Friday, 9 December 2011

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Friday, 09 December 2011
(मार्गशीर्ष शुक्ल चतुर्दशी, वि.सं.-२०६८, शुक्रवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
सन्त हृदयोद्गार

82.    आप सच मानिए, सिद्धि वर्तमान में ही होती है। भविष्य में कभी सिद्धि नहीं होती । भविष्य में तो उसकी प्राप्ति होती है, जो वर्तमान में नहीं है अर्थात् जिसकी उत्पत्ति हो । ........... जरा सोचिए, साध्य तो हो वर्तमान में, और साधक यह माने कि हमें भविष्य में मिलेगा ! जरा ध्यान दीजिए, साध्य तो है वर्तमान में, और मिलेगा भविष्य में !

83.    मानव को प्रभु दण्ड नहीं देता, विधान मानव को दण्ड नहीं देता, तो फिर क्या देता है ? जिस परिस्थिति से आपका विकास होता है, वही परिस्थिति आपको देता है ।

84.    यह दिमागी कौतूहल है कि किसी परिस्थिति-विशेष की प्राप्ति से हम वह हो जाएँगे, जो हम आज नहीं हैं । सरकार, यहीं रहेंगे, यहीं । अन्तर यही होगा कि आप तीन बटा चार न लिखकर पचहत्तर बटा सौ लिखियेगा ।

85.    प्राकृतिक नियमानुसार प्रत्येक परिस्थिति मंगलमय है, इसी ध्रुव सत्य के कारण जो हो रहा है, वही ठीक है ।

86.    प्रतिकूल परिस्थिति भोग में भले ही बाधक हो, पर योग में नहीं ।

87.    ऐसी कोई अनुकूलता है ही नहीं, जिसने प्रतिकूलता को जन्म न दिया हो और न ऐसी कोई प्रतिकूलता ही है, जिसमें प्राणी का हित न हो ।

88.    जितने आस्तिक होते हैं, वे प्रत्येक प्रतिकूलता में अपने परम प्रेमास्पद की अनुकूलता का अनुभव करते हैं कि अब हमारे प्यारे ने अपने मन की बात करना आरम्भ कर दिया । अब वे हमें जरूर अपनायेंगे ।

- (शेष आगेके ब्लागमें) 'सन्त हृदयोद्गार' पुस्तक से ।

Tuesday, 6 December 2011

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Tuesday, 06 December 2011
(मार्गशीर्ष शुक्ल मोक्षदा एकादशी, गीता जयंती, वि.सं.-२०६८, मंगलवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
सन्त हृदयोद्गार

63.    वे (संसार के रचयिता) अपनी वस्तु को सदैव देखते रहते हैं। उन्होंने कभी भी तुम्हें अपनी आँख से ओझल नहीं किया । ........... साधक भले ही उन्हें भूल जाय, पर वे नहीं भूलते। ........... जिसकी जो वस्तुएँ हैं, उसे वह देखता ही है, सम्भालता ही है । ............ अपनी रचना से क्या रचयिता अपरिचित होता है? कदापि नहीं ।  
      
64.    भगवान् का कोई एक ठिकाना नहीं है । ऐसा नहीं है कि संसार अलग हो, तत्वज्ञान अलग हो, भक्ति अलग हो और भगवान् अलग हो । सब मिलकर जो चीज है, उसी का नाम भगवान् है ।
             
65.    जो किसी का नहीं तथा जिसका कोई नहीं, उसके भगवान् अपने-आप हो जाते हैं; क्योंकि वे अनाथ के नाथ हैं ।

66.    भगवान् के होकर 'भगवान् का स्वरूप क्या है ?' यह प्रश्न क्या अर्थ रखता है ? गहराई से देखिए, प्यासने कभी नहीं पूछा, 'पानी क्या है ?' भूख ने किसी से नहीं पूछा, 'भोजन क्या है?' पानी पाकर प्यास तृप्त हो गई, भोजन पाकर भूख तृप्त हो गई। तृप्ति होनेपर पानी और प्यास की भिन्नता तथा भूख और भोजन की भिन्नता शेष नहीं रहती ।

67.    जब हम अपने में शरीर-भाव का अभिनय स्वीकार करते हैं, तब हमारे प्यारे (प्रभु) विश्वरूप होकर लीला करते हैं । शरीर होकर किसी भी खिलाड़ी (प्राणी) ने विश्व से भिन्न कुछ नहीं जाना । .......... हम शरीर बनकर तो केवल उनको विश्वरूप में ही देख सकते हैं ।
 
68.    ईश्वर मानव की स्वाधीनता छिनना नहीं चाहता, इसलिए मानव जबतक स्वयं अपनी ओर से ईश्वर के सम्मुख नहीं होता, तबतक ईश्वर उसके पीछे ही रहता है ।

- (शेष आगेके ब्लागमें) 'सन्त हृदयोद्गार' पुस्तक से ।

Monday, 5 December 2011

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Monday, 05 December 2011
(मार्गशीर्ष शुक्ल दशमी, वि.सं.-२०६८, सोमवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
सन्त हृदयोद्गार 

56.    जिस समय अपने दोष का दर्शन हो जाय, समझ लो कि तुम जैसा विचारशील कोई नहीं । और जिस समय परदोष-दर्शन हो जाय, उस समय समझ लो कि हमारे जैसा कोई बेसमझ नहीं ।

57.    अपने दोष का दर्शन अपने को निर्दोष बनाने में समर्थ है और परदोष-दर्शन अपने को दोषी बनाने में हेतु है ।

58.    भगवान् के खिलाफ जो आवाज उठती है न, वह तर्क से नहीं उठती है । वह आवाज उठती है भगवान् को माननेवालों के दुश्चरित्र से, और कोई बात नहीं है । भगवान् को माननेवाले अगर ठीक आदमी हों तो भगवान् के खिलाफ कोई बोल ही नहीं सकता ।

59.    परमात्मा को 'अभी' न मानना बड़ी भारी भूल होगी, 'अपना' न मानना उससे बड़ी भूल होगी, और 'अपने में' न मानना सबसे बड़ी भूल होगी ।

60.    प्रभु अपने में हैं, अभी हैं और अपने हैं - इससे परमात्मा मिल जाएँगे ।

61.    याद रहे, और कुछ भी अपना है और परमात्मा भी अपना है - ये दोनों बातें एक साथ नहीं होतीं । जबतक हम और कुछ भी अपना मानते हैं, तबतक तो मुख से कहते हुए भी हमने सच्चे हृदय से भगवान को अपना नहीं माना । यही इसकी पहचान है।

62.    सर्वसमर्थ प्रभु साधक का भूतकाल नहीं देखते । उसकी वर्तमान वेदना से ही करुणित हो अपना लेते हैं ।

- (शेष आगेके ब्लागमें) 'सन्त हृदयोद्गार' पुस्तक से ।

Sunday, 4 December 2011

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Sunday, 04 December 2011
(मार्गशीर्ष शुक्ल नवमी, वि.सं.-२०६८, रविवार)
     
सन्त हृदयोद्गार 

50.    प्रिय-से-प्रिय वस्तु तथा व्यक्ति का त्याग गहरी नींदके किए भला किसने नहीं किया ?

51.    ईश्वर, धर्म और समाज किसी के ॠणी नहीं रहते । जो इनके लिए त्याग करते हैं, उनका ये अवश्य निर्वाह करते हैं ।

52.    त्याग हो जाने पर त्याग का भास नहीं रहता; क्योंकि त्याग की स्मृति अथवा उसका अस्तित्व तभी तक प्रतीत होता है, जबतक त्याग होता नहीं ।

53.    इन तीन बातों से सारे जीवन की समस्याएँ हल हो जाती हैं - १) मुझे कुछ नहीं चाहिए, २) प्रभु अपने हैं, ३) सब कुछ प्रभु का है । यही जीवन का सत्य है। इसको स्वीकार करने से उदारता, स्वाधीनता और प्रेम प्राप्त होगा ।

54.    ध्यान किसी का नहीं करना है । किसी का ध्यान नहीं करोगे तो परमात्मा का ध्यान हो जाएगा । और किसी का ध्यान करोगे तो वह फिर किसी और का ही ध्यानमात्र रह जाएगा ।

55.    अगर परमात्मा के माननेवालों को परमात्मा की याद नहीं आती, और करनी पड़ती है - यह कोई कम दुःख की बात है ? यह कम आश्चर्य की बात है ? अरे, मरे हुए बुजुर्गों की याद आती है आपको, गये हुए धन की याद आती है आपको ! तो परमात्मा इतना घटिया हो गया कि उसकी याद आपको करनी पड़े? .......... याद नहीं आती है इसलिए कि आप उसे अपना नहीं मानते ।

- (शेष आगेके ब्लागमें) 'सन्त हृदयोद्गार' पुस्तक से ।

Saturday, 3 December 2011

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Saturday, 03 December 2011
(मार्गशीर्ष शुक्ल नवमी, वि.सं.-२०६८, शनिवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
दुःख का प्रभाव 

        दोष-जनित सुख दोषों को बनाये रखने पर भी सुरक्षित नहीं रहता, अर्थात् कोई भी प्राणी सदैव दोषी होकर भी सुख का भोग नहीं कर सकता है । आया हुआ सुख चला जाता है और उसका भोगी बेचारा दोषी बनकर ही रह जाता है। यद्यपि अपने को सदा के लिए सर्वांश में दोषी बनाये रखना किसी को भी अभीष्ट नहीं है, तथापि सुख की दासता से वह अपने में अपराधी-भाव स्वीकार कर, निर्दोषता से निराश हो जाता है । इस कारण सुख-भोग का साधक के जीवन में कोई स्थान ही नहीं है ।

        सुख का आना और जाना तभी उपयोगी तथा हितकर सिद्ध होते हैं, जब मानव सुख का भोगी न होकर, उसकी वास्तविकता का अनुभव कर, आये हुए सुख द्वारा सेवा-परायण हो जाय। सेवा-सामग्री का भोगी हो जाना, मानवता से पशुता की ओर अग्रसर होना है ।

        दुःख का प्रभाव पशुता का अन्त कर सोई हुई मानवता जगाने में समर्थ है । यह तभी सम्भव होगा, जब मानव यह स्वीकार करे कि आया हुआ सुख अपने लिए नहीं है, अपितु दुखियों की धरोहर है । सुख-दुःख-युक्त परिस्थिति में से जब सुखांश सेवा में व्यय हो जाता है, तब मंगलमय विधान से केवल दुःख दुखी को उस जीवन से अभिन्न कर देता है, जो सुख-दुःख से अतीत दिव्य और चिन्मय है, जिसमें जड़ता, पराधीनता तथा अभाव की गन्ध भी नहीं है और जो अकर्तव्य, असाधन एवं आसक्तियों से रहित है ।

        कामना-पूर्ति और अपूर्ति की परिस्थितियों से तादात्म्य स्वीकार करना अपने को सुख की दासता तथा दुःख के भय में आबद्ध करना है । इस कारण कामना-पूर्ति-अपूर्ति में जीवन-बुद्धि स्वीकार करना प्रमाद ही है । प्रमाद के रहते हुए न तो सुख की दासता का नाश होता है और न दुःख के भय का ही अन्त होता है। दुःख का भय दुःख से भी अधिक दुःखद है । दुःख का भय दुखी के जीवन में असावधानी उत्पन्न कर देता है, जो उसके लिए सर्वदा अहितकर है । इस दृष्टि से दुःख से भयभीत होना भारी भूल है । इस भूल का अन्त करना मानव मात्र के लिए अनिवार्य है।

- 'दुःख का प्रभाव' पुस्तक से (Page No. 25-26)

Friday, 2 December 2011

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Friday, 02 December 2011
(मार्गशीर्ष शुक्ल अष्टमी, वि.सं.-२०६८, शुक्रवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
दुःख का प्रभाव 

      परिस्थिति-भेद से बेचारा प्राणी केवल अनुमान करता है कि अमुक व्यक्ति विशेष सुखी है । विशेषता और न्यूनता परिस्थितियों के बाह्य स्वरूप में है । सुख का भास वास्तव में परिस्थिति-जन्य नहीं है, केवल संकल्प-पूर्तिजन्य है । सभी संकल्पों की पूर्ति किसी भी प्रकार, किसी भी परिस्थिति में सम्भव नहीं है । तो फिर सुख के अस्तित्व को स्वीकार करना कहाँ तक युक्तियुक्त है? अस्तित्वहीन आभास मात्र सुख के पीछे दौड़ना रस से विमुख होने के अतिरिक्त और कुछ नहीं है ।

        न चाहने पर भी बार-बार दुःख का प्रादुर्भाव मंगलमय विधान से सुख की दासता का नाश करने के लिए ही मानव के जीवन में होता है । पर बेचारा प्राणी प्रमादवश आए हुए दुःख से भयभीत और जानेवाले सुख की दासता में आबद्ध होकर नित-नव रस से, जो जीवन की वास्तविक माँग है, वंचित रह जाता है; यद्यपि रस की माँग नष्ट नहीं होती, दब जाती है और फिर नीरसता मानव को सुख का भिखारी बना देती है । नीरसता का अन्त वर्तमान में सम्भव है; किन्तु सुख का सम्पादन भविष्य की आशा पर ही निर्भर रहता है । भविष्य की आशा वर्तमान की वास्तविक व्यथा को शिथिल बनाती है । 

        व्यथा की शिथिलता में सजगता नहीं रहती । उसके बिना सुख और रस का भेद स्पष्ट नहीं होता । उसके बिना हुए न तो रस की माँग ही सर्वांश में जाग्रत होती है और न सुख की आशा का ही अन्त होता है । सुख के सम्पादन के लिए श्रम, संग्रह, पराधीनता एवं जड़ता आदि दोष अपेक्षित हैं; किन्तु अगाध, अनन्त, नित-नव रस के प्रादुर्भाव के लिए केवल विश्राम, स्वाधीनता तथा प्रेम की जागृति अपेक्षित है ।

        दुःख का प्रभाव अत्यन्त सुगमतापूर्वक मानव को विश्राम, स्वाधीनता तथा प्रेम का अधिकारी बना देता है । पर यह रहस्य वे ही जान पाते हैं, जिन्होंने आये हुए दुःख का आदरपूर्वक स्वागत किया है और गये हुए सुख को धीरजपूर्वक विदाई दी है।

- (शेष आगेके ब्लागमें)- 'दुःख का प्रभाव' पुस्तक से (Page No. 24-25)

Thursday, 1 December 2011

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Thursday, 01 December 2011
(मार्गशीर्ष शुक्ल सप्तमी, वि.सं.-२०६८, गुरुवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
दुःख का प्रभाव 

     प्राकृतिक नियमानुसार कोई भी प्रतीति तथा भास स्वरूप से स्थिर नहीं है। उसकी उत्पत्ति तथा विनाश का जो क्रम है, उससे ही स्थिरता का भास होता है। किन्तु सुख के आदि और अन्त में दुःख स्वभाव से उस समय तक रहता ही है, जबतक सुख में अथवा उसके भोग में आस्था है। आस्था प्राणी को उसके अस्तित्व का भास कराती है, जिसमें वह आस्था करता है ।

        जबतक सुख में आस्था रहेगी, तबतक सुख का अस्तित्व प्रतीत होगा । यद्यपि प्राकृतिक नियमानुसार उत्पन्न हुई प्रत्येक प्रतीति निरन्तर परिवर्तनशील है, तथापि सुखासक्ति सतत परिवर्तन में भी स्थिरता का भास कराती है । सुख की स्थिरता का भास सुख में जीवन-बुद्धि उत्पन्न करता है, जिसके उत्पन्न होते ही सुख का महत्व बढ़ जाता है और फिर बेचारा प्राणी विवश होकर अपने आप जानेवाले सुख के पीछे दौड़ने लगता है, यद्यपि उसे पकड़ नहीं पाता । परन्तु अल्पकाल की समीपता की अनुभूति, न रहनेवाले सुख से निराश नहीं होने देती।

        सुख की आशा सुख से भी अधिक मधुर प्रतीत होती है। उस मधुरिमा में आबद्ध प्राणी सुख-भोग के लिए बड़े-बड़े दुखों को सहन कर सकता है । उसपर पर भी सुख का भोग तथा उसकी आशा परिणाम में दुःख ही प्रदान करती है । इस दृष्टि से सुख में ही दुःख विद्यमान है और दुःख से ही सुख का भास होता है। सुख और दुःख, दोनों की वास्तविकता के बोध में सुख की दासता तथा दुःख के भय का नाश है ।

        रस जीवन की माँग है और सुख तथा दुःख भोग हैं । भोग का परिणाम रोग तथा शोक है, जो किसी भी प्राणी को अभीष्ट नहीं है । सुख संकल्प-पूर्ति की एक दशा मात्र है और कुछ नहीं। संकल्प शुद्ध हो अथवा अशुद्ध, लघु अथवा महान; किन्तु संकल्प-पूर्ति का सुख समान ही है । इसी कारण शुभाशुभ प्रवृत्तियाँ सुख के भोगी में जीवित रहती हैं ।

        यदि संकल्प-पूर्ति के अतिरिक्त सुख का कोई और अस्तित्व होता, तो शुभाशुभ प्रवृत्तियों का विभाजन स्वतः हो जाता । इतना ही नहीं, उत्पन्न हुई अशुभ प्रवृत्तियाँ नष्ट हो जातीं और पुनः उत्पन्न न होतीं । जीवन में केवल शुभ प्रवृत्तियाँ रह जातीं । परन्तु बेचारा सुख का भोगी सर्वांश में न अशुभ प्रवृत्तियों का नाश ही कर पाता है और न शुभ प्रवृत्तियों की दासता से ही मुक्त हो पाता है । प्रवृत्ति रहते हुए रस के साम्राज्य में प्रवेश ही नहीं होता । इस दृष्टि से सुख और रस में बड़ा भेद है। इतना ही नहीं, रस की अनेक श्रेणियाँ हैं । परन्तु सुख में कोई श्रेणी नहीं है ।

- (शेष आगेके ब्लागमें)- 'दुःख का प्रभाव' पुस्तक से (Page No. 23-24)