Saturday, 18 January 2014

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Saturday, 18 January 2014  
(पौष कृष्ण द्वितीया, वि.सं.-२०७०, शनिवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
सर्व हितकारी प्रवृत्ति तथा वासना-रहित निवृत्ति

        दुःख की निवृत्ति और आनन्द की उपलब्धि, इन दोनों को जो मानते हैं, वे चाह की निवृत्ति के साथ-साथ चाह की पूर्ति की भी चर्चा करते हैं और जो केवल दुःख की निवृत्ति को ही साध्य मानते हैं, वे अचाह-पद को प्राप्त कर मौन हो जाते हैं । इसका मतलब यह नहीं है कि चाह की निवृत्ति के पश्चात् चाह की पूर्ति नहीं हुई । मिलता क्या है ? मिलता वह है, जो सत्य है । सत्य उसे नहीं कहते, जो किसी के न मानने से अथवा किसी के वर्णन न करने से न रहे । सत्य तो उसे कहते हैं, जो आप जानें तो सत्य, न जानें तो सत्य, मानें तो सत्य, न मानें तो सत्य और उसके सम्बन्ध में मौन रहें तो सत्य । अत: दुःख की निवृत्ति के पश्चात् जो उपलब्ध होता है, उसका नाम सत्य है । तो, अन्तर केवल इतना रहा कि जिन्होंने वर्तमान पर ही विचार किया और भविष्य के लिए मौन हो गए, वे तो यही कहेंगे कि चाह की निवृत्ति ही जीवन है । और जिन्होंने वर्तमान के परिणामों पर भी विचार किया, वे कहेंगे कि चाह की पूर्ति भी जीवन है । अर्थात् दुःख की निवृत्ति भी जीवन है और आनन्द की उपलब्धि भी जीवन है ।

        एक बार मैं अपने एक साथी से चर्चा कर रहा था । दूसरे भाई ने पूछा कि आपके और उनके विचारों में क्या भेद है? उन्होंने बड़े सुन्दर शब्दों में कहा कि मैं तो यह कहता हूँ कि गरमी मिट जायगी और स्वामी जी यह कहते हैं कि ठण्डा बगीचा भी मिल जाएगा । और कोई अन्तर नहीं है ।

        तो, मेरा आग्रह यह नहीं है कि हर एक भाई चाह की निवृत्ति और चाह की पूर्ति दोनों को ही मानें । किन्तु निवेदन यह है कि चाह की निवृत्ति में आपका पुरुषार्थ अपेक्षित है और चाह की निवृत्ति के पश्चात् जिस जीवन से अभिन्नता होती है, उसमें कोई प्रयत्न अपेक्षित नहीं रहता, क्योंकि चाह का समूह जो सीमित अहम् था, वह चाह की निवृत्ति से मिट जाता है । प्रयत्न का जन्म जिस अहम् से होता है, वह अहम् नहीं रहा ।

- (शेष आगेके ब्लाग में) 'मानव की माँग' पुस्तक से, (Page No. 51-53) ।

Friday, 17 January 2014

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Friday, 17 January 2014  
(पौष कृष्ण प्रतिपदा, वि.सं.-२०७०, शुक्रवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
सर्व हितकारी प्रवृत्ति तथा वासना-रहित निवृत्ति

        एक बात बहुत गम्भीरता से विचार करने की यह है कि मुक्त होना भी साधना ही है, साध्य नहीं। यहाँ कुछ जिज्ञासु सोचने लगेंगे कि भाई, मुक्ति के बाद तो कुछ प्राप्त करना शेष नहीं रहता है, फिर यह कैसे कहते हैं कि मुक्ति भी साधन ही है । आप विचार करें, किसी भूख से पीड़ित प्राणी से पूछें कि भोजन का करना अथवा भूख का दूर होना, ये दो बातें हैं या एक ? तो, वह कहेगा - 'जितने-जितने अंश में हम भोजन करते हैं, उतने-उतने अंश में भूख से मुक्ति होती जाती है।' भोजन की पूर्णता और भूख से मुक्ति एक ही वस्तु हुई । जब उससे पूछा जाय कि भाई, भूख से जो मुक्ति मिली, वह किस लिए ? तो वह कहेगा कि तृप्ति के लिए । तो क्या मुक्ति से तृप्ति कोई अलग चीज है ? तो कहेगा, यह तो नहीं कह सकता कि मुक्ति और तृप्ति में कितना भेद है ? पर यह अवश्य कह सकता हूँ कि मुक्ति के पश्चात् ही तृप्ति होती है ।

        यह नियम है कि जो जिसके पश्चात् आती है, वह उसी का साध्य होता है और जिसके द्वारा आती है, वह साधन होता है। इस दृष्टि से परिस्थिति से मुक्त होना भी एक साधन ही सिद्ध हुआ । परन्तु, जो लोग इसी से सन्तुष्ट हो जाते हैं, वे कुछ काल के लिये उसे साध्य मान सकते हैं । जैसे, इच्छित वस्तु मिलने पर कुछ काल के लिए सभी को तृप्ति का अनुभव  होता है। परन्तु कालान्तर में फिर एक नई इच्छा उत्पन्न होती है । इसी प्रकार मुक्ति प्राप्त हो जाने पर एक ऐसे अनुपम जीवन का उदय होता है जिसमें न तो किसी प्रकार का अभाव ही है और न चाह की उत्पत्ति ही है । इस प्रकार अचाह पद साधन है नित्य तृप्ति का।

        अब विचार यह करना है कि अचाह साधन कब है? वासनाओं की निवृति में । अचाह साध्य कब है ? लक्ष्य की पूर्ति में । क्योंकि चाह की पूर्ति में भी एक अचाह है और चाह की निवृत्ति में भी एक अचाह है । तो चाह की निवृत्ति में और पूर्ति में क्या अन्तर है ? चाह की निवृत्ति की बात वहीं कही जाती है, जहाँ परिस्थिति से सम्बन्ध रखने वाली चाह की उत्पत्ति हो और चाह की पूर्ति की बात वहाँ कही जाती है, जहाँ परिस्थितियों से अतीत चिन्मय जीवन हो । चिन्मय जीवन की प्राप्ति को चाह की पूर्ति और वासनाओं की निवृत्ति को चाह की निवृत्ति कहेंगे। चाह की निवृत्ति और चाह की पूर्ति, ये दोनों एक मालूम होते हुए भी एक बड़ा ही विचित्र भेद रखती हैं । चाह की निवृत्ति में दुःख की निवृत्ति निहित है और चाह की पूर्ति में आनन्द की उपलब्धि निहित है । 

- (शेष आगेके ब्लाग में) 'मानव की माँग' पुस्तक से, (Page No. 50-51) ।

Thursday, 16 January 2014

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Thursday, 16 January 2014  
(पौष पूर्णिमा, वि.सं.-२०७०, गुरुवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
सर्व हितकारी प्रवृत्ति तथा वासना-रहित निवृत्ति

        परिस्थिति द्वारा सुख लेने की आसक्ति क्या है ? यह मानना होगा कि परिस्थिति में और अपने में हमने जो एकता मान ली है, उस एकता की सत्यता इतनी दृढ़ हो गई है कि हमारी सत्ता से परिस्थिति सत्ता पाकर हम पर ही शासन करने लगी है। परिस्थिति अपनी सत्ता से हम पर शासन नहीं करती, किन्तु सत्ता हमसे लेती है, चेतना हमसे लेती है और हम पर ही शासन करती है । यही कारण है परिस्थितियों में सुख की आसक्ति होने का । यदि हम अपनी सत्ता को परिस्थितयों से असङ्ग कर लें, तो बेचारी परिस्थिति कभी हमें मुँह नहीं दिखाती, न हम पर शासन ही करती है, न हमें कभी दीन या अभिमानी ही बनाती है और न हममें चाह उत्पन्न करती है ।

        सभी विकार हमारे इस प्रमाद से उत्पन्न हुए हैं कि हमने अपनी सत्ता परिस्थिति को देकर अपने को परिस्थिति का दास बना लिया है । यदि विवेकी साधक परिस्थिति से अपनी सत्ता वापस ले ले, असंग हो जाय, विमुख हो जाय, तो बड़ी सुगमता से अचाह-पद को प्राप्त कर सकता है । अचाह होने पर प्रतिकूल परिस्थिति भी अनकुलता में बदल जाती है और अनुकूल परिस्थिति से असङ्ग्ता आ जाती है । यह अचाह की महिमा है। इस महिमा पर जिनका विश्वास हो जाता है, अथवा इस महिमा को जो अनुभव कर लेते हैं, वे बड़ी सुगमता से प्रतिकूल और अनुकूल परिस्थितियों का सदुपयोग कर अपने को परिस्थितियों से असंग कर लेते हैं। परिस्थितियों के सदुपयोग का नाम ही वास्तव में कर्तव्य-परायणता है । कारण कि, ऐसा कोई कर्तव्य नहीं है, जो किसी परिस्थिति से सम्बन्धित न हो ।

        अत: हमें अपनी परिस्थिति से भयभीत नहीं होना चाहिए और न उसकी दासता में ही आबद्ध होना चाहिए । न अप्राप्त परिस्थितियों का आह्वान् करना चाहिए और न प्राप्त परिस्थितियों से घृणा करनी चाहिए, चाहे वे दीखने में कितनी ही प्रतिकूल हों । हमें प्राप्त परिस्थिति का आदरपूर्वक स्वागत करते हुए उसका सदुपयोग करने में प्रयत्नशील रहना चाहिए । इससे हम और आप बड़ी ही सुगमतापूर्वक परिस्थितियों की दासता से मुक्त हो जायेंगे । परिस्थितियों की दासता से मुक्त होना ही मुक्ति है ।

- (शेष आगेके ब्लाग में) 'मानव की माँग' पुस्तक से, (Page No. 48-50) ।

Wednesday, 15 January 2014

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Wednesday, 15 January 2014  
(पौष शुक्ल चतुर्दशी, वि.सं.-२०७०, बुधवार)

सर्व हितकारी प्रवृत्ति तथा वासना-रहित निवृत्ति

मेरे निजस्वरूप उपस्थित महानुभाव !

        कल सेवा में निवेदन किया था कि साधना का सार चाह-रहित होना अथवा समाज की चाह की पूर्ति करना है । अचाह होने के लिये सबसे प्रथम आवश्यकता इस बात की है कि हम यह जान लें कि चाह की उत्पत्ति का कारण क्या है ? चाह की उत्पत्ति का कारण यदि विवेकदृष्टि से देखा जाय, तो एकमात्र अविवेक है । और अविवेक क्या है ? अविवेक कहते हैं - विवेक के अनादर को । अविवेक का कोई स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं है । जो विवेक है, उसका हम अनादर करते हैं, अर्थात् जाने हुए को नहीं मानते । इसी का नाम अविवेक है । 

        किसी भाई से यह कहा जाय कि क्या वह वही है जो कुछ काल पूर्व अमुक स्कूल में हमारे साथ पढ़ता था ? तो वह कहेगा, हाँ ! में वही हूँ; परन्तु अब मैं अमुक पद पर नियुक्त हो गया हूँ और पूछने वाला भी यह कहेगा कि भाई, मैं भी वही हूँ, पर मैं भिखारी बन गया हूँ । दोनों की अवस्था में बड़ा भेद है, किन्तु दोनों के इस ज्ञान में भेद नहीं है कि मैं वही हूँ । जो आज एक पद-विशेष पर स्थित है और जो एक दीनता में आबद्ध है, वे दोनों यही जानते हैं कि हम दोनों वही हैं, जो पहले थे । परिस्थितियों का भेद होने पर भी अपना भेद स्वीकार नहीं करते ।

        इससे यह निर्विवाद सिद्ध हो जाता है कि परिस्थिति में और अपने में भिन्नता है । इस भिन्नता को जानकर भी परिस्थिति से अभिन्न रहना अविवेक है । हम जानते हैं कि हम और हमारी अवस्था, और हम और हमारी परिस्थिति तथा हम और हमारी वस्तुएँ परस्पर भिन्न हैं । परन्तु यह जानते हुए भी हम परिस्थिति से ही अपने को मिला लेते हैं । जहाँ हमने अपने को किसी परिस्थिति से मिलाया, वहीं किसी-न-किसी प्रकार की चाह उत्पन्न हुई । इस प्रकार चाह की उत्पत्ति का मूल कारण निजविवेक का अनादर ही हुआ ।

        अब सबसे बड़ा प्रश्न यह आ जाता है कि हम जाने हुए का अनादर क्यों करते हैं ? इसका कारण क्या है ? इसपर यदि आप विचार करें, तो यह विदित होगा कि जाने हुए का अनादर करने में कोई बाह्य हेतु नहीं है, कि किसी परिस्थिति ने हमें ऐसा बना दिया कि हम जाने हुए का अनादर करें और न किसी और व्यक्ति ने ऐसा कर दिया कि हम जाने हुए का अनादर करें । जाने हुए के अनादर का एकमात्र कारण परिस्थिति द्वारा सुख लेने की आसक्ति है, और कोई कारण नहीं ।

- (शेष आगेके ब्लाग में) 'मानव की माँग' पुस्तक से, (Page No. 47-48) ।

Tuesday, 14 January 2014

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Tuesday, 14 January 2014  
(पौष शुक्ल चतुर्दशी, वि.सं.-२०७०, मंगलवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
अपना कल्याण चाह-रहित होने में है

        अब प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि यदि कोई अपने को दूसरे की चाह पूरी करने में निर्बल पाता है, तो फिर उसका कल्याण कैसे होगा ? इसका उत्तर यह है कि यदि कोई सचमुच दूसरे की चाह पूरी करने में असमर्थ है, तो उसे अपनी भी कोई चाह नहीं रखनी चाहिए । तब भी साधन-निर्माण हो जाएगा; क्योंकि चाह-रहित होने से कर्तव्यपरायणता की शक्ति स्वत: आ जाती है । किन्तु, यदि कोई अपनी चाह-पूर्ति की तो आशा करता है और दूसरे की चाह-पूर्ति से निराश रहता है, तो यह उसका प्रमाद है, क्रोध है, द्वेष है, जो उसे कर्तव्यनिष्ठ नहीं होने देता, और यह अकल्याण का हेतु है। जिस अंश में हमारे कर्तव्य से दूसरे की चाह की पूर्ति होती है, उसी अंश में हमारा जीवन उदारता तथा प्रेम से भर जाता है, जो कल्याण का हेतु है । और जिस अंश में हम अपनी चाह-पूर्ति की सोचते हैं, उसी अंश में हम परतन्त्र तथा भोगी हो जाते हैं, जो अकल्याण का हेतु है ।

        इससे यह सिद्ध हुआ कि जिसे अचाह-पद अभीष्ट है, उसके लिए दूसरों की चाह-पूर्ति में और अपनी चाह की अपूर्ति में कोई अन्तर नहीं है । कारण कि, अचाह में जो रस है, वह चाह-पूर्ति में नहीं है । चाह-पूर्ति का रस तो पुन: चाह उत्पन्न करता है, और अचाह होने पर पुन: चाह उत्पन्न न होगी । अचाह होने से कोई क्षति नहीं होती, क्योंकि चाह-पूर्ति के पश्चात् भी प्राणी उसी दशा में आ जाता है, जो चाह की उत्पत्ति से पूर्व थी । तो फिर चाह-पूर्ति करने का प्रयत्न ही निरर्थक सिद्ध हुआ । इसी रहस्य को जानकर विचारशील दूसरों की चाह पूरी करते हुए भी स्वयं अचाह रहते हैं ।

        चाह का जन्म अविवेक से होता है । इसी का नाम अमानवता है । अत: अविवेक और अमानवता एक ही बात है। चाह की निवृत्ति विवेक से होती है, और उसी का नाम मानवता है।

        जब आप 'अहम्' से रहित हो जायेंगे, तो राग न रहेगा । राग के न रहने पर भोग-वासनाएँ मिट जायेंगी, और भोग योग में बदल जाएगा । फिर अध्यात्मवाद का जन्म होगा, जो अमर जीवन प्राप्त कराने में समर्थ है । मानवता आ जाने से ही सुन्दर समाज का निर्माण होगा, जो भौतिकवाद की पराकाष्ठा है। मानवता आ जाने से ही परम प्रेम प्राप्त होगा, जो आस्तिक जीवन है और प्रभु-प्राप्ति का साधन है । अतएव अमर जीवन, सुन्दर समाज का निर्माण तथा अगाध, अनन्त नित-नव-रस मानव को मानवता विकसित होने पर प्राप्त हो सकता है । इस दृष्टि से प्रत्येक भाई-बहिन को मानव होने के लिए अथक प्रयत्नशील होना चाहिए । ।। ऊँ ।।

- 'मानव की माँग' पुस्तक से, (Page No. 45-46) ।

Monday, 13 January 2014

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Monday, 13 January 2014 
(पौष शुक्ल त्रयोदशी, वि.सं.-२०७०, सोमवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
अपना कल्याण चाह-रहित होने में है

        साधना के दो भाग हैं - अचाह होना और दूसरों की हितकारी चाह को पूरा करना । कोई कहे कि यदि हम अचाह रहना चाहते हैं, तो दूसरों की चाह की पूर्ति क्यों करें ।  तो इसका उत्तर यह है कि आप दूसरों की चाह की पूर्ति इसलिए करें कि आप में अचाह होने का बल आ जाय । जो दूसरे की चाह की पूर्ति नहीं करता, वह अचाह नहीं रह सकता। जब दूसरे की चाह हमारा जीवन बन जायगी, तभी हम अचाह हो सकते हैं । समाज के अधिकारों के समूह का नाम ही व्यक्ति का जीवन है । इन अधिकारों की रक्षा कर देना ही अचाह होने का सुगम उपाय है । इससे यह सिद्ध हुआ कि सुन्दर समाज के निर्माण में ही हम अचाह होने की योग्यता सम्पन्न कर सकते हैं। सुन्दर समाज का निर्माण तो हमारी वह साधना है, जो हमे अचाह बना दे और अचाह वह साधना है, जो सुन्दर समाज के निर्माण की योग्यता विकसित कर दे । इससे यह सिद्ध हुआ कि साधना के दो भाग होने पर भी वास्तव में दोनों एक ही हैं। इसका विभाजन नहीं हो सकता ।

        इस दृष्टिकोण से हमें और आपको अपनी वस्तु-स्थिति पर, अर्थात् अपनी वर्तमान दशा पर विचार करना चाहिए। प्रातःकाल से लेकर सायंकाल तक जो प्रवृत्ति हमारे द्वारा होती है, उस प्रवृत्ति से दुसरे के सङ्कल्प की पूर्ति होती है या नहीं, यह देखना चाहिए । यदि हमारी प्रवृत्ति दूसरों के शुद्ध सङ्कल्पों को पूरा करती है, तो हम अवश्य अचाह-पद को प्राप्त कर लेंगे और यदि हमारी प्रवृत्ति दूसरों के द्वारा अपने सङ्कल्प पूरे कराने में रत है, तो हम अचाह न हो सकेंगे । इस प्रकार अपने कल्याण का साधन यह है कि हमारी प्रत्येक प्रवृत्ति में दूसरों का हित निहित हो और किसी का हित न कर सकें, तो निवृत्ति को अपनाकर चाह से मुक्त हों ।  

        अचाह-पद का अर्थ है - सहज निवृत्ति । सहज निवृत्ति का अर्थ है वृति का स्फुरण न होना और स्फुरण न होने का फल है - अपना प्रेम । वृत्तियों के स्फुरण अर्थात् 'स्व'  'पर' की ओर गतिशील होने से ही हम अपने प्रेमास्पद से विमुख होकर संसारोन्मुखी हो जाते हैं, फिर उसमें आसक्त होकर रोगी बन जाते हैं, और रोगी बनकर भोगी बन जाते हैं, फिर भोगी होकर रोगी और रोगी होकर व्यथित हो जाते हैं । इसी का नाम अकल्याण, अमानवता तथा पशुता है ।

- (शेष आगेके ब्लाग में) 'मानव की माँग' पुस्तक से, (Page No. 43-45) ।

Sunday, 12 January 2014

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Sunday, 12 January 2014  
(पौष शुक्ल द्वादशी, वि.सं.-२०७०, रविवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
अपना कल्याण चाह-रहित होने में है

        किसी से कोई पूछे कि तुम खून में, हड्डियों में, मांस में, मज्जा में, मूत्र में रहना चाहते हो? तो,सभी विचारशील यही कहेंगे कि नहीं रहना चाहते । कारण, कि मलिनता किसी को प्रिय नहीं । अब हम स्वयं सोचें कि देह में मलिनता के अतिरिक्त क्या है ? तो मानना होगा कि कुछ नहीं। इससे यह सिद्ध हुआ कि हम मलिनता को अपना कर ही अधिकार लालसा में आबद्ध होते हैं, और जिन्हें निर्मलता प्रिय है, वे कर्तव्यपरायण होते हैं । जब हम मल-मूत्र से अलग रहें, तो अधिकार की कौन-सी माँग आती है, आप बताइये ? कोई भाई-बहिन बताये कि अपने को देह से अलग मान कर आपको कौन-से अधिकार चाहिए ? मान चाहिए तो देह बन कर, वस्तु चाहिए तो देह बन कर, भोग चाहिए तो देह बनकर, कोई परिस्थिति विशेष चाहिए तो देह बनकर, व्यक्ति विशेष की जरूरत हो तो देह बनकर । तीनों देह से असंग होने पर न किसी व्यक्ति की जरूरत होती है, न किसी अवस्था की और न किसी परिस्थिति की । फिर भला, क्या शेष रह जाता है ? 

        जब अपने को देह से अलग अनुभव करते हैं, तब निर्वासना आ जाती है और जीवन प्रेम से परिपूर्ण हो जाता है । देह से अलग होने पर ही निर्वासना पद प्राप्त होता है और प्रेम का उदय होता है। कारण कि, चाह-रहित प्राणी ही प्रेम कर सकता है । जो कुछ नहीं चाहता, वही प्रेम कर सकता है और जो कुछ नहीं चाहता, वही मुक्त हो सकता है । स्वाधीनता तथा प्रेम-पूर्ण जीवन ही कल्याणयुक्त जीवन है । कल्याण का अर्थ है, जहाँ अगाध अनन्त नित-नव रस हो । वही अमर जीवन है । जहाँ देह है, वहीं मृत्यु है । देह से अतीत जीवन तो चिन्मय है और वही अमरत्व है।

        देह से अलग होकर कोई वासना उत्पन्न नहीं होती । जहाँ वासना की उत्पत्ति नहीं है, वहाँ स्वाधीनता और मुक्ति होगी और जहाँ स्वाधीनता होगी, वहाँ प्रेम अवश्य होगा । तो भाई ! प्रेम रहे, जीवन रहे, स्वाधीनता रहे, इसका का नाम हुआ - कल्याण । 

        जहाँ मृत्यु प्रवेश कर सके, जहाँ पराधीनता आ सके और जहाँ बन्धन हो, इसी का नाम अकल्याण है । तो हमारा कल्याण किस पर निर्भर है ? हमारे कर्तव्य और हमारी साधना पर, न कि किसी दूसरे के कर्तव्य पर । यदि कल्याण चाहने वाले भाई-बहिन यह सोचते हैं कि हमारा कल्याण किसी और पर निर्भर है, तो मानना पड़ेगा कि वे अपना कल्याण नहीं चाहते । आपका कल्याण तो आप पर ही निर्भर है, अर्थात् आपके साधन पर निर्भर है। 

- (शेष आगेके ब्लाग में) 'मानव की माँग' पुस्तक से, (Page No. 42-43) ।