Monday, 30
December 2013
(पौष कृष्ण त्रयोदशी, वि.सं.-२०७०, सोमवार)
व्यर्थ-चिन्तन का
स्वरूप और माँग की पूर्ति – 2
परम उदार प्रभु ने मानव का निर्माण केवल इसलिए किया है कि उसे कोई अपना
कहे । आप कहेंगे, क्यों भाई ! अपना कहने में अपने के प्रति कितनी गहरी प्रियता जाग्रत होती है
? इसे वे ही जानते हैं, जिन्होंने किसी
को अपना कहा है । पर, किसे अपना कहना है ? जिसे देखा नहीं है। किसे अपना कहना है ? जिसे सुना है
। सुने हुए की आत्मीयता में ही प्रियता है, और देखे हुये की निर्ममता
में ही निर्विकारता है । मिले हुये की असंगता में ही स्वाधीनता है । इस दृष्टि से निर्विकारता,
स्वाधीनता, प्रियता प्रत्येक भाई को प्रत्येक बहिन
को मिल सकती है और इसी जीवन में मिल सकती है इसी परिस्थिति में मिल सकती है । इसमें
लेशमात्र भी सन्देह नहीं करना चाहिये। तात्पर्य केवल इतना है कि व्यर्थ-चिन्तन और
अखण्ड स्मृति, ये दोनों एक ही जीवन में हैं, अर्थात् एक ही सिक्के के दो पहलू हैं । ममता, कामना,
तादात्म्य के आधार पर व्यर्थ-चिन्तन की उत्पत्ति और आत्मीयता के द्वारा
अखण्ड स्मृति की जागृति स्वत: होती है । यह ऐसी बात नहीं है, जिस पर आप केवल श्रद्धा करके रह जायँ । यह तो ऐसी बात है कि उसको अपना कर अनुभव
करें । इस बात का अनुभव करें कि आपका अपना कोई है नहीं । यदि नहीं है, तो क्या आप अकेले नहीं रह सकते हैं ? यदि अकेले नहीं
रह सकते, तो कोई आपका अवश्य है । परन्तु आस्था उसमें न हो,
जो आपके न चाहने पर चला जाय, बुलाने पर भी न आये। क्या उसमें ममता करें ? ऐसा करते हैं, तो यह हमारी अपनी भूल है ।
सोचिए, अज्ञान है क्या ? अविद्या है क्या ? जाने हुए का अनादर, न जानना नहीं । आप जानते हैं कि जो
मिला है, वह आपका व्यक्तिगत नहीं है। आप जानते हैं कि जो मिला
है वह 'पर' के लिये है, 'स्व' के लिये नहीं है । किन्तु फिर भी जो अपना नहीं है,
उसे अपना मानते हैं । जो 'पर' के लिये है, उसे अपने लिये
सँभाल कर रखते हैं । इसी भूल का परिणाम है कि आप व्यर्थ-चिन्तन में आबद्ध हो गये ।
मेरे भाई ! जो सदैव अपना है, न मानने पर भी अपना है, न जानने
पर अपना है; परन्तु उसको
अपना मानने की सामर्थ्य कहाँ चली गई? मेरा निवेदन है कि अखण्ड
स्मृति के बिना नीरसता नहीं जायगी, पराधीनता का नाश नहीं होगा,
अशान्ति का नाश नहीं होगा । अखण्ड स्मृति के बिना यह सम्भव नहीं है।
और अखण्ड स्मृति निर्ममता-निष्कामतापूर्वक आत्मीयता से ही साध्य है ।
- (शेष आगेके ब्लाग में) ‘प्रेरणा
पथ' पुस्तक से, (Page No. 89-90) ।