना अथवा सुख की आशा करना छोड़ देना चाहिए । तब जीवन से दुःख अवश्य ही चला जाएगा ।

प्रश्न - बेईमान दुनियाँ में ईमानदारी आदमी कैसे जिए ?
उत्तर - बेईमानी का कारण लोभ है । निर्लोभता में दरिद्रता का नाश है ।

-(शेष आगेके ब्लागमें) 'प्रश्नोत्तरी' पुस्तक से, (Page No. 15-16) । 

Thursday, 12 January 2012

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Thursday, 12 January 2012
(माघ कृष्ण तृतीया, वि.सं.-२०६८, गुरुवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
प्रश्नोत्तरी

प्रश्न - माँग कैसे पूरी होती है ?
उत्तर - माँग तीन प्रकार से होती है। कामना को लेकर, लालसा को लेकर तथा जिज्ञासा को लेकर। भोगों की कामना, सत्य की जिज्ञासा और प्रभु-प्रेम की लालसा। जिज्ञासा कहते हैं जानने की इच्छा को। लालसा कहते हैं प्रभु पाने की इच्छा को और कामना कहते हैं भोगों की इच्छा को । जिसमें भोग की कामना, सत्य की जिज्ञासा और परमात्मा की लालसा - ये तीनों बातें होती हैं, उसे "मैं" कहते हैं । कामना भूल से उत्पन्न होती है, उसकी निवृति (प्राप्त निज-विवेक के आदर से) हो सकती है । जिज्ञासा की पूर्ति हो जाती है । फिर प्रभु की प्राप्ति हो जाती है । अतः कामना की निवृति, जिज्ञासा की पूर्ति और परमात्मा की प्राप्ति मनुष्य को हो सकती है । 

प्रश्न - दुःख की निवृति कैसे हो ?
उत्तर - वासनाओं की निवृति होने से दुःख की निवृति होती है । जब साधक विवेक का आदर करके यह समझ लेता है कि "मैं शरीर नहीं हूँ", तब वासनाओं और संकल्पों का अभाव हो जाता है। इसके होते ही दुःख मिट जाते हैं । इंद्रियों और मन के क्रिया-रहित हो जाने पर वासनाओं का अन्त अपने आप हो जाता है ।

प्रश्न - मुझे क्या करना चाहिए ?
उत्तर - यदि बिना किए रह सको, तो कुछ भी नहीं करना चाहिए। यदि बिना किए न रह सको, तो सब कुछ करना चाहिए । भोगों के बाद शोक की प्राप्ति निश्चित है । प्रत्येक कर्म के दो फल होते हैं। एक दृश्य जो अपने आप मिट जाता है । दूसरा अदृश्य जो फल की कामना न होने पर मिट जाता है । अतः जो कुछ करो, चाह-रहित, चिन्तन-रहित और फल की आशा से रहित होकर करो। जिस साधन से प्रभु से सम्बन्ध जुड़े वही करना चाहिए। अतः करना हो तो सेवा करो अथवा त्याग करो ।

प्रश्न - कभी तो ऐसा मालूम होता है कि हृदय में प्रेम है और कभी ऐसा मालूम होता है कि हृदय सुना है, प्रेम नहीं है । यह क्या है ?
उत्तर - आश्चर्य की बात तो यह है कि मनुष्य संसार पर जितना भरोसा करता है, उतना भगवान् पर नहीं करता । संसार पर भरोसा करके बहुत बार धोखा खाया है । भगवान् पर भरोसा करनेवाले को कभी धोखा नहीं हुआ । 
        मनुष्य स्वयं अलग रहकर अपने मन, बुद्धि और इंद्रियों को भगवान् में लगाना चाहता है । भूल यहीं से होती है । प्रेम का सम्बन्ध साधक से है, उसकी बुद्धि, मन व इंद्रियों से नहीं है ।
        परम प्रियतम प्रभु को ही अपना मानें, उसी पर विश्वास करें और उसी से प्रेम करें । मनुष्य अनित्य वस्तुओं से सुख की आशा करके उनमें आसक्त हो गया है । इससे ही वह ईश्वर-प्रेम से विमुख हो गया है ।

-(शेष आगेके ब्लागमें) 'प्रश्नोत्तरी' पुस्तक से, (Page No. 13-14) । 

Wednesday, 11 January 2012

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Wednesday, 11 January 2012
(माघ कृष्ण द्वितीया, वि.सं.-२०६८, बुधवार)

प्रश्नोत्तरी

प्रश्न - कर्म से स्थाई प्रसन्नता क्यों नहीं मिलती है ?
उत्तर - कर्म, शरीर, व संसार, इन तीनों का स्वरूप एक ही है । इनकी कोई स्वतन्त्र सत्ता नहीं है । जिसकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं है उससे स्वतन्त्रता नहीं मिल सकती। स्वतन्त्रता के बिना प्रसन्नता कहाँ ? अतः कर्मादि से प्रसन्नता नहीं मिल सकती ।

प्रश्न - कर्म किस प्रकार करना चाहिए ?
उत्तर - कर्म विश्व-प्रेम के भाव से करना चाहिए । ऐसा करने से भोगों का यथार्थ ज्ञान हो जाता है । भोगों का यथार्थ ज्ञान होने पर त्याग अपने आप होता है । फिर कर्म करने में रूचि नहीं रहती। करने के राग की निवृति हो जाती है और योग प्राप्त होता है।

प्रश्न - मनुष्य को शान्ति क्यों नहीं मिलती ?
उत्तर - कामना पूरी करने के लिए कर्म करने से शान्ति नहीं मिलती । साधक यदि चित-शुद्धि का प्रयत्न करे, तो शान्ति अपने आप आ जाती है ।

प्रश्न - भगवान् हमसे प्रेम करते हैं, यह कैसे मालूम हो ?
उत्तर - भगवान् पर विश्वास हो और उनसे हमारा सम्बन्ध हो, तब मालूम हो सकता है । जैसे माता अपने बच्चे के लिए तरसती है, वैसे ही भगवान् अपने भक्त के लिए तरसते हैं । बच्चा काला-कलूटा, गूँगा-बहरा, लूला-लँगड़ा कैसा भी हो, माता उससे प्रेम करती है । बच्चा भी यह बात समझता है । भगवान् में तो माता से अनेक गुना वात्सल्य है । फिर वे भक्त से प्रेम करें, इसमें कहना ही क्या ? अतः जो एकमात्र भगवान् को ही मानते हैं, उनको भगवान् का प्रेम मिलता है । इसमें सन्देह नहीं है। यह भक्तों का अनुभव है । ईश्वर प्रेमीभक्त को ढूँढ़ता है। विचारशील साधक ईश्वर को ढूँढ़ता है ।

प्रश्न - अपने दोष कैसे देखें और उसको कैसे मिटाएँ ?
उत्तर  - गुण और दोषों को देखने की शक्ति प्रत्येक मनुष्य में विद्यमान है । जिस योग्यता से हम दूसरों के दोषों को देखते हैं, उसी योग्यता से अपने दोषों को देखें । अपने दोषों को ठीक-ठीक देख लेने पर गहरा दुःख होता है । गहरा दुःख होने से दोष दूर हो जाते हैं । दूसरों के दोष और अपने गुण देखने से मनुष्य का विकास रुक जाता है और अभिमान पुष्ट होता है ।

-(शेष आगेके ब्लागमें) 'प्रश्नोत्तरी' पुस्तक से, (Page No. 12-13) । 

Monday, 17 October 2011

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Monday, 17 October 2011
(कर्तिक कृष्ण पंचमी, वि.सं.-२०६८, सोमवार)


प्रश्नोत्तरी

प्रश्न - आसक्ति-रहित होकर कार्य करने से क्या तात्पर्य है ?
उत्तर - जिस कार्य को करने में अपना सुख निहित नहीं होता, जो सर्वहितकारी दृष्टि से किया जाता है, वह आसक्ति-रहित कार्य कहलाता है ।

प्रश्न - हम दूसरों के दोष क्यों देखते हैं ?
उत्तर - क्योंकि हम अपने दोषों को नहीं देखते ।

प्रश्न - पूजा का क्या अर्थ है ?
उत्तर - संसार को भगवान् का मानकर उन्हीं की प्रसन्नतार्थ संसार से मिली हुई वस्तुओं को संसार की सेवा में लगा देना ही पूजा है ।

प्रश्न - स्तुति, उपासना तथा प्रार्थना का क्या अर्थ है ?
उत्तर - प्रभु के अस्तित्व एवं महत्व को स्वीकार करना ही स्तुति है । प्रभु से अपनत्व का सम्बन्ध स्वीकार करना उपासना है और प्रभु-प्रेम की आवश्यकता अनुभव करना प्रार्थना है ।

प्रश्न - भगवत्प्राप्ति में विघ्न क्या है ?
उत्तर  - संसार को पसन्द करना ही सबसे बड़ा विघ्न है ।

प्रश्न - दुःख क्यों होता है ?
उत्तर - सुख-भोग से ही दुःख रूप वृक्ष उत्पन्न होता है । ऐसा कोई भी दुःख नहीं है, जिसका जन्म सुख-भोग से न हुआ हो ।

प्रश्न - दुःख और सुख का परिणाम क्या है ?
उत्तर - जो सुख किसी का दुःख बनकर मिलता है वह मिट कर कभी न कभी बहुत बड़ा दुःख हो जाता है और जो दुःख किसी का सुख बन कर मिलता है वह मिट कर कभी न कभी आनन्द प्रदान करता है । प्राणी सुख से बँधता और दुःख से छूट जाता है । सुख से दुःख और दुःख से आनन्द मिलता है ।

प्रश्न - त्याग क्या है ?
उत्तर - संसार की अनुकूलता व प्रतिकूलता पर विश्वास का अत्यन्त अभाव ही सच्चा त्याग है । क्योंकि अनुकूलता से राग और प्रतिकूलता से द्वेष का जन्म होता है । राग-द्वेष का अभाव हो जाना ही त्याग है। जिस प्रकार लड़की पिता के घर कन्या, ससुराल में बहू और पुत्रवती होने पर माता कहलाती है, उसी प्रकार त्याग ही प्रेम और प्रेम ही ज्ञान कहलाता है । त्याग होने पर आस्तिकता आ जाती है, तब त्याग प्रेम में बदल जाता है और आस्तिकता का यथार्थ अनुभव होने पर प्रेम ही ज्ञान में बदल जाता है । 

-'प्रश्नोत्तरी' पुस्तक से, पृष्ठ सं॰ ११-१२ (Page No. 11-12) ।

Sunday, 16 October 2011

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Sunday, 16 October 2011
(कर्तिक कृष्ण चतुर्थी, वि.सं.-२०६८, रविवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
प्रश्नोत्तरी

प्रश्न - सच्चा सुख मानव को कब और कैसे मिल सकता है ?
उत्तर - वास्तव में मानव जीवन की यही सबसे बड़ी समस्या है । इसके हल करने में प्राणी सदा स्वतन्त्र है । इस प्रश्न पर गम्भीरतापूर्वक विचार न करना बड़ी भारी भूल है ।
        मानवता प्राप्त होने पर मनुष्य को वह सुख मिल जाता है जिसमें दुःख नहीं होता अर्थात् सच्चा सुख मिल जाता है ।
         सहज भाव से मूक भाषा में प्रेम-पात्र से प्रार्थना करो - "हे नाथ ! इस हृदय को अपनी प्रीति से भर दो । इस शरीर को दुखियों की सेवा में लगा दो । बुद्धि को विवेकवती बना दो । इस जगत् रूपी  वाटिका में मुझे एक सुन्दर पुष्प बना दो । मैं सदा आपकी कृपा की प्रतीक्षा में रहूँ।" ऐसी प्रार्थना करने से प्रेम-पात्र तुम्हें अपनी सेवा करने के योग्य अवश्य बना लेंगे, ऐसा मेरा विश्वास है ।

प्रश्न - शारीरिक कष्टों को कैसे भूला जाय ?
उत्तर - भूला नहीं जाय, सहा जाय - चिंता एवं विलाप से रहित होकर । यह तप है । तप से शक्ति बढ़ती है । भूलने से तो जड़ता आवेगी । शरीर से तितिक्षा होनी चाहिए । तितिक्षा का अर्थ है, हर्षपूर्वक कष्ट को सहन करना ।

प्रश्न - मानव-सेवा-संघ की पहली प्रार्थना में यह कहा जाता है कि दुखियों के हृदय में त्याग का बल प्रदान करें । दुःखी बेचारा क्या त्याग करेगा ?
उत्तर - जब मनुष्य कुछ चाहता है और उसका चाहा नहीं होता है, तो वह दुःख का अनुभव करता है । इससे सिद्ध हुआ कि दुःख का कारण 'चाह' है । अतः अगर दुःखी दुःख से छुट्टी पाना चाहता है, तो उसे चाह का त्याग कर देना चाहिए । चाह का त्याग करने में मानव-मात्र स्वाधीन है ।

(शेष आगेके ब्लागमें)
-'प्रश्नोत्तरी' पुस्तक से, पृष्ठ सं॰ १० (Page No. 10) ।

Saturday, 15 October 2011

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Saturday, 15 October 2011
(कर्तिक कृष्ण तृतीया, वि.सं.-२०६८, शनिवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
प्रश्नोत्तरी

प्रश्न - दुःखी होना और करुणित होना एक बात है क्या?
उत्तर - नहीं, दुःख में जड़ता आती है । करुणा में चेतनता आती है, संसार से सम्बन्ध टूटता है ।

प्रश्न - शारीरिक रोग आने पर दुःख क्यों होता है ?
उत्तर - 'मैं शरीर हूँ' या 'शरीर मेरा है' - ऐसा समझने से दुःख होता है ।

प्रश्न - रोगी को दुःख न सताए, इसके लिए क्या करना चाहिए ?
उत्तर - रोग प्राकृतिक तप है, ऐसा मानकर उसे हर्षपूर्वक सहन कर लेना चाहिए ।

प्रश्न - रोगी व्यक्ति को रोगावस्था में क्या करना चाहिए ?
उत्तर - प्रत्येक अवस्था में प्रभु की अहैतुकी कृपा का अनुभव होता रहे और हृदय उनकी प्रीति से भरा रहे । शरीर के रहने, न रहने से साधकों को कोई लाभ-हानि नहीं होती । शरीर को बनाये रखने की कामना का त्याग आवश्यक है ।

प्रश्न - दुःख क्यों भोगना पड़ता है ?
उत्तर - सुख के भोगी को दुःख भोगना ही पड़ता है, ऐसा नियम ही है । सुख-भोग की रूचि के नाश के लिए रोग आता है ।

प्रश्न - बीमारी से क्यों डर लगता है ?
उत्तर - रोग शारीरिक बल का आश्रय तोड़ने के लिए आता है । उससे साधकों को डरना नहीं चाहिए, अपितु उसका सदुपयोग करना चाहिए ।

प्रश्न - रोग का सदुपयोग क्या है ?
उत्तर - दुःख का प्रभाव होना चाहिए । रोग देह की वास्तविकता का अनुभव करा देता है । शरीर से व्यक्ति को असंग करने में रोग सहायता देता है |

प्रश्न - रोग का निदान या दवा क्या है ?
उत्तर - शरीर के राग से निवृत होना ही साधक का लक्ष्य होना चाहिए। शारीरिक स्वास्थ्य का यथा-शक्ति ध्यान रख कर, शरीर की सेवा करनी चाहिए - ऐसा करने से शरीर के रोग का अन्त हो जाता है । शरीर सेवा-सामग्री है । साधक की प्रार्थना होनी चाहिए - "हे प्रभु ! यह शरीर विश्व के काम आ जाय, अहम् अभिमान-शून्य हो जाय एवं हृदय प्रेम से भर जाय ।"

(शेष आगेके ब्लागमें)
-'प्रश्नोत्तरी' पुस्तक से, पृष्ठ सं॰ ८-९ (Page No. 8-9) ।

Friday, 14 October 2011

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Friday, 14 October 2011
(कर्तिक कृष्ण द्वितीया, वि.सं.-२०६८, शुक्रवार)


प्रश्नोत्तरी

प्रश्न - महाराज जी ! धर्मात्मा कौन होता है ?
उत्तर - जिसकी समाज को आवश्यकता हो जाय ।

प्रश्न - व्यर्थ-चिन्तन से कैसे बचा जाय ?
उत्तर - व्यर्थ-चिन्तन भुक्त-अभुक्त का प्रभाव है । आप उससे असहयोग करें । न उसे दबाएं, न उससे सुख लें, न भयभीत हों और न तादात्म्य रखें । तो व्यर्थ-चिन्तन प्रकट होकर नाश हो जाएगा ।

प्रश्न - स्वामी जी ! हम क्या करें ?
उत्तर - सेवा, त्याग और आस्था । सेवा का अर्थ है उदारता, सुखियों को देखकर प्रसन्न होना और दुखियों को देखकर करुणित होना । त्याग का अर्थ है कि मिला हुआ अपना नहीं है | जिससे जातीय तथा स्वरूप की एकता नहीं है, उसकी कामना का त्याग । प्राप्त में ममता नहीं और अप्राप्त की कामना नहीं । प्रभु में आस्था और विश्वास करो ।

प्रश्न - स्वामी जी ! आज तक तो मेरी आँखें बिल्कुल ठीक रही हैं । परन्तु अब 75 वर्ष के बाद रोशनी कम होने पर अभाव खटकने लगता है ।
उत्तर - आँख तो भैया पहले भी अपनी नहीं थी । परन्तु इसका पता अभी चला है । गहरी नींद में हर रोज आँखों के रहते हुए भी अन्धे हो जाते हैं । इस पर विचार ही नहीं किया ।

प्रश्न - क्या संकल्प-पूर्ति का कोई स्थान जीवन में है ?
उत्तर - दूसरों की संकल्प-पूर्ति का है, अपनी संकल्प-पूर्ति का नहीं ।

प्रश्न - भक्ति कैसे हो ?
उत्तर - संसार को अपने लिए अस्वीकार करने और केवल भगवान् को ही अपना मानने से भक्ति-भाव की अभिव्यक्ति होती है ।

प्रश्न - स्वप्न का क्या कोई अस्तित्व है ?
उत्तर - स्वप्न तो एक अवस्था है । अवस्था का कोई अस्तित्व नहीं होता ।

प्रश्न - दुःख विधान का फल है क्या ?
उत्तर - दुःख तो सुख की दासता मिटाने के लिए विधान से आता है । दुःख हमारी भूल का परिणाम है ।

(शेष आगेके ब्लागमें)
-'प्रश्नोत्तरी' पुस्तक से, पृष्ठ सं॰ ७-८ (Page No. 7-8) ।

Tuesday, 4 October 2011

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Tuesday, 04 October 2011
(आश्विन शुक्ल अष्टमी, वि.सं.-२०६८, मंगलवार)
 
 (गत ब्लॉगसे आगेका)
प्रश्नोत्तरी

प्रश्न – महाराज जी ! ईशाई लोग ईशा की बात क्यों नहीं मानते हैं ?
उत्तर – नकली ईशाई ईशा की चर्चा करेगा और सही ईशाई ईशा की बात मानेगा । यह बात न सिर्फ ईशाईयों के लिये सत्य है; बल्कि हिन्दू, मुसलमान, फारसी, सिक्ख, जैन और बौद्ध आदि सभी के लिये सत्य है ।

प्रश्न – महाराज जी ! भौतिक उन्नति का साधन क्या है ?
उत्तर – योग्यता, परिश्रम, ईमानदारी और उदारता ।

प्रश्न – महाराज जी ! जीवनमुक्त कौन है ?
उत्तर – जो इमानदार है, और ईमानदार वही है जो संसार की किसी भी चीज को अपनी नहीं मानता ।

प्रश्न – जीवनमुक्ति का स्वरूप क्या है ?
उत्तर – इच्छाएँ रहते हुए प्राण चले जाएँ तो मृत्यु हो गयी । फिर जन्म लेना पड़ेगा और प्राण रहते इच्छाएँ समाप्त हो जाएँ, तो मुक्ति हो गयी । जैसे बाजार गए, पर पैसे समाप्त हो गए और जरूरत बनी रही, तो फिर बाजार जाना पड़ेगा । और यदि पैसे रहते जरूरत समाप्त हो जाए, तो बाजार काहे को जाना पड़ेगा ?

प्रश्न – पढ़ाई-लिखाई बढ़ रही है, फिर भी दोष कम क्यों नहीं हो रहे ?
उत्तर – कोई दोष तब करता है, जब अपनी ही बात नहीं मानता। पढ़ाई-लिखाई तो एक प्रकार की योग्यता है । योग्यता जब निज विवेक के अधीन नहीं रहती है, तो बड़े-बड़े अनर्थ कर डालती है ।

प्रश्न – महाराज जी ! क्या भगवत्-प्रेम भी कामी-कामिनी वाले प्रेम की तरह होता है ?
उत्तर – कामी कामिनी को प्रेम नहीं करता । वे एक-दूसरे को नष्ट करते हैं, खा जाते हैं । भगवत्-प्रेम तो प्रेमी और प्रेमास्पद दोनों को आह्लादित करता है ।

प्रश्न – दुःख का आना मानव के पतित अथवा पापी होने का परिचय है क्या ?
उत्तर – दुःख का आना पतित होने का फल नहीं है । दुःख तो सुख-भोग की आसक्ति को मिटाने के लिए आता है ।   

–‘प्रश्नोत्तरी संतवाणी’ पुस्तकसे, पृष्ठ सं॰ ६-७ (Page No. 6-7)।

Monday, 3 October 2011

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Monday, 03 October 2011
(आश्विन शुक्ल सप्तमी, वि.सं.-२०६८, सोमवार)
 
  प्रश्नोत्तरी

प्रश्न – महाराज जी ! शिक्षक का क्या कर्तव्य है ?
उत्तर – शिक्षक का काम है, अपनी योग्यता का सदुपयोग एवं शिक्षार्थी का चरित्र-निर्माण ।

प्रश्न – स्वामी जी ! भगवान हमारी चाह पूरी क्यों नहीं करते ?
उत्तर – चाह तो उन्होंने अपने बाप दशरथ की भी पूरी नहीं की । फिर तुम्हारी कैसे कर दें ? जो सीता ने चाहा, नहीं हुआ । जो कौशल्या ने चाहा, नहीं हुआ । फिर तुम्हारे चाहने से क्या होगा ?

प्रश्न – स्वामी जी ! आपके कथन अनुसार जब दुःख मानव को कुछ सिखाने के लिये आता है, तो फिर बच्चों के जीवन में दुःख क्यों आता है ?
उत्तर– बच्चे प्राणी हैं । प्राणी के जीवन में तो सुख-दुःख का भोग ही होता है । जब वे मानव बनेंगे, तभी न दुःख उन्हें कुछ सिखाएगा ?

प्रश्न – स्वामी जी ! समाज का दुःख कैसे दूर हो सकता है ?
उत्तर – आप अपना दुःख दूर कर सकते हैं । समाज चाहेगा, तो उसका दुःख दूर होगा । कोई बाप अपने बेटे का, कोई पति अपनी पत्नी का दुःख दूर नहीं कर सकता, तो समाज का कैसे कर लेगा? हाँ, इतना आप कर सकते हैं कि अपना दुःख-रहित जीवन समाज के सामने रख सकते हैं, जिसको देखकर समाज के मन में दुःख दूर करने की रूचि पैदा हो सकती है ।

प्रश्न – महाराज जी ! सृष्टि की सेवा करनेवाला प्रभु को कैसे प्यारा लगता है ?
उत्तर – जैसे तुम्हारे लडके की सेवा करनेवाला तुम्हे प्यारा लगता है ।

प्रश्न – स्वामी जी ! भगवान् का दर्शन कैसे हो सकता है ?
उत्तर – भगवत्-प्रेम का महत्व है, भगवत्-दर्शन का कोई महत्व नहीं । भगवान् रोज दिखें और प्यारे न लगें, तो तुम्हारा विकास नहीं होगा । भगवत्-विश्वास, भगवत्-सम्बन्ध और भगवत्-प्रेम का महत्व है ।

प्रश्न – स्वाधीनता का स्वरूप क्या है ?
उत्तर – स्वाधीनता का अर्थ है, अपने में सन्तुष्ट होना, न कि किसी वस्तु या किसी परिस्थिति में आबद्ध होना ।  

(शेष आगेके ब्लॉगमें)       
–‘प्रश्नोत्तरी संतवाणी’ पुस्तकसे, पृष्ठ सं॰ ५-६ (Page No. 5-6)।