Sunday, 24 November 2013

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Sunday, 24 November 2013 
(मार्गशीर्ष कृष्ण षष्ठी, वि.सं.-२०७०, रविवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
साधना की अभिव्यक्ति के लिये जीवन के सत्य को स्वीकार 
करो - 2
                   
मानव-सेवा-संघ ने कहा - तुम पहले सत्य को स्वीकार करो, सत्य को स्वीकार करने से अकर्त्तव्य, असाधन और आसक्ति मिटेगी । यह पहले मिटेगी । और जब अकर्त्तव्य मिट जायगा, तब जो कर्त्तव्य-परायणता आयेगी और जब आसक्ति मिट जायगी, तब जो प्रियता आयेगी, वह कर्त्तव्य-परायणता, वह असंगता और वह प्रियता आपके जीवन में साधना के रूप में प्रकट होगी, यानी वह आपकी साधना हो जायगी । और जब साधना के रूप में असंगता, कर्त्तव्य-परायणता और प्रियता आपको प्राप्त होगी, तब निर्विकारता, शान्ति, मुक्ति और भक्ति भी आपको प्राप्त हो जायगी । ऐसी बात नहीं है कि कर्त्तव्य-परायणता के बिना आपको निर्विकारता और शान्ति मिल जाय, असंगता के बिना आपको मुक्ति मिल जाय और आत्मीयता के बिना भक्ति मिल जाय । यह कभी नहीं होगा। भक्ति जब मिलेगी, तो आत्मीयता से ही मिलेगी और मुक्ति जब मिलेगी, तो असंगता से ही मिलेगी, निर्विकारता जब मिलेगी, तब निर्ममता से ही मिलेगी और चिर-शान्ति जब मिलेगी, तो निष्कामता से ही मिलेगी । यह जीवन का अटल सत्य है ।

तो, मैं यह निवेदन कर रहा था कि निर्मम होना, असंग होना अथवा परमात्मा से आत्मीय सम्बन्ध स्वीकार करना - यह सत्संग हुआ । अगर आप सत्संग करेंगे, तो साधना स्वत: प्रकट हो जायगी । और महाराज, साधना और साध्य में विभाजन नहीं होता, साधना और साध्य में दूरी नहीं रहती, भेद और भिन्नता नहीं रहती । तो साधना साध्य से अभिन्न हो जायगी । इसमें कोई सन्देह की बात नहीं है । परन्तु जीवन में साधना की अभिव्यक्ति होनी चाहिये और साधना की यह अभिव्यक्ति एक-मात्र सत्संग से ही होगी, अन्य किसी प्रकार नहीं हो सकती । आप सोचिये कि सत्संग के बिना भी आप बलपूर्वक साधना तो कर सकते हैं, लेकिन वह जीवन के साथ अभिन्न नहीं होगी। इस प्रकार की हुई साधना से आप अपने को अलग अनुभव करेंगे और बलपूर्वक की हुई साधना को अलग अनुभव करेंगे और कहेंगे कि आज मैंने इतनी देर ध्यान किया । ध्यान अलग और आप अलग । आज मैंने इतना जप किया । जप अलग और आप अलग । आज मैंने इतना तप किया । तप अलग और आप अलग । आज मैंने इतना दान दिया । दान अलग और आप अलग । इस प्रकार की भिन्नता रहेगी ही और जब इस प्रकार की भिन्नता रहेगी, तो 'आपका' जो अस्तित्व रहेगा, वह साधन रूप नहीं हो पाएगा । इसलिये सत्संग के द्वारा आपके अस्तित्व में ही, किसी और में नहीं, आपके अस्तित्व में ही, साधना की अभिव्यक्ति हो जायेगी ।

जब मनुष्य के अस्तित्व में साधना की अभिव्यक्ति हो जाती है, तो फिर असाधन की उत्पत्ति नहीं होती । क्योंकि अगर साधन से अलग यदि अपना कोई अस्तित्व रहता, तो सम्भव है, फिर कभी असाधना आ जाती । लेकिन जब साधक की साधना से भिन्न उसका अलग कोई अस्तित्व रहता ही नहीं, तो फिर सदा के लिये असाधन का नाश हो जाता है, और जब असाधन का नाश सदा के लिये हो गया, तो फिर साधना और साध्य तो अभिन्न हैं ही, बल्कि ऐसा कहना चाहिये कि साधना तो साध्य की ही महिमा है, और कुछ नहीं है । तो साधना का जो रूप हुआ वह साधक का जीवन भी है और साध्य की महिमा भी है । इससे यह सिद्ध हुआ कि साध्य की महिमा साधक का जीवन है । यह बड़े रहस्य की और गम्भीर बात है । साध्य की महिमा, और महिमा किसे कहते हैं ? महिमा का अर्थ होता है, जो हमें आकर्षित कर सके, खींच ले । इस प्रकार हमारा जीवन ही साध्य की महिमा हो गई । तो फिर महिमा हम को खींच लेगी न । जरूर खींच लेगी । इसी सत्य को समझाने के लिए हमने विद्वान् महानुभावों के श्रीमुख से सुना है कि परमात्मा, जिसे पसन्द करता है, उसको स्वयं वरण कर लेता है । अब प्रश्न होगा कि परमात्मा किसे पसन्द करता है ? मानव-सेवा-संघ की विचारधारा के अनुसार इसका उत्तर होगा कि जो सत्संग के द्वारा अपने में साधना को प्रकट कर लेता है, अथवा सत्संग के द्वारा जिसमें साधना प्रकट हो जाती है, परमात्मा उसी को पसन्द करता है ।


 - ‘प्रेरणा पथ' पुस्तक से, (Page No. 36-38)

Saturday, 23 November 2013

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Saturday, 23 November 2013 
(मार्गशीर्ष कृष्ण पंचमी, वि.सं.-२०७०, शनिवार)

साधना की अभिव्यक्ति के लिये जीवन के सत्य को स्वीकार 
करो - 2

जीवन के सत्य को स्वीकार किये बिना, सत्संग से वंचित होकर, सत्संग से विमुख होकर-हमारे किये सत्कार्य का, सत्-चिन्तन का और हमारी की हुई सत्-चर्चा का यह फल नहीं होगा कि हमारे जीवन में साधना की अभिव्यक्ति हो जाय और हम सत्य से अभिन्न हो जायें । यही कारण है कि आज आप समय का बहुत बड़ा भाग सत्-चर्चा और सत्-चिन्तन में लगा देते हैं और समय और सम्पत्ति का बहुत बड़ा भाग आप सत्कार्यों में लगा देते हैं । आपने समय और सम्पत्ति को सत्कार्यों में लगाया, आपने सत्-चर्चा और सत्-चिन्तन किया । परन्तु सत्संग न करने से आपके जीवन में साधना की अभिव्यक्ति नहीं हुई। और जब जीवन में साधना की अभिव्यक्ति नहीं होती, तब साधना हमारे लिए एक भार हो जाती है, एक अस्वाभाविक बात हो जाती है । कभी-कभी, आपने देखा होगा कि बड़े उत्साह से, बड़े प्रेम से हम नित्यकर्म करने बैठ गये, किया और जिस समय नित्यकर्म पूरा हो जाता है, उस समय जैसी  'रिलीफ' आपको मालूम होती है, वैसी रिलीफ नित्यकर्म करते समय मालूम होती है क्या? आपने इस विषय में विचार नहीं किया होगा तो ठीक उत्तर दे नहीं पायेंगे। आप कभी अनुभव करके देखिये । आप किसी भी अनुष्ठान को करने के लिये तत्पर हो जाइये। जिस समय अनुष्ठान सम्पन्न होता है और आप थोड़ी देर के लिए न करने की स्थिति में आते हैं, उस समय जैसा संतोष आपको मालूम होता है, वैसा संतोष अनुष्ठान-काल में नहीं मालूम होता ।
             
भागलपुर में एक महात्मा बड़े यज्ञ कराया करते हैं, बहुत से यज्ञ उन्होंने कराये हैं । और उनके यज्ञों में लाखों रुपये का व्यय होता है, और लाखों रुपया एकत्रित भी हो जाता है - ऐसे यज्ञ कराते हैं वे । हमने सोचा कि चलें, महात्मा से भेंट कर आवें । जब हम उनसे भेंट करने गये, तो उनके मुँह से सबसे पहले यही बात निकली - 'महाराज, ऐसी कृपा कीजिये कि अनुष्ठान सानन्द सम्पन्न हो जाय'। उन्होंने यह कहा तो ठीक ही कहा - सच्ची बात ही कही । पर हमें लगा कि हमने जो सोचा था कि ये अनेक यज्ञ कर चुके हैं, लाखों रुपये व्यय कर चुके हैं, तो ये बिल्कुल निश्चिन्त जरूर होंगे । पर ऐसी बात नहीं थी, ऐसा होता नहीं है। कितना भी बड़ा काम कीजिए और सफल भी हो जाइये, फिर भी उस कार्य की पूर्ति-काल में जो सन्तोष होता है, वह कार्य-काल में नहीं । एक बात । दूसरी बात यह है कि कार्य के द्वारा आपको जो थोड़ा सा सन्तोष होता है, वह पुन: कार्य करने के संकल्प को जन्म दे देता है । यह बड़ी ऊँची बात है, बड़ी गम्भीर बात है ।


 - (शेष आगेके ब्लाग में) ‘प्रेरणा पथ' पुस्तक से, (Page No. 34-36)

Friday, 22 November 2013

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Friday, 22 November 2013 
(मार्गशीर्ष कृष्ण पंचमी, वि.सं.-२०७०, शुक्रवार)

साधना की अभिव्यक्ति के लिये जीवन के सत्य को स्वीकार करो - 1

मिली हुई वस्तु पर हमारा अधिकार नहीं है और देखी हुई सृष्टि का स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं है। जिस का स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं है, उसकी हम कामना नहीं करेंगे, और जिस पर हमारा स्वतन्त्र अधिकार नहीं है, उसमें ममता नहीं करेंगे । तो दो बातें सामने आती हैं, - अगर हम शरीर से ममता नहीं करते और संसार की कामना नहीं करते, तो निर्मम होने से निर्विकारता और निष्काम होने से चिर-शान्ति प्राप्त होती है । अब यह जो निर्विकारता और चिरशान्ति आपको प्राप्त हुई, यह आपकी उपार्जित वस्तु नहीं है । यह सर्वमान्य तथ्य है कि निर्विकारता का तत्त्व स्वाभाविक तत्त्व है और शान्ति का तत्त्व भी स्वाभाविक तत्त्व है । ऐसे ही असंगता से प्राप्त स्वाधीनता है । वह भी स्वाभाविक तत्त्व है । इसी प्रकार आत्मीयता से प्राप्त जो अखण्ड स्मृति तथा अगाध प्रियता है, वह भी स्वाभाविक तत्त्व है । तो निर्विकारता, शान्ति, मुक्ति और अखण्ड-स्मृति तथा अगाध-प्रियता का स्वतन्त्र अस्तित्व है । अब देखिये, जिसका स्वतन्त्र अस्तित्व है, उसी को हमें पसन्द करना चाहिये । यदि इस बात को आप मान लें तो बड़ी सुगमतापूर्वक साधन-तत्त्व से, साधना से अभिन्न हो सकते हैं । परन्तु हम सबसे गलती यह होती है कि निर्मम होना पसन्द नहीं करते और हमारे पास यदि धन है, तो उसको अपना मानकर लोभ करते हैं । यदि ऐसा न करें, तो धन के लोभ की उत्पत्ति ही नहीं होती है । इस प्रकार धन से आपकी कोई हानि नहीं होती, हानि तो उसे अपना मानने से होती है; क्योंकि धन से तो लोभ की उत्पत्ति है ही नहीं, लोभ की उत्पत्ति हुई धन को अपना मानने से ।

जो साधक 'अपना' मान करके दान भी कर देता है, तो महाराज ! उलटी ही प्रतिक्रिया होती है । हमारे पास अभी एक बहिन ने कुछ रुपया भेजा है - अपनी बहिन का रुपया, आप जानकर ताज्जुब करेंगे कि उसके लिये उन्होंने अपनी तीन पुश्तों के नाम लिखाने को कहा है कि अमुक-अमुक के नाम लिखा दें। लेकिन सोचिये तो सही, दान देने के बाद भी, उस धन के बदले में न जाने क्या-क्या चाहते हैं । अब आप सोचिये, उसका परिणाम यही होगा कि हम धन देने का सुख-भोग, नाम और यश की दासता में बँध गये ।

ऐसी दशा में क्या धन से हमारा सम्बन्ध टूट गया ? या हम निर्लोभ हो गये ? क्या यह सम्भव होगा ? परिणाम यही होगा कि इस प्रकार के दान से हमको यश और नाम तो मिल गया; लेकिन वह दान जो दिया गया, उसके बदले में यदि आपने आत्म-ख्याति चाही, उसका फल चाहा, तो आपने दिया या लिया? यह ऐसा ही दान हुआ जैसे कोई-कोई किसान खेत में बीज डाले और कहे कि हमने भूमि को दाना भेंट कर दिया, दान दे दिया । यह तो भूमि जानती है कि इसने जो एक दाना डाला है, उसके बदले में मुझसे कई गुना उसे लेना चाहता है। तो, लेने के लिए जो दिया जाता है, वह दान नहीं है । वह पुण्य कर्म कहलाता है, वह त्याग नहीं कहलाता । उससे आपको निर्दोषता प्राप्त नहीं हो सकती, उससे आपको निरभिमानता प्राप्त नहीं हो सकती ।

इसलिये मानव-सेवा-संघ ने कहा कि ऐसा मानो, जीवन के इस सत्य को स्वीकार करो कि मुझे जो कुछ मिला है, वह मेरा नहीं है । अगर आप यह बात मान लेंगे, तो निर्विकारता आ जायगी । उसके बदले में मुझे कुछ नहीं चाहिए - यह बात मान लें, तो चिर-शान्ति आ जायगी । और फिर सृष्टि पर मेरा कोई अधिकार नहीं है - अगर इस सत्य को मान लेंगे, तो असंग होकर स्वाधीनता प्राप्त हो जायगी । ऐसे ही, जब प्रभु को आप अपना मान लेंगे, तो प्रियता आ जायगी ।
                   
अब आप देखिए, जितनी साधना है, वह सत्य को स्वीकार करने से प्राप्त हुई, साधना सत्य को स्वीकार करने से आप में प्रकट हो गई । परन्तु हम सत्य को स्वीकार करना तो छोड़ देते हैं और सत्-कार्य, सत्-चर्चा और सत्-चिन्तन को पकड़ लेते हैं । मैं यह नहीं कहता कि सत्-कार्य नहीं करना चाहिये या सत्-चर्चा और सत्-चिन्तन नहीं करना चाहिये । ऐसा मेरा मत नहीं है । लेकिन सत्संग से वंचित होकर, सत्संग से विमुख होकर, हमारा किया हुआ जो सत्कार्य है, हमारा किया हुआ जो सत्-चिन्तन है, हमारी की हुई जो सत्-चर्चा है, उसका वह फल नहीं होगा कि जीवन में साधना की अभिव्यक्ति हो जाय, और हम साध्य से अभिन्न हो जायँ ।


 - ‘प्रेरणा पथ' पुस्तक से, (Page No. 32-34)

Thursday, 21 November 2013

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Thursday, 21 November 2013 
(मार्गशीर्ष कृष्ण चतुर्थी, वि.सं.-२०७०, गुरुवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
अपनी ओर निहारो - 3

एक होता है मिला हुआ, एक होता है प्राप्त । मिला हुआ वही है, जिसको आप 'यह' कहकर सम्बोधन करते हैं, और प्राप्त वह है जिसको आप 'है' करके सम्बोधन करते हैं । और किसको मिला है ? जिसको आप 'मैं' करके सम्बोधन करते हैं । तो 'मैं' को कुछ मिला है और भाई, और कुछ मौजूद है । जब मैं पहले मिले हुये में ममता करता हूँ तो असत् का संग हो जाता है, और मौजूद में आस्था करता हूँ तो सत् का संग हो जाता है । सत् का संग होते ही वह ज्ञान जिसको गुरु ने कहा है - 'यह गुरु का ज्ञान है ।' वह ज्ञान जिसको शास्त्रों ने कहा है -'यह शास्त्र का ज्ञान है', वह ज्ञान जिसको पीर और पैगम्बर ने कहा है कि यह पीर और पैगम्बर का ज्ञान है, वही ज्ञान आप के जीवन में स्वत: अवतरित होता है, स्वत: स्फुरित होता है । ऐसा क्यों ? यह मंगलमय विधान है, यों । इसी आधार पर मानव-सेवा-संघ ने कहा कि 'हे मानव ! तू क्यों निराश होकर बैठा है ? तू क्यों हार मानकर बैठा है ? तू क्यों भय से भयभीत हो कर बैठा है ?’

एक दिन मैं मानव-सेवा-संघ के निर्माण निकेतन आश्रम राँची में बैठा हुआ था । एक विदेशी डाक्टर आये, जो लिटरेचर के डाक्टर थे । उन्होंने एक प्रश्न किया । वे हिन्दी नहीं जानते थे और मैं इंगलिश नहीं जानता था । मेरे चार-पाँच मित्र वहाँ बैठे हुये थे । उन्होंने कहा – महाराज, हमारे सामने एक प्रौबलम है, समस्या है, और वह यह है कि आज ऐसे विनाशकारी आविष्कार हो गये हैं, जिनको देखकर आशंका होती है कि संसार का न जाने कब नाश हो जाय ! इस सम्बन्ध में आपका क्या विचार है ? मैंने अपनी मिली हुई प्रेरणा के अनुसार कहा - 'मेरे भाई, मुझे तो लेशमात्र भी इसका भय नहीं है । बोले, क्यों ? मैंने कहा, 'जो व्यक्ति सृष्टि बना नहीं सकता, उसको चैलेंज है कि वह उसे मिटा भी नहीं सकता । उसने कहा - सोचता मैं भी ऐसा ही था, परन्तु उसे कहने का मेरा साहस नहीं होता था । उसने अपनी डायरी निकाली और नोट कर लिया । हमारे देश के लोगों में और दूसरे देश के लोगों में एक बड़ा अन्तर है । हमारे देश के लोग इस बात पर ध्यान देते हैं कि बोलने वाला कौन है, उसका मुँह कैसा है, उसकी शिक्षा-दीक्षा क्या है, आदि । विदेशी ऐसा नहीं करते । वे जो बोला गया, उस पर विचार करते हैं । हमारे देश की आज यह दशा है कि जो मुझसे प्रेम करते हैं, वे मेरे व्याख्यान के बाद उठ जायेंगे । जो स्वामी जी महाराज से प्रेम करते हैं, वे उनके व्याख्यान के बाद उठ जायेंगे । क्योंकि उन्हें इससे मतलब नहीं कि बात क्या है । उन्हें तो सिर्फ इससे मतलब है कि मुँह कौन सा है ? यह मुँह कौन सा है, यह भाषा कौन सी है ? यह तरीका कौन सा है ? परन्तु जहाँ आप लोग भाषा पर दृष्टि रखते हैं,  मुँह पर दृष्टि रखते हैं, तरीके पर दृष्टि रखते हैं और जो शब्द कहे गये, उनके अर्थ पर दृष्टि नहीं रखते, वहाँ यही परिणाम होता है कि दिमागी उन्नति तो बहुत हो जाती है, मस्तिष्क में संग्रह तो बहुत हो जाता है; लेकिन हृदय का पल्ला बहुत नीचे गिर जाता है । क्रियात्मक जीवन बहुत निम्नकोटि का हो जाता है । परन्तु वह विदेशी जिज्ञासु भाई, हम लोगों की भाँति नहीं था । उसने डायरी निकाली, नोट किया और मुझे विश्वास दिलाया कि मैं आपका यह सन्देश अपने देश में कहूँगा । कहने का मेरा तात्पर्य केवल इतना ही है कि आप इस बात से हार मान कर न बैठ जायँ कि हम साधारण प्राणी हैं, भला हम सृष्टि के लिए कैसे उपयोगी हो सकते हैं ? परन्तु मैं सच कहता हूँ यह मिथ्या धारणा है ।


 - ‘प्रेरणा पथ' पुस्तक से, (Page No. 30-32)

Wednesday, 20 November 2013

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Wednesday, 20 November 2013 
(मार्गशीर्ष कृष्ण तृतीया, वि.सं.-२०७०, बुधवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
अपनी ओर निहारो - 3

जब हम मिले हुये का दुरुपयोग नहीं करते हैं, तब हमारे द्वारा दूसरों के अधिकार सुरक्षित होते हैं और जब हमारे द्वारा दूसरों के अधिकार सुरक्षित होते हैं, तो परस्पर एकता होती है । जब एकता होती है, तो स्नेह की वृद्धि होती है, विश्वास की वृद्धि होती है। जब परस्पर स्नेह और विश्वास की वृद्धि होती है, तब जो नहीं करना चाहिए, उसकी उत्पत्ति ही नहीं होती । तब अपने आप एक ऐसे सुन्दर समाज का निर्माण हो जाता है कि जिसको पुलिस की, फौज की, न्यायालय की, लड़ाई के सामान की जरूरत ही नहीं होती । इस बात को सुनकर मेरे बहुत से मित्र यह सन्देह करते हैं, कहते हैं, 'महाराज ! आप ऐसी जो बात कहते हैं, वह व्यक्तिगत रूप से तो बिलकुल ठीक मालूम होती है; किन्तु सामूहिक रूप से ऐसा होना सम्भव नहीं है । परन्तु यदि आप गम्भीरतापूर्वक विचार करें, तो आपको यह स्वीकार करना ही पड़ेगा कि जो बात हमारे अहं में आ जाती है, वह विभु हो जाती है । आप सोचिये कि पहले आपको किस का भास होता है? आप कहेगे कि स्वयं अपना - यानी 'मैं हूँ’ । इससे यही तो सिद्ध हुआ कि आपसे पुराना इस दृश्य में कोई नहीं है । यह कल्पना नहीं है, एक वैज्ञानिक तथ्य है। इसमें दार्शनिक रहस्य है । आपके अहं से पुराना इस सारी सृष्टि में कोई नहीं है। अत: सृष्टि का कोई भाग ऐसा नहीं है कि जहाँ अहं न हो ।

अहं विभु है; लेकिन विभु होने पर भी उसके गुणों में भेद होता है । अहं बुद्धि से भी सूक्ष्म है और सूक्ष्म होने के नाते सबसे अधिक व्यापक है । इसीलिये वह बुद्धि से भी अधिक सूक्ष्म है । बुद्धि मन से सूक्ष्म है, मन इन्द्रियों से सूक्ष्म है और इन्द्रियाँ इस दृश्य से सूक्ष्म हैं । अत: जो न्याय, जो ईमानदारी, जो प्रेम, जो श्रद्धा, जो विश्वास और जो सच्चरित्रता स्वयं आपके जीवन में आ जाती है, वह व्यापक हुये बिना नहीं रह राकती । इसीलिये व्यक्ति की सुन्दरता पर ही समाज की सुन्दरता निर्भर करती है । और इसीलिये यह बात कही गई है कि व्यक्ति अपने जीवन को सुन्दर बना कर ही समाज में सुन्दरता ला सकता है । जीवन सुन्दर कैसे होता है ? जीवन सुन्दर होता है, सत्संग से । और हम सत्संग करने में क्या स्वाधीन नहीं हैं ? हैं, सभी स्वाधीन हैं । अपने जीवन में से अपने जाने हुये असत् के त्याग में हम सभी स्वाधीन हैं । कोई भाई, कोई बहिन ऐसी नहीं है, जो सत्संग में स्वाधीन न हो । सत्संग का अर्थ है 'है' का संग । 'है' माने, जो मौजूद है । तो, मौजूद का राग करने में कोई पराधीन नहीं है । ऐसा मैं अपनी भाषा में कहता हूँ, मैं बे-पढा-लिखा आदमी हूँ, इसलिए उसमें कुछ दोष रह जाते हैं । यहाँ पर 'मौजूद' का अर्थ वैसा नहीं है, जैसा कि 'आप लोग यहाँ मौजूद हैं' ऐसा कहने में है ।


 - (शेष आगेके ब्लाग में) ‘प्रेरणा पथ' पुस्तक से, (Page No. 29- 30)

Tuesday, 19 November 2013

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Tuesday, 19 November 2013 
(मार्गशीर्ष कृष्ण द्वितीया, वि.सं.-२०७०, मंगलवार)

अपनी ओर निहारो - 3

हम स्वयं अपने नेता बनें और यह समझें कि नेता किसे कहते हैं ? और राष्ट्र किसे कहते हैं? राष्ट्र में बल का उपयोग होता है और जो नेता है, वह समझदारी का उपयोग करता है, समझाता-बुझाता है । नेता उसी को कहते हैं । आपके जीवन में जो बुद्धि का स्तर है, समाज में वही नेता का स्तर है। आपके जीवन में जो मन का स्थान है, समाज में वही राष्ट्र का स्थान है । मन के द्वारा इन्द्रियों पर शासन होता है, किन्तु बुद्धि के द्वारा हम स्वयं अपने को समझाते हैं । जो अपने को समझा सके । क्या समझा सके ? समझा सके कि जाने हुये का अनादर नहीं करूँगा, मिले हुये का दुरुपयोग नहीं करूँगा, सुने हुये प्रभु में अश्रद्धा नहीं करूँगा । आप श्रद्धा करें या न करें, आपकी रुचि।

अगर आपने अपने को यह समझा लिया कि मैं जाने हुये का अनादर नहीं करूँगा, मिले हुये का दुरुपयोग नहीं करूँगा, सुने हुये प्रभु में अश्रद्धा नहीं करूँगा, तब परिणाम होगा कि जाने हुये का अनादर न करने से, सिर्फ अनादर न करने से, क्या होगा ? जब आप जाने हुये का अनादर नहीं करेंगे, तब आपके जीवन में तीन प्रकार की स्मृति जाग्रत होगी, - कर्त्तव्य की स्मृति, स्वरूप की स्मृति और अपने प्रभु की स्मृति, अथवा यों कहिये कि जब आप जाने हुये का अनादर नहीं करेंगे, तब आपके जीवन में से राग का नाश होगा, असंगता प्राप्त होगी । आपके जीवन में से अकर्त्तव्य का नाश होगा, कर्त्तव्य-परायणता प्राप्त होगी । आपके जीवन में से आसक्तियों का नाश होगा, प्रेम का प्रादुर्भाव होगा । जाने हुये के आदर में ही कर्त्तव्य-परायणता, असंगता और आत्मीयता निहित है । दूसरी बात यह कि जब आप मिले हुये का दुरुपयोग नहीं करेंगे, तब सबल और निर्बल में एकता होगी। यह जो सुन्दर समाज का निर्माण होता है, यह खाली स्कीमों से नहीं होता है, योजनाओं से नहीं होता है, कानूनों से नहीं होता है । सुन्दर समाज का निर्माण होता है - बल का दुरुपयोग न करने से, मिले हुये का दुरुपयोग न करने से।


 - (शेष आगेके ब्लाग में) ‘प्रेरणा पथ' पुस्तक से, (Page No. 28- 29)

Monday, 18 November 2013

॥ हरि: शरणम्‌ !॥

Monday, 18 November 2013  
(मार्घशीर्ष कृष्ण प्रतिपदा, वि.सं.-२०७०, सोमवार)

(गत ब्लागसे आगेका)
हमारी आवश्यकता

        कोई भी प्राणी तबतक उन्नति नहीं कर सकता, जबतक उसे स्वयं अपनी दृष्टि से अपनी कमी का अनुभव न हो। विचारशील प्राणी कमी का अनुभव कर उसका नितान्त अन्त करने के लिए घोर प्रयत्न करते हैं । अतः हमको अपनी कमी का अन्त करने के लिए अखण्ड प्रयत्न करना चाहिए ।

        हम कब तक दुखी होते रहते हैं ? जबतक हम किसी को भी अपने से सबल, स्वतन्त्र तथा श्रेष्ठ पाते हैं । अतः हमारी पूर्ण स्वतन्त्र, सबल तथा श्रेष्ठ होने की स्वभाविक अभिलाषा है । जो स्वतन्त्र है, वही सबल तथा श्रेष्ठ है । यह नियम है कि 'क्रिया से भिन्न कर्ता का स्वरूप कुछ नहीं होता ।' जैसे, देखने की क्रिया से भिन्न नेत्र कुछ नहीं है । अभिलाषा क्रिया है । अतः जो हमारी अभिलाषा है, वही हमारा स्वरूप है । इस दृष्टि से यह सिद्धान्त निर्विवाद सिद्ध हो जाता है कि हम पूर्ण स्वतन्त्र, सबल तथा श्रेष्ठ हो सकते हैं, क्योंकि अपने को अपने स्वरूप से कोई भी भिन्न नहीं कर सकता । अतएव स्वभाविक अभिलाषा का पूर्ण होना अनिवार्य है ।

        क्या हमारी स्वभाविक अभिलाषा की पूर्ति के लिए यह संसार, जो प्रतीत होता है, समर्थ है ? यदि बेचारा संसार समर्थ होता, तो क्या हम इसके होते हुए भी निर्बलता एवं परतन्त्रता आदि बन्धनों में बँधें रहते ? कदापि नहीं । हमको परतन्त्रता, निर्बलता आदि बन्धनों से छुटकारा पाने के लिए केवल अपनी ओर देखना होगा । हम उसी दोष का अन्त कर सकते हैं, जो हमारा बनाया हुआ है; क्योंकि किसी और की बनाई हुई वस्तु को कोई और नहीं मिटा सकता है । 

- (शेष आगेके ब्लाग में) 'सन्त-समागम भाग-2' पुस्तक से, (Page No. 11-12) ।