Sunday, 17 November 2013

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Sunday, 17 November 2013  
(कार्तिक पूर्णिमा, वि.सं.-२०७०, रविवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
हमारी आवश्यकता

        काल्पनिक सम्बन्ध भी दो प्रकार के होते हैं - भेद-भाव का सम्बन्ध तथा अभेद-भाव का सम्बन्ध। माना हुआ 'मैंअभेद भाव का सम्बन्ध है और माना हुआ 'मेराभेद-भाव का सम्बन्ध है। अभेद भाव का सम्बन्ध केवल अपनी स्वीकृति के आधार पर जीवित रहता है और भेद-भाव का सम्बन्ध माने हुए सम्बन्ध के अनुरूप चेष्टा करने पर प्रतीत होता रहता है । प्रतीति निज-सत्ता के बिना किसी और की सत्ता के आधार पर भी किसी कारणवश हो सकती है - जैसे, मृगतृष्णा का जल ।

        जिस प्रकार प्रत्येक मित्र अपने मित्र के सुख-दुःख से मैत्री सम्बन्ध के कारण दुखी-सुखी होकर अपने को दुखी-सुखी समझने लगता है, उसी प्रकार हम शरीर के सुख-दुःख आदि स्वभाव को अपने में आरोपित करने लगते हैं । किन्तु हमारी स्वभाविक अभिलाषा शरीर-सम्बन्ध से पूर्ण नहीं हो पाती। अतः हमको अपने लिए अपने प्रेमपात्र अर्थात् नित्य-जीवन की आवश्यकता शेष रहती है । उसी आवश्यकता की पूर्ति के लिए हमको अनित्य जीवन से भिन्न नित्य-जीवन की ओर जाना अनिवार्य हो जाता है ।

        अब हम अपने नित्य-जीवन को कैसे जानें ? यह प्रश्न स्वभाविक उत्पन्न होता है । यद्यपि प्रत्येक प्राणी अपनी स्वीकृति करता है, परन्तु अपने वास्तविक निज-स्वरूप, नित्य-जीवन को जानने से इन्कार करता है । यह कैसे आश्चर्य की बात है! 'स्वभाविक अभिलाषा से भिन्न अभिलाषी का निज-स्वरूप कुछ नहीं हो सकता ।'

        अब विचार यह करना है कि हमारी स्वभाविक अभिलाषा क्या है ? प्रत्येक प्राणी अपने में किसी प्रकार की कमी रखना नहीं चाहता; क्योंकि कमी का अनुभव होते ही दुःख का अनुभव होता है। यद्यपि दुःख किसी भी प्राणी को प्रिय नहीं है, फिर भी अपने-आप आता है । जो अपने-आप आता है, उससे हमारा हित अवश्य होगा, यदि उसका सदुपयोग किया जाय । क्योंकि यदि दुःख न आता, तो हम अस्वभाविक अनित्य जीवन से विरक्त नहीं हो सकते थे । अथवा यों कहो कि हमारी स्वभाविक अभिलाषा, जो अस्वभाविक इच्छाओं द्वारा दबाकर निर्बल बना दी गई थी, सबल न हो पाती । अतः दुःख की कृपा से हम जाग्रत हो जाते हैं । इस दृष्टि से दुःख आदरणीय अवश्य है ।

- (शेष आगेके ब्लाग में) 'सन्त-समागम भाग-2' पुस्तक से, (Page No. 10-11) ।

Saturday, 16 November 2013

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Saturday, 16 November 2013  
(कार्तिक शुक्ल चतुर्दशी, वि.सं.-२०७०, शनिवार)

हमारी आवश्यकता

        'अपने लिए अपने से भिन्न की आवश्यकता कदापि नहीं हो सकती', क्योंकि भिन्नता से एकता होना सर्वदा असम्भव है। जिस प्रकार श्रवण ने शब्द से भिन्न कुछ नहीं सुना, नेत्र ने रूप से भिन्न किसी भी काल में कुछ नहीं देखा तथा त्वचा ने स्पर्श से भिन्न, रसना ने रस से भिन्न एवं नासिका ने गन्ध से भिन्न किसी का अनुभव नहीं किया; क्योंकि श्रवण की आकाश तथा शब्द से, नेत्र की अग्नि तथा रूप से, त्वचा की वायु तथा स्पर्श से, रसना की जल तथा रस से और नासिका की पृथ्वी तथा गन्ध से जातीय एकता है। मन-बुद्धि आदि आन्तरिक इन्द्रियों की श्रवण-नेत्र आदि बाह्य इन्द्रियों से एवं प्रत्येक ज्ञानेन्द्रिय की प्रत्येक कर्मेन्द्रिय से जातीय एकता है ।

        यदि ऐसा न होता, तो आन्तरिक इन्द्रियों के अनुरूप बाह्य इन्द्रियाँ चेष्टा न करतीं । आन्तरिक एवं बाह्य इन्द्रियों का कारण-कार्य का सम्बन्ध है । प्रत्येक कार्य अपने कारण में विलीन होता है । कारण कार्य के बिना भी रह सकता है, किन्तु कार्य कारण के बिना नहीं रह सकता । कारण में स्वतन्त्रता अधिक होती है और कार्य में गुणों की विशेषता होती है । कारण सूक्ष्म एवं अव्यक्त होता है और कार्य स्थूल एवं व्यक्त होता है । जो सूक्ष्म एवं अव्यक्त होता है, वह स्थूल एवं व्यक्त की अपेक्षा अधिक विभु होता है। इसी कारण आन्तरिक इन्द्रियों की प्रेरणा से ही बाह्य इन्द्रियाँ प्रवृत होती हैं ।

        उसी प्रकार हमारी अपने निज-स्वरूप, नित्य-जीवन से एकता है । अतः हमारे लिए नित्य-जीवन का अनुभव करना परम अनिवार्य है । शरीर विश्व से भिन्न नहीं हो सकता और हमारी शरीर से काल्पनिक सम्बन्ध के अतिरिक्त जातीय एकता कदापि नहीं हो सकती अर्थात् 'शरीर विश्व के और हम विश्वनाथ से ही अभिन्न हो सकते हैं'; क्योंकि हम स्वभाविक रूप से यही कथन और चिन्तन करते हैं कि शरीर हमारा है; 'हम शरीर हैं', ऐसा कोई भी प्राणी कथन नहीं करता । 

- (शेष आगेके ब्लाग में) 'सन्त-समागम भाग-2' पुस्तक से, (Page No. 9-10) ।

Friday, 15 November 2013

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Friday, 15 November 2013  
(कार्तिक शुक्ल त्रयोदशी, वि.सं.-२०७०, शुक्रवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
कर्तव्य-अकर्तव्य का विवेचन

        प्रत्येक व्यक्ति का जीवन उस अनन्त जीवन का एक अंशमात्र है। प्रत्येक अंश उससे अभिन्न हो सकता है, जिसका वह अंश है; पर उसके सम्बन्ध में कोई निर्णय नहीं दे सकता । जिस सीमित परिवर्तनशील योग्यता से हम निर्णय देते हैं, वह योग्यता क्या हमारी अपनी वस्तु है? यदि हमारी वस्तु है, तो उसमें परिवर्तन क्यों है ? और उसका विनाश क्यों है ? यदि हमारी नहीं है, तो क्या हमें जिससे मिली है, उसकी ओर गतिशील होने का कभी प्रयत्न किया ? यदि नहीं किया, तो हमें किसी प्रकार के निर्णय करने का क्या अधिकार है ? व्यक्ति मिली हुई योग्यता का सदुपयोग ही कर सकता है; किसी प्रकार का अनर्गल निर्णय देकर खीझना व्यर्थ है ।

        दुःख उतनी बुरी वस्तु नहीं, जितना हम मान लेते हैं। दुःख के आधार पर ही हम आनन्द की प्राप्ति कर सकते हैं। जिस प्रकार भूख ही भोजन-प्राप्ति में हेतु है, उसी प्रकार दुःख तथा मृत्यु ही अमरत्व तथा आनन्द की प्राप्ति में हेतु है । पर ऐसा तभी हो सकता है, जब हम दुःख होने पर विचार करें, भयभीत न हों। दुःख हमारे बिना ही बुलाए आया है, हम उसे रोक नहीं सकते। जिसे रोक नहीं सकते और जो अपने-आप आता है, वह किसी ऐसे की देन है, जो अनन्त है ।

        उस अनन्त की देन में सभी का हित विद्यमान है । उससे भयभीत होना हमारी अपनी भूल है । जिस काल में दुःख पूर्ण जागृत होता है, उसी काल में सब प्रकार की आस्क्तियाँ अपने-आप मिट जाती है, जिनके मिटते ही हम उस अनन्त की महिमा देखने के अधिकारी हो जाते हैं । अथवा यों कहो कि उसकी महिमा का आश्रय लेकर ही उससे नित्य-सम्बन्ध स्वीकार कर लेते हैं । अतः जो कुछ हो रहा है, वह हमें 'नहीं' से 'है' की ओर गतिशील करने में समर्थ है । 'नहीं' का अर्थ अभाव है और 'है' का अर्थ अभाव-का-अभाव । इस दृष्टि से प्रत्येक 'अभाव', अभाव-का-अभाव करने में समर्थ है और प्रत्येक रचना उस अनन्त की लालसा जागृत करने में हेतु है । अतः जो हो रहा है; उसमें सब कुछ मिल सकता है ।

- 'जीवन-दर्शन भाग-2' पुस्तक से, (Page No. 26-27) ।

Thursday, 14 November 2013

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Thursday, 14 November 2013  
(कार्तिक शुक्ल द्वादशी, वि.सं.-२०७०, गुरुवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
कर्तव्य-अकर्तव्य का विवेचन

       जो हो रहा है, उससे तो हमें प्रेम तथा जीवन की ही उपलब्द्धि होती है । इस दृष्टि से जो हो रहा है, उसमें सभी का हित विद्यमान है । अतः 'होने' में प्रसन्न तथा 'करने' में सावधान रहने के लिए सतत प्रयत्नशील रहना चाहिए ।

        अब यदि कोई यह कहे कि वस्तु आदि के सौन्दर्य को देखकर हमारे जीवन में काम की उत्पत्ति होती है और दुःख-मृत्यु आदि को देखकर भय उत्पन्न होता है । तो कहना होगा कि हमारे देखने में दोष है । हम सीमित सौन्दर्य को देखकर ही उसमें आबद्ध हो जाते हैं और उसका भोग करने लगते हैं, अनन्त और नित्य सौन्दर्य की लालसा को सबल नहीं होने देते। प्रत्येक भोग के परिणाम में भयंकर रोग उत्पन्न होता है, जो जिज्ञासा जागृत करने में हेतु है । पर हम जिज्ञासु न होकर उस रोग-शोक आदि को देखकर खीझने लगते हैं और मनमाना कोई-न-कोई निर्णय कर बैठते हैं कि उस अनन्त की रचना में इतना दुःख क्यों है!

        इतना ही नहीं, कभी-कभी तो यहाँ तक कहने लगते हैं कि सृष्टि का कोई कर्ता नहीं है, घटनाएँ अकस्मात हो रही हैं, मृत्यु-ही-मृत्यु है, जीवन जैसी कोई वस्तु है ही नहीं; जहाँ तक सुख सम्पादित सकें, करते रहें । यद्यपि सुख-सम्पादन के परिणाम में दुःख-ही-दुःख भोगते रहते हैं और खीझते रहते हैं; परन्तु न तो घटनाओं के अर्थों पर विचार करते हैं, न उस कर्ता की कारीगरी को देखते हैं और न अपने को उसका जिज्ञासु अथवा भक्त ही मानते हैं । अपितु भोगी तथा रोगी बनकर ही जीवित रहते हैं। दुःख तथा मृत्यु के दर्शन से तो हमारे जीवन में अमरत्व त्तथा आनन्द की लालसा जागृत होनी चाहिए थी, पर ऐसा नहीं होता। उसका कारण यह है कि हम मनमाना निर्णय कर लेते हैं, जो हमारा अपना ही दोष है । हमारा निर्णय ऐसा ही होता है, जैसे कोई जल-कण सागर के विषय में मनमाना निर्णय कर ले ।

- (शेष आगेके ब्लागमें) 'जीवन-दर्शन भाग-2' पुस्तक से, (Page No. 25-26) ।

Wednesday, 13 November 2013

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Wednesday, 13 November 2013  
(कार्तिक शुक्ल एकादशी, वि.सं.-२०७०, बुधवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
कर्तव्य-अकर्तव्य का विवेचन

        जो हो रहा है, उसके दो रूप दिखाई देते हैं - एक तो सीमित सौन्दर्य और दूसरा प्रत्येक वस्तु आदि का सतत परिवर्तन । वस्तु आदि के सौन्दर्य को देखकर हमें उस अनन्त सौन्दर्य की महिमा का अनुभव स्वतः होने लगता है । जिस प्रकार किसी सुंदर वाटिका को देखकर वाटिका के माली की स्मृति स्वतः जागृत होती है, उसी प्रकार प्रत्येक रचना को देखकर संसाररूपी वाटिका के माली की स्मृति स्मृति जागृत होती है, क्योंकि किसी की रचना का दर्शन रचयिता की महिमा को प्रकाशित करता है । इस दृष्टि से प्रत्येक वस्तु हमें उस अनन्त की ओर ले जाने में हेतु बन जाती है और हम उसकी रचना देख-देखकर नित-नव प्रसन्नता का अनुभव करने लगते हैं । यहाँ तक कि प्रत्येक रचना में उस कलाकार का ही दर्शन होने लगता है। ऐसा प्रतीत होने लगता है कि यह सब उस अनन्त की लीला ही है, और कुछ नहीं ।

        अनन्त की लीला भी अनन्त ही है और उसका दर्शन भी अनन्त है । लीला का बाह्य स्वरूप भले ही सीमित तथा परिवर्तनशील हो, पर उसके मूल में तो अनन्त नित्य चिन्मय तत्व ही विद्यमान है । उनकी अनुपम लीला का दर्शन उनकी चिन्मय दिव्य प्रीति जागृत करने में समर्थ है । अतः जो हो रहा है, उसका प्रभाव प्रेमी बनाकर प्रेमास्पद से अभिन्न करने में हेतु है।

        अब रहा वस्तु आदि में परिवर्तन के दर्शन का प्रभाव परिवर्तन का दर्शन होते ही स्वभावतः अविनाशी की जिज्ञासा जागृत होती है । ज्यों-ज्यों जिज्ञासा सबल तथा स्थाई होती जाती है, त्यों-त्यों कामनाएँ स्वतः मिटने लगती हैं । कामनाओं का अन्त होते ही जिज्ञासा की पूर्ति हो जाती है और जिज्ञासा की पूर्ति में ही अमर जीवन निहित है ।

- (शेष आगेके ब्लागमें) 'जीवन-दर्शन भाग-2' पुस्तक से, (Page No. 24-25) ।

Tuesday, 12 November 2013

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Tuesday, 12 November 2013  
(कार्तिक शुक्ल दशमीं, वि.सं.-२०७०, मंगलवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
कर्तव्य-अकर्तव्य का विवेचन

        इन्द्रिय-दृष्टि की सत्यता का प्रभाव राग उत्पन्न करता है और राग भोग में प्रवृत करता है; किन्तु बुद्धि-दृष्टि की सत्यता राग को वैराग्य में और भोग को योग में परिवर्तित करने में समर्थ है । जब राग वैराग्य में और भोग योग में बदल जाता है, तब दृष्टा में मान्यताओं से अतीत होकर देखने की योग्यता आती है। उससे पूर्व हम जो कुछ देखते हैं, वह किसी-न-किसी मान्यता में आबद्ध होकर ही देखते हैं, अर्थात् उस समय हमारी दृष्टि सीमित रहती है, दूरदर्शिनी नहीं रहती । इस कारण जो वस्तु जैसी है, उसे वैसी ही नहीं जान पाते। अतः हम अनेक प्रकार के प्रभाओं में आबद्ध रहते हैं ।

        यह तो सभी को मान्य होगा कि कर्तृत्वकाल में भोग हो सकता है, देखना नहीं; क्योंकि जब हम कुछ करते हैं, तब देखते नहीं और जब देखते हैं, तब करते नहीं । इस दृष्टि से विषयों के उपभोगकाल में विषयों को देख नहीं पाते और जब विषयों को देखते हैं, तब उनका उपभोग नहीं कर सकते । अतः देखना तभी सम्भव हो सकता है, जब उपभोगकाल न हो । 

        भोग-प्रवृति भोग का देखना नहीं, अपितु भोग के आरम्भ का सुख और परिणाम का दुःख भोगना है । सुख-दुःख का भोग करते हुए हम जो स्वतः हो रहा है, उसे यथार्थ देख नहीं सकते। अतः जो हो रहा है, उसको देखने के लिए हमें रागरहित दृष्टि की अपेक्षा है, जो विवेकसिद्ध है ।

- (शेष आगेके ब्लागमें) 'जीवन-दर्शन भाग-2' पुस्तक से, (Page No. 23) ।

Monday, 11 November 2013

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Monday, 11 November 2013  
(कार्तिक शुक्ल नवमीं, वि.सं.-२०७०, सोमवार)

(गत ब्लाग से आगेका)
कर्तव्य-अकर्तव्य का विवेचन

        इन्द्रियों की दृष्टि से समस्त विषय सुखद तथा सत्य प्रतीत होते हैं। जबतक इन्द्रिय-दृष्टि का प्रभाव मन पर रहता है, तबतक मन इन्द्रियों के अधीन होकर विषयों की और गतिशील रहता है और जब मन पर बुद्धि-दृष्टि का प्रभाव होने लगता है, तब इन्द्रियों का प्रभाव मिटने लगता है; क्योंकि जो वस्तु इन्द्रिय-दृष्टि से सत्य और सुंदर मालूम होती है, वही वस्तु बुद्धि-दृष्टि से असत्य और असुन्दर मालूम होती है।

        बुद्धि-दृष्टि का प्रभाव होते ही मन विषयों से विमुख हो जाता है । उसके विमुख होते ही इन्द्रियां स्वतः विषयों से विमुख होकर मन में विलीन हो जाती हैं और मन बुद्धि में विलीन हो जाता है । उसके विलीन होते ही बुद्धि सम हो जाती है । फिर उस समता का जो दृष्टा है, वह किसी मान्यता में आबद्ध नहीं हो सकता । उस दृष्टा की दृष्टि में सृष्टि जैसी कोई वस्तु ही नहीं है; क्योंकि समस्त सृष्टि तो बुद्धि के सम होते ही विलीन हो जाती है; केवल समता रह जाती है । उस समता का प्रकाशक जो नित्य-ज्ञान है, उसमें सृष्टि जैसी कोई वस्तु ही नहीं प्रतीत होती, अथवा यों कहो कि उस ज्ञान से अभिन्न होने पर सब प्रकार के अभाओं का अभाव हो जाता है; अर्थात् कामनाओं की निवृति तथा जिज्ञासा की पूर्ति हो जाती है, जो वास्तव में जीवन है ।



- (शेष आगेके ब्लागमें) 'जीवन-दर्शन भाग-2' पुस्तक से, (Page No. 22-23) ।